क्षमा वीरस्य भूषणम् | Kshama Virasy Bhushanam

क्षमा वीरस्य भूषणम्

-प्रो. वीरसागर जैन

क्षमावाणी के प्रसंग में एक सूक्ति बहुत अधिक बोली जाती है- ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ | यह एक बहुत ही सारगर्भित एवं महत्त्वपूर्ण सूक्ति है, इसमें बहुत गहरा अर्थ छुपा है, किन्तु खेद है कि इसका ठीक-ठीक अर्थ समझनेवाले लोग लोक में बहुत ही कम हैं | अधिकांश लोग, अनेक विद्वान् वक्ता तक भी इसका अर्थ शारीरिक आदि बाहरी वीरता ही करते हैं और ऊँचे स्वर में कहते हैं कि क्षमा वीर का आभूषण है, कायर का नहीं | इस सन्दर्भ में वे अनेक कविताएँ भी सुना देते हैं | यथा-

क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो |
उसको क्या जो दन्तहीन विषहीन विरल हो ||

किन्तु यहाँ ‘वीरता’ का अर्थ वास्तव में शारीरिक आदि बाहरी वीरता नहीं है, अपितु आन्तरिक या आध्यात्मिक वीरता है | ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ - इस सूक्ति के द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि क्षमा धारण करना बहुत बड़ी बात है, बहुत हिम्मत की बात है | कोई हमें गाली दे, झूठा आरोप लगाए, भरी सभा में लगाए, हमारी वस्तु छीने, हमें घर से निकाले, बांधे, मारे, नाना प्रकार से कष्ट दे, फिर भी अपने मन को तनिक भी मलिन न करना-यह कोई आसान काम नहीं है, इसके लिए बहुत बड़ी शक्ति चाहिए, बहुत बड़ी वीरता चाहिए | दुनिया में सब कुछ सहना आसान होता है, पर कुटिल वचन आदि को सहना आसान नहीं होता | कहा भी है कि-

खोद खाद धरती सहे, काट कूट वनराय |
कुटिल वचन साधु सहे, और से सहा न जाय ||

अर्थ- खोदने का कष्ट पृथ्वी सहन कर सकती है, काटने का कष्ट वनस्पति सहन कर सकती है, परन्तु कुटिल वचनों को तो सिर्फ साधु पुरुष ही सहन कर सकते हैं, अन्य कोई नहीं सहन कर सकता है ।

लोक में भी हम देखते हैं कि लोग वैसे तो बहुत बड़े बन जाते हैं, पर अपने विरोधी को नहीं सहन कर पाते हैं | उसे येन-केन प्रकारेण तुरन्त समाप्त करने में लग जाते हैं | क्षमावाणी पर्व हमें यही सिखाता है कि विरोधी को भी सहन करो, उसके प्रति भी किंचित् भी कषाय मत करो | अनुकूल से तो सभी प्रेम करते हैं, प्रतिकूल से भी प्रेम करना -यही तो बड़ी वीरता है, कोई बहुत बड़े हृदय का व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है | ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ सूक्ति का यही सच्चा अभिप्राय है।

इसी सन्दर्भ में आचार्य पद्मनंदी स्वामी का एक श्लोक भी ध्यान देने योग्य है-

दोषानाघुष्य लोके, मम भवतु सुखी, दुर्जनश्चेद् धनार्थी;
मत्सर्वस्वं गृहीत्वा, रिपुरथ सहसा, जीवितं स्थानमन्यः।
मध्यस्थस्त्वेवमेवाखिलमिह हि जगत्, जायतां सौख्यराशिः;
मत्तो मा भूदसौख्यं कथमपि भविनः कस्यचित् पूत्करोमि ।।
-पद्मनंदी-पंचविंशति, 85

अर्थ- जो दुर्जन मेरे दोष जाहिर करके सुखी होते हों वे मेरे दोष जाहिर कर दें, जो धनार्थी जन मेरा सर्वस्व ग्रहण करके सुखी होते हों वे मेरा सर्वस्व ग्रहण कर लें, जो शत्रु मेरा जीवन लेकर सुखी होते हों तो वे मेरा जीवन ले लें, जो पदलोलुप व्यक्ति मेरी पदवी छीनकर सुखी होते हों वे मेरी पदवी छीन लें, और जो मनुष्य मध्यस्थ हैं, राग-द्वेष रहित हैं वे ऐसे ही मध्यस्थ बने रहें, यह संपूर्ण जगत् अतिशय सुख को प्राप्त करे, कोई भी संसारी प्राणी मेरे निमित्त से किसी भी प्रकार दुःखी न हो - ऐसा मैं ऊँचे स्वर में पुकार-पुकार कर कह रहा हूँ।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसी भावना कोई आध्यात्मिक वीर ही कर सकता है, अन्य कोई नहीं | यही बात ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ सूक्ति के द्वारा कही गई है ।