तर्ज : करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं
करता हूँ मैं अभिनन्दन, स्वीकार करो माँ,
शरणागत अपने बालक का, उद्धार करो माँ … उद्धार करो माँ ।
हे माँ जिनवाणी, हे माँ जिनवाणी ।। टेक ।।
करता हूँ मैं अभिनन्दन …
मिथ्यातम वश रुल रहा, अशरण संसार में,
पुण्योदय से आ गया, तेरे दरबार में ।
सम्यक हो मेरी बुद्धि, उपकार करो माँ,
करता हूँ मैं अभिनन्दन … ।। १ ।।
इस पंचम काल में तीर्थंकर, दर्शन हैं नहीं,
सच्चे ज्ञानी गुरु दुर्लभ, मिलते कभी कभी ।
अतएव मुझ लाचार की, आधार तुम्हीं माँ,
करता हूँ मैं अभिनन्दन … ।। २ ।।
जीवादि सात तत्त्वों का माँ, मर्म बताया,
स्याद्वाद अनेकान्त ले, निजरूप जताया ।
निजरूप को लखकर, निज में लीन रहूँ माँ,
करता हूँ मैं अभिनन्दन … ।। ३ ।।
प्र. रवींद्रजी ‘आत्मन्’ की कलम से…!
कहाँ अक्षय निधि मेटी, कहाँ पर्याय विनाशी है ।
कहाँ त्रिकाल सुखमय ध्रुव, कहाँ पर्याय जरा सी है ।।
स्रोत: जिनवर भक्ति शतक (सामूहिक जिनेन्द्र पूजन समिति, कोटा)
संकलन: विक्रान्त कुमार जैन · सम्पादन: डॉ. वैद्य दीपक जैन