है मोह महा दुःख मूल अरे अब तजियो जी।
कर निज-पर भेद-विज्ञान, स्व-हित में लगियो जी॥टेक॥
यह स्वर्णिम अवसर आया, जिनवर का दर्शन पाया।
है क्रोध भयंकर आग, दूर ही रहियो जी॥ कर.॥1॥
जिनवाणी पढ़ो-पढ़ाओ, निर्णय में चित्त लगाओ।
है मान महा विष रूप, ज्ञान करि तजियो जी॥ कर.॥2॥
गुरु शिक्षा उर में धारो, सब छल प्रपंच परिहारो।
है सरल भाव सुखकार, सदा ही धरियो जी॥ कर.॥3॥
नित बीज पाप के बोवे नहीं लाभ लोभ से होवे।
संतोष महा सुखकार, सुधारस पीवो जी॥ कर.॥4॥
परिहास क्लेश उपजावे, परिहास का पात्र बनाबे।
रति-अरति दुःख का हेतु, जानिके तजियो जी॥ कर.॥5॥
संयोग-वियोग स्वरूप क्यों, शोक करे दुख रूप।
रे घृणा अधोगति कारण, लखि परिहरियो जी॥ कर.॥6॥
है काम महाअघकारण, वेदों का करो निवारण।
है ब्रह्मचर्य अविकार सहज ही धरियो जी॥ कर.॥7॥
भवि तत्त्व भावना भाओ, निज शुद्ध चिदातम ध्याओ।
है वीतराग पद सार, प्रगट अब करियो जी॥ कर.॥8॥
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह