क्या धारावाहिक ज्ञान अप्रमाण है ? | Kya Dharavahik Jnan Apraman Hai

क्या धारावाहिक ज्ञान अप्रमाण है ?

-प्रो. वीरसागर जैन

धारावाहिक ज्ञान को प्रमाण मानने न मानने के सम्बन्ध में जैनाचार्यों में मतभेद पाया जाता है | आचार्य अकलंक ने सर्वप्रथम धारावाहिक ज्ञान को प्रमाणकोटि से बाहर किया था | उनसे पूर्व ऐसी व्यवस्था नहीं थी | तथा इनके बाद भी विद्यानन्द आदि आचार्यों ने इसे प्रमाण के लक्षण में आया हुआ एक व्यर्थ विशेषण माना है | कहा है कि ज्ञान चाहे गृहीत हो या अगृहीत, यदि अपने विषय को निर्णयात्मक रूप से जानता है तो वह प्रमाण ही है, उसकी प्रमाणता कहीं भी वर्जित नहीं है- न लोक में न शास्त्र में | यथा-

तत्स्वार्थव्यवसायात्मज्ञानं मानमितीयता |
लक्षणेन गतार्थत्वात् व्यर्थमन्यद्विशेषणम् ||
गृहीतमगृहीतं वा स्वार्थं यदि व्यवस्यति |
तन्न लोके न शास्त्रेषु विजहाति प्रमाणताम् || -तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक 1/10/78-79

अर्थ- स्व और अर्थ का निश्चय करनेवाला ज्ञान प्रमाण है -इतना ही लक्षण पर्याप्त है, इतने लक्षण से ही सर्व प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं | अतः अन्य सर्वथा अपूर्व अर्थ का ग्राहकपना, बाधविवर्जितपना, लोकसम्मतपना आदि विशेषण व्यर्थ हैं | यदि कोई ज्ञान, चाहे वह गृहीत हो या अगृहीत, स्व और अर्थ का निश्चय करने वाला है तो वह लोक एवं शास्त्र -दोनों में ही प्रमाणपने को नहीं छोड़ता है।

किन्तु वर्तमान न्याय मुख्यरूप से अकलंक-वचन पर ही आधारित/प्रचलित है, अतः उसमें धारावाहिक ज्ञान को अप्रमाण माना जाता है | अथवा- धारावाहिक ज्ञान का अन्य मतों में, सौगत भाट्ट आदि में, जो स्वरूप कहकर उसे प्रमाण माना गया है, वह सत्य सिद्ध नहीं होता है, अतः उसे अप्रमाण कहा गया है |

तथा अकलंक आचार्य ने भी ‘तत्त्वार्थवार्तिक’ में एक स्थान पर प्रमाण के लक्षण में ‘अपूर्व’ विशेषण को अनुचित कहा है | यथा-

“अपूर्वाधिगमलक्षणानुपपत्तिश्च सर्वस्य ज्ञानस्य प्रमाणत्वोपपत्तेः | प्रदीपवत् ज्ञानमपि उत्पत्त्यनन्तरं घटादीनामवभासकं भूत्वा प्रमाणत्वमनुभूय न तं व्यपदेशं त्यजति तदर्थत्वात् ।”

अर्थ- प्रमाण में अपूर्व अर्थ को जानने रूप लक्षण नहीं बन सकता, क्योंकि सभी ज्ञान प्रमाण होते हैं | जो ज्ञान अपनी उत्पत्ति के बाद घटादि पदार्थों का अवभासक होकर अपने में प्रमाणत्व का अनुभव करता है, वह उत्तर काल में भी प्रमाण ही रहता है, प्रमाण के व्यपदेश/संज्ञा/नाम को छोड़ नहीं देता है | जिस प्रकार दीपक प्रथम क्षण में स्व-पर पदार्थों का प्रकाशक होता है तो द्वितीयादि क्षणों में भी उनका प्रकाशक बना रहता है, उसी प्रकार ज्ञान के विषय में भी समझना चाहिए | इससे भी सिद्ध होता है कि धारावाहिक ज्ञान को मात्र धारावाहिक या गृहीतग्राही होने के कारण अप्रमाण मानना उचित नहीं है । ज्ञान कोई भी हो, यदि वह अविसंवादी है तो प्रमाण ही है ।

शंका- यदि ऐसा है तो न्यायदीपिका आदि ग्रन्थों में धारावाहिक ज्ञान को अप्रमाण कैसे कहा गया है ?

समाधान- ऊपर हमने सर्वप्रथम ही कहा है न कि धारावाहिक ज्ञान को प्रमाण मानने न मानने के सम्बन्ध में जैनाचार्यों में मतभेद पाया जाता है । वैसे मेरी समझ से सही बात यह होगी कि न्यायदीपिका आदि ग्रन्थों में जिस धारावाहिक ज्ञान को अप्रमाण कहा गया है, वह अन्यमताभिमत/भाट्टाभिमत धारावाहिक ज्ञान है, जो प्रमिति का जनक नहीं है, अतः प्रमाण सिद्ध नहीं होता । जैन दर्शन में वैसा धारावाहिक ज्ञान नहीं कहा है, अतः उसे अप्रमाण नहीं माना जा सकता । ऐसा मुझे अन्यत्र भी अनेक स्थानों पर हुआ लगता है । जैसे कि दर्शन को अप्रमाण मानने के सम्बन्ध में भी सिद्ध होता है । न्यायदीपिका, परीक्षामुख आदि में जिस दर्शन को अप्रमाण कहा गया है, वह अन्यमताभिमत/बौद्धाभिमत दर्शन है, जैनदर्शनाभिमत दर्शन नहीं है । इस सम्बन्ध में मेरा अन्य लेख ‘क्या दर्शनोपयोग अप्रमाण है’ पठनीय है । तथापि विद्वज्जनों से निवेदन है कि वे स्पष्ट समाधान करने की कृपा करें |