कोण्डेश से कुन्दकुन्द तक | Kondesh se kundakund tak

(वीर छंद)

कुन्दकुन्द आचार्य देव की गाथा तुम्हें सुनाता हूँ,
कोण्डेश से कुन्दकुन्द तक का मैं सार बताता हूँ।

(छंद परिवर्तन)

यह गाथा है उस दिव्य पुरुष की, जिसकी गाथा पढ़े जग रीझा।
यह गाथा है उस महापुरुष की, जो अष्ट वर्ष में सद्ज्ञानी।

यदि अष्ट वर्ष के पूर्व देख लो, तो पूर्व भव इस ज्ञानी का।
भोला-भाला सा एक ग्वाला, न एक शब्द का ज्ञानी था।

चौपाई छंद

एक दिवस कोण्डेश ने देखे, जंगल में मुनिराज महान।
महाज्ञानी मुनिराज दे रहे, भव्य जीव उपदेश समान।

दूर बिटप के पीछे छिपकर, देख हृदय से हर्षित वान।
अल्पज्ञानी जाने स्वाको, ज्ञान की महिमा उसे महान।

एक दिवस सामान्य ही था, गोपाल चरे अपनी गायें।
नयन रुक गए देख अचंभित, भीषण उस दावाग्नि को।

सारा वन धू-धू कर जलता, पर एक वृक्ष पर आँच नहीं।
देख हृदय आश्चर्य हुआ, फिर वेग गति से बढ़ा वहीं।

वृक्ष को छाना, ध्यान पूर्वक, मिला ज्ञान भंडार तभी।
देख हृदय में विनय बहुत थी, पर काला अक्षर भैंस बराबर।

धर मस्तक जिनवाणी माँ को, वह मुनिराज निकट पहुँचा।

फिर मुनिराज उपदेश देते हैं

हे भव्य! जिन बैन देन का करै काज, धरिके हृदय में बिनय भाव।
फल पाओगे अति ही महान, संपूर्ण जगत में पूज्यवान।
ज्ञानदान सबसे महान, फल पाओगे अति ही महान।

ताटंक छंद

जन्म हुआ कोण्डकुंड ग्राम में,
कुन्दकुन्द तब नाम पड़ा।

मुनि दीक्षाधारी ग्यारह वर्षों में,
ज्ञान मार्ग पे गमन हुआ।

सीमंधर की दिव्य ध्वनि पा,
निज हित का पुरुषार्थ किया।

अध्यात्म ग्रंथ की रचना कर,
सारे जग का कल्याण किया।

:writing_hand: (स्वरचित — शाश्वत जैन)
AJ

रचनाकार: शाश्वत जैन (Shashwat Jain), सागर
Instagram: @333shashwat