क्रोध से बचने के बीस उपाय | Krodh Se Bachane Ke Bis Upay

क्रोध से बचने के बीस उपाय¹

-प्रो. वीरसागर जैन

क्रोध एक अत्यन्त हानिकारक मनोविकार है। उससे हमें येन-केन प्रकारेण अवश्य बचना चाहिए। अन्यथा हमारा धार्मिक या आध्यात्मिक जीवन तो दूर, लौकिक जीवन भी ठीक से नहीं चल पायेगा।
जैनाचार्यों के अनुसार क्रोध को जीतने का सच्चा उपाय यद्यपि एक आत्मानुभूति ही है, तथापि उन्होंने प्राथमिक दशा में क्रोध से बचने के अनेक उपाय निम्नानुसार भी बताये हैं, जिन्हें हम ज्ञानार्णव (18/51-84), भगवती आराधना (1420-26), सुभाषित-रत्नसन्दोह, परमात्मप्रकाश-टीका, रत्नकरण्डश्रावकाचार-भाषावचनिका आदि अनेक ग्रन्थों के आधार से यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

उदाहरणार्थ किसी ने हमको बहुत दुर्वचन कहे, गाली दी, हमको ‘गधा’ ही कह दिया तो हमें इस-इस प्रकार से विचार करके शान्ति धारण करना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए-

(i) यदि सामने वाले ने मुझे ‘गधा’ कहा है तो अवश्य ही सर्वप्रथम मुझे स्वयं को देखना चाहिए, आत्मनिरीक्षण करना चाहिए, हो सकता है मुझसे कोई गलती हुई हो, मुझे अपनी गलती सुधारनी चाहिए। गलती बताने वाले पर क्रोध करना उचित नहीं।

(ii) मेरे हाथ-पैर गधे जैसे नहीं हैं, मनुष्य जैसे हैं, मैं गधा नहीं हूँ, उसके कहने से भी मैं गधा बना नहीं हूँ, उसी की वाणी झूठी हुई है, वही झूठा हुआ है, मेरा तो इससे कुछ भी नहीं बिगड़ा।

(iii) चलो, कोई बात नहीं, उसे थोड़ी देर के लिए खुशी मिल गई और वह भी मेरे निमित्त से -यह तो अच्छा ही हुआ। लोग तो दूसरों को प्रसन्न करने के लिए पता नहीं क्या-क्या करते हैं, भोजन कराते हैं, वस्त्रादि प्रदान करते हैं, बहुत

  1. यहाँ ‘बीस’ शब्द का अर्थ सीधे-सीधे 20 नहीं, अपितु लाक्षणिक रूप से ‘अनेक’ समझना चाहिए। यहाँ लेख में भी केवल 20 बिन्दु लिखे हैं, परंतु ऐसे और भी अनेक हो सकते हैं।
  2. “सततसुलभभैषज्येनिःसुखे जीवलोके, यदि मम परिवादात्प्रीतिमाप्नोति कश्चित्। परिवदतु यथेष्टं मत्समक्षं तिरो वा, जगति हि बहुदुःखं दुर्लभः प्रीतियोगः॥” धन खर्च करते हैं, मेरा तो कुछ भी खर्च नहीं हुआ और उसे मेरे निमित्त से खुशी मिल गई।

(iv) चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते हुए मैं पूर्वजन्मों में अनेक बार गधा हुआ हूँ। इसने मुझे गधा कहा है सो भूत नैगम नय से सत्य ही है। उसमें गलत क्या कहा? जैसे सेवानिवृत्त तहसीलदार या पटवारी या जज को लोग बाद में भी तहसीलदार, पटवारी या जज कह देते हैं, पर कोई बुरा नहीं मानता। यह तो संसार में चलता ही है।

(v) ‘गधा’ शब्द का अर्थ गधा ही नहीं होता, लक्षणाशक्ति से ‘गधा’ शब्द का अर्थ ‘अज्ञानी’ होता है और केवलज्ञान होने से पूर्व तक सभी जीव अज्ञानी होते हैं। मैं तो महा अज्ञानी हूँ। इसने मुझे अज्ञानी रूप में गधा कहा तो इसमें उसकी गलती क्या है?

(vi) गधा कोई बुरा नहीं होता है। वह भी एक जीव है, जो स्वभाव से हमारे ही समान है। ऊपरी पर्याय मात्र को क्या देखना? पर्यायदृष्टि तो संसार का कारण है।

(vii) गधे में अनेक गुण हैं। वह अविराम भार-वहन करता है, शीतोष्ण से नहीं घबराता, सदा सन्तोष धारण करता है। यथा-
“अविश्रामं वहेत् भारं, शीतोष्णं च न विन्दति ।
ससन्तोषस्तथा नित्यं, त्रीणि शिक्षेत् गर्दभात् ।।”

(viii) यह मुझे दुर्वचन कह रहा है तो क्या हुआ? यह तो इसका स्वभाव ही है। मैं क्यों क्रोध करूँ? यदि कुत्ता काटे तो क्या बदले में हम भी उसे काटते हैं?

(ix) मेरे अशुभ कर्म का उदय है, मैंने भी पूर्व में कभी दूसरों को ऐसे दुर्वचन कहे होंगे। ‘जैसे को तैसा’ - यही कर्मसिद्धान्त है।

(x) बड़े-बड़े महापुरुषों को भी दुर्जन लोग इससे अधिक बुरे वचन कहते हैं, पर वे शान्त रहते हैं, क्रोध नहीं करते। मुझे ऐसा कहा तो क्या हुआ?

(xi) शब्द तो ब्रह्म है। यह उनका दुरुपयोग कर रहा है। क्या करे, यह नासमझ है। अग्नि, जल पाषाण आदि तो सदुपयोग के लिए हैं, कोई उनका दुरुपयोग करे तो क्या किया जा सकता है?

(xii) मैंने शास्त्रों में पढ़कर सीखा है कि क्रोध हानिकारक है, कदापि नहीं करना चाहिए- ‘गाली सुनि मन खेद न आनो’; आज मुझे उसे आचरण में उतारने का अवसर मिला है, यह मुझे निःशुल्क प्रयोगशाला प्राप्त हुई है। यह मेरे ज्ञान की परीक्षा की घड़ी है।

(xiii) जीवों को पूर्वकर्म के उदय से सब फल प्राप्त होते हैं। मैंने भी पूर्व में किसी को दुर्वचन कहे होंगे। आज उसी का उदय आया है। मुझे शान्ति रखनी चाहिए।

(xiv) रोज चार रोटी पचाता हूँ, क्या इसके ये दो अक्षर (गधा) भी नहीं पचा पाऊँगा। कुछ नहीं चलो, कुछ नहीं हुआ।

(xv) अरे, इसने मुझे दो अक्षर ही तो कहे हैं, बहुत अधिक तो कुछ नहीं कहा। कहनेवाले तो जाने कितना-कितना गन्दा कह देते हैं और वह भी भरी सभा में।

(xvi) ‘जाकी जितनी बुद्धि हो, उतनी देय बताय।
वाको बुरो न मानिए, और कहाँ से ल्याय।।’

(xvii) इसने मेरे लिए अपने मुँह से कुछ कहा ही तो है, मेरा कुछ छीना तो नहीं। मेरे शरीर को तो कोई बाधा नहीं पहुँचाई।

(xviii) शरीर को भी बाधा पहुँचाए तो भी क्षमा करना चाहिए कि मात्र इतनी-सी बाधा पहुँचाई है, प्राण-विनाश तो नहीं किया।

(xix) प्राण-विनाश करे तो भी क्षमा करना चाहिए कि मात्र इस शरीर का प्राण-विनाश कर रहा है, मेरे आत्मिक गुणों (धर्म) का विनाश तो नहीं करता।

इस प्रकार शान्त मन से चिन्तवन करने से गाली सुनकर भी क्रोध से बचा जा सकता है। इसीप्रकार क्रोध के अन्य निमित्त मिलने पर भी क्रोध से बचा जा सकता है; सहज शान्त और संतुलित रहा जा सकता है।

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अपकुर्वति कोपश्चेत, किं न कोपाय कुप्यसि।
त्रिवर्गस्यापवर्गस्य, जीवितस्य च नाशिने॥
-आचार्य वादीभ सिंह, क्षत्रचूड़ामणि, 2/42

अर्थ- हे भाई ! यदि तुम बुरा करने वाले पर ही क्रोध करना चाहते हो तो इस क्रोध पर ही क्रोध क्यों नहीं करते हो? क्योंकि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप तुम्हारे सम्पूर्ण जीवन का विनाश करनेवाला यह क्रोध ही तो है। इससे अधिक बुरा करनेवाला अन्य कोई नहीं है।

क्षमा शस्त्रं करे यस्य, दुर्जनः किं करिष्यति?
अतृणे पतितो वह्निः, स्वयमेवोपशाम्यति॥

अर्थ- जिसके हाथ में क्षमारूपी शस्त्र है, उसका दुर्जन क्या कर पाएगा? तृणहीन स्थान पर गिरी हुई अग्नि स्वयमेव उपशांत हो जाती है।