क्या दर्शनोपयोग अप्रमाण है ? | Kya Darshanopayog Apraman Hai

क्या दर्शनोपयोग अप्रमाण है ?

-प्रो. वीरसागर जैन

जैन दर्शन में चेतना या उपयोग के दो भेद कहे हैं- ज्ञान एवं दर्शन | ये दोनों ही पदार्थों को जानने का कार्य करते हैं | किन्तु जैन-न्याय के ग्रन्थों में ज्ञान को ही प्रमाण माना गया है, दर्शन को नहीं | परीक्षामुख आदि में तो स्पष्ट रूप से ही दर्शन की प्रमाणता का निराकरण किया गया है । कहा गया है कि गृहीत ज्ञान, दर्शन, संशय आदि प्रमाणाभास हैं | यथा-

‘अस्वसंविदितगृहीतार्थदर्शनसंशयादयः प्रमाणाभासाः’ - परीक्षामुखसूत्र 6/2

अर्थ- अस्वसंविदित, गृहीतार्थ, दर्शन और संशयादि प्रमाणाभास हैं ।

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि दर्शन भी तो पदार्थ का सम्यक् अवलोकन करता है, अतः उसे भी ज्ञान की भांति प्रमाण मानना चाहिए था, उसे प्रमाण क्यों नहीं माना गया ? क्या वह अप्रमाण है ? यदि अप्रमाण है तो शास्त्रों में उसे मिथ्या क्यों नहीं कहा गया ?

यदि कहा जाए कि दर्शन ज्ञान की तरह व्यवसायात्मक/निर्णयात्मक नहीं होता इसलिए उसे प्रमाण नहीं माना है, तो ऐसे तो अवग्रह और ईहा ज्ञान भी नहीं होते, उनको प्रमाण क्यों माना गया ?

यदि कहा जाए कि दर्शन वस्तु के सामान्य अंश को जानता है, निराकार होता है इसलिए उसे प्रमाण नहीं माना है, तो यह तो उसका स्वरूप ही है, यह कोई दोष नहीं है।

समाधान- दरअसल, परीक्षामुख आदि न्यायग्रन्थों में जिस दर्शन का निराकरण किया गया है, वह बौद्धाभिमत निर्विकल्पक दर्शन है, जो स्वविषय का उपदर्शक नहीं होता और इसीलिए उसे प्रमाणाभास कहकर उसका निराकरण किया गया है, जैसा कि वहीं पर आगे निम्नलिखित सूत्र द्वारा स्पष्ट किया गया है -

‘स्वविषयोपदर्शकत्वाभावात्’ - परीक्षामुखसूत्र 6/3

इस प्रकार यह भलीभांति स्पष्ट है कि जैन-न्याय-ग्रन्थों में जैनदर्शनाभिमत दर्शन की प्रमाणता का निराकरण नहीं किया गया है |

शंका- किन्तु वह प्रमाण है - यह भी कहीं सिद्ध नहीं किया गया है ?

समाधान- वस्तुतः बात ऐसी लगती है कि न्याय की चर्चा मुख्यतः अन्य दर्शनों के साथ होती रही है और उसमें दर्शन को प्रमाण की कोटि में लाने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी, क्योंकि अन्य दर्शन ऐसी कोई अवधारणा दर्शनोपयोग की नहीं मानते, यह तो जैन दर्शन का ही विशेष सूक्ष्म विषय है |

शंका- अवग्रह, ईहा भी तो जैनदर्शन के ही विशेष सूक्ष्म विषय हैं, उनकी प्रमाणता क्यों स्थापित की गई?

समाधान- वे सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष की चर्चा करते समय सहज आ गये, उन्हें अलग से नहीं लेना पड़ा | वह भी सब आचार्यों ने नहीं लिया, कुछ ने ही जैन पाठकों की जिज्ञासा शान्त करने के लिए संक्षेप में लिया है, किन्तु दर्शन को तो एकदम अलग से लेना पड़ता |

शंका- ले लेते, उसमें क्या दिक्कत थी ?

समाधान- यह विषय जटिल बहुत है, अन्य दर्शन वालों को तो विशेष रूप से इसे समझाना बहुत कठिन है। जैन ग्रन्थों में भी यह विषय एकदम स्पष्ट रूप से नहीं मिलता | तथापि हमें उम्मीद है कि यह विषय कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी आचार्य ने अवश्य उठाया होगा, हमने देखा नहीं है -इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि कहीं है ही नहीं। हमें और खोजना चाहिए।

फ़िलहाल, बहुत खोजने पर हमें इस सन्दर्भ में अभयदेवसूरि कृत सन्मतिसूत्र टीका, पृष्ठ 458 पर यह विषय संक्षेप में उपलब्ध हुआ है, जहाँ दर्शन को प्रमाण के रूप में स्थापित किया है और यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। कोई कारण नहीं कि हम इसे न मानें। वहाँ टीकाकार अभयदेवसूरि लिखते हैं कि निराकार और साकार दोनों ही उपयोग अपने विषय को मुख्य रूप से प्रतिभासित करने के कारण तथा इतर विषय को गौण करने के कारण प्रमाण हैं। यथा-
“निराकारसाकारोपयोगौ तूपसर्जनीकृत तदितराकारौ स्वविषयावभासकत्वेन प्रवर्तमानौ प्रमाणं न तु निरस्तेतराकारौ, तथाभूतवस्तुरूपविषयाभावेन निर्विषयतया प्रमाणत्वानुपपत्तेः इतरांशविकलैकांश रूपोपयोगसत्तानुपपत्तेश्च।”
(सिद्धिविनिश्चय, प्रस्तावना, पृष्ठ 105)

इसप्रकार हम कह सकते हैं कि दर्शन को प्रमाण मानने में किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं है। उसे अप्रमाण कहना/मानना उचित नहीं है। उसमें अप्रमाणता का हेतुभूत विसंवाद नहीं पाया जाता, वह संशय-विपर्यय-अनध्यवसायरूप नहीं है।

शंका- आपने ऊपर कहा कि दर्शनोपयोग का स्वरूप जैन ग्रन्थों में भी एकदम स्पष्ट नहीं है, वह क्या है ?

समाधान- मैंने ऊपर जो यह कहा था कि दर्शनोपयोग का स्वरूप जैन ग्रन्थों में भी एकदम स्पष्ट नहीं है, उसका आशय यह है कि वह मेरी समझ में नहीं आया है, मैं उसे जब भी ठीक से पढ़ने-समझने की कोशिश करता हूँ, तभी उलझ जाता हूँ, स्पष्ट नहीं हो पाता हूँ, वहाँ मुझे आचार्यों में भी कुछ मतभेद-सा समझ में आता है।

तथापि अब तक मेरी समझ में जो आया है वह यह है कि ‘आत्मग्राहकं दर्शनं परग्राहकं ज्ञानम्’ (बृहद् द्रव्यसंग्रह टीका, गाथा 44) अर्थात् जो आत्मा को जाने वह दर्शन है और जो पर को जाने वह ज्ञान है। हम लोग जो कहते हैं कि ज्ञान स्व-पर-प्रकाशक है, वह स्थूल कथन है, वहाँ हम ज्ञान में दर्शन को गर्भित कर लेते हैं। ज्ञान स्व-पर-प्रकाशक है -इसका अर्थ है कि आत्मा स्व-पर-प्रकाशक है, क्योंकि वह दर्शन एवं ज्ञान दोनों गुणों का स्वामी है, दोनों गुणों के द्वारा स्व एवं पर को भलीभांति जानता है।

तथा जब यह कहा जाता है कि दर्शन निराकार/सामान्य को जानता है और ज्ञान साकार/विशेष को जानता है, तब हमें निराकार/सामान्य का अर्थ आत्मा और साकार/विशेष का अर्थ पर समझना चाहिए।

तथा जो यह कहा जाता है कि छद्मस्थ के दर्शन-ज्ञान क्रम से होते हैं और केवली के युगपत्, उसका अभिप्राय भी यही है कि छद्मस्थ अवस्था में हमारा उपयोग एक समय में एक ही जगह रहता है, जब हम स्व को जानते हैं तब पर को नहीं जानते और जब पर को जानते हैं तब स्व को नहीं जानते; किन्तु केवली एक साथ स्व एवं पर दोनों को युगपत् जानते हैं।

समयसार, गाथा 299 की टीका में भी कहा है कि चेतना स्वपरप्रकाशक है, क्योंकि द्विरूप है, दृग्ज्ञप्तिरूप है, जो सामान्य को जाने वह दर्शन है और जो विशेष को जाने वह ज्ञान है।

निष्कर्ष- न्यायशास्त्र में प्रमाण को सामान्यविशेषात्मक पूर्ण वस्तु को जाननेवाला एवं स्वपरप्रकाशक कहा है, इससे सिद्ध होता है कि वहाँ ज्ञान में दर्शन भी गर्भित है, अतः वह भी प्रमाण ही है, उसे अप्रमाण नहीं कह सकते। आशा है विद्वज्जन इस विषय पर चिन्तन करेंगे और जो कुछ स्खलन हो उसको संशोधित करेंगे।

प्रमाण क्या है- ज्ञान या आत्मा ?
-प्रो. वीरसागर जैन

वर्तमान में हम सब न्यायशास्त्र को पढ़ते-पढ़ाते समय यह बात बहुत जोर देकर स्थापित करते हैं कि ज्ञान ही प्रमाण है, अन्य कुछ नहीं | यथा-

स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मक ज्ञानं प्रमाणम् |1
-आचार्य माणिक्यनंदी, परीक्षामुख १/१
हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थं हि ज्ञानं ततो ज्ञानमेव तत् |2 -आचार्य माणिक्यनंदी, परीक्षामुख १/१
सम्यग्ज्ञानं प्रमाणम् |3

  • अभिनव धर्मभूषण यति, न्यायदीपिका १/८

इतना ही नहीं, उक्त सूत्रों की व्याख्या करते हुए हम यह भी भलीभांति समझते-समझाते हैं कि यहाँ ‘ज्ञान’ पद से अज्ञानरूप सन्निकर्षादि एवं प्रमाता-प्रमिति आदि की निवृत्ति समझनी चाहिए, क्योंकि वे सब भी प्रमा के करण नहीं हैं ।4

इस प्रसंग में पुनः युक्तिपुरस्सर यह बात स्थापित की जाती है कि ज्ञान ही प्रमाण है, अन्य कुछ नहीं, आत्मा भी नहीं | यथा-

“शंका- ‘ज्ञान’ पद से अन्य सबकी निवृत्ति तो ठीक, पर प्रमाता की निवृत्ति तो नहीं करनी चाहिए, वह तो प्रमाण/ज्ञान का आधार ही है, अधिकरण है ।

समाधान- वह अधिकरण है, करण नहीं | प्रमाण तो वह होता है जो प्रमा का करण हो ।”

इस प्रकार न्यायशास्त्र के हम सभी विद्यार्थी यही जानते-मानते हैं कि ज्ञान ही प्रमाण है, आत्मा नहीं |

किन्तु यदि हम प्राचीन जैनागम को ध्यान से देखते हैं अथवा उस परम्परा के अन्य ग्रन्थों को भी देखते हैं तो ज्ञात होता है कि वहाँ तो लगभग सर्वत्र ही आत्मा को ही प्रमाण कहा गया है, ज्ञान को नहीं | ज्ञान को प्रमाण मानने का तो बल्कि वहाँ निषेध किया गया है, वह भी युक्तिपुरस्सर | यथा-

“किं प्रमाणम् ? निर्बाधबोधविशिष्टः आत्मा प्रमाणम् | … ज्ञानस्यैव प्रामाण्यं किमिति नेष्यते ? न, जानाति परिच्छिनत्ति जीवादिपदार्थानिति ज्ञानात्मा, तस्यैव प्रामाण्याभ्युपगमात् । न ज्ञानपर्यायस्य स्थितिरहितस्य उत्पादविनाशलक्षणस्य प्रामाण्यं, तत्र त्रिलक्षणाभावतः अवस्तुनि परिच्छेदलक्षणार्थक्रियाभावात् स्मृतिप्रत्यभिज्ञानुसंधानप्रत्ययादीनामभावप्रसंगाच्च ।” 5
-आचार्य वीरसेन, धवला ९/४,१,४५

अर्थ- शंका- प्रमाण क्या है ? समाधान- निर्बाधबोधविशिष्ट आत्मा ही प्रमाण है | शंका- ज्ञान को ही प्रमाण क्यों नहीं स्वीकार करते हो ? समाधान- नहीं, जो जीवादिक पदार्थों को भलीभांति जाने उस ज्ञानरूप आत्मा को ही प्रमाण माना गया है | ज्ञान तो स्थितिरहित उत्पादविनाशलक्षणवाली पर्याय है, उसके प्रमाणता नहीं बनती है, क्योंकि उसमें त्रिलक्षणाभाव से वस्तुत्व ही नहीं बनता, उसमें परिच्छित्तिरूप अर्थक्रिया ही नहीं बनती और उससे स्मृति-प्रत्यभिज्ञान-अनुसन्धानादि प्रत्ययों के अभाव का भी प्रसंग उपस्थित होता है | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रमाण के सम्बन्ध में जैनाचार्यों में भी मतभेद है । एक कहते हैं कि ज्ञान ही प्रमाण है, आत्मा नहीं और दूसरे कहते हैं कि आत्मा ही प्रमाण है, ज्ञान नहीं । जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि सत्य क्या है ?

समाधान- दरअसल, दोनों कथन विवक्षाभेद से सही हैं और दोनों की विवक्षा भी ऊपर ही आचार्यों ने स्पष्ट कर दी है, हमें उसी को ठीक से समझना है, उलझन में नहीं पड़ना है । जब यह कहा जाए कि ज्ञान ही प्रमाण है, ज्ञाता नहीं, तब हमें समझ लेना चाहिए कि प्रमिति के करण की विवक्षा मुख्य है, आधार की नहीं । तथा जब यह कहा जाए कि आत्मा ही प्रमाण है, ज्ञान नहीं, तब हमें समझ लेना चाहिए कि ज्ञान एवं ज्ञाता के अभेद सत् की विवक्षा मुख्य है, भेदरूप ज्ञान की नहीं । यही बात ब्रह्मदेवसूरि ने भी बृहद् द्रव्यसंग्रह की संस्कृत-टीका में कही है । यथा-

“संशयविमोहविभ्रमरहितवस्तुज्ञानस्वरूपात्मैव प्रमाणम् । स च प्रदीपवत् स्वपरगतं सामान्यं विशेषं च जानाति । तेन कारणेनाभेदेन तस्यैव प्रमाणत्वमिति ।”6

इस प्रकार यहाँ ब्रह्मदेवसूरि ने एक और भी विशेष बात जोड़ दी है कि आत्मा को प्रमाण मानना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि तभी प्रमाण स्वपरप्रकाशक एवं सामान्यविशेषप्रकाशक सिद्ध होगा, यदि हम मात्र ज्ञान को ही प्रमाण मानेंगे तो ज्ञान तो केवल परप्रकाशक एवं विशेषप्रकाशक ही है, यह दोष उत्पन्न होगा । यदि आत्मा को प्रमाण मानेंगे तो ज्ञान-दर्शन दोनों सम्मिलित हो जाएँगे और प्रमाण स्वपरप्रकाशक एवं सामान्य-विशेषप्रकाशक सिद्ध हो जाएगा ।

सन्दर्भ-

  1. आचार्य माणिक्यनंदी, परीक्षामुख १/१
  2. आचार्य माणिक्यनंदी, परीक्षामुख १/१
  3. अभिनव धर्मभूषण यति, न्यायदीपिका १/८
  4. “ज्ञानपदेन प्रमातुः प्रमितेश्च व्यावृत्तिः ।” -न्यायदीपिका १
  5. आचार्य वीरसेन, धवला ९/४,१,४५
  6. ब्रह्मदेवसूरि, बृहद् द्रव्यसंग्रह, गाथा ४४