कर्त्ता-अकर्त्ता पच्चीसी | Kartta-Akartta Pachchisi

कर्त्ता-अकर्त्ता पच्चीसी | Kartta-Akartta Pachchisi

(दोहा)
कर्मन को कर्त्ता नहीं, धरता सुद्ध सुभाय।
ता ईश्वर के चरन को, बन्दौं शीश नवाय ॥१॥
जो ईश्वर करता कहैं, भुक्ता कहिये कौन।
जो करता सो भोगता, यहै न्याय को भौन ॥२॥
दुहूँ दोष तैं रहित है, ईश्वर ताको नाम ।
मन वच शीस नवाइ कैं, करूँ ताहि परणाम ॥३॥
कर्मन को करता वहै, जापै ज्ञान न होय।
ईश्वर ज्ञानसमूह है, किम कर्ता है सोय ॥४॥
ज्ञानवंत ज्ञानहिं करै, अज्ञानी अज्ञान ।
जो ज्ञाता कर्ता कहै, लगै दोष असमान ॥५॥
ज्ञानीपै जड़ता कहा, कर्ता ताको होय ।
पण्डित हिये विचार कै, उत्तर दीजे सोय ॥६॥
अज्ञानी जड़तामयी, करै अज्ञान निशङ्कः ।
कर्ता भुगता जीव यह, यों भाखें भगवन्त ॥७॥
ईश्वर की जिय जात है, ज्ञानी तथा अज्ञान ।
जो इह नै कर्ता कहो, तो हैं बात प्रमान ॥८ ॥
अज्ञानी कर्ता कहै, तौ सब बने बनाव ।
ज्ञानी हैं जड़ता करै, यह तौ बने न न्याव ॥९ ॥
ज्ञानी करता ज्ञान को, करें न कहुँ अज्ञान।
अज्ञानी जड़ता करें, यह तो बात प्रमान ॥१० ॥
जो कर्ता जगदीश है, पुण्य पाप किहँ होय।
सुख दुःख काको दीजिये, न्याय करहुँबुध लोय ॥११॥
नरकन में जिय डारिये, पकर पकरकें बाँह ।
जो ईश्वर करता कहो, तिनको कहा गुनाह ॥१२॥
ईश्वर की आज्ञा बिना, करत न कोऊ काम।
हिंसादिक उपदेश को, कर्ता कहिये राम ॥१३॥
कर्ता अपने कर्म को, अज्ञानी निर्धार ।
दोष देत जगदीश को, यह मिथ्या आचार ॥१४॥
ईश्वर तौ निर्दोष है, करता भुक्ता नाहिं।
ईश्वर को कर्ता कहै, ते मूरख जग मांहि ॥१५॥
ईश्वर निर्मल मुकुरवत, तीन लोक आभास ।
सुख सत्ता चैतन्यमय, निश्चय ज्ञान विलास ॥१६ ॥
जाके गुन तामें बसें, नहीं और में होय।
सूधी दृष्टि निहार तैं, दोष न लागें कोय ॥१७॥
वीतराग बानी विमल, दोष रहित तिहुँ काल।
ताहि लखै नहिं मूढ़ जन, झूठे गरु के बाल ॥१८ ॥
गुरु अन्धे शिष्य अन्धकी, लखै न बाट कुबाट।
बिना चक्षु भटकत फिरै, खुलें न हिये कपाट ॥१९॥
जोलों मिथ्यादृष्टि है, तोलों कर्ता होय।
सो हू भावित कर्मको, दर्वित करै न कोय ॥२०॥
दर्व कर्म पुद्गलमयी, कर्ता पुद्गल तास।
ज्ञानदृष्टि के होत ही, सूझे सब परकाश ॥२१ ॥
जोलों जीव न जान ही, छहों काय के वीर।
तौलों रक्षा कौन की, कर है साहस धीर ॥२२॥
जानत है सब जीव को, मानत आप समान।
रक्षा यातें, करत है, सब में दरशन ज्ञान ॥२३ ॥
अपने-अपने सहज के, कर्ता हैं सब दर्व।
यहै धर्म को मूल है, समझ लेहु जिय सर्व ॥२४॥
‘भैया’ बात अपार है, कहै कहाँलों कोय।
थोरे ही में समझियो, ज्ञानवंत जो होय ॥२५॥


स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: भैया भगवतीदास जी

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