जो भी भूल हुई प्रभु मुझ से उसकी क्षमा याचना है ।
द्रव्य भाव की भूल न हो अब ऐसी सदा कामना है ।।
तुम प्रसाद से परम सौख्य हो ऐसी विनय भावना है ।
जिन गुण सम्पत्ति का स्वामी हो जाऊँ यही साधना है ।।
शुद्धातम का आश्रय लेकर तुम समान प्रभु बन जाऊँ ।
सिद्ध स्वपद पाकर हे स्वामी फिर न लौट भव में आऊँ ।।
ज्ञान हीन हूँ क्रिया हीन हूँ द्रव्य हीन हूँ हे जिनदेव ।
भाव सुमन अर्पित हैं हे प्रभु पाऊँ परम शान्ति स्वयमेव ।।
पूजन शान्ति विसर्जन करके निज आतम का ध्यान करूँ ।
जिन पूजन का यह फल पाऊँ मैं शाश्वत कल्याण करूँ ।।
मंगलमय भगवान् वीर प्रभु मंगलमय गौतम गणधर ।
मंगलमय श्री कुन्दकुन्द मुनि मंगल जिनवाणी सुखकर ।।
सर्व मंगलों में उत्तम है णमोकार का मंत्र महान् ।
श्री जिनधर्म श्रेष्ठ मंगलमय अनुपम वीतराग विज्ञान ।।
क्षमापना - 2
(दोहा)
भूल-चूक कर दो क्षमा, भाव क्षमा अवतार ।
हम अज्ञानी जीव हैं, आप ज्ञान भण्डार ।।
तुव चरणों की शरण पा, पाया सौख्य अपार ।
क्षमा करो निज ज्ञान दो, करो भवोदधि पार ।।
पुष्पांजलि
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ४०५