क्षमा और आत्म-विजय | Kshama aur atma-vijay

जैन वही जो ‘जिन’ कहलाए,
इंद्रियों पर जो विजय है पाए
राग-द्वेष के बंधन काटे,
निज आत्मा का दीप जलाए

बाहर के शत्रुओं से लड़ना,
शूरवीर की नहीं पहचान
अपने ही मन को जो जीते,
वही है सच्चा वीर महान

पर्व क्षमा का हमें सिखाता,
वैर-भाव हम आज मिटाये
‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहकर,
सबको प्रेम से गले लगायें

जाने-अनजाने में हमने,
जिसे भी ठेस पहुंचाई हो
क्षमा माँग लें सच्चे मन से
मिटे हृदय की जो भी खाई हो

कर्मों का यह खेल निराला,
जैसा बोया वैसा काटा
पुण्य-पाप के इस तराजू में
जीवन का हर पल है बाँटा

तप और संयम की अग्नि से,
कर्म-शृंखला को पिघलायें
मोह-निशा से जागो चेतन
आत्म-ज्ञान का भोर ले आयें

सम्यक् दर्शन, ज्ञान, आचरण,
रत्नत्रय हैं मोक्ष के द्वार
तीर्थंकरों की देशना से ही
तरता है यह भव-संसार

‘अहिंसा परमो धर्मः’ को,
अपने रोम-रोम में बसायें
जैन धर्म की अमर ज्योति से,
अपना जीवन सफल बनायें

महावीर के चरणों में, शत-शत हो वंदन,
अहिंसा का जहाँ महकता, पावन-सा चंदन

जियो और जीने दो का, गूँजे जहाँ नारा,
सत्य और शांति की, बहती निर्मल धारा

छोटे से छोटे जीव में, ईश्वर का है वास
किसी को भी न दुःख देना, यही है सच्चा आस

अनेकांतवाद सिखाता, सबका करो सम्मान,
हर दृष्टि में सत्य छिपा है, यही है सच्चा ज्ञान

कोई भी विचार पूर्ण नहीं, ना कोई है अज्ञानी,
स्याद्वाद की इस भाषा से, सुलझती हर मनमानी

अपरिग्रह की राह पर चलकर, मोह-माया को त्यागो,
आत्म-शुद्धि के इस पथ पर, हे चेतन! अब जागो

इच्छाओं का अंत नहीं है, तृष्णा है एक जाल,
त्याग और तपस्या से ही, सँवरेगा हर हाल

क्षमा वीर का आभूषण है, क्रोध को जीतो मन से,
मैत्री भाव रखो सब जग से, दूर हटो उलझन से

कर्मों की निर्जरा करके, पा लो मोक्ष का धाम,
चौबीस तीर्थंकरों को, मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।
AJ

रचनाकार: श्रेया जैन (Shreya Jain), चंदेरी
Instagram: @its_theJainshreyaa