स्थापना (सवैया मात्रिक छन्द-२१ मात्रा)
(ज्ञानोदय)
हे सुखकारी ! अतिशयकारी, पूज्य बड़ेबाबा सुखकार।
कुण्डलपुर पर्वत पर शोभित, जिन्हें पूजते सुर-नर-नार॥
पूजा को हम द्रव्य सँजोकर, करते आह्वानन नत माथ।
हृदय कमल के उच्चासन पर, आन विराजो मेरे नाथ॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्हं नमः श्री वृषभजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर…।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः… । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्… । (पुष्पांजलिं…)
बाह्य मैल से देह मलिन है, उसको जल से सब धोते ।
देह सजाकर सब खुश हैं पर, कर्म रोग से सब रोते॥
जनम जरा मृति राग द्वेष को, धोने को हम सब आए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, शुचि जल पूजन को लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्हं नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-
विनाशनाय जलं…।
क्रोध आग है महा भयङ्कर, जिसमें जलते संसारी।
आतम वैभव जला उसी में, दुखी भटकते नर नारी॥
तन मन आतम शीतल करने, सभी ताप हरने आए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, चंदन पूजन को लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्हं नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय संसारताप-
विनाशनाय चंदनं…।
धन बल सत्ता रूप सम्पदा, पा करके जड़ की माया।
नश्वर जीवन में भूले हम, अक्षय आतम ना ध्याया॥
तजकर दुखद जगत् पद सारे, प्रभु जैसे बनने आए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, अक्षत पूजन को लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्ह नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये
अक्षतान् … ।
सब रोगों में महारोग है, कामदेव जिसको कहते।
जिसके रोगी भव-भव भटकें, सब दुख संकट वे सहते॥
तीन लोक के इस राजा पर, विजय प्राप्त करने आए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, पुष्प समर्पण को लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्ह नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय कामबाण-
विध्वंसनाय पुष्पं…।
क्षुधा रोग के कारण हम सब, पाप बन्ध करते जाते।
इसकी औषध करने को हम, भक्ष्याभक्ष्य भखे जाते॥
रोग निरन्तर बढ़ता जाता, इसे नाशने अब आए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, शुभ नैवेद्य भेंट लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं यें बड़ेबाबा अर्ह नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय क्षुधारोग-
विनाशनाय नैवेद्यं…।
मोह तिमिर के कारण जग में, चारों ओर अँधेरा है।
महाबली इस राजा का ही, सारे जग में डेरा है॥
ज्ञान-दीप के प्रभा पुञ्ज को, देख मोह तम नश जाए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, दीपक पूजन को लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्ह नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय मोहान्धकार-
विनाशनाय दीपं…।
अच्छे बुरे सभी कर्मों ने, हमको बाँधा इस जग में।
सब जल जाता ये ना जलते, सुख-दुख देते पग-पग में॥
धूप सुगन्धी तव-पद-रज से, कर्माष्टक झट जल जाए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, धूप चढ़ाने को लाए॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्ह नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय
धूपं…।
फल की इच्छा से इस जग के, हमने काम किए सारे ।
पाए खुशी क्षणिक फल पाकर, दुखी हुये जब हम हारे।।
दुखी जगत् के सब फल तजकर, मोक्ष महाफल मन भाये।
आज बड़ेबाबा कै द्वारे, शुभ फल पूजन को लाए॥
ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अईं नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय मोक्षमहाफल-
प्राप्तये फलं…।
शुचि जल चंदन अक्षत लाए, शुद्ध पुष्प नैवेद्य लिए।
दीप धूप नाना फल मिश्रित, श्रेष्ठ अर्घ्य हम भेंट किए॥
अर्घ्य चढ़ाने वाले भविजन, अनर्घपद आतम पाए।
आज बड़ेबाबा के द्वारे, अर्घ्य चढ़ाने को लाए॥
ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अईं नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय अनर्घपद-प्राप्तये
अर्घ्य…।
पंचकल्याणक अर्घ्य (दोहा)
दूज कृष्ण आषाढ़ को, कुण्डलपुर के नाथ।
वसे गर्भ मरुमात के, हो नमोऽस्तु नत माथ॥
ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अईं नमः आषाढ़कृष्णद्वितीयायां गर्भमङ्गल-
मण्डिताय श्री वृषभजिनेन्द्राय अर्घ्यं…।
चैत्र कृष्ण नवमी तिथी, कुण्डलपुर के नाथ।
जन्मे नाभिराय के, हो नमोऽस्तु नत माथ॥
ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अईं नमः चैत्रकृष्णनवम्यां जन्ममङ्गलमण्डिताय
श्री वृषभजिनेन्द्राय अर्घ्यं…।
जन्म तिथि में मुनि बने, कुण्डलपुर के नाथ।
नग्न दिगम्बर रूप को, हो नमोऽस्तु नत माथ॥
ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्हं नमः चैत्रकृष्णनवम्यां तपोमङ्गलमण्डिताय
श्री वृषभजिनेन्द्राय अर्घ्यं…।
ग्यारस फाल्गुन कृष्ण को, कुण्डलपुर के नाथ।
जगतपूज्य ज्ञानी बने, हो नमोऽस्तु नत माथ॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्ह नमः फाल्गुनकृष्ण-एकादश्यां ज्ञानमङ्गल-
मण्डिताय श्री वृषभजिनेन्द्राय अर्घ्य… ।
कृष्णा चौदस माघ को, कुण्डलपुर के नाथ।
मोक्ष गए कैलाश से, हो नमोऽस्तु नत माथ॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्ह नमः माघकृष्णचतुर्दश्यां मोक्षमङ्गल-
मण्डिताय श्री वृषभजिनेन्द्राय अर्घ्य… ।
जाप्य मंत्र-ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े-बाबा अईं नमः ।
जयमाला (दोहा)
नाथ बड़े बाबा बड़े, स्वामी परम दयाल।
भक्ति सहित गुणगान की, कथा करूँ जयमाल॥
(ज्ञानोदय)
मध्यप्रदेश दमोह जिले में, कुण्डलपुर इक ग्राम रहा।
इसके दक्षिण में इक पर्वत, कुण्डलगिरि शुभधाम रहा॥
ऊपर नीचे जहाँ बहुत से, मन्दिर प्रतिमाएँ प्यारी।
बीचों-बीच बड़ेबाबा की, प्रतिमा है अतिशयकारी॥१॥
अतिशय की है कथा निराली, किंवदन्ति व्यापारी की।
ऐसे पर्वत पर प्रभु आए, खुशी प्रजा तब सारी थी ॥
पद्मासन प्रतिमा मनहारी, चर्चित देश विदेशों में।
तब औरंगजेब था आया, धर्म विरोधी भेषों में॥२॥
मूर्ति विरोधी उसने जैसे, घात लगायी बाबा पर।
दूध धार बह शहद-मक्खियाँ, देखा भागा वह डरकर॥
देखा अतिशय जब वह उसने, बना मूर्ति पूजक सच्चा।
नहीं मूर्तियाँ अब तोडूंगा, नियम लिया उसने अच्छा॥३॥
पन्ना का राजा बेघर था, राज्य हारकर वह अपना।
मन्दिर जीर्णोद्धार कराकर, पूर्ण हुआ उसका सपना॥
बहुत-बहुत है अतिशय प्यारे, श्रद्धा के आधार रहे।
नाथ अनाथों के हो प्रभु तुम, सबको भव से तार रहे॥४॥
चरण आपके तारणहारे, रोग शोक भय नाशक हैं।
इसीलिए तो तुमको ध्याते, सच्चे योगी साधक हैं॥
विद्यागुरुवर छोटेबाबा, पहली बार यहाँ आए।
मन्दिर छोटा सा देखा तो, बहुत बड़ा सब बनवाए॥५॥
उसमें बाबा जाएँ कैसे?, सभी ओर यह चर्चा थी।
किन्तु फूल सी उड़कर पहुँची, भक्ति-पुण्य गुरु अर्चा थी॥
बहुत बड़ा यह अतिशय देखा, किए विहार बड़ेबाबा।
श्रद्धालु लाखों दर्शक थे, संघ सहित छोटेबाबा॥६॥
छोटेबाबा ने उच्चासन, दिया बड़ेबाबा को ज्यों।
बड़ा संघ छोटेबाबा का, किया बड़ेबाबा ने त्यों॥
अट्ठावन बहनों की दीक्षा, हुई आर्यिका श्रेष्ठ बनीं।
दोनों बाबा इक दूजे का, रखते हैं नित ध्यानधनीं॥७॥
ज्ञान-सिन्धु के शुभाशीष से, कुण्डलपुर जब गुरु आए।
कृपा बड़ेबाबा की पाकर, समवशरण सी छवि पाए॥
छोटेबाबा का सपना जो, हुआ समय पाकर सच्चा।
बहुत विरोधी होने पर भी, दिया उच्च आसन अच्छा॥८॥
जो भी आते द्वार आपके, मन वांछित फल पाते हैं।
उभय लोक के वैभव पाकर, मुक्ति रमा पा जाते हैं।
सो मिलकर हम भक्त पुकारें, टेर सुनो अब तो बाबा।
‘सुव्रत’ धरकर तुमको पूजें, अपने सम कर लो बाबा॥९॥
दोहा
सद्गुण के भण्डार हैं, वृषभनाथ भगवान्।
पूजा क्या ? जयमाल क्या ? मैं बालक नादान॥
फिर भी श्रद्धावश किया, पूजन वा जयमाल।
उसका फल बस यह मिले, छूटे भव जंजाल॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़ेबाबा अर्हं नमः श्री वृषभजिनेन्द्राय अनर्घपद-प्राप्तये
जयमाला पूर्णार्घ्य… ।
दोहा
पूज्य बड़ेबाबा करे, विश्वशान्ति कल्याण।
प्रासुक जल की धार दे, हम पूजत भगवान॥
(शान्तये शान्तिधारा…)
कल्पवृक्ष के पुष्पसम, पुष्पांजलि पद लाए।
सब कष्टों को मेट दो, वृषभनाथ जिनराय॥
(पुष्पांजलिं…)
चौबीस तीर्थंकरों के नाम व चिह्न
वृषभनाथ का बैल चिह्न है, हाथी अजितनाथप्रभु का।
शम्भव प्रभु का घोड़ा प्यारा, बन्दर अभिनन्दनप्रभु का॥
सुमतिनाथ का चकवा पक्षी, पद्मप्रभू का लालकमल।
सुपार्श्वप्रभु का चिह्न साँथिया, चन्द्रप्रभू का चन्द्र विकल॥
मगर चिह्न प्रभु पुष्पदंत का, कल्पवृक्ष शीतलप्रभु का।
है गैंड़ा श्रेयांसनाथ का, भैंसा वासुपूज्यप्रभु का॥
विमलनाथ का सुन्दर शूकर, अनन्त जिनवर का सेही।
धर्मनाथ का वज्रदण्ड अरु, शान्तिनाथ का हिरण सही॥
कुन्थुनाथ का बकरा प्यारा, मछली अरनाथप्रभु का।
मल्लिनाथ का चिह्न कलश है, कछुआ मुनिसुव्रतप्रभु का॥
श्वेतकमल नमिनाथ देव का, नेमिनाथ का शंख रहा।
पार्श्वनाथ का चिह्न सर्प अरु, वर्द्धमान का सिंह रहा॥
Artist: मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज
स्रोत: श्री जिनवाणी (पूजन-पाठ संग्रह)