क्षणभंगुर संसार | Kshanbhangur sansar

तू इस जग में है आता ।
तो पक्का यह भव छोड़कर जाता ॥
अरे पर नहीं है तेरा ।
तो हटा अपने मन का इससे बसेरा ॥
अगर यह तेरा होता ।
तो इनको तू न खोता ॥
अरे अध्यात्म को घोल ।
और मोक्ष के द्वार खोल ॥
हटा पर से ममता ।
क्योंकि इनसे दुख है बढ़ता ॥

रचनाकार: दिव्य जैन (Divy Jain), उदयपुर
Instagram: @divyj_ain11