तू जाग, तेरा आत्म
पुकारे सिद्ध धाम।
द्रव्य तेरा नाम और पर्याय तेरा काम।
तेरी परिणति का है तुझसे अंजाम,
लोग करें कर्मों को यूँ ही बदनाम।
मिथ्यात्व से भ्रमकर तू भ्रमे संसार,
लोग करें कर्मों को यूँ ही बदनाम।
नित्य-अनित्य, एक-अनेक,
कौन-सा गुण कहो इसमें न समाया?
एक को ही माना तो रचा संसार।
लोग करें कर्मों को यूँ ही बदनाम।
एकांत धर्म माने ये सारा संसार,
जैनधर्म स्याद्वादी, रूप अनेकांत।
नय और प्रमाण से वस्तु समझते,
अंतर्मुख जाते, सभी इसी में समाते।
उपयोग जो मोड़े, तो बने भगवान्!
श्रावक का भी काम, वो तो मुनि का भी काम।
तेरी परिणति का तुझसे अंजाम,
तू जाग रे चेतन, तू जाग, तेरा आत्म
पुकारे सिद्ध धाम!
लोग करें कर्मों को यूँ ही बदनाम।
द्रव्य तेरा नाम और पर्याय तेरा काम।
रचनाकार: ब्र. पन्ना मेहता (Br. Panna Mehta), सोनगढ़