तर्ज : आत्मन् अपनी वैभव गाथा…
कर्म जीव के दुश्मन हैं, इनसे बचना आसान नहीं।
इन्हीं के कारण से जीव, अनादि से पाता सुख सम्मान नहीं॥1॥
जीव रूप को ढके हुए, ज्यों पर्दा ढकता मूरत को।
ज्ञानादि गुणों को घात करे, प्रकटाता नहीं उस सूरत को॥2॥
तीन प्रकार कर्म के हैं, नो-द्रव्य-भाव सुन लो भाई।
द्रव्य कर्म के आठ भेद, श्री जिनवाणी में बतलाई॥3॥
दर्शनावरणी-ज्ञानावरणी, दर्शन-ज्ञान को हरते हैं।
वेदनीय-सांसारिक सुख-दुख के निमित्त को धरते हैं॥4॥
मोहनीय कर्मों का नृप है, जीव को रूप भुलाता है।
सांसारिक माया चक्कर में, फँसा के दुख दिलाता है॥5॥
जीव उदय से आयु कर्म के, किसी गति में रुकता है।
उसे नष्ट कर जीव काय में, इक क्षण नहीं ठहरता है॥6॥
नाम कर्म से काया रचना, इष्ट-अनिष्ट जु होती है।
सुन्दर रूप इसी से मिलता, विकृत आकृति होती है॥7॥
गोत्र कर्म ऊँचे या नीचे, कुल में जन्म है करवाता।
अन्तराय के उदय समय में, होता काम न हो पाता॥ ৪॥
इसप्रकार से अष्टकर्म, संसार में चक्कर करवाते।
अपने चंगुल में फँसा जीव को, भारी दुख हैं पहुँचाते॥१॥
इसलिए उपेक्षित इन्हें करो, तब ही आत्महित होवेगा।
इनके चक्कर से छूटते ही, सुन्दर शुद्धात्म होवेगा॥10॥
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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