काशी में जैन संस्कृति
-प्रो. वीरसागर जैन
जैन संस्कृति को प्राचीन काल में श्रमण संस्कृति कहा जाता था और जैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं अथवा नदी के दो किनारे होते हैं वैसे ही प्राचीनकाल से वैदिक और श्रमण दोनों संस्कृतियां मिल-जुलकर समानांतर रूप से चलती आ रही हैं। काशी एक बहुत बड़ा भारतीय संस्कृति का केन्द्र रहा है, अतः वहां प्राचीन काल से जैन संस्कृति भी बहुत अधिक पल्लवित एवं विकसित होती रही है। यहाँ उसी की एक झलक कि जैन संस्कृति वहाँ किस तरह रही, जैन आचार्य वहाँ कौन-कौन हुए, उसको मैं बहुत संक्षेप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।
जैन संस्कृति के प्रवर्तक मुख्य रूप से चौबीस तीर्थंकर माने जाते हैं | आपको जानकर ये आश्चर्य होगा कि चौबीस तीर्थंकरों में से चार तीर्थंकरों का जन्म बनारस अर्थात् काशी में ही हुआ है। अयोध्या के बाद ऐसी कोई दूसरी नगरी नहीं है, जहाँ पर इतने ज्यादा तीर्थंकरों का जन्म हुआ हो। काशी में चार-चार तीर्थंकरों ने जन्म लिया, बाललीला की और बाद में तपस्या करके धर्मतीर्थ का प्रवर्तन किया | इससे काशी में जैन संस्कृति का विशेष प्रभाव समझा जा सकता है ।
इन चार तीर्थंकरों के नाम भी अवश्य जानने योग्य हैं। सबसे पहले सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ हैं | बनारस में जो भदैनी घाट है वहां पर इनका जन्म हुआ था। आज भी इनकी जन्मभूमि के स्थान पर वहां बहुत सुंदर जैन मंदिर बना हुआ है।
इसके बाद आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभ नाम से हैं। बनारस के पास ही चन्द्रावती नामक नगर है, जो उस समय काशी राज्य के ही अंतर्गत आता था, वहां चन्द्रप्रभ तीर्थंकर का जन्म हुआ। वहां भी बहुत सुंदर जैन मंदिर बना हुआ है।
इसके बाद ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ हैं। उनका जन्म सारनाथ में हुआ | इसे सिंहपुरी भी कहते हैं जो कि वर्तमान वाराणसी से पन्द्रह-सोलह किलोमीटर दूर ही स्थित है।
तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हैं | उनका जन्म बनारस के केन्द्र में, हृदयस्थान में जिसे आज भेलूपुर के नाम से सब जानते हैं वहां हुआ और वो एक क्रांतिकारी घटना इतिहास में भी दर्ज है | बाकी तीर्थंकरों की बातें तो जैन पुराणों के आधार पर सिद्ध होती हैं, लेकिन पार्श्वनाथ की घटना को तो इतिहास भी स्वीकार करता है। क्योंकि ये घटना आज से लगभग 2800 वर्ष पुरानी है। जब वहां पार्श्वनाथ का जन्म हुआ था उस समय का सारा परिदृश्य इतिहास में अंकित है कि उस समय बनारस एक बहुत बड़ा जैन केन्द्र था। वहां के राजा भी जैन थे। आज से २८०० वर्ष पहले बनारस का राजा जैन था। उनका नाम था विश्वसेन, उनकी रानी का नाम था वामादेवी और उन्हीं के राजकुमार थे पार्श्वनाथ जो बाद में बहुत बड़े जैन आचार्य, जैन तीर्थंकर बने। उन्होंने पूरे विश्व में जैन-धर्म का बहुत प्रवर्तन किया, प्रचार-प्रसार किया और बाद में वे सम्मेदशिखर, शिखरजी के नाम से है, जो कि झारखंड में है, वहाँ से मोक्ष पधारे । सम्मदेशिखर में जो पार्श्वनाथ नाम का पहाड़ है, वहां पारसनाथ नाम का रेलवे स्टेशन भी है। पार्श्वनाथ के बारे में इतिहासकारों ने बहुत कुछ लिखा है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी पार्श्वनाथ पर अनेक पदों का निर्माण किया है- तुम्हीं तो पारसनाथ हो पियारे, इत्यादि | उन्होंने कई पदों का निर्माण किया है। पार्श्वनाथ जैन संस्कृति के मूलाधार हैं और वे बनारस से संबंधित हैं | इससे सिद्ध होता है कि बनारस का जैन संस्कृति से बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है। पार्श्वनाथ के नाम पर यहां तक कहावत तक चलती है कि ‘जहां की मिट्टी भी पारस है उसका नाम बनारस है।’ आज संपूर्णानंद विश्वविद्यालय में भी पार्श्वनाथ की प्रतिमाएं हैं। अन्यत्र भी वहाँ जगह-जगह पार्श्वनाथ और अन्य जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं मिलती हैं।
इसके बाद हम आगे बढ़ते हैं तो एक बहुत बड़े जैन आचार्य हुए हैं समंतभद्र। समंतभद्र नाम के एक धुरंधर नैयायिक, तार्किक एवं दार्शनिक आचार्य हुए हैं। जिन्होंने रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासन, स्तुतिविद्या जैसे महान् संस्कृत काव्यों की, दार्शनिक ग्रंथों की रचना की थी | बनारस में जैन आचार्यों की परम्परा में समंतभद्र का नाम सूर्य चंद्र के समान है। समंतभद्र आचार्य यद्यपि दक्षिण भारत के रहने वाले थे, लेकिन बाद में बनारस आए थे और काफी दिन तक बनारस रहे थे | कहते हैं कि यहाँ उन्होंने एक बहुत बड़ा शास्त्रार्थ भी किया था और उस शास्त्रार्थ में स्याद्वाद सिद्धान्त के बल पर बहुत बड़ी विजय भी प्राप्त की थी। उनका भयंकर भस्मक व्याधि रोग भी यहीं फटे महादेव का मंदिर है उसमें दूर हुआ था | ऐसा सब वर्णन जैन ग्रंथों में और इतिहास में मिलता है।
इसके बाद वहां पर एक बनारसीदासजी जैन नाम के बहुत बड़े कवि हुए, जिन्होंने हिन्दी की सबसे पहली आत्मकथा लिखी ‘अर्द्ध कथानक’ | ‘समयसार नाटक’ भी उनकी अमर कृति है | बनारसीदास का नाम ही बनारस के नाम पर पड़ा है | यद्यपि वे जौनपुर के रहने वाले थे और बाद में जीवन के अंत में आगरा आ गए थे, लेकिन उनका बनारस से बहुत गहरा संबंध रहा। बनारसीदास गोस्वामी तुलसीदास से भी मिले थे और दोनों ने आपस में एक-दूसरे की रचनाओं को देखकर उनकी समीक्षा में बहुत अच्छे पद लिखे थे।
उसके बाद एक आचार्य यशोविजय हुए | उनको कौन नहीं जानता है? उन्होंने १६-१७वीं शताब्दी में जैन दर्शन पर पच्चीसों ग्रन्थों की रचना की, अष्टसहस्त्री आदि ग्रंथों की व्याख्या की। वे नव्य न्याय के बहुत गहरे, तार्किक आचार्य थे | आचार्य यशोविजय के नाम पर वहां अभी भी एक यशोविजय पाठशाला चलती है।
इसके बाद एक वृन्दावनदास बहुत बड़े जैनाचार्य हुए, जिन्होंने प्रवचनसारादि अनेक ग्रंथों की टीका लिखी | अंग्रेजों के शासनकाल में वे अंग्रेजों के कोषाध्यक्ष/खजांची थे और टकसाल का काम करते थे | जैसे जो काम आज रिजर्व बैंक करता है वो काम किया करते थे।
इसके अलावा बनारस में एक स्याद्वाद विद्यालय अभी भी चलता है, जिसमें बहुत सारे जैनाचार्य तैयार हुए हैं | गणेशप्रसाद वर्णी का नाम काशी के जैनाचार्यों में स्वर्णाक्षरों में लिखने लायक है। ये बहुत बड़े जैनाचार्य हुए | इनको समयसारादि अनेक ग्रन्थ कण्ठस्थ थे और इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में जैन दर्शन विभाग की स्थापना कराई थी पण्डित मदनमोहन मालवीय जी से मिलकर | गणेशप्रसादजी वर्णी का योगदान निरूपण करना हो तो यह बहुत लंबा समय मांगता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी उनका बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने गांधीजी के साथ मिलकर के जिस तरह स्वतंत्रता का अलख जगाया था, वो बहुत गौरव पैदा करता है। उनकी ‘मेरी जीवन गाथा’ पढ़ ली जाए तो बहुत कुछ पता चलता है। गणेशप्रसादजी वर्णी की आत्मकथा है- मेरी जीवन गाथा।
इसके बाद जिनेन्द्र प्रसाद जी वर्णी हुए, उन्होंने भी बहुत काम किया। उन्होंने ‘जैनेन्द्र सिद्धांत कोश’ के चार भाग तैयार किए जो कि भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है।
भारतीय ज्ञानपीठ की स्थापना भी बनारस में ही हुई थी। भारतीय ज्ञानपीठ यद्यपि आज दिल्ली में चलता है लेकिन भारतीय ज्ञानपीठ को जन्म देने का श्रेय काशी को है। काशी में अनेक जैन संस्थाएं बनीं और फिर यहां वहां महानगरों में जा बसीं ।
वर्तमान में स्याद्वाद विद्यालय के अलावा एक बहुत सुन्दर ‘गणेश वर्णी शोध संस्थान’ है नरिया में, वहां पर जैन ग्रन्थों का अध्ययन, अध्यापन, प्रकाशन होता है। एक पार्श्वनाथ विद्याश्रम भी कशी हिन्दू विश्वविद्यालय के बगल में स्थित है। वहां भी अनेक आचार्य हैं। ये जो स्याद्वाद विद्यालय है, उसमें इतने आचार्य हुए हैं कि अगर गिनने लगें तो १०० की संख्या मैं पार कर सकता हूं। पण्डित सुखलाल संघवी थे, प्रज्ञाचक्षु थे, लेकिन इन्होंने तत्त्वार्थसूत्र आदि ग्रंथों की बहुत टीका की है और उनके पास हजारी प्रसाद द्विवेदी जी जैसे विद्वान् भी घर जाकर ज्ञानचर्चा करते थे और कहते थे कि मैं इनके पास आता हूँ तो मेरा असली गंगा-स्नान हो जाता है।
इसके अलावा एक पण्डित कैलाशचन्द्रजी शास्त्री थे बहुत धुरंधर विद्वान्, सिद्धान्ताचार्य थे। बनारस ने अनेक जैन न्यायतीर्थों को जन्म दिया है। न्याय विधा को विकसित और पल्लवित करने में बनारस का योगदान स्तुत्य है। उनमें पंडित कैलाशचन्द्रजी सिद्धान्ताचार्य का नाम विशेष उल्लेखनीय है।
इसके बाद एक पण्डित फूलचंद जैन सिद्धांतशास्त्री हुए, जिन्होंने धवला ग्रंथ का जो लगभग २ लाख श्लोक प्रमाण है, उसका ३९ भागों में प्राकृत-संस्कृत-मिश्रित ग्रंथ के संपादन का काम किया। बड़े धुरंधर आचार्य हुए हैं पण्डित फूलचंदजी शास्त्री।
फिर एक महेंद्रकुमारजी जैन न्यायाचार्य वो तो मानो भारतेंदु हरिश्चन्द्र के अवतार थे। जैसे भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने बहुत छोटी आयु में बहुत ज्यादा साहित्य लिखा, ऐसे ही महेंद्रकुमारजी न्यायाचार्य ४८ वर्ष की अल्पायु में चले गए थे, लेकिन उन्होंने जो काम किया है, उसे देखकर किसी को भी बहुत अधिक आश्चर्य होता है। जैनन्याय के जिन ग्रन्थों का एक पैराग्राफ कोई नहीं लगा सकता, वैसे उन्होंने २० ग्रंथों का अपने जीवन काल में संपादन किया।
बनारस प्रारंभ से लेकर आजतक जैन विद्या का अद्भुत केन्द्र रहा है। कुछ समय पूर्व तक भी वहाँ अनेक बड़े-बड़े जैन आचार्य निवास करते थे, जिनमें प्रोफेसर उदयचंद जैन सर्वदर्शनाचार्य, डॉ. गोकुलचन्द्र जैन आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। तथा वर्तमान में भी वहां पर अनेक जैन विद्वान् रहते हैं और जैन विद्या का बहुत गहरा अध्ययन-अध्यापन करते हैं। एक आचार्य पण्डित फूलचंदजी प्रेमी हैं, जो संपूर्णानंद विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए हैं। एक प्रोफेसर कमलेशकुमारजी हैं। एक प्रोफेसर अशोककुमारजी हैं। तथा अन्य भी अनेक विद्वान् हैं जो जैन विद्या के लेखन, अध्यापन, प्रचार-प्रसार में निरन्तर संलग्न हैं। बनारस प्राचीन काल से आज तक निरंतर जैन संस्कृति का अनूठा केन्द्र रहा है।
विशेष- यह लेख मेरे एक व्याख्यान का रूपान्तर है, जो मैंने साहित्य अकादमी नई दिल्ली के सेमिनार में दिया था।