श्री कुन्दकुन्द महिमा भजन
मंगलाचरण (श्लोक):
आचार्य कुन्दकुन्दाख्यो, वक्रग्रीवो महामुनिः ।
एलाचार्यो गृद्धपिच्छ, इति तन्नाम पञ्चधा ॥
मुखड़ा (Chorus):
कुन्दकुन्द-सा पारस छूकर, कौन नहीं पारस बन जाये ।
‘समयसार’ का अवगाहन कर, समयसार ही खुद बन जाये ॥
अंतरा 1:
कलिकाल सर्वज्ञ मुनीश्वर, दर्शन को दर्पण दे डाला ।
महावीर के तत्त्वबोध को, शोध-शोध जग को दे डाला ॥
तत्वबोध को स्वीकारे जो, आत्मबोध उसको हो जाये ।
कुन्दकुन्द-सा पारस छूकर, कौन नहीं पारस बन जाये ॥
अंतरा 2:
गये सदेह विदेह धन्य तुम, सीमन्धर से तत्व सुना था ।
उसको वैसा ही प्राकृत की, गाथाओं में गूँथ दिया था ॥
बने अनेकों पाहुड़ उससे, सत्य बोध के दर्शन को ।
पर द्रव्यों से भिन्न बताकर, एक शुद्ध निज दर्शन को ॥
निज दर्शन से सहज सुखी हो, सुख का ही स्वामी बन जाये ।
कुन्दकुन्द-सा पारस छूकर, कौन नहीं पारस बन जाये ॥
अंतरा 3:
षट्कारक निज के निज में हैं, पर में कुछ अपनत्व नहीं है ।
मैं ही मेरा, मैं हूँ निश्चित, पर का कुछ अस्तित्व नहीं है ॥
अंतर चक्षु से अंतर में, जिसने जब भी जो देखा है ।
वही केवल आत्मतत्व है, अन्य नहीं कुछ, सब धोखा है ॥
आत्मतत्व को जो आराधे, मिथ्यातम उसका गल जाये ।
कुन्दकुन्द सा पारस छूकर, कौन नहीं पारस बन जाये ॥
अंतरा 4:
नित्य देशना अरिहंतों सी, समयसार हमको देता है ।
सिद्धों सा शुद्धत्व बताकर, आत्मबोध सबको देता है ॥
सर्व साधु के आचरणों का, उपाध्याय के उपदेशों का ।
कुन्दकुन्द के निर्देशों का, समयसार दर्शन देता है ॥
श्रद्धा हो जब समयसार पर, समयसार को ही पा जाये ।
कुन्दकुन्द सा पारस छूकर, कौन नहीं पारस बन जाये ॥
Artist: Anvay jain, Anubhav jain
Satpath Foundation, Nagpur