क्षमावाणी पर्व : एक अनुशीलन | Kshamavani Parv Ek Anushilan

क्षमावाणी पर्व : एक अनुशीलन

-प्रो. वीरसागर जैन

क्षमावाणी पर्व का वैशिष्ट्य

यूँ तो हमारा देश पर्वों का ही देश है। यहाँ इतने अधिक पर्व होते हैं कि एक कहावत ही बन गई है- ‘सात वार, नौ त्योहार’ अर्थात् एक सप्ताह में दिन तो सात ही होते हैं किन्तु त्यौहार (पर्व) नौ-दस तक भी हो जाते हैं। हम प्रायः देखते ही हैं कि एक ही दिन में दो-दो पर्व आ जाते हैं।

किन्तु क्षमावाणी का यह पर्व अनेक अर्थों में अन्य सभी पर्वों से बहुत अलग है।

अन्य पर्वों पर जहाँ हम मित्रों के घर जाते हैं, उन्हें गले लगाकर मुबारकवाद देते हैं, वहीं आज इस क्षमावाणी पर्व के दिन हमें शत्रुओं के घर जाना होता है, उन्हें गले लगाना होता है और उनके एवं अपने मनोमालिन्य को पूरी तरह धोना होता है। तथा यह कार्य आसान नहीं है, छोटा भी नहीं है, इसीलिए क्षमावाणी को ‘महापर्व’ कहा जाता है।

इसीप्रकार जगत् के प्रायः अन्य सभी पर्व किसी-न-किसी व्यक्तिविशेष या घटना-विशेष से सम्बन्धित हैं और उसी की स्मृतिस्वरूप मनाए जाते हैं। जैसे- होली, दीपावली, दशहरा, रामनवमी, जन्माष्टमी इत्यादि । परन्तु यह क्षमावाणी महापर्व किसी भी व्यक्ति या घटना विशेष से सम्बन्धित नहीं है। इसका सम्बन्ध तो विशुद्ध रूप से अपने मनोभावों की मलिनता दूर करने से है।

क्रोध सदा सर्वत्र सभी के लिए अहितकारी है और क्षमा सदा सर्वत्र सभी के लिए हितकारी है- बस, यही सार्वकालिक, सार्वभौमिक और सार्वजनिक सन्देश है इस क्षमावाणी महापर्व का । अतएव यह सही अर्थों में एक शाश्वत महापर्व है, पर्वराज है।

क्षमावाणी पर्व की प्रासंगिकता

इस पर्व की प्रासंगिकता भी दुनिया में कभी खत्म नहीं हो सकती। आधुनिक युग में भी क्रोध की तीव्रता के कारण अनेकानेक अपराध घर में, समाज में, सड़क आदि स्थानों पर प्रायः प्रतिदिन हो रहे हैं जिनसे हम सभी समाचार-पत्रों द्वारा भलीभाँति परिचित हैं। अतः क्षमावाणी विश्वकल्याण का शाश्वत पर्व है। वैश्वीकरण के इस दौर में इसे ‘विश्व-पर्व’ की संज्ञा और मान्यता प्रदान की जा सकती है।

क्षमा का जीवन के हर क्षेत्र में असाधारण महत्त्व है। क्रोधी व्यक्ति रात-दिन जलता-भुनता रहता है, स्वयं को और दूसरों को भी सदा संतप्त करता रहता है, कोई कार्य ठीक से नहीं कर पाता। उसका आध्यात्मिक जीवन तो दूर, लौकिक जीवन भी सहज नहीं रह पाता। किन्तु क्षमावान् जीव सदा सुख-चैन की साँसें लेता रहता है, कैसी भी प्रतिकूल स्थिति हो, विचलित नहीं होता। क्षमाभाव से उसका मन सदा हल्का, शांत और प्रफुल्लित रहता है, अतः वह सहज ही सर्व कार्यों की सिद्धि में सफल हो जाता है।

जीवन में उन्नति हेतु मन की सहज संतुलित स्थिति सर्वप्रथम आवश्यक है और इसके लिए यह क्षमावाणी महापर्व ही रामबाण औषध सिद्ध हो सकता है, इसी से बात-बात पर क्रोधित हो उठने की हमारी मानसिक दुर्बलता का ठीक से उपचार हो सकता है।

क्षमावाणी महापर्व का पावन सन्देश है कि क्रोध का पूर्णतः त्याग करके क्षमाभाव धारण करो। यहाँ ‘क्रोध का पूर्णतः त्याग करके क्षमा भाव धारण करो’- का सूक्ष्म अभिप्राय यह भी है कि क्रोधादि सर्व कषायों (मनोविकारों) को त्यागकर क्षमादि सर्व पवित्र भावों को धारण करो; क्योंकि यहाँ ‘क्रोध’ पद वस्तुतः सर्व कषायों का और ‘क्षमा’ पद सर्व निर्मल भावों का प्रतिनिधि है। जो व्यक्ति क्रोध को पूर्णतः त्याग देता है, निश्चय ही उसके जीवन में सर्व कषायों का अभाव हो जाता है और वह क्षमादि सर्व निर्मल भावों को समीचीन रूप से धारण कर लेता है।

किन्तु एक साधारण मनुष्य का क्रोध से पूर्णतः बच पाना अत्यन्त कठिन है, लाख कोशिश करने पर भी मन खेद-खिन्न हो ही जाता है, जो कि वैर, झुंझलाहट आदि के समान क्रोध का ही एक प्रकार है। अतः एतदर्थ विभिन्न चरणों में किया गया सतत प्रयास बड़ा उपयोगी सिद्ध हो सकता है। जिस प्रकार हम पूरी कोशिश करते हैं कि हमारे घर में बिल्कुल भी कूड़ा-करकट न आवे और इसके लिए अपने घर के खिड़कियाँ-दरवाजे भी बन्द कर लेते हैं; परन्तु लाख सावधानी रखते-रखते भी धूल भरी हवा चलते ही थोड़ी धूल घर में आ ही जाती है जिसे हम रोज सुबह झाडू लगाकर निकाल देते हैं। इसके बाद भी कुछ धूल घर के ओने-कोने में छुपी रह जाती है, जो रोज की झाडू से भी नहीं निकलती। उसे हम दीपावली आदि पर सफाई अभियान चलाकर पूरी तरह निकाल देते हैं। उसी प्रकार हमारा प्रयत्न रहना चाहिए कि प्रथम तो हमारे मन में क्रोधादि की कोई मलिनता उत्पन्न ही न हो, तथापि यदि उत्पन्न ही हो जाए तो उसे तभी यथाशीघ्र समाप्त कर देना चाहिए। तथा इसके बाद भी जो थोड़ी-बहुत मलिनता मन की गहराई में कहीं बची रह जाए तो उसे आज क्षमावाणी के दिन तो बिल्कुल ही निकाल देना चाहिए। यही महत्त्व है क्षमावाणी पर्व का।

क्रोध चार प्रकार का कहा गया है- 1. जल-रेखा के समान, 2. धूलि-रेखा के समान, 3. पाषाण-रेखा के समान, 4. लौह-रेखा के समान। जिस प्रकार जल-रेखा तत्काल विलीन हो जाती है उसी प्रकार उत्तम पुरुषों का क्रोध तत्काल शान्त हो जाता है। जिस प्रकार धूलि-रेखा कुछ काल बाद हवा चलने मात्र से भी विलीन हो जाती है, उसी प्रकार मध्यम पुरुषों का क्रोध कुछ काल बाद शांत हो जाता है। जिस प्रकार पाषाण-रेखा को मिटाना बहुत कठिन होता है, उसी प्रकार अधम पुरुषों के क्रोध को मिटाना बहुत कठिन होता है। जिस प्रकार लौह-रेखा अमिट-सी बन जाती है उसी प्रकार अधमाधम पुरुषों का क्रोध चिरकाल तक भी शांत नहीं होता। क्षमावाणी महापर्व को मनाते हुए हमें अपने क्रोध के स्तर को पहचानना चाहिए और शनैः-शनैः उसे जल-रेखा के समान बनाकर समाप्त कर देना चाहिए।

यदि फिर भी क्रोध करना ही है तो क्रोध पर ही क्रोध करना चाहिए, क्योंकि वही हमारा सर्वाधिक बुरा करने वाला शत्रु है। हमें डाँटकर क्रोध से कह देना चाहिए कि वह हमें अपनी शक्ल कभी न दिखाए, हमारी नजरों से भी सदा के लिए हट जाए; अन्यथा हम स्वयं ही उससे दूर हट जाएंगे।

आत्मशुद्धि का एक अद्भुत पर्व

इस प्रकार हम देखते हैं कि क्षमावाणी आत्मशुद्धि का एक अद्भुत पर्व है जो वस्तुतः क्षेत्र, काल, जाति, सम्प्रदाय आदि की सर्व सीमाओं से अतीत है और इसीलिए उसमें प्राणिमात्र का हित सन्निहित है। आवश्यकता है कि आज हम इसे सच्चे हृदय से मनाएं, कोरी औपचारिकता निभाकर न रह जाएं।

क्षमावाणी एक आध्यात्मिक पर्व भी है, अतः आज के दिन हमें थोड़ी देर आत्मध्यान भी अवश्य करना चाहिए, मात्र दूसरों से ही क्षमायाचना-क्षमादान की बातें बोलने से कार्य पूरा नहीं होगा। आज के दिन हमें अपने अन्तर में यह भलीभांति निर्णय करना चाहिए कि कोई भी जीव अब हमारा शत्रु नहीं है और हम भी किसी जीव के शत्रु नहीं हैं, हमारा सभी जीवों के प्रति क्षमाभाव है। ऐसा करने से हमारी आत्मा में सभी के प्रति समता भाव उत्पन्न होगा, वीतराग भाव उत्पन्न होगा। यही सच्ची क्षमावाणी है।

राष्ट्रिय पर्व घोषित होना चाहिए क्षमावाणी को

हमारे पास अपना राष्ट्रिय ध्वज है, राष्ट्रिय प्रतीक है, राष्ट्रिय पशु है और राष्ट्रिय पक्षी भी है; पर क्या एक राष्ट्रिय पर्व भी नहीं होना चाहिए ? होना चाहिए, अवश्य होना चाहिए और वह भी हमारी महान् संस्कृति के अनुरूप ही महान् भी होना चाहिए।

आप कह सकते हैं कि है तो सही, स्वतंत्रता-दिवस है ना, यह हमारा राष्ट्रिय पर्व ही तो है।

ठीक है, है तो सही, परन्तु यह हमारी महान् संस्कृति के अनुरूप नहीं है। इसके साथ हमारी परतन्त्रता की स्मृतियाँ भी जुड़ी हुई है। दूसरी बात यह कि यह एक घटना-प्रधान पर्व है जो 15 अगस्त 1947 से ही प्रारम्भ हुआ है, उससे पहले नहीं था, हमारी संस्कृति के समान सनातन नहीं है। अतः हमारा राष्ट्रिय पर्व कोई ऐसा ही चुना जाना चाहिए जो हमारी सनातन भारतीय संस्कृति के अनुरूप हो, सनातन हो, विश्व-कल्याणकारी हो और सर्वमान्य भी हो तो बहुत ही अच्छा ।

हम समझते हैं कि इसके लिए यह क्षमावाणी महापर्व सर्वाधिक उपयुक्त सिद्ध हो सकता है। यद्यपि लोग इसे जैन समाज का पर्व कहते-समझते हैं; पर वस्तुतः सूर्य-चन्द्र आदि के समान क्षमा भी एक अत्यन्त सार्वजनिक वस्तु है। वह किसी व्यक्ति, समाज या जाति-विशेष की अपनी बपौती नहीं हो सकती।

क्रोध सदा सर्वत्र सभी के लिए अहितकारी है और क्षमा सदा सर्वत्र सभी के लिए हितकारी है, अतः क्षमावाणी पर्व को व्यक्ति, जाति, देश, काल आदि की किसी सीमा में भी नहीं बाँधा जा सकता।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जहाँ हम क्रोध की भयंकरता के परिणाम प्रतिदिन देख और भोग रहे हैं, यह क्षमावाणी पर्व अपनी और अधिक उपयोगिता को रेखांकित कर रहा है।

क्षमा के महत्त्व को सभी धर्म स्वीकार करते हैं

क्षमा के महत्त्व को सभी धर्मों ने मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है, अतः इस दृष्टि से भी यह एक निर्विवाद पर्व प्रतीत होता है। यथा- भारतीय संस्कृति की प्राचीनकाल से ही दो प्रमुख धाराएँ रही हैं- श्रमण और वैदिक। श्रमणधारा को तो यह पर्व मान्य है ही, वैदिक धारा को भी यह पर्व सहर्ष मान्य है। वैदिक ग्रन्थों में कदम-कदम पर क्षमा की श्रेष्ठता के विपुल गीत गाये हैं। यदि यह भी कहा जाए कि वैदिक धर्म का पूरा साँचा ही क्षमाभाव पर खड़ा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वृक्ष के मूल की भाँति क्षमा सम्पूर्ण वैदिक धर्म का मूल है। क्षमा के ही कारण वैदिक धर्म इतना उदार, सहिष्णु और व्यापक सिद्ध हुआ है। वैदिक ग्रन्थों में आगत क्षमा के महत्त्वसूचक सभी कथनों को प्रस्तुत करने का अवकाश यहाँ नहीं है, तथापि एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।

सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण की मृत्यु जंगल मे जर के बाण से हुई थी। बाण मारने के बाद घबराये हुए जर को श्रीकृष्ण क्या कहते हैं - यही यहाँ गम्भीरतापूर्वक ध्यान देने योग्य है। वे कहते हैं:-

“मा भैर्जरे ! त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे ।
याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम् ।।” - श्रीमद्भागवत 11/30/39

अर्थात् हे जर! तुम दुःखी मत होओ। उठो और जाओ। यह जो कुछ हुआ, सब ठीक ही हुआ। मेरी अनुज्ञा है कि तुम पुण्यवानों के लिए प्राप्य स्वर्ग को प्राप्त करो।

इससे सिद्ध होता है कि श्रमण संस्कृति की भाँति वैदिक संस्कृति में भी क्षमा का महत्त्व समान भाव से स्वीकृत है।

अब यदि आगे चले तो श्रमण और वैदिक संस्कृति ही नहीं, दुनिया के अन्य सभी छोटे-बडे धर्म या सम्प्रदाय भी क्षमा के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। उनके ग्रन्थों में भी क्रोध की निन्दा और क्षमा की प्रशंसा पुरजोर ढंग से की गयी है। प्रमाणस्वरूप कतिपय प्रसंग/उद्धरण प्रस्तुत हैं । यथाः-

श्रीकृष्ण की भाँति ईसा मसीह ने भी सूली पर चढते हुए कहा था कि- “ हे ईश्वर ! इन्हें क्षमा करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं ।”

इसी प्रकार कुरान शरीफ में भी क्षमा के महत्त्वसूचक अनेक वाक्य उपलब्ध होते हैं। यथा -

“जो गुस्सा पी जाते हैं और लोगों को माफ कर देते हैं, अल्लाह ऐसी नेकी करने वालों से प्यार करता है।”
-कुरान शरीफ 3 / 134

“जो वक्त पर धैर्य रखे और क्षमा कर दे तो निश्चय ही यह बड़े साहस के कामों में से एक है।”

  • कुरान शरीफ 42 / 143

इसी प्रकार सिक्ख धर्म में भी क्षमा का बहुत महत्त्व बताया गया है। गुरु गोविन्दसिंह कहते हैं - “यदि कोई दुर्बल मनुष्य तुम्हारा अपमान करता है तो उसे क्षमा कर दो, क्योंकि क्षमा करना वीरों का काम है ।”

संत तुकाराम भी कहते हैं - “जिस मनुष्य के हाथ में क्षमारूपी शस्त्र हो, उसका दुष्ट क्या बिगाड़ सकता है ?”

इस प्रकार हम देखते हैं कि क्षमावाणी ही एक ऐसा निर्विवाद पर्व हो सकता है जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप हमारा राष्ट्रिय पर्व सिद्ध हो सकता है। इतना ही नहीं, यदि आगे बढ़कर देखें तो वैश्वीकरण के इस दौर में ‘विश्व पर्व’ बनने की क्षमता भी इस क्षमावाणी पर्व में निहित है। जो भी हो, कम से कम हमें इसे अपना राष्ट्रिय पर्व तो घोषित करना ही चाहिए। सुधीजनों से इस विषय पर निष्पक्षतापूर्वक विचार करने का अनुरोध है।

औपचारिकता से ऊपर उठकर मनाएं क्षमावाणी

क्षमावाणी पर्व जगत् के अन्य पर्वों से बहुत अलग है, अतः इसके मनाने की विधि भी अन्य पर्वों से अलग ही है। अन्य पर्वों पर जहाँ हम अपने मित्रों के घर जाते हैं, उनके गले मिलते हैं और उन्हें मुबारकबाद देते हैं, वहीं आज इस क्षमावाणी पर्व के दिन हमें अपने शत्रुओं के घर जाना होता है, उन्हें गले लगाना होता है और उनके व अपने मन का सम्पूर्ण गिला-शिकवा दूर करना होता है। संक्षेप में इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि क्षमावाणी पर्व मित्रों का नहीं, शत्रुओं का पर्व है। आज के दिन हमें अपने शत्रुओं को समाप्त करना होता है। शत्रुओं को भी क्या, उनसे मिलकर उनके प्रति अपनी शत्रुता को समाप्त करना होता है।

परन्तु यह विडंबना ही है कि आज के दिन भी हम में से अधिकांश लोग अपने उन्हीं परिजनों और प्रियजनों से ही क्षमा का आदान-प्रदान करते हैं, जिनसे हमारे बड़े मधुर सम्बन्ध होते हैं, जिन्हें हम होली-दीपावली और नववर्ष आदि अन्य अवसरों पर मुबारकबाद देते हैं। इस प्रकार यह पर्व एक कोरी औपचारिकता बनकर रह जाता है।

हम यह नहीं कहना चाहते कि हमें अपने प्रियजनों के साथ क्षमावाणी नहीं मनानी चाहिए या उनसे क्षमा का आदान-प्रदान नहीं करना चाहिए। करना चाहिए, अवश्य करना चाहिए; परन्तु वह भी सच्ची होनी चाहिए, कोरी औपचारिकता नहीं। हमें सच्चे हृदय से उनके प्रति हुए अपराधों को स्वीकार कर उनकी क्षमा याचना करना चाहिए और उनके भी अपराधों को सच्चे हृदय से क्षमा कर देना चाहिए, ताकि उनके और हमारे मन भी पूर्णतः शल्यरहित हो जाएं।

किन्तु आज के दिन हमें विशेष रूप से अपने उन शत्रुओं या प्रियजनों को भी अवश्य याद करना चाहिए, जिनके प्रति हमने सचमुच अपराध किये हैं या जिनके अपराध से हमारे मन में क्रोध उत्पन्न हुआ है। तथा उनके पास जाकर उनसे निष्कपट भाव से बात करके परस्पर क्षमा भाव का आदान-प्रदान करना चाहिए। तभी हमारी क्रोध-मानादि कषायें गलेंगी और हमारा क्षमावाणी पर्व मनाना सार्थक होगा।

क्षमावाणी : एक अनूठा चिन्तन

क्षमावाणी महापर्व के सम्बन्ध में कतिपय निम्नलिखित बिन्दु भी विशेष रूप से ज्ञातव्य हैं-

(क) क्षमावाणी महापर्व पर उपदेश दिया जाता है कि आज के दिन हमें अपने शत्रु से मिलना चाहिए, उससे बात करनी चाहिए और उससे क्षमा माँगनी चाहिए -यही सच्ची क्षमावाणी है। यह बात एक अपेक्षा से ठीक है, इस बात को कहने का आशय भी ठीक है; परन्तु इस बात को समझने और अपनाने में अत्यन्त सावधानी रखनी चहिए। क्योंकि सामनेवाला यदि दुर्जन व्यक्ति हो तो उसके पास जाना और फिर उससे बात करना बड़ा ही हानिकारक सिद्ध हो सकता है। सभी आचार्यों ने दुर्जन से दूर रहने की शिक्षा दी है।

(ख) इसी प्रकार कहा जाता है कि क्षमावाणी को औपचारिकता से ऊपर उठकर मनाना चाहिए, औपचारिकता में कुछ नहीं रखा है; किन्तु इस बात को भी स्याद्वाद से ही समझना चाहिए, क्योंकि देखा जाए तो इस औपचारिकता की भी आज बड़ी उपयोगिता है। अधिकांश साधारण व्यक्ति इस औपचारिक आयोजन से ही बड़ी प्रेरणा ग्रहण करते हैं और समाज एवं राष्ट्र में इन औपचारिक आयोजनों से ही बड़ी प्रभावना धर्म की होती है। वैसे भी जब तक हम सच्ची क्षमावाणी नहीं मना सकें तब तक ऐसी औपचारिकता भी हमें अनेक लाभ पहुँचाती हुई सच्ची क्षमावाणी मनाने का अवसर प्रदान करती रहेगी। अतः औपचारिकता का सर्वथा निषेध करना ठीक नहीं है।

(ग) इसी प्रकार यह भी कहा जाता है कि आज के दिन हमें सबको क्षमा कर देना चाहिए। परन्तु सावधानीपूर्वक चिन्तन करें तो समझ में आता है कि यह उपदेश भी सबके लिए नहीं है, मात्र मोक्षमार्ग के साधकों के लिए है। इस उपदेश को सब लोग नहीं पाल सकते। जरा सोचिए- राजा कैसे पाल सकता है? उसे तो अपराधी को दण्ड देना ही होगा। इसी प्रकार अध्यापक, माता-पिता आदि को भी अवसर देखकर उचित दण्ड बालकों को देना ही पड़ता है, देना ही चाहिए । दंड सदा बुरा ही नहीं होता, प्रायश्चित्तस्वरूप भी होता है।

रे जिय काहे क्रोध करै ।। टेक ।।
देखिकै अविवेकि प्रानी, क्यो न विवेक धरै ।।
जिसे जैसी उदय आवै, सो क्रिया आचरै।
सहज तू अपनो बिगारै, जाय दुर्गति परै ।।
होय संगति-गुन सबनि कों, सरव जग उच्चरै ।
तुम भले कर भले सबको, बुरे लखि मत जरै ।।
वैद्य पर विष हर सकत नहिं, आप भखि को मरै।
बहु कषाय निगोद वासा, छिमा ‘दयानत’ तरै ।।

अर्थः- हे जीव ! तू सामने वाले पर क्रोध क्यों करता है ? उसे अज्ञानी प्राणी समझकर विवेक (शांति) धारण क्यों नहीं करता है? जिसके जैसा कर्मोदय है, वह वैसी ही क्रिया करता है। तू क्यों अपना ऐसा नुकसान करता है जिससे तुझे दुर्गति में जाना पड़े ? सारे जगत् में कहावत प्रसिद्ध है कि संगति का असर अवश्य होता है, अतः तू तो स्वयं को भला रखकर सबका भला करता चल, किन्तु बुरा देखकर क्रोध कभी मत कर । वैद्य दूसरे के विष को उतरना चाहता है, परन्तु यदि नहीं उतार सके तो क्या स्वयं विष खाकर मर जाता है ? कविवर दयानतराय कहते हैं कि हे भाई ! बहुत क्रोधादि कषाय करने से निगोद में जाना होता है, अतः संसार-तारक क्षमा भाव को धारण करो ।

“नरस्याभरणं रूपं, रूपस्याभरणं गुणाः।
गुणस्याभरणं ज्ञानं, ज्ञानस्याभरणं क्षमाः।।”

अर्थ:- मनुष्य की शोभा रूप (सौन्दर्य) से है। रूप का महत्त्व गुणों से है। गुणों की शोभा ज्ञान से है और ज्ञान की शोभा क्षमा से है।