कितना सुन्दर | kitana sundara

कितना सुन्दर, कितना सुखमय, अहो सहज जिनपंथ है।

धन्य धन्य स्वाधीन निराकुल, मार्ग परम निर्ग्रन्थ है ॥ टेक ॥
श्री सर्वज्ञ प्रणेता जिसके, धर्म पिता अति उपकारी।
तत्वों का शुभ मर्म बताती, माँ जिनवाणी हितकारी।
अंगुली पकड़ सिखाते चलना, ज्ञानी गुरु निर्ग्रन्थ हैं ॥ धन्य ॥1 ॥

देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा ही, समकित का सोपान है।
महाभाग्य से अवसर आया, करो सही पहिचान है ॥
पर की प्रीति महा दुखःदायी, कहा श्री भगवंत है ॥ धन्य ॥2॥

निर्णय में उपयोग लगाना ही, पहला पुरुषार्थ है।
तत्व विचार सहित प्राणी ही, समझ सके परमार्थ है ॥
भेदज्ञान कर करो स्वानुभव, विलसे सौख्य बसन्त है ॥ धन्य ॥3 ॥


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन