कर्मप्रकृति (आचार्य नेमिचन्द्र एवं आचार्य अभयचन्द्र), टीका एवं हिन्दी अनुवाद सहित | Karmaprakriti (Acharya Nemichandra, Acharya Abhaychandra)

कर्मप्रकृति (आचार्य नेमिचन्द्र एवं आचार्य अभयचन्द्र), टीका एवं हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती; आचार्य अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती
टीका: संस्कृत टीका (भट्टा॰ ज्ञानभूषण, भट्टा॰ सुमतिकीर्ति); पं॰ हेमराज कृत हिन्दी टीका
सम्पादन एवं अनुवाद: पं॰ हीरालाल शास्त्री; डॉ॰ गोकुलचन्द्र जैन
प्रकाशक: जैन विद्यापीठ, सागर (म॰ प्र॰)
संस्करण: २०१७ (आवृत्ति ११००)

कर्म की प्रकृतियों, उनके स्वभाव और भेदों का वर्णन। इस संस्करण में आचार्य नेमिचन्द्र और आचार्य अभयचन्द्र कृत दोनों कर्मप्रकृति, संस्कृत टीका तथा पं॰ हेमराज कृत हिन्दी टीका।

Karmaprakriti: two works on the types and nature of karma, by Acharya Nemichandra and Acharya Abhaychandra, with Sanskrit commentary, Hindi translation and the Hindi tika of Pt. Hemraj.


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हर गाथा अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

कर्मप्रकृतिः (भाग 1/2)

पणमिय सिरसा णेमिं गुणरयणविहूसणं महावीरं।
सम्मत्तरयणणिलयं पयडिसमुकित्तणं वोच्छं॥१॥

अर्थ: मंगलाचरण और ग्रन्थ-निरूपण-प्रतिज्ञा-मैं (ग्रन्थकार नेमिचन्द्र) अनन्त ज्ञानादि गुणरूप रत्नों के आभूषण धारण करने वाले, महान् बलशाली और क्षायिक सम्यक्त्वरूप रत्न के स्थान ऐसे नेमिनाथ तीर्थंकर को तथा उक्त विशेषणों से विशिष्ट एवं धर्मतीर्थरूप रथ के चक्र की धुरा को धारण करने वाले ऐसे महावीर तीर्थंकर को नमस्कार करके प्रकृतिसमुत्कीर्तन नामक अधिकार को कहता हूँ।


पयडी सील सहावो जीवांगाणं अणाइसंबंधो।
कणयोवले मलं वा ताणत्थित्तं सयं सिद्धं॥२॥

अर्थ: प्रकृति शब्द का अर्थ तथा जीव-कर्म के सम्बन्ध की अनादिता-प्रकृति, शील और स्वभाव ये कर्म के पर्यायवाची नाम हैं। जीव और कर्म का सम्बन्ध अनादिकालिक है। जिस प्रकार कनकोपल (सुवर्ण-पाषाण) में सोने और पाषाणरूप मल का मिलाप अनादिकालिक है और इसीलिए सुवर्ण-पाषाण के अनादिकालिक अस्तित्व के समान जीव और कर्म का अस्तित्व भी स्वयं सिद्ध है।


देहोदएण सहिओ१५ जीवो आहरदि कम्म-णोकम्मं।
पडिसमयं सव्वंगं तत्तायसपिंडओव्व जलं१६॥३॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार बतलाते हैं कि यह जीव कर्म-नोकर्म का ग्रहण किस प्रकार से करता है-जिस प्रकार अग्नि से सन्तप्त लोहे का गोला प्रतिसमय अपने सर्वांग से जल को खींचता है, उसी प्रकार शरीर नामक नामकर्म के उदय से चंचलता को प्राप्त हुआ यह जीव प्रतिसमय सर्व ओर से कर्म और नोकर्म वर्गणाओं को ग्रहण करता है।


सिद्धाणंतमभागं अभव्वसिद्धाणंतगुणमेव।
समयपबद्धं बंधदि जोगवसादो दु विसरित्थं१७ ॥४॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार प्रतिसमय ग्रहण की जाने वाली उन वर्गणाओं का प्रमाण बतलाते हैं-साधारणतः यह संसारी जीव सिद्ध राशि के अनन्तवें भाग और अभव्यराशि से अनन्तगुणित समयप्रबद्धरूप कर्म-नोकर्मवर्गणाओं को प्रतिसमय ग्रहण कर अपने साथ सम्बद्ध करता है, किन्तु योगों की विशेषता से अर्थात् मन्दता या तीव्रता से हीन या अधिक परिमाण में भी बाँधता है।


जीरदि समयपबद्धं पओगदो णेगसमयबद्धं वा।
गुणहाणीण दिवड्ढं समयपबद्धं हवे सत्तं ॥५॥

अर्थ: इस प्रकार कर्म-परमाणुओं के बन्ध का प्रमाण बतलाकर अब ग्रन्थकार उनके उदय और सत्त्व का प्रमाण बतलाते हैं-साधारणतः एक समय में एक समयप्रबद्ध प्रमाण कर्म-परमाणु उदय में आकर और अपना फल देकर निर्जीर्ण हो जाते हैं अर्थात् झड़ जाते हैं, किन्तु तपश्चरणादि विशेष प्रयोग से अनेक समयप्रबद्ध भी निर्जीर्ण हो जाते हैं अर्थात् झड़ जाते हैं। तथापि कुछ कम डेढ़ गुणहानि आयामगुणित समयप्रबद्ध सत्त्वरूप से अवस्थित रहते हैं।


कम्मत्तणेण इक्कं दव्वं भावो त्ति होइ दुविहं खु।
पुग्गलपिंडो दव्वं तस्सत्ती भावकम्मं तु ॥६॥

अर्थ: अब दो गाथाओं के द्वारा कर्म के भेद-प्रभेदों का निरूपण करते हैं-अभेद या सामान्य की अपेक्षा कर्म एक प्रकार का है। भेद की अपेक्षा द्रव्य और भाव के भेद से दो प्रकार का है। उनमें ज्ञानावरणादि रूप पुद्गलपरमाणुओं के पिण्ड को द्रव्यकर्म कहते हैं और उस द्रव्यकर्म रूप पिण्ड में फल देने की जो शक्ति है, उसे भावकर्म कहते हैं अथवा उस शक्ति से उत्पन्न हुए अज्ञानादि तथा रागादि भावों को भी भावकर्म कहते हैं।


तं पुण अट्ठविहं वा अडदालसयं असंखलोगं वा।
ताणं पुण२५ घादि त्ति अघादि त्ति य होंति सण्णाओ२६ ॥७॥

अर्थ: वह कर्म मूल प्रकृतियों की अपेक्षा आठ प्रकार का भी है अथवा उत्तरप्रकृतियों की अपेक्षा एक सौ अड़तालीस प्रकार का भी है अथवा बन्ध के कारणभूत कषायाध्यवसायस्थानों की अपेक्षा असंख्यात लोकों के जितने प्रदेश होते हैं, उतने भेदरूप भी हैं। कर्मों के जो आठ भेद हैं उनमें से चार कर्मों की घातिसंज्ञा है और चार कर्मों की अघातिसंज्ञा है।


णाणस्स दंसणस्स य आवरणं वेयणीय मोहणियं।
आउग णामं गोदंतरायमिदि अट्ठ पयडीओ२७ ॥८॥

अर्थ: अब कर्मों के आठ भेदों का निरूपण करते हैं-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये कर्मों के आठ मूलभेद हैं।


आवरण मोह विग्घं घादी जीवगुणघादणत्तादो।
आउग णामं गोदं वेयणियं तह अघादि त्ति२८ ॥९॥

अर्थ: अब उक्त कर्मों में घाति-अघाति का विभाजन करते हैं-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार घातिया कर्म हैं, क्योंकि ये जीव के ज्ञानादि गुणों का घात करते हैं। आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय ये चार अघातिया कर्म हैं; क्योंकि वे जीव के ज्ञानादि गुणों के घात करने में असमर्थ हैं।


केवलणाणं दंसणमणंतविरियं च खइयसम्मं च।
खइयगुणे मदियादी खओवसमिए य घादी दु२९॥१०॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार घातियाकर्मों से घात किये जाने वाले गुणों को बतलाते हैं-केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य और क्षायिकसम्यक्त्व तथा ‘च’ शब्द से सूचित क्षायिकचारित्र और क्षायिकदानादिरूप क्षायिक गुणों को; तथा मतिज्ञानादि क्षायोपशमिक गुणों को भी ये ज्ञानावरणादि कर्म घात करते हैं, इसलिए उन्हें घातिया कर्म कहते हैं।


कम्मकयमोहवड्ढियसंसारम्हि य अणादिजुत्तम्हि।
जीवस्स अवट्ठाणं करेदि आऊ हलिव्व णरं३० ॥११॥

अर्थ: अब अघातिया कर्मों में से पहले आयुकर्म का कार्य बतलाते हैं-कर्मों के उदय से उत्पन्न हुए मोह, अज्ञान, असंयम और मिथ्यात्व भाव से वृद्धि को प्राप्त इस अनादिकालीन संसार में जो मनुष्य को हलि या खोडे के समान जीव को रोक रखे, उसे आयुकर्म कहते हैं।


गदि आदि जीवभेदं देहादी पोग्गलाण भेयं च।
गदि-अंतरपरिणमणं करेदि णामं अणेयविहं३१ ॥१२॥

अर्थ: अब नामकर्म का कार्य बतलाते हैं-नामकर्म अनेक प्रकार का है। वह गति, जाति आदि जीवों के भेदों को, शरीर, अंगोपांग आदि पुद्गलों के भेदों को तथा जीव के एक गति से दूसरी गति रूप परिणमन को करता है।


संताणकमेणागयजीवायरणस्स गोदमिदि सण्णा।
उच्चं णीचं चरणं उच्चं णीचं हवे गोदं ॥१३॥

अर्थ: अब गोत्रकर्म का स्वरूप बतलाते हैं-सन्तान-क्रम से अर्थात् कुल की परम्परा से चले आये आचरण की गोत्र संज्ञा है। उसके दो भेद हैं; उनमें से कुल-परम्परागत उच्च (उत्तम) आचरण को उच्चगोत्र कहते हैं और निन्द्य आचरण को नीच गोत्र कहते हैं।


अक्खाणं अणुभवणं वेयणियं सुहसरूवयं सादं।
दुक्खसरूवमसादं तं वेदयदीदि वेयणीयं ॥१४॥

अर्थ: अब वेदनीयकर्म का स्वरूप बतलाते हैं-जो कर्म इन्द्रियों के विषयों का अनुभवन अर्थात् वेदन करावे, उसे वेदनीय कहते हैं। उसके दो भेद हैं, उनमें से जो सुखरूप इन्द्रिय-विषयों का अनुभव करावे, उसे सातावेदनीय कहते हैं और जो दुःख-स्वरूप इन्द्रिय-विषयों का अनुभव करावे, उसे असातावेदनीय कहते हैं।


अत्थं देखिय जाणदि पच्छा सद्दहदि सत्तभंगीहिं।
इदि दंसणं च णाणं सम्मत्तं हुंति जीवगुणा३८ ॥१५॥

अर्थ: अब आवरण का क्रम बतलाने के लिए पहले जीव के कुछ प्रधान गुणों का निर्देश करते हैं-संसारी जीव पहले पदार्थ को देखकर जानता है, पीछे सात भंगवाली नयों से निश्चय कर उनका श्रद्धान करता है। इस प्रकार दर्शन, ज्ञान और सम्यक्त्व ये तीन जीव के गुण सिद्ध होते हैं अर्थात् देखना दर्शनगुण है, जानना ज्ञानगुण है और श्रद्धान करना सम्यक्त्वगुण है।


सिय अत्थि णत्थि उभयं अव्वत्तव्वं पुणो वि तत्तिदयं।
दव्वं खु सत्तभंगं आदेसवसेण संभवदि३९ ॥१६॥

अर्थ: अब सात भंग कैसे संभव हैं, इस बात को बतलाते हैं-वस्तु स्यात् अस्तिरूप है, स्यात् नास्तिरूप है, स्यात् उभयरूप है और स्यात् अवक्तव्यरूप है। पुनः स्यात् अस्ति अवक्तव्यरूप है, स्यात् नास्ति अवक्तव्यरूप है और स्यात् अस्ति-नास्ति अवक्तव्यरूप है। इस प्रकार प्रत्येक द्रव्य के प्रति उपर्युक्त सात भंग आदेश अर्थात् विवक्षा के वश से संभव हैं।


अब्भरिहिदादु पुव्वं णाणं तत्तो दु दंसणं होदि।
सम्मत्तमदो विरियं जीवाजीवगदमिदि चरिमे ॥१७॥

अर्थ: ग्रन्थकार ने ‘अत्थं देखियय जाणदि’ इस गाथा में जिस क्रम से जीव के गुणों का निर्देश किया है, तदनुसार पहले दर्शनावरण का और पीछे ज्ञानावरणकर्म का निर्देश करना चाहिए था, परन्तु वैसा न करके पहले ज्ञानावरणकर्म का जो निर्देश आगम-परम्परा में पाया जाता है, सो क्यों ? इस शंका का समाधान ग्रन्थकार युक्तिपूर्वक करते हैं-जीव के सर्व गुणों में ज्ञानगुण प्रधान है, इसलिए उसके आवरण करने वाले कर्म का सबसे पहले नाम-निर्देश किया गया है। उसके पश्चात् दर्शन और सम्यक्त्वगुण के आवरण करने या घातने वाले कर्मों का निर्देश किया गया है। वीर्यगुण शक्तिरूप है और यह शक्तिरूप गुण जीव और अजीव दोनों में पाया जाता है, इसलिए उसके घात करने वाले अन्तराय कर्म का सब कर्मों के अन्त में निर्देश किया गया है।


घादीवि अघादिं वा णिस्सेसं घादणे असक्कादो।
णामतियणिमित्तादो विघ्घं पठिदं अघादिचरिमम्हि॥१८॥

अर्थ: यहाँ पर पुनः शंका उत्पन्न होती है कि अन्तराय तो घातियाकर्म है उसका अघातिया कर्मों के अन्त में क्यों नाम-निर्देश किया गया है ? ग्रन्थकार इसका समाधान करते हुए कहते हैं-यद्यपि अन्तराय घातिया कर्म है तथापि अघातिया कर्मों के समान वह जीव के वीर्यगुण को सम्पूर्ण रूप से घात करने में समर्थ नहीं तथा नाम, गोत्र और वेदनीय इन तीन कर्मों के निमित्त से ही वह अपना कार्य करता है, इसलिए उसे अघातिया कर्मों के अन्त में कहा गया है।


आउबलेण अवट्ठिदि भवस्स इदि णाममाउपुव्वं तु।
भवमस्सिय णीचुच्चं इदि गोदं णामपुव्वं तु॥१९॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार शेष कर्मों के क्रम की सार्थकता बतलाते हैं-आयुकर्म के बल से जीव का विवक्षित भव या चतुर्गतिरूप संसार में अवस्थान होता है, इसलिए आयुकर्म के निर्देश के पश्चात् नामकर्म का निर्देश किया गया है तथा शरीर रूप भव का आश्रय लेकर ही नीच और ऊँचपने का व्यवहार होता है, इसलिए नामकर्म के पश्चात् गोत्रकर्म का निर्देश किया गया है।


घादिं व वेयणीयं मोहस्स बलेण घाददे जीवं।
इदि घादीणं मज्झे मोहस्सादिम्हि पठिदं तु॥२०॥

अर्थ: यहाँ पर शंका उत्पन्न होती है कि वेदनीयकर्म तो अघातिया है, फिर उसका पाठ घातिया कर्मों के बीच में क्यों किया गया है ? इसका ग्रन्थकार समाधान करते हैं-यद्यपि वेदनीयकर्म अघातिया है तथापि वह मोहनीयकर्म के बल से घातिया कर्म के समान ही जीव का घात करता है, इसलिए घातिया कर्मों के मध्य में और मोहनीयकर्म के आदि में उसका नाम-निर्देश किया गया है।


णाणस्स दंसणस्स य आवरणं वेयणीय मोहणियं।
आउग णामं गोदंतरायमिदि पठिदमिदि सिद्धं५० ॥२१॥

अर्थ: इस प्रकार से कर्मों का जो पाठक्रम सिद्ध हुआ उसका ग्रन्थकार उपसंहार करते हैं-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय इस प्रकार से आगम में जो कर्मों का पाठ का क्रम है वही युक्ति-पूर्वक सिद्ध होता है।


जीवपएसेक्केक्के कम्मपएसा हु अंतपरिहीणा।
होंति घणणिविडभूओ संबंधो होइ णायव्वो५१ ॥२२॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार जीव के प्रदेशों के साथ कर्म के प्रदेशों के सम्बन्ध होने का निरूपण कहते हैं-जीव के एक-एक प्रदेश के ऊपर कर्मों के अन्त-परिहीन अर्थात् अनन्त प्रदेश अत्यन्त सघन प्रगाढ़ रूप से अवस्थित होकर सम्बन्ध को प्राप्त हो रहे हैं, ऐसा जानना चाहिए।


अत्थि अणाईभूओ बंधो जीवस्स विविहकम्मेण५२।
तस्सोदएण जायइ भावो पुण राय-दोसमओ५३ ॥२३॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार जीव और कर्म के अनादिकालीन सम्बन्ध का निरूपण करते हैं-इस जीव का नाना प्रकार के कर्मों के साथ अनादिकालीन सम्बन्ध है। पुनः उन कर्मों के उदय से जीव के राग-द्वेषमय भाव उत्पन्न होता है।


भावेण तेण पुणरवि अण्णे बहुपुग्गला हु लग्गंति।
जह तुप्पियगत्तस्स य णिविडा रेणुव्व लग्गंति५४ ॥२४॥

अर्थ: पुनः उस राग-द्वेषमय भाव के निमित्त से बहुत से अन्य कर्मपुद्गल-परमाणु जीव के साथ सम्बन्ध को प्राप्त होते हैं। जैसे कि घृत से लिप्त शरीर के साथ धूलि-कण अति सघनता के साथ चिपक जाते हैं।


एक्कसमएण बद्धं कम्मं जीवेण सत्तभेएहिं।
परिणमइ आउकम्मं बंधं भूयाउ [भुत्ताउ] सेसेण५६ ॥२५॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार एक समय में बँधनेवाले कर्मों के विभाग का क्रम बतलाते हैं-जीव के द्वारा एक समय में बाँधा गया कर्म आयुकर्म के बिना शेष सात कर्मों के स्वरूप से परिणमित होता है, किन्तु जो आयुकर्म है, वह भुज्यमान आयु के (त्रिभाग के) शेष रहने पर बन्ध को प्राप्त होता है।


सो बंधो चउभेओ णाएव्वो होदि सुत्तणिद्दिष्ट्ठो।
पयडिठ्ठिदि-अणुभाग-पएसबंधो पुरा कहियो ॥२६॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार बन्ध के भेदों का निरूपण करते हैं- जीव के एक समय में जो कर्मबन्ध होता है वह प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश बन्ध के रूप में आगमसूत्र में चार प्रकार का पुरातन आचार्यों द्वारा निर्देश किया गया है, ऐसा जानना चाहिए।


पडपडिहारसिमज्जा - हडि - चित्त - कुलाल - भंडयारीणं ।
जह एदेसिं भावा तहविह कम्मा मुणेयव्वा६० ॥२७॥

अर्थ: अब दृष्टान्तपूर्वक आठों कर्मों के स्वभाव का निरूपण करते हैं-पट (वस्त्र), प्रतीहार (द्वारपाल), मधु-लिप्त असि, मद्य (मदिरा), हलि (पैर को फाँसकर रखने वाला काठ का यन्त्र-खोड़ा), चित्रकार, कुलाल (कुम्भकार) और भण्डारी के जैसे अपने-अपने कार्य करने के भाव होते हैं, उसी प्रकार क्रम से आठों कर्मों के कार्य जानना चाहिए।


णाणावरणं कम्मं पंचविहं होइ सुत्तणिद्दिट्ठं ।
जह पडिमोवरि खित्तं कप्पडयं छादयं होइ६२ ॥२८॥

अर्थ: ज्ञानावरणकर्म आगमसूत्र में पाँच प्रकार का कहा गया है। जिस प्रकार प्रतिमा के ऊपर पड़ा हुआ कपड़ा प्रतिमा का आच्छादक होता है उसी प्रकार यह कर्म आत्मा के ज्ञानगुण का आच्छादन करता है।


दंसण-आवरणं पुण जह पडिहारो हु णिवदुवारम्हि।
तं णवविहं पउत्तं फुडत्थवाईहि६३ सुत्तम्हि६४ ॥२९॥

अर्थ: जिस प्रकार राजद्वार पर बैठा हुआ प्रतिहार (द्वारपाल) किसी को राजा के दर्शन नहीं करने देता उसी प्रकार दर्शनावरणकर्म आत्मा के दर्शन नहीं करने देता। यह कर्म स्पष्टवादी आचार्यों ने परमागमसूत्र में नौ प्रकार का कहा है।


महुलित्तखग्गसरिसं दुविहं पुण होइ वेयणीयं तु।
सायासायविभिण्णं सुह-दुक्खं देइ जीवस्स६७ ॥३०॥

अर्थ: मधुलिप्त खड्ग के सदृश वेदनीयकर्म है। वह दो प्रकार का है जो सातावेदनीय कर्म है वह जीव को सुख देता है और जो असातावेदनीय कर्म है, वह जीव को दुःख देता है।


मोहेइ मोहणीयं ६८जह मयिरा अहव कोद्दवा पुरिसं।
तं अडवीसविभिण्णं णायव्वं जिणुवदेसेण६९ ॥३१॥

अर्थ: जिस प्रकार मदिरा अथवा मत्तौनिया कोदों पुरुष को मोहित करते हैं उसी प्रकार मोहनीयकर्म जीव को मोहित करता है। जिनेन्द्रदेव के उपदेश से उसे अट्ठाईस भेदरूप जानना चाहिए।


आऊ७० चउप्पयारं णिरय-तिरिच्छ-मणुय-सुरगइगं।
हडिखित्त पुरिससरिसं जीवे भवधारणसमत्थं७१ ॥३२॥

अर्थ: नारक, तिर्यंच, मनुष्य और देवायु के भेद से आयुकर्म चार प्रकार का कहा गया है। यह कर्म हडि (खोड़े) में डाले गये पुरुष के सदृश जीवों को किसी एक भव में धारण करने के लिए समर्थ है।


चित्तपडं७२ व विचित्तं णाणाणामे णिवत्तणं णामं।
तेयाणवदी गणियं गइ-जाइ-सरीर-आईयं७३ ॥३३॥

अर्थ: चित्रकार के सदृश नामकर्म जीव के नाना प्रकार के आकारों का निर्माण करता है। यह गति, जाति, शरीर आदि के भेद से तेरानवे प्रकार का कहा गया है।


गोदं कुलालसरिसं णीचुच्चकुले७४सुपायणे दच्छं।
घडरंजणाइकरणे कुंभायारो जहा णिउणो७५ ॥३४॥

अर्थ: कुलाल (कुम्भकार) के सदृश गोत्रकर्म नीच और उच्चकुलों में उत्पादन करने में समर्थ कहा गया है। जिस प्रकार कुम्भकार घट-सिकोरा आदि बनाने में निपुण होता है उसी प्रकार यह गोत्रकर्म भी नीच और ऊँच कुलों में जीव को पैदा करने में समर्थ है।


जह भंडयारि पुरिसो धणं णिवारेइ राइणा दिण्णं।
तह अंतरायपणगं णिवारयं होइ लद्धीणं ॥३५॥

अर्थ: जिस प्रकार राजा के द्वारा दिये गये धन को भण्डारी देने से रोकता है उसी प्रकार पाँच प्रकार का अन्तरायकर्म दान आदि लब्धियों का निवारक कहा गया है।


पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण तेणवदी।
ते उत्तरं सयं वा दुग पणगं उत्तरा होंति ॥३६॥

अर्थ: ज्ञानावरणादि कर्मों की उत्तर प्रकृति का कथन-उक्त आठों कर्मों के क्रमशः पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तेरानवे अथवा एक सौ तीन, दो और पाँच उत्तर भेद होते हैं।


अहिमुहणियमियबोहणमाभिणिबोहियमणिंदि - इंदियजं।
बहुआदि-ओग्गहादिय-कयछत्तीसतसयभेयं ॥३७॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार ज्ञान के पाँच भेदों में से पहले मतिज्ञान का स्वरूप कहते हैं-इन्द्रिय और अनिन्द्रिय (मन) की सहायता से अभिमुख और नियमित पदार्थ के जानने वाले ज्ञान को आभिनिबोधिक कहते हैं। यह प्रत्येक अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा के भेद से तथा बहु आदि के भेद से तीन सौ छत्तीस प्रकार का कहा गया है।


अत्थादो अत्थंतरमुवलं भं तं भणंति सुदणाणं।
आभिणिबोहियपुव्वं णियमेणिह ८६सद्दजप्पमुहं८७॥३८॥

अर्थ: श्रुतज्ञान का स्वरूप-आभिनिबोधिक ज्ञान के विषयभूत पदार्थ से भिन्न पदार्थ के जानने को श्रुतज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान नियम से आभिनिबोधिक ज्ञानपूर्वक होता है। इसके अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक अथवा शब्दजन्य और लिंगजन्य ये दो भेद हैं। इनमें शब्दजन्य और अक्षरात्मक श्रुतज्ञान मुख्य है।


अवधीयदि त्ति ओही सीमाणाणेत्ति वण्णियं समये।
भव-गुणपच्चयविहियं जमोहिणाणेत्ति णं विंति९०॥३९॥

अर्थ: अवधिज्ञान का स्वरूप-द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से जिसके विषय की सीमा निश्चित है ऐसे भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालवर्ती सीमित पदार्थों के जानने वाले ज्ञान को अवधिज्ञान कहते हैं। सीमित जानने की अपेक्षा परमागम में इसे सीमाज्ञान कहा गया है। जिनेन्द्रदेव ने इसके दो भेद कहे हैं-एक भवप्रत्यय अवधि और दूसरा गुणप्रत्यय अवधि।


चिंतियमचिंतियं वा अद्धं चिंतियमणेयभेयगयं।
मणपज्जवं ति वुच्चइ जं जाणइ तं खु णरलोए९२॥४०॥

अर्थ: जो चिन्तित, अचिन्तित अथवा अर्धचिन्तित आदि अनेक भेदरूप से दूसरे के मन में स्थित पदार्थ को जाने उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान तपस्वी मनुष्यों के मनुष्यलोक में ही होता है, बाहर नहीं।


संपुण्णं तु समग्गं केवलमसवत्त सव्वभावगयं।
लोयालोयवितिमिरं केवलणाणं मुणेयव्वं९३॥४१॥

अर्थ: केवलज्ञान का स्वरूप-जो ज्ञान सम्पूर्ण, समग्र, केवल (असहाय), असपत्न (प्रतिपक्षरहित), सर्वपदार्थगत और लोक-अलोक में अन्धकाररहित होता है, उसे केवलज्ञान कहते हैं।


मदि - सुद - ओही - मणपज्जव - केवलणाण - आवरणमेवं।
पंचवियप्पं णाणावरणीयं जाण ९५जिणभणियं ॥४२॥

अर्थ: उपर्युक्त मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान के आवरण करने से ज्ञानावरणीय कर्म पाँच विकल्परूप जिनभगवान् ने कहा है, ऐसा हे शिष्य! तू जान।


जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कट्टुमायारं।
अविसेसिदूण अट्ठे दंसणमिदि भण्णए समये९६॥४३॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार दर्शन का स्वरूप कहते हैं-पदार्थों के आकार रूप-विशेष अंश का ग्रहण न करके जो केवल सामान्य अंश का निर्विकल्परूप से ग्रहण होता है, उसे परमागम में दर्शन कहते हैं।


चक्खूणं जं पयासइ दीसइ१०२ तं चक्खुदंसणं विंति।
सेसिंदियप्पयासो णायव्वो सो अचक्खु त्ति१०३॥४४॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार क्रमशः उनका स्वरूप कहते हुए पहले चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शन का स्वरूप निरूपण करते हैं-चक्षु इन्द्रिय के द्वारा जो पदार्थ का सामान्य प्रकाश होता है या वस्तु का सामान्य रूप दिखाई देता है, उसे चक्षुदर्शन कहते हैं। चक्षुरिन्द्रिय के सिवाय शेष इन्द्रियों और मन के द्वारा होने वाले अपने-अपने विषयभूत सामान्य प्रकाश या प्रतिभास को अचक्षुदर्शन जानना चाहिए।


परमाणुआदिआइं१०५ अंतिमखंधं ति मुत्तिदव्वाइं।
तं ओहिदंसणं पुण जं पस्सइ ताइं पच्चक्खं१०६॥४५॥

अर्थ: अवधिदर्शन का स्वरूप-अवधिज्ञान होने के पूर्व उसके विषयभूत परमाणु से लेकर महास्कन्धपर्यन्त मूर्तद्रव्य को जो सामान्यरूप से देखता है, उसे अवधिदर्शन कहते हैं। इस अवधिदर्शन के अनन्तर अवधिज्ञान उत्पन्न होता है, जो अपने विषयभूत परमाणु आदि को स्पष्टरूप से प्रत्यक्ष जानता है।


बहुविह-बहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्मि खेत्तम्मि।
लोयालोयवितिमिरो जो केवलदंसणुज्जोवो॥४६॥

अर्थ: केवलदर्शन का स्वरूप-तीव्र, मन्द, मध्यम आदि अनेक अवस्थाओं की अपेक्षा तथा चन्द्र-सूर्य आदि पदार्थों की अपेक्षा अनेक प्रकार के प्रकाश लोक के परिमित क्षेत्र में ही रहते हैं, किन्तु जो केवलदर्शन रूप उद्योत (प्रकाश) है वह लोक और अलोक को अन्धकाररहित स्पष्ट रूप से प्रकाशित करता है।


चक्खु - अचक्खू - ओही - केवलआलोयणाणमावरणं।
एत्तो पभणिस्सामो पण णिद्दा दंसणावरणे॥४७॥

अर्थ: दर्शनावरण कर्म के भेद-उक्त चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवलदर्शन के आवरण करने वाले कर्म को दर्शनावरण कहते हैं। इस कर्म के नौ भेद हैं जिनमें से चार भेदों का स्वरूप कह दिया। अब पाँच निद्राओं का स्वरूप आगे कहते हैं।


अह थीणगिद्धि णिद्दाणिद्दा य तहेव पयलपयला य।
णिद्दा पयला एवं णवभेयं दंसणावरणे॥४८॥

अर्थ: पाँच प्रकार की निद्रा का कथन-चक्षुदर्शनावरण आदि चार भेदों के साथ स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला तथा निद्रा और प्रचला इन पाँच निद्राओं के मिला देने पर दर्शनावरणकर्म के नौ भेद हो जाते हैं।


थीणुदएणुट्ठविदे सोवदि कम्मं करेदि जंपदि वा।
णिद्दाणिद्दुदएण य ण दिट्ठिमुग्घाडिदुं सक्को॥४९॥

अर्थ: स्त्यानगृद्धि और निद्रानिद्रा का स्वरूप-स्त्यानगृद्धिकर्म के उदय से जीव उठाये जाने पर भी सोता ही रहता है, सोते हुए ही नींद में अनेक कार्य करता है और बोलता भी रहता है पर संज्ञाहीन रहता है। निद्रानिद्रा कर्म के उदय से जगाये जाने पर भी आँखें नहीं उघाड़ सकता है।


पयलापयलुदएण य वहेदि लाला चलंति अंगाइं।
णिद्दुदए गच्छंतो ठाइ पुणो वइसदि पडेदि॥५०॥

अर्थ: प्रचलाप्रचला और निद्रा का स्वरूप-प्रचलाप्रचला कर्म के उदय से मुख से लार बहती है और अंग-उपांग चलते रहते हैं। निद्राकर्म के उदय से जीव गमन करता हुआ भी खड़ा हो जाता है, बैठ जाता है, गिर पड़ता है इत्यादि नाना क्रियाएँ करता है।


पयलुदएण य जीवो ईसुम्मीलिय सुवेदि सुत्तो वि।
ईसं ईसं जाणदि मुहुं मुहुं सोवदे मंदं११५॥५१॥

अर्थ: प्रचला का स्वरूप-प्रचला कर्म के उदय से यह जीव कुछ-कुछ आँखों को उघाड़कर सोता है और सोता हुआ भी थोड़ा-थोड़ा जानता है और जानते हुए बार-बार मन्द-मन्द नींद लेता रहता है।


दुविहं खु वेयणीयं सादमसादं च वेयणीयमिदि।
पुण दुवियप्पं मोहं दंसण-चारित्तमोहमिदि॥५२॥

अर्थ: वेदनीयकर्म के दो भेद हैं-१. सातावेदनीय, २. असातावेदनीय। मोहनीयकर्म दो प्रकार का है-१. दर्शनमोहनीय, २.चारित्रमोहनीय। जो आत्मा के सम्यग्दर्शन गुण का घात करे, उसे दर्शन मोहनीय कहते हैं और सम्यक् चारित्र गुण का घात करने वाले कर्म को चारित्रमोहनीय कहते हैं।


बंधादेगं मिच्छं उदयं सत्तं पडुच्च तिविहं खु।
दंसणमोहं मिच्छं मिस्सं सम्मत्तमिदि जाणे११६॥५३॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्म के भेद-दर्शनमोहनीय कर्म बन्ध की अपेक्षा एक मिथ्यात्व रूप ही है किन्तु उदय और सत्त्व की अपेक्षा तीन प्रकार का जानना चाहिए-१. मिथ्यात्व, २. मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) और ३. सम्यक्त्वप्रकृति।


जंतेण कोद्दवं वा पढमुवसमसम्भवावजंतेण।
११९मिच्छादव्वं तु तिधा१२० असंखगुणहीणदव्वकमा१२१॥५४॥

अर्थ: दर्शनमोह के तीन भेद होने का दृष्टान्तपूर्वक वर्णन-यन्त्र (जाँता या चक्की) से दले हुए कोदों के समान प्रथमोपशम सम्यक्त्व परिणामरूप यन्त्र से मिथ्यात्व रूप कर्म द्रव्य तीन प्रकार का हो जाता है और वह द्रव्य प्रमाण में क्रम से असंख्यात गुणित-असंख्यातगुणित हीन होता है।


दुविहं चरित्तमोहं कसायवेयणीयं णोकसायमिदि।
पढमं सोलसविहं विदियं णवभेयमुद्दिट्ठं ॥५५॥

अर्थ: चारित्र मोहकर्म के भेद-मोहनीयकर्म का दूसरा भेद जो चारित्रमोहनीय कर्म है वह दो प्रकार का है-कषायवेदनीय और नोकषायवेदनीय। उनमें प्रथम कषायवेदनीय सोलह और द्वितीय नोकषाय वेदनीय नौ प्रकार का कहा गया है।


अणंताणुबंधी पच्चक्खाणं तहेव संजलणं।
कोहो माणो माया लोहो सोलस कसायेदे ॥५६॥

अर्थ: कषाय वेदनीय के भेद-कषाय वेदनीय के सोलह भेद इस प्रकार हैं-अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ और संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ ॥५६॥


सिल-पुढविभेद-धूली-जलराइसमाणओ हवे कोहो।
णारयतिरियणरामरगईसु उप्पायओ कमसो॥५७॥

अर्थ: चारों प्रकार की क्रोध कषाय के उपमान और फल-उनमें से अनन्तानुबन्धी क्रोध पत्थर की रेखा के समान, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध पृथ्वी की रेखा के समान, प्रत्याख्यानावरण क्रोध धूलि की रेखा के समान और संज्वलन क्रोध जल की रेखा के समान परिणाम वाला कहा गया है। ये चारों प्रकार के क्रोध क्रमशः नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति में उत्पन्न करने वाले हैं।


सिल-अट्ठि-कट्ठ-वेत्ते णियभेएणणुहरंतओ माणो।
णारयतिरियणरामरगईसु उप्पायओ कमसो॥५८॥

अर्थ: चारों प्रकार की मानकषाय के उपमान और फल-अनन्तानुबन्धी मान पत्थर के समान, अप्रत्याख्यानावरण मान हड्डी के समान, प्रत्याख्यानावरण मान काठ के समान और संज्वलन मान बेंत के समान कठोर परिणाम वाला कहा गया है। ये चारों प्रकार के मान क्रमशः नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति में उत्पन्न करने वाले हैं।


वेणुवमूलोरब्भयसिंगे गोमुत्तए य खोरुप्पे।
सरिसी माया णरयतिरियणरामरगईसु खिवदि जियं१२७॥५९॥

अर्थ: चारों प्रकार की मायाकषाय के उपमान और फल-अनन्तानुबन्धी माया बाँस की जड़ के समान, अप्रत्याख्यानावरण माया मेंढ़े के सींग के समान, प्रत्याख्यानावरण माया गोमूत्र के समान और संज्वलन माया खुरपा के समान कुटिल परिणाम वाली कही गयी है। ये चारों प्रकार की माया क्रमशः जीव को नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति में ले जाती हैं।


किमिराय-चक्क -तणुमल-हरिद्दराएण सरिसओ लोहो।
णारयतिरिक्खमाणुसदेवेसुप्पायओ कमसो१२८॥६०॥

अर्थ: चारों प्रकार की लोभ कषाय के उपमान और फल-अनन्तानुबन्धी लोभ कृमिराग के समान, अप्रत्याख्यानावरण लोभ चक्रमल (ओंगन) के समान, प्रत्याख्यानावरण लोभ शरीर के मल के समान और संज्वलन लोभ हल्दी के रंग के समान सचिक्कण परिणाम वाला कहा गया है। ये चारों प्रकार के लोभ क्रमशः नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति के उत्पादक होते हैं।


सम्मत्त - देस - सयलचरित्त - जहखादचरणपरिणामे।
घादंति वा कसाया चउ-सोल-असंखलोगमिदा१२९॥६१॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धी आदि चारों प्रकार की कषायों के कार्य-जो सम्यक्त्व, देशचारित्र, सकलचारित्र और यथाख्यात चारित्ररूप परिणामों को कसे या घात करे, उसे कषाय कहते हैं। इसके अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण आदि की अपेक्षा चार भेद हैं। इन्हीं चारों के क्रोध, मान, माया और लोभ की अपेक्षा सोलह भेद हैं और कषाय के उदयस्थानों की अपेक्षा असंख्यात लोकप्रमाण भेद कहे गये हैं। अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यक्त्व की घातक, अप्रत्याख्यानावरण कषाय देशचारित्र (श्रावकव्रत) की घातक, प्रत्याख्यानावरण कषाय सकलचारित्र (मुनिव्रत) की घातक और संज्वलन कषाय यथाख्यातचारित्र की घातक है।


हस्स रदि अरदि सोयं भयं जुगुंछा य इत्थि-पुंवेयं।
संढं वेयं च तहा णव एदे णोकसाया य॥६२॥

अर्थ: नोकषाय वेदनीय के नौ भेदों का प्रतिपादन करते हैं-हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसक वेद ये नौ नोकषाय हैं। इनका स्वरूप इनके नामों के अनुसार जानना चाहिए।


छादयदि सयं दोसे णयदो१३० छाददि परं पि दोसेण।
छादणसीला जम्हा तम्हा सा वण्णिदा इत्थी१३१॥६३॥

अर्थ: स्त्रीवेद का स्वरूप-यतः जो मिथ्यादर्शन, अज्ञान, असंयम आदि दोषों से अपने को आच्छादित करती है और मृदु-भाषण, तिरछी-चितवन आदि व्यापारों से दूसरे पुरुषों को भी हिंसा, कुशीलादि दोषों से आच्छादित करती है, अतः उसे आच्छादन स्वभाव युक्त होने से स्त्री कहा गया है।


पुरुगुणभोगे सेदे करेदि लोयम्हि पुरुगुणं कम्मं।
पुरु उत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिदो पुरिसो॥६४॥

अर्थ: पुरुषवेद का स्वरूप-यतः जो उत्कृष्ट गुण अथवा उत्कृष्ट भोगों का स्वामी है अथवा जो लोक में उत्कृष्ट गुणयुक्त कर्म को करता है अथवा जो स्वयं उत्तम है, उसे पुरुष कहा गया है।


णेवित्थी णेव पुमं णउंसवो उहयलिंगवदिरित्तो।
इट्ठावग्गिसमाणयवेयणगरुओ कलुसचित्तो॥६५॥

अर्थ: नपुंसक वेद का स्वरूप-जो न स्त्रीरूप है और न पुरुषरूप है ऐसे दोनों ही लिंगों से रहित जीव को नपुंसक कहते हैं। इसकी विषय-सेवन की लालसा भट्ठे में पकती हुई ईंटों की अग्नि के समान तीव्र कही गयी है अतएव इसका निरन्तर कलुषित चित्त रहता है।


णायरतिरियणरामर आउगमिदि चउव्विहो हवे आऊ।
णामं वादालीसं पिंडापिंडप्पभेएण॥६६॥

अर्थ: आयुकर्म का निरूपण करते हैं-नारक, तिर्यंच, मनुष्य और देवायुष्य के भेद से आयुकर्म चार प्रकार का होता है अर्थात् आयुकर्म के चार भेद हैं-नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु। पिण्ड प्रकृति और अपिण्ड प्रकृतियों के भेद से नामकर्म बयालीस प्रकार का है।


णेरइय-तिरिय-माणुस-देवगइ त्ति य हवे गई चदुधा।
इगि-वि-ति-चउ-पंचक्खा जाई पंचप्पयारेदे॥६७॥

अर्थ: गति और जाति नामकर्म के भेद-उनमें से गति नामकर्म चार प्रकार का है-नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति और देवगति। जाति नामकर्म पाँच प्रकार का है-एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति और पंचेन्द्रियजाति।


ओरालिय - वेगुव्विय - आहारय - तेज - कम्मणसरीरं।
इदि पंचसरीरा खलु ताण वियप्पं वियाणाहि ॥६८॥

अर्थ: शरीर नामकर्म के भेद-शरीर नामकर्म के पाँच भेद जानना चाहिए-औदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर, आहारक शरीर, तैजस शरीर और कार्मण शरीर।


तेजाकम्मेहिं तिए तेजाकम्मेण कम्मणा कम्मं।
कयसंजोगे चदुचदुचदुदुगएक्कं च पयडीओ१४१॥६९॥

अर्थ: अब इन पाँचों शरीरों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भेदों का निरूपण करते हैं-तैजस और कार्मण शरीर के साथ औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर का आपस में संयोग करने पर चार-चार भेद होते हैं, इस प्रकार तीनों के मिलकर बारह भेद हो जाते हैं तथा कार्मण शरीर के साथ तैजस शरीर के मिलाने से दो भेद और कार्मण शरीर के साथ कार्मण शरीर को मिलाने से एक भेद और होता है, इस प्रकार सब मिलाकर पन्द्रह भेद हो जाते हैं।


पंच य सरीरबंधणाणं ओराल तह य वेउव्वं।
आहार तेज कम्मण सरीरबंधन सुणाममिदि॥७०॥

अर्थ: बन्धन नामकर्म के भेद-बन्धन नामकर्म के पाँच भेद हैं-१. औदारिक शरीर-बन्धन, २. वैक्रियिक शरीर-बन्धन, ३. आहारक शरीर-बन्धन, ४. तैजस शरीर-बन्धन और ५. कार्मणशरीर-बन्धन।


पंच संघादणाणं ओरालिय तह य जाण वेउव्वं।
आहार तेज कम्मण सरीरसंघादणाममिदि॥७१॥

अर्थ: संघात नामकर्म के भेद-संघात नामकर्म पाँच प्रकार का है-१. औदारिक शरीर-संघात, २. वैक्रियिक शरीर-संघात, ३. आहारक शरीर-संघात, ४. तैजस शरीर-संघात और ५. कार्मण शरीर-संघात।


समचउरस णिग्गोहं सादी कुज्जं च वामणं हुंडं।
संठाणं छब्भेयं इदि णिद्दिट्ठं जिणागमे जाण॥७२॥

अर्थ: संस्थान नामकर्म के छह भेद जिनागम में कहे गये हैं जो इस प्रकार जानना चाहिए-१. समचतुरस्रसंस्थान, २. न्यग्रोधसंस्थान, ३. स्वातिसंस्थान, ४. कुब्जक-संस्थान, ५. वामन-संस्थान और ६. हुण्डकसंस्थान ॥७२॥


ओरालय वेगुव्विय आहारय अंगुवंगमिदि भणिदं।
अंगोवंगं तिविहं परमागमकुसलसाहूहं॥७३॥

अर्थ: अंगोपांग नामकर्म के भेद-परमागम में कुशल साधुओं ने अंगोपांग नामकर्म के तीन भेद कहे हैं-१. औदारिक शरीर अंगोपांग, २. वैक्रियिक शरीर अंगोपांग, ३. आहारक शरीर अंगोपांग ॥७३॥


णलया बाहू य तहा णियंब पुट्ठी उरो य सीसो य।
अट्ठेव दु अंगाईं देहे सेसा उवंगाईं॥७४॥

अर्थ: शरीर के आठ अंग-शरीर में ये आठ अंग होते हैं-दो पैर, दो हाथ, नितम्ब (कमर के पीछे का भाग), पीठ, हृदय और मस्तक। नाक, कान आदि उपांग कहलाते हैं।


दुविहं विहायणामं पसत्थ-अपसत्थगमणमिदि णियमा।
वज्जरिसहणारायं वज्जंणाराय णारायं॥७५॥

अर्थ: विहायोगति नामकर्म के नियम से दो भेद हैं-१. प्रशस्तविहायोगति, २. अप्रशस्तविहायोगति।


तह अद्धं णारायं कीलिय संपत्तपुव्व सेवट्ठं।
इति संहडणं छव्विहमणाइणिहणारिसे भणिदं॥७६॥

अर्थ: अब संहनन नामकर्म के भेद कहते हैं-अनादिनिधन आर्ष में संहनन नामकर्म छह प्रकार का कहा गया है-१. वज्रवृषभ-नाराचसंहनन, २. वज्रनाराचसंहनन, ३. नाराचसंहनन, ४. अर्धनाराचसंहनन, ५. कीलकसंहनन और ६. असम्प्राप्ता-सृपाटिकासंहनन।


जस्स १४८कम्मस्स उदए वज्जमयं अट्ठि रिसह णारायं।
तं संहडणं भणियं १४९वज्जरिसहणारायणाममिदि॥७७॥

अर्थ: वज्रवृषभनाराच संहनन का स्वरूप-जिस कर्म के उदय से वज्रमय हड्डी ऋषभ (वेष्ठन) और नाराच (कील) हों, उसे वज्रवृषभनाराचसंहनन कहते हैं।


जस्सुदए वज्जमयं अट्ठी णारायमेव सामण्णं।
रिसहो तस्संहडणं णामेण य वज्जणारायं॥७८॥

अर्थ: वज्रनाराचसंहनन का स्वरूप-जिस कर्म के उदय से वज्रमय हड्डी और कीलें हों किन्तु वेष्ठन सामान्य हो अर्थात् वज्रमय न हो, उसे वज्रनाराचसंहनन कहते हैं।


जस्सुदए वज्जमया हड्डा वो१५० वज्जरहिदणारायं।
रिसहो तं भणियव्वं णारायसरीरसंहडणं॥७९॥

अर्थ: नाराचसंहनन का स्वरूप-जिस कर्म के उदय से हड्डियाँ तो वज्रमय हों किन्तु वेष्ठन और कीलें वज्रमय न हों, उसे नाराचशरीरसंहनन कहना चाहिए।


वज्जविसेसणरहिदा अट्ठीओ अद्धविद्धणारायं।
जस्सुदए तं भणियं णामेण य अद्धणारायं॥८०॥

अर्थ: अर्धनाराचसंहनन का स्वरूप-जिस कर्म के उदय से हड्डियाँ वज्रविशेषण से रहित हों और शरीर के अर्धभाग में कीलें लगी हों, उसे अर्धनाराचसंहनन कहते हैं।


१५१जस्स कम्मस्स उदए अवज्जहड्डाइं खीलियाइं व।
दिढबंधाणि हवंति हु तं कीलियणामसंहडणं॥८१॥

अर्थ: कीलिकसंहनन का स्वरूप-जिस कर्म के उदय से हड्डियाँ और कीलें वज्रमय न हों किन्तु हड्डियों में कीलें दृढ़ बन्धन वाली लगी हों, उसे कीलकसंहनन कहते हैं।


जस्स कम्मस्स उदए अण्णोण्णमसंपत्तहड्डुसंधीओ।
णरसिर-बंधाणि हवे तं खु असंपत्तसेवट्टं॥८२॥

अर्थ: सृपाटिकासंहनन का स्वरूप-जिस कर्म के उदय से हड्डियों की सन्धियाँ परस्पर में भिन्न हों और नसों से बँधी हुई हों, उसे असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन कहते हैं।


सेवट्टेण य गम्मइ आदीदो चदुसु कप्पजुगलो त्ति।
तत्तो दुजुगलजुगले कीलियणारायणद्धोत्ति१५२॥८३॥

अर्थ: अब उक्त संहनन वाले जीव स्वर्ग में कहाँ तक उत्पन्न हो सकते हैं यह बतलाते हैं-सृपाटिका संहनन वाले जीव यदि स्वर्गों में उत्पन्न हों तो आदि स्वर्ग-युगल (सौधर्म-ऐशान) से लगाकर चौथे कल्पयुगल (लान्तव-कापिष्ठ) तक चार युगलों में अर्थात् आठवें स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकते हैं। पुनः दो-दो युगलों में कीलक और अर्धनाराच संहनन वाले जीव जन्म धारण करते हैं अर्थात् पाँचवें छठे स्वर्ग युगल में कीलक संहनन वाले और सातवें तथा आठवें स्वर्गयुगल में अर्धनाराच संहनन वाले जन्म ले सकते हैं।


१५३गेविज्जाणुदिसाणुत्तरवासीसु जंति ते१५४ णियमा।
तिदुगेगे संहडणे णारायणमादिगे कमसो१५५॥८४॥

अर्थ: नाराच आदि तीन संहनन वाले वज्रनाराच आदि दो संहनन वाले तथा वज्रऋषभनाराचसंहनन वाले जीव क्रमशः नौ ग्रैवेयकों में नौ अनुदिशों में और अनुत्तर विमानवासी देवों में उत्पन्न हो सकते हैं अर्थात् आदि के तीन संहनन वाले नौ ग्रैवेयकों तक, आदि के दो संहनन वाले नौ अनुदिशों तक और प्रथम संहनन वाले जीव पंच अनुत्तर विमानों तक जन्म ले सकते हैं।


सण्णी छस्संहडणो वच्चइ मेघं तदो परं चावि।
सेवट्टादीरहिदो पण-पण-चदुरेगसंहडणो१५६॥८५॥

अर्थ: अब किस संहनन वाले जीव किस नरक तक उत्पन्न हो सकते हैं, यह बतलाते हैं-छहों संहनन वाले संज्ञी जीव यदि नरक में जन्म लेवें तो मेघा नामक तीसरे नरक तक जा सकते हैं। सृपाटिका संहनन रहित पाँच संहनन वाले अरिष्टा नामक पाँचवें नरक तक उत्पन्न हो सकते हैं। आदि के चार संहनन वाले जीव छठवें मघवी नामक नरक तक और वज्रवृषभनाराच संहनन वाले सातवें माघवी नामक नरक तक उत्पन्न हो सकते हैं।


घम्मा वंसा मेघा अंजण रिट्ठा तहेव अणिवज्झा।
छट्ठी मधवी पुढवी सत्तमिया माघवी णाम॥८६॥

अर्थ: अब सातों नरकों की पृथ्वियों के नाम बतलाते हैं-पहली घम्मा, दूसरी वंशा, तीसरी मेघा, चौथी अंजना, पाँचवीं अरिष्टा, छठी मघवी और सातवीं पृथ्वी का नाम माघवी है। ये सभी नाम अनादि-निधन एवं अनवद्य हैं।


मिच्छापुव्वदुगादिसु सगचदुपणठाणेसु णियमेण।
पढमादियाइ छत्तिगि ओघादेसे विसेसदो णेया॥८७॥

अर्थ: अब गुणस्थानों में संहननों का निरूपण करते हैं-ओघ की अपेक्षा मिथ्यात्व आदि सात गुणस्थानों में छहों संहनन वाले जीव, अपूर्वकरण आदि उपशम श्रेणी के चार गुणस्थानों में आदि के तीन संहनन वाले जीव और अपूर्वकरण आदि क्षपक श्रेणी के पाँच गुणस्थानों में प्रथम संहनन वाले जीव पाये जाते हैं। आदेश अर्थात् मार्गणा स्थानों में विशेष रूप से (आगमानुसार) जानना चाहिए।


विरयचउक्के छट्ठं पढमं तु असंखआउजीवेसु।
चउत्थे पंचम छट्ठे कमसो विय छत्तिगेक्क संहडणी॥८८॥

अर्थ: जीवसमासों में संहनन का निरूपण-विकल चतुष्क अर्थात् द्वीन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक चार जाति के जीवों में छठा असम्प्राप्तासृपाटिका संहनन होता है। असंख्यात वर्ष की आयु वाले भोगभूमियाँ जीवों में पहला वज्रऋषभनाराचसंहनन होता है। अवसर्पिणी के चौथे काल में छहों संहनन वाले, पंचम काल में अन्तिम तीन संहनन वाले और छठे काल में अन्तिम एक सृपाटिका संहनन वाले जीव होते हैं।


सव्वविदेहेसु तहा विज्जाहर-मिलिच्छमणुय-तिरिएसु१६२।
छस्संहडणा भणिया णगिंदपरदो य तिरिएसु॥८९॥

अर्थ: सम्पूर्ण विदेह क्षेत्रों में तथा विद्याधर म्लेच्छ मनुष्यों में और तिर्यंचों में छहों संहनन वाले जीव कहे गये हैं। नागेन्द्र पर्वत से परवर्ती तिर्यंचों में भी छहों संहनन कहे गये हैं।


अंतिमतिगसंहडणस्सुदओ पुण कम्मभूमिमहिलाणं।
आदिमतियसंहडणं णत्थि त्ति जिणेहिं णिद्दिट्ठं१६३॥९०॥

अर्थ: कर्मभूमिज स्त्रियों के संहनन का वर्णन-कर्मभूमि की महिलाओं के अन्तिम तीन संहननों का उदय होता है, उनके आदि के तीन संहनन नहीं होते ऐसे जिनेन्द्र देवों ने कहा है।


पंच य वण्णा सेदं पीदं हरिदरुणकिण्हवण्णमिदि।
गंधं दुविहं लोए सुगंध-दुग्गंधमिदि जाणे॥९१॥

अर्थ: अब नामकर्म के शेष भेदों का प्रतिपादन करते हैं-जिस कर्म के उदय से शरीर में श्वेत आदि वर्ण उत्पन्न हों, उसे वर्ण नामकर्म कहते हैं। वर्ण नामकर्म के पाँच भेद हैं-श्वेत, पीत, हरित, अरुण (लाल) और कृष्णवर्ण नामकर्म। जिस कर्म के उदय से शरीर में गन्ध उत्पन्न होती है, उसे गन्धनामकर्म कहते हैं। गन्ध नामकर्म लोक में सुगन्ध और दुर्गन्ध ये दो प्रकार का जानना चाहिए।


तित्तं कडुयं कसायं अंबिल महुरमिदि पंच रसणामं।
मउगं कक्कस गुरु लघु सीदुण्हं णिद्ध रुक्खमिदि॥९२॥

अर्थ: जिस कर्म के उदय से शरीर में मधुर आदि रस उत्पन्न होते हैं, उसे रस नामकर्म कहते हैं। रस नामकर्म पाँच प्रकार का है-तिक्त (चरपरा), कटु, कषाय (कसैला), आम्ल (खट्टा) और मधुर (मीठा) रस नामकर्म। जिस कर्म के उदय से शरीर में कोमल कठोर आदि स्पर्श उत्पन्न होते हैं, उसे स्पर्श नामकर्म कहते हैं। स्पर्श नामकर्म के आठ भेद हैं-मृदु (कोमल), कर्कश (कठोर), गुरु (भारी), लघु (हल्का), शीत (ठण्डा), उष्ण (गर्म), स्निग्ध (चिकना) और रूक्ष (रूखा)।


फासं अट्ठवियप्पं चत्तारि आणुपुव्वि अणुकमसो।
णिरयाणू तिरियाणू णराणू देवाणुपुव्वि त्ति ॥९३॥

अर्थ: जिस कर्म के उदय से विग्रहगति में पूर्व शरीर का आकार बना रहता है, उसे आनुपूर्वी नामकर्म कहते हैं। आनुपूर्वी नामकर्म के अनुक्रम से ये चार भेद जानना चाहिए-नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और देवगत्यानुपूर्वी।


एदा चउदस१६८ पिंडा १६९पयडीओ वण्णिदा समासेण।
एत्तो१७० अपिंडपयडी अडवीसं वण्णइस्सामि ॥९४॥

अर्थ: इस प्रकार उपर्युक्त चौदह पिण्डप्रकृतियों का संक्षेप से वर्णन किया। अब इससे आगे अट्ठाईस अपिण्ड प्रकृतियों का वर्णन करेंगे।


अगुरुलहुग उवघादं परघादं च जाण उस्सासं।
आदावं उज्जोवं छप्पयडी अगुरुछक्कमिदि॥९५॥

अर्थ: अगुरुलघुषट्क का स्वरूप-अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, आतप और उद्योत। इन छह प्रकृतियों को अगुरुषट्क जानना चाहिए।


मूलुण्हपहा अग्गी आदावो होदि उण्हसहियपहा।
आइच्चे तेरिच्छे उण्हूणपहा हु उज्जोवो१७१॥९६॥

अर्थ: अब अग्नि, आतप और उद्योत प्रकृति में अन्तर बताते हैं-अग्नि की मूल और प्रभा दोनों उष्ण होते हैं अतः अग्नि के उष्ण स्पर्शनामकर्म का उदय जानना चाहिए, किन्तु जिसके आतप नामकर्म का उदय होता है उसका मूल तो शीतल होता है पर प्रभा उष्णतासहित होती है। इस आतपनामकर्म का उदय सूर्य के बिम्ब में उत्पन्न हुए बादरपर्याप्त पृथ्वीकायिक तिर्यंच जीवों के होता है। जिसके उद्योतनामकर्म का उदय होता है उसका मूल और प्रभा ये दोनों ही उष्णतारहित अर्थात् शीतल होते हैं। इस नामकर्म का उदय चन्द्रबिम्ब में उत्पन्न होने वाले पृथ्वीकायिक जीवों में तथा खद्योत (जुगूनू) आदि विशेष तिर्यंचों में होता है।


तस थावरं च बादर सुहुमं पज्जत्त तह अपज्जत्तं।
पत्तेयसरीरं पुण साहारणसरीर थिरमथिरं ॥९७॥

सुह असुह सुहग दुब्भग सुस्सर दुस्सर तहेव णायव्वा।
आदिज्जमणादिज्जं१७२ जस अजसकित्ति णिमिण तित्थयरं ॥९८॥

अर्थ (गाथा 97 से 98): अपिण्ड प्रकृतियों का निरूपण-त्रस-स्थावर, बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर-साधारणशरीर, स्थिर-अस्थिर शुभ-अशुभ, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय, यशःकीर्ति-अयशःकीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर ये शेष अपिण्ड प्रकृतियाँ जानना चाहिए।


तस बादर पज्जत्तं पत्तेयसरीर थिर सुहं सुभगं१७३।
सुस्सर आदिज्जं पुण जसकित्ति णिमिण तित्थयरं॥९९॥
[तसद्वादसयं]

अर्थ: त्रस द्वादशक का निरूपण-त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर इन बारह प्रकृतियों को त्रस-द्वादशक कहते हैं।


थावर सुहुममपज्जत्तं साहारणसरीरमथिरं च।
असुहं दुब्भग दुस्सर णादिज्जं अजसकित्ति त्ति ॥१००॥

अर्थ: स्थावरदशक का वर्णन-स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण शरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और अयशःकीर्ति ये दश प्रकृतियाँ स्थावरदशक कहलाती हैं।


इदि णामप्पयडीओ तेणवदी, उच्चणीयमिदि दुविहं।
गोदं कम्मं भणिदं पंचविहं अंतरायं तु ॥१०१॥

अर्थ: ये उपर्युक्त नामकर्म की सब मिलाकर तेरानवे प्रकृतियाँ जानना चाहिए। गोत्रकर्म दो प्रकार का कहा गया है-उच्चगोत्र और नीचगोत्र। जिस कर्म के उदय से लोक-पूजित कुल में जन्म हो, वह उच्चगोत्र और लोक-निन्द्य कुल में जन्म हो, वह नीच गोत्र है। अन्तराय कर्म पाँच प्रकार का है। जिनके नाम इस प्रकार हैं-


तह दाण लाह भोगुवभोगा विरिय अंतरायमिदि णेयं।
इदि सव्वुत्तरपयडी अडदालसयप्पमा होंति॥१०२॥

अर्थ: अन्तराय कर्म के भेद-दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय ये पाँच अन्तराय कर्म के भेद जानना चाहिए। जिस कर्म के उदय से दान देने की इच्छा रखने पर भी दे न सके, वह दानान्तराय है। जिस कर्म के उदय होने पर लाभ न हो सके, वह लाभान्तराय है। जिस कर्म के उदय होने पर भोगने की इच्छा रखने पर भी भोग न सके, वह भोगान्तराय है। जिसके उदय होने पर स्त्री आदिक उपभोगों को न भोग सके, वह उपभोगान्तराय है। जिसके उदय होने पर शरीर में बल-वीर्य प्राप्त न हो सके, वह वीर्यान्तराय कर्म है। इस प्रकार आठों कर्मों की सभी उत्तर प्रकृतियाँ (५+९+२+२८+४+९३+२+५=१४८) एक सौ अड़तालीस होती हैं।


देहे अविणाभावी बंधण संघात इति अबंधुदया।
वण्णचउक्केऽभिण्णे गहिदे चत्तारि बंधुदये॥१०३॥

अर्थ: अब नामकर्म की उत्तर प्रकृतियों में अभेद-विवक्षा से कौन प्रकृति किसमें सम्मिलित हो सकती है, वह दिखलाते हैं-शरीर नामकर्म के साथ अपना-अपना बन्धन और अपना-अपना संघात, ये दोनों कर्म अविनाभावी हैं अर्थात् ये दोनों शरीर के बिना नहीं हो सकते। इस कारण पाँच बन्धन और पाँच संघात ये दश प्रकृतियाँ बन्ध और उदय अवस्था में अभेद विवक्षा से पृथक् नहीं गिनी जातीं, किन्तु उनका शरीरनाम कर्म में ही अन्तर्भाव हो जाता है तथा सामान्य वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श इन चार में ही इनके उत्तर बीस भेद सम्मिलित हो जाते हैं अतएव अभेद की अपेक्षा इनके भी बन्ध और उदय अवस्था में चार ही भेद गिने जाते हैं।


वण्ण-रस-गंध-फासा चउ चउ इगि सत्त १८२सम्ममिच्छतं।
होंति अबंधा बंधण पण पण संघाद सम्मत्तं॥१०४॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार अबन्ध प्रकृतियों को अर्थात् जिनका बन्ध नहीं होता, उन प्रकृतियों को गिनाते हैं-चार वर्ण, चार रस, एक गन्ध, सात स्पर्श, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति, पाँच बन्धन और पाँच संघात ये अट्ठाईस अबन्ध प्रकृतियाँ हैं अर्थात् इनके अतिरिक्त शेष एक सौ बीस प्रकृतियाँ बन्ध-योग्य होती हैं।


पंच णव दोण्णि छव्वीसमवि य चउरो कमेण सत्तट्ठी।
दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ बंधपयडीओ१८३॥१०५॥

अर्थ: इस प्रकार बन्ध-योग्य प्रकृतियों की संख्या का ग्रन्थकार निरूपण करते हैं-ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, वेदनीय की दो, मोहनीय की छब्बीस, आयुकर्म की चार, नामकर्म की सड़सठ, गोत्रकर्म की दो और अंतराय कर्म की पाँच ये सब बन्ध होने योग्य प्रकृतियाँ हैं ॥१०५॥


पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण सत्तट्ठी।
दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ उदयपयडीओ॥१०६॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार उदय-योग्य प्रकृतियों को गिनाते हैं-ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, वेदनीय की दो, मोहनीय की अट्ठाईस, आयु की चार, नामकर्म की सड़सठ, गोत्र की दो और अन्तराय की पाँच ये सब उदय-प्रकृतियाँ कही गयी हैं।


भेदे छादालसयं इदरे बंधे हवंति वीससयं।
भेदे सव्वे उदये वावीससयं अभेदम्हि॥१०७॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार भेद और अभेद विवक्षा से बन्ध और उदय रूप प्रकृतियों की संख्या कहते हैं-भेद-विवक्षा से बन्ध योग्य प्रकृतियाँ एक सौ छियालीस हैं, क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति इन दो प्रकृतियों का बन्ध नहीं होता, किन्तु अभेद-विवक्षा से एक सौ बीस प्रकृतियाँ बन्ध योग्य होती हैं। भेद-विवक्षा से उदय योग्य सभी अर्थात् एक सौ अड़तालीस प्रकृतियाँ किन्तु अभेद-विवक्षा से एक सौ बाईस प्रकृतियाँ उदय-योग्य कही गयी हैं ॥१०७॥


पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण तेणवदी।
दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ सत्तपयडीओ१८७॥१०८॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार सत्त्वरूप प्रकृतियाँ गिनाते हैं-ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, वेदनीय की दो, मोहनीय की अट्ठाईस, आयुकर्म की चार, नामकर्म की तेरानवे, गोत्रकर्म की दो और अन्तराय की पाँच ये सत्त्व प्रकृतियाँ कही गयी हैं।


केवलणाणावरणं दंसणछक्कं कसायवारसयं।
मिच्छं च सव्वघादी सम्मामिच्छं अबंधम्हि१८८॥१०९॥

अर्थ: पहले जो घातिकर्म बतला आये हैं, उनके सर्वघाती और देशघाती की अपेक्षा दो भेद होते हैं, उनमें से सर्वघाती प्रकृतियों को गिनाते हैं-केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावरण और पाँच निद्रा इस प्रकार दर्शनावरण की ६ प्रकृतियाँ; बारह कषाय अर्थात् अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ और मिथ्यात्व मोहनीय ये बीस प्रकृतियाँ सर्वघाती हैं। सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति भी बन्धरहित अवस्था में अर्थात् उदय और सत्त्व अवस्था में सर्वघाती है।


णाणावरणाचउक्कं तिदंसणं सम्मत्तं च संजलणं।
णव णोकसाय विग्धं छव्वीसा देसघादीओ१९०॥११०॥

अर्थ: अब देशघाती प्रकृतियों को गिनाते हैं-केवलज्ञानावरण को छोड़कर ज्ञानावरणकर्म की शेष चार प्रकृतियाँ, पूर्वोक्त ६ भेदों के सिवाय दर्शनावरण की शेष तीन प्रकृतियाँ, सम्यक्त्वप्रकृति, संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्यादि नौ नोकषाय और अन्तराय की पाँचों प्रकृतियाँ ये छब्बीस देशघाती प्रकृतियाँ हैं।


सादं तिण्णेवाऊ उच्चं सुर-णरदुगं च पंचिंदी।
देहा बंधण संघादंगोबंगाई१९१ वण्णचऊ ॥१११॥

समचउर वज्जरिसहं १९२उवघादूणगुरुछक्क सग्गमणं।
तसबारसट्ठसट्ठी बादालमभेददो सत्था१९३॥११२॥

अर्थ (गाथा 111 से 112): इस प्रकार घातियाकर्मों के भेद कहकर अब अघातिया कर्मों के जो प्रशस्त और अप्रशस्त ये दो भेद हैं, उनमें से पहले प्रशस्त प्रकृतियों को बतलाते हैं-सातावेदनीय, तिर्यंच, मनुष्य और देव ये तीन आयु, उच्चगोत्र, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी पंचेन्द्रियजाति, पाँच शरीर, पाँच बन्धन, पाँच संघात, तीन आंगोपांग, शुभ वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श इन चार के बीस भेद, समचतुरस्रसंस्थान, वज्रऋषभ नाराचसंहनन, उपघात के बिना, अगुरुलघु आदि ६ प्रकृतियाँ तथा प्रशस्तविहायोगति और त्रस आदिक बारह प्रकृतियाँ इस प्रकार अड़सठ प्रकृतियाँ भेद-विवक्षा से प्रशस्त (पुण्यरूप) कही हैं, किन्तु अभेद-विवक्षा में ये बियालीस प्रकृतियाँ ही पुण्य रूप कही गयीं हैं।


घादी णीचमसादं णिरयाऊ णिरिय-तिरियदुग जादी।
संठाण-संहदीणं चदु पण पणगं च वण्णचऊ ॥११३॥

उवघादमसग्गमणं थावरदसं च अप्पसत्था हु।
बंधुदयं पडि भेदे अडणवदि सयं दु चदुरसीदिदरे१९५॥११४॥

अर्थ (गाथा 113 से 114): अब अप्रशस्त (पापरूप) कर्मप्रकृतियों की संख्या गिनाते हैं-चारों घातिया कर्मों की सैंतालीस प्रकृतियाँ, नीचगोत्र, असातावेदनीय, नरकायु, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रियादि चार जाति, समचतुरस्रसंस्थान, वज्रऋषभनाराचसंहनन के सिवाय शेष पाँच संस्थान, पाँच संहनन, अशुभवर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, ये चार मूलभेद अथवा भेद-विवक्षा में बीस भेद, उपघात, अप्रशस्तविहायोगति और स्थावर आदि दश ये सब अप्रशस्त प्रकृतियाँ हैं। ये भेद-विवक्षा से बन्धरूप अट्ठानबे हैं और उदय की अपेक्षा सौ प्रकृतियाँ पापरूप जानना चाहिए तथा अभेद विवक्षा से बन्ध-योग्य बियासी और उदय रूप चौरासी पाप प्रकृतियाँ जानना चाहिए।


पढमादिया कसाया सम्मत्तं देस-सयलचारित्तं।
जहखादं घादंति य गुणणामा होंति सेसावि॥११५॥

अर्थ: अब अनन्तानुबन्धी आदि चारों कषायों के कार्य बतलाते हैं-पहली अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यक्त्व को, दूसरी अप्रत्याख्यानावरणकषाय देशचारित्र को, तीसरी प्रत्याख्यानावरणकषाय सकलचारित्र को और चौथी संज्वलनकषाय यथाख्यात चारित्र को घातती है। अतएव ये यथार्थ गुणनामवाली हैं अर्थात् जैसे इनके नाम हैं वैसे ही इनके गुण हैं। इनके अतिरिक्त शेष प्रकृतियाँ भी अपने नाम के अनुसार अर्थवाली हैं।


अंतोमुहुत्तपक्खं छम्मासं संखऽसंख्यऽणंतभवं।
संजलणमादियाणं वासणकालो दु णियमेण॥११६॥

अर्थ: अब कषायों की वासना (संस्कार) का काल बतलाते हैं-संज्वलन आदि चारों कषायों का वासनाकाल नियम से क्रमशः अन्तर्मुहूर्त, एक पक्ष (पन्द्रह दिन) ६ मास और संख्यात, असंख्यात तथा अनन्तभव है।


देहादी फासंता पण्णासा णिमिण तावजुगलं च।
थिर-सुह-पत्तेयदुगं अगुरुतियं पोग्गलविवाई१९८॥११७॥

अर्थ: ऊपर बतलायी गयी कर्मप्रकृतियाँ पुद्गलविपाकी, क्षेत्रविपाकी, भवविपाकी और जीवविपाकी के भेद से चार प्रकार की हैं, उनमें से पहले पुद्गलविपाकी प्रकृतियों की संख्या बतलाते हैं-शरीर नामकर्म से लेकर स्पर्श नामकर्म तक पचास प्रकृतियाँ तथा निर्माण, आतप, उद्योत और स्थिर, शुभ, प्रत्येक इन तीनों का जोड़ा तथा अगुरुलघु आदि तीन ये सब बासठ प्रकृतियाँ पुद्गलविपाकी हैं अर्थात् इनके उदय का फल जीव के पौद्गलिक शरीर में ही होता है।


आऊणि भवविवाई खेत्तविवाई य आणुपुव्वीओ।
अट्ठत्तरि अवसेसा जीवविवाई मुणेयव्वा१९९॥११८॥

अर्थ: अब भवविपाकी, क्षेत्रविपाकी और जीवविपाकी प्रकृतियों को बतलाते हैं-नरकादिक चार आयु भवविपाकी हैं, क्योंकि नरकादि भव में ही इन प्रकृतियों का फल प्राप्त होता है। चार आनुपूर्वी प्रकृतियाँ क्षेत्रविपाकी हैं; क्योंकि परलोक को गमन करते हुए जीव के मध्यवर्ती क्षेत्र में ही इनका उदय होता है। शेष अठहत्तर प्रकृतियाँ जीव विपाकी जानना चाहिए; क्योंकि इनका फल जीव को ही प्राप्त होता है।


वेयणीय गोद घादीणेकावण्णं तु णामपयडीणं।
सत्तावीसं चेदे अट्ठत्तरि जीवविवाईओ२०१॥११९॥

अर्थ: अब इन्हीं अठहत्तर जीवविपाकी प्रकृतियों को गिनाते हैं-वेदनीय की दो, गोत्र की दो, घातिया कर्मों की सैंतालीस इस प्रकार ६ कर्मों की इकावन प्रकृतियाँ तथा नामकर्म की सत्ताईस। इस प्रकार सब मिलाकर अठहत्तर प्रकृतियाँ जीव-विपाकी हैं।


तित्थयरं उस्सासं बादर पज्जत्त सुस्सरादेज्जं।
जस-तस-विहाय-सुभगदु चउगइ पण जाइ सगवीसं२०२॥१२०॥

अर्थ: अब नामकर्म की उपर्युक्त सत्ताईस प्रकृतियाँ बतलाते हैं-तीर्थंकरप्रकृति, उच्छ्वासप्रकृति, तथा बादर, पर्याप्त, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, त्रस, विहायोगति और सुभग इनका जोड़ा, नरकादि चार गतियाँ तथा एकेन्द्रियादि पाँच जातियाँ इस प्रकार नामकर्म की सत्ताईस प्रकृतियाँ जीवविपाकी जानना चाहिए।


गदि जादी उस्सासं विहायगदि-तसतियाण जुगलं च।
सुभगादी चउजुगलं तित्थयरं चेदि सगवीस२०३॥१२१॥

अर्थ: अब दूसरे प्रकार से इन्हीं सत्ताईस जीवविपाकी प्रकृतियों को गिनाते हैं-चार गति, पाँच जाति, उच्छ्वास, विहायोगति और त्रस, बादर, पर्याप्त इन तीन का जोड़ा तथा सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति इन चार का जोड़ा और एक तीर्थंकर प्रकृति इस प्रकार क्रम से ये सत्ताईस नामकर्म की प्रकृतियाँ जीवविपाकी हैं।


तीसं कोडाकोडी तिघादि-तदिएसु वीस णामदुगे।
सत्तरि मोहे सुद्धं उवही आउस्स तेत्तीसं२०४॥१२२॥

अर्थ: अब स्थितिबन्ध को बतलाते हुए सर्वप्रथम आठों मूल कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति को बतलाते हैं-तीन घातिया कर्मों की अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय कर्म की तथा तीसरे वेदनीयकर्म की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। नाम और गोत्रकर्म की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। मोहनीयकर्म की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। आयुकर्म की उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागर प्रमाण है।


दुक्ख-तिघादीणोधं सादित्थी-मणुदुगे तदद्धं तु।
सत्तरि दंसणमोहे चरित्तमोहे च चत्तालं२०५॥१२३॥

अर्थ: अब कर्मों की उत्तर प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थिति को छह गाथाओं से बतलाते हैं-दुःख अर्थात् असातावेदनीय एक, ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ और अन्तराय की पाँच; इन बीस प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ओघ अर्थात् सामान्य मूलकर्मों के समान तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण है। सातावेदनीय, स्त्रीवेद, मनुष्यगति और मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन चार प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध उक्त प्रकृतियों से आधा अर्थात् पन्द्रह कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। मिथ्यात्व दर्शनमोहनीय का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण है और चारित्रमोहनीय का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध चालीस कोड़ाकोड़ी सागर-प्रमाण है।


संठाण-संहदीणं चरिमस्सोघं दुहीणमादि त्ति।
अट्ठारस कोडिकोडी वियलाणं सुहुमतिण्हं च२०६॥१२४॥

अर्थ: छह संस्थान और छह संहनन में से अन्त का हुण्डकसंस्थान और सृपाटिकासंहनन इन दोनों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मूलप्रकृति के समान बीस कोड़ाकोड़ी सागर है। मध्यवर्ती चार संस्थान और चार संहननों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध दो-दो सागर पहले-पहले तक कम करना चाहिए अर्थात् वामनसंस्थान और कीलक संहनन का अठारह, कुब्जक संस्थान और अर्धनाराच संहनन का सोलह, स्वातिसंस्थान और नाराच संहनन का चौदह, न्यग्रोध परिमण्डलसंस्थान और वज्रनाराचसंहनन का बारह तथा समचतुरस्रसंस्थान और वज्रवृषभनाराच संहनन का दश कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण है। विकलेन्द्रिय अर्थात् द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति और सूक्ष्मादि तीन इन छह प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अठारह कोड़ाकोड़ी सागर-प्रमाण है।


अरदी सोगे संढे तिरिक्ख-भय-णिरय-तेजुरालदुगे।
वेगुव्वादावदुगे णीचे तस-वण्ण-अगुरुतिचउक्के ॥१२५॥

इगि-पंचिंदिय-थावर-णिमिणासग्गमण-अथिरछक्काणं।
वीसं कोडाकोडी सागरणामाणमुक्कस्सं ॥१२६॥

अर्थ (गाथा 125 से 126): अरति, शोक, नपुंसकवेद; तिर्यंचगति, भय, नरकगति, तैजस, औदारिक इन पाँच का जोड़ा, वैक्रियिक आतप इन दो का जोड़ा, नीचगोत्र, त्रस, वर्ण, अगुरुलघु इन तीनों की चौकड़ी एकेन्द्रिय जाति, पंचेन्द्रिय जाति, स्थावर, निर्माण, असद्गमन (अप्रशस्तविहायोगति) और अस्थिरादि छह; इन इकत्तालीस प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध बीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण है।


हस्स रदि उच्च पुरिसे थिरछक्के सत्थगमणदेवदुगे।
तस्सद्धमंतकोडाकोडी आहार-तित्थयरे ॥१२७॥

अर्थ: हास्य, रति, उच्चगोत्र, पुरुषवेद, स्थिरादि छह, प्रशस्तविहायोगति, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी; इन तेरह प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ऊपर की प्रकृतियों से आधा अर्थात् दश कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। आहारकशरीर, आहारक अंगोपांग और तीर्थंकर इन तीन प्रकृतियों का स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ाकोड़ी अर्थात् कोड़ी से ऊपर और कोड़ाकोड़ी से नीचे इतने सागर प्रमाण है।


सुर-णिरयाऊणोधं णर-तिरियाऊण तिण्णि पल्लाणि।
उक्कस्सट्ठिदिबंधो सण्णीपज्जत्तगे जोगे॥१२८॥

अर्थ: देवायु और नरकायु इन दोनों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मूलप्रकृति के समान तैंतीस सागर है। मनुष्यायु और तिर्यंचायु का उत्कृष्ट स्थिति बन्ध तीन पल्यप्रमाण है। तीन शुभ आयु के सिवाय शेष कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध संज्ञी, पंचेन्द्रिय, पर्याप्तक, योग्य जीव के ही होता है, हर एक के नहीं होता।


सव्वट्ठिदीणमुक्कस्सओ दु उक्कस्ससंकिलेसेण।
विवरीदेण जहण्णो आउगतिगवज्जियाणं तु॥१२९॥

अर्थ: अब उत्कृष्ट स्थितिबन्ध के कारणभूत परिणामों का निर्देश करते हैं-तीन आयुकर्म अर्थात् तिर्यंच, मनुष्य और देवायु के बिना शेष एक सौ सत्तरह प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध यथासंभव उत्कृष्ट संक्लेश परिणामों से होता है और जघन्य स्थितिबन्ध विपरीत परिणामों से अर्थात् संक्लेश से उल्टे उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामों से होता है। तीन आयुकर्मों का इससे विपरीत अर्थात् उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामों से उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होता है उत्कृष्ट संक्लेश परिणामों से जघन्य स्थितिबन्ध होता है।


सव्वुक्कस्सट्ठिदीणं मिच्छाइट्ठी दु बंधगो भणिदो।
आहारं तित्थयरं देवाउं वा विमोत्तूणं२१३॥१३०॥

अर्थ: अब उत्कृष्ट स्थितिबन्ध के करने वाले स्वामियों का निर्देश करते हैं-आहारकशरीर, आहारकशरीर-अंगोपांग, तीर्थंकर और देवायु इन चार प्रकृतियों को छोड़कर शेष एक सौ सोलह प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थितियों का बन्ध करने वाला मिथ्यादृष्टि जीव कहा गया है।


देवाउगं पमत्तो आहारयमप्पमत्तविरदो दु।
तित्थयरं च मणुस्सो अविरदसम्मो समज्जेइ२१४॥१३१॥

अर्थ: अब उक्त चार प्रकृतियों के बन्ध करने वाले स्वामियों का निर्देश करते हैं-देवायु का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध प्रमत्तसंयत करता है। आहारक शरीर और आहारक शरीर अंगोपांग का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अप्रमत्तसंयत करता है और तीर्थंकर प्रकृति का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अविरतसम्यग्दृष्टि मनुष्य करता है।


णर-तिरिया सेसाऊ२१५ वेगुव्वियछक्क वियल-सुहुमतियं।
सुर-णिरया ओरालिय-तिरियदुगुज्जोव-संपत्तं ॥१३२॥

देवा पुण एइंदिय आदावं थावरं च सेसाणं।
उक्कस्ससंकिलिट्ठा चदुगदिआ ईसिमज्झिमया२१६॥१३३॥

अर्थ (गाथा 132 से 133): अब उक्त चार प्रकृतियों के अतिरिक्त शेष जो एक सौ सोलह प्रकृतियाँ हैं, उनके बन्ध करने वाले मिथ्यादृष्टि जीवों का विशेष रूप से निरूपण करते हैं-देवायु से शेष नरकादि तीन आयु, वैक्रियिकषट्क, द्वीन्द्रियादि तीन विकलेन्द्रिय जाति, सूक्ष्मादि तीन इन पन्द्रह प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मनुष्य और तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव ही करते हैं। औदारिक शरीर, औदारिक शरीर अंगोपांग, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, उद्योत और सपाटिका संहनन इनका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध देव और नारकी मिथ्यादृष्टि जीव ही करते हैं। एकेन्द्रियजाति, आतप और स्थावर इन तीन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मिथ्यादृष्टि देव करते हैं। शेष बानवे प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध उत्कृष्ट संक्लेश परिणाम वाले तथा ईषन्मध्यम परिणाम वाले चारों गति के मिथ्यादृष्टि जीव करते हैं।


बारस य वेयणीए णामागोदे य अट्ठ य मुहुत्ता।
भिण्णमुहुत्तं तु ठिदी जहण्णयं सेसपंचण्हं२१८॥१३४॥

अर्थ: अब मूलप्रकृतियों का जघन्य स्थितिबन्ध बतलाते हैं-वेदनीयकर्म का जघन्य स्थितिबन्ध बारह मुहूर्त है, नाम तथा गोत्रकर्म का आठ मुहूर्त है। शेष बचे पाँच कर्मों का जघन्य स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त-प्रमाण है।


लोहस्स सुहुमसत्तरसाणमोधं दुगेक्क दलमासं।
कोहतिए पुरिसस्स य अट्ठय वासा जहण्णठिदी॥१३५॥

अर्थ: अब उत्तरप्रकृतियों का जघन्य स्थितिबन्ध बतलाते हैं-संज्वलन लोभ कषाय का और दसवें सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान में बँधने वाली सत्तरह प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबन्ध मूलप्रकृतियों के समान जानना चाहिए अर्थात् यशःकीर्ति और उच्चगोत्र का आठ-आठ मुहूर्त, सातावेदनीय का बारह मुहूर्त, पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय इन चौदह का तथा लोभ प्रकृति का जघन्य स्थितिबन्ध एक-एक अन्तर्मुहूर्त प्रमाण होता है। क्रोधादि तीन का अर्थात् संज्वलन क्रोध, मान और माया का क्रम से दो मास, एक मास और पन्द्रह दिन प्रमाण जघन्य स्थितिबन्ध होता है। पुरुषवेद का जघन्य स्थितिबन्ध आठ वर्ष प्रमाण होता है।


तित्थाहाराणंतोकोडाकोडी जहण्णठिदिबंधो।
खवगे सग-सगबंधच्छेदणकाले हवे णियमा॥१३६॥

अर्थ: तीर्थंकर और आहारकद्विक इन तीन प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबन्ध अन्तः कोड़ाकोड़ी सागर-प्रमाण होता है। यह जघन्य स्थितिबन्ध क्षपक श्रेणी वाले जीवों के अपनी-अपनी बन्धव्युच्छित्ति के समय में ही नियम से होता है।


भिण्णमुहुत्तो णर-तिरियाऊणं वासदससहस्साणि।
सुर-णिरयआउगाणं जहण्णओ होइ ठिदिबंधो॥१३७॥

अर्थ: मनुष्यायु और तिर्यंगायु का जघन्य स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त है। देवायु और नरकायु का जघन्य स्थितिबन्ध दश हजार वर्ष प्रमाण होता है।


सेसाणं पज्जत्तो बादर एइंदिओ विसुद्धो य।
बंधदि सव्वजहण्णं सग-सगउक्कस्सपडिभागे॥१३८॥

अर्थ: उपर्युक्त उनतीस प्रकृतियों के सिवाय इक्यानवे प्रकृतियाँ शेष रहती हैं। उनमें से वैक्रियिकषट्क और मिथ्यात्व इन सात प्रकृतियों के बिना शेष चौरासी प्रकृतियों की जघन्य स्थितियों को बादर पर्याप्त यथायोग्य विशुद्ध परिणामों वाला एकेन्द्रिय जीव ही बाँधता है। उसका प्रमाण गणित के अनुसार त्रैराशिक विधि से भाग करने पर अपनी-अपनी स्थिति के प्रतिभाग का जो प्रमाण आवे उतना जानना चाहिए।


एयं पणकदि पण्णं सयं सहस्सं च मिच्छवरबंधो।
इगि-विगलाणं बंधो अवरं पल्लासंखूण संखूणं॥१३९॥

अर्थ: अब उसी जघन्यस्थिति की विधि और प्रमाण को दिखलाते हैं-एकेन्द्रिय और विकलचतुष्क अर्थात् द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रिय ये पाँच प्रकार के जीव क्रमशः मिथ्यात्वकर्म की उत्कृष्ट स्थिति का बन्ध एक सागर, पच्चीस सागर, पचास सागर, सौ सागर और एक हजार सागर-प्रमाण करते हैं। एकेन्द्रिय जीव अपनी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य का असंख्यातवाँ भाग कम करने पर जो प्रमाण बाकी रहता है उतनी जघन्य स्थिति को बाँधते हैं और विकल-चतुष्क जीव अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य के संख्यातवें भाग कम करने पर जो प्रमाण शेष रहता है उतनी जघन्य स्थिति को बाँधते हैं। सोलह प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ५७ १/७ सागर का, ज्ञानावरणादि तीन घातियाकर्मों की १९ और असातावेदनीय इन २० प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ४२८ ४/७ सागर का, नामकर्म की ३९ और नीचगोत्र इन ४० प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध २८५ ५/७ सागर का होता है।

असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीव के मिथ्यात्व का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध १००० सागर का, चारित्रमोह की १६ कषायों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ५७१ ३/७ सागर का, ज्ञानावरणादि ३ घातिया कर्मों की १९ और असातावेदनीय इन २० प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ४२८ ४/७ सागर का, नामकर्म की ३९ और नीचगोत्र इन ४० प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध २८५ ५/७ सागर का होता है।

ऊपर द्वीन्द्रिय से लगाकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक के जीवों के सातों कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति का निरूपण किया गया है। इनमें से जिस जीव के जिस प्रकृति का जितना उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होता है, उसमें से पल्य का संख्यातवाँ भाग कम कर देने पर वह जीव उस प्रकृति के उतने जघन्य स्थितिबन्ध को करता है।

संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के सभी प्रकृतियों का उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबन्ध मूलग्रन्थ में गाथा १२२ से लगाकर गाथा १३८ तक बतलाया ही गया है। आयुकर्म का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३३ सागर है जो सर्वार्थसिद्धि या सातवें नरक जाने वाले मनुष्य और तिर्यंच जीव वर्तमान भव की आयु के त्रिभाग में बाँधते हैं। आयुकर्म का जघन्य स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त है, यह भी मनुष्य या तिर्यंच के ही होता है। उपर्युक्त सर्व कथन की अर्थ-बोधक संदृष्टियाँ संस्कृत टीका में दी हुई हैं, जिन्हें पाठक सुगमता से समझ सकेंगे। विस्तार के भय से यहाँ नहीं दी जा रही हैं।


सुहपयडीण विसोही तिव्वो असुहाण संकिलेसेण२३३।
विवरीदेण जहण्णो अणुभागो सव्वपयडीणं२३४॥१४०॥

अर्थ: अब अनुभागबन्ध का वर्णन करते हैं-सातावेदनीय आदिक शुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग बन्ध विशुद्धि से होता है और असातावेदनीय आदि अशुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभागबन्ध संक्लेश से होता है। उक्त प्रकृतियों का जघन्य अनुभागबन्ध विपरीत परिणामों से होता है अर्थात् शुभ प्रकृतियों का संक्लेश से और अशुभ प्रकृतियों का विशुद्धि से जघन्य अनुभागबन्ध होता है। इस प्रकार सर्वप्रकृतियों के अनुभागबन्ध का नियम जानना चाहिए।


सत्ती य लता-दारू-अट्ठी-सेलोवमा हु घादीणं।
दारूअणंतमभागो त्ति देसघादी तदो सव्वं२३६॥१४१॥

अर्थ: अब घाति और अघाति कर्मों की अनुभागरूप शक्ति का वर्णन करते हैं-घातिया कर्मों के फल देने की शक्ति लता (बेलि), दारू (काठ), अस्थि (हड्डी) और शैल (पत्थर) के समान होती है अर्थात् लता आदिक में जैसे उत्तरोत्तर अधिकाधिक कठोरपना है वैसे ही इनके फल देने की शक्ति में भी उत्तरोत्तर अधिकाधिक तीव्रता समझना चाहिए, इनमें दारूभाग के अनन्तवें भाग तक का शक्ति रूप अंश देशघाती है और दारू के शेष बहुभाग से लेकर शैल भाग तक शक्तिरूप अंश सर्वघाती है अर्थात् उसके उदय होने पर आत्मा के गुण प्रकट नहीं होते।

कर्मप्रकृतिः (भाग 2/2)

देसो त्ति हवे सम्मं तत्तो दारु-अणंतिमे मिस्सं।
सेसा अणंतभागा अट्ठि-सिलाफड्ढया मिच्छे॥१४२॥

अर्थ: अब दर्शनमोहनीय के मिथ्यात्व आदि भेदों में जो विशेषता है, उसे बतलाते हैं-मिथ्यात्व प्रकृति के लता भाग से लेकर दारूभाग के अनन्तवें भाग तक देशघाती स्पर्द्धक सम्यक्त्वप्रकृति के हैं। दारूभाग के अनन्तबहुभाग के अनन्तवें भाग प्रमाण भिन्न जाति के सर्वघातिया स्पर्धक मिश्र प्रकृति अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व के हैं। दारू के शेष अनन्त बहुभाग तथा हड्डी और शैलभाग रूप स्पर्धक मिथ्यात्व प्रकृति के जानना चाहिए।


गुडखंडसक्करामियसरिसा सत्था हु णिंब-कंजीरा।
विस-हालाहलसरिसा असत्था हु अघादिपडिभागा॥१४३॥

अर्थ: अब प्रशस्त और अप्रशस्तस्वरूप अघातिया कर्मों की शक्तियों को बतलाते हैं-अघातिया कर्मों में प्रशस्त (पुण्य) प्रकृतियों के शक्ति-अंश गुड़, खाँड़, मिश्री और अमृत के समान तथा अप्रशस्त (पाप) प्रकृतियों के शक्ति-अंश निम्ब (नीम), कांजीर, विष और हालाहल के समान जानना चाहिए।


पडिणीगमंतराए उवघादे तप्पदोस-णिण्हवणे।
आवरणदुगं बंधदि भूयो अच्चासणाए वि॥१४४॥

अर्थ: अब प्रदेशबन्ध का वर्णन करते हुए पहले ज्ञानावरण और दर्शनावरणकर्म-बन्ध के कारणों का निरूपण करते हैं-प्रत्यनीक, अन्तराय, उपघात, प्रदोष, निह्नव और असातना से जीव ज्ञानावरण और दर्शनावरण इन दो आवरण कर्मों को अधिकता से बाँधता है।


भूदाणुकंप-वदजोगजुत्तो२४३ खंतिदाण गुरुभत्तो।
बंधदि भूयो सादं विवरीदो बंधदे इदरं२४४॥१४५॥

अर्थ: अब वेदनीयकर्म के दोनों भेदों के बन्ध कारणों का निर्देश करते हैं-सर्व प्राणियों पर दया करने से, अहिंसादि व्रत और समाधिरूप परिणामों के धारण करने से, क्रोध के त्यागरूप क्षमा भाव से, दान देने से तथा पंच परमगुरुओं की भक्ति करने से जीव सातावेदनीय कर्म के अनुभाग को प्रचुरता से बाँधता है। उक्त कारणों से विपरीत आचरण करने से जीव असातावेदनीय कर्म का तीव्र स्थिति और अनुभाग बन्ध करता है। सातावेदनीय के बन्ध में स्थिति का प्रचुर बन्ध न बताने का कारण यह है कि स्थितिबन्ध की अधिकता विशुद्ध परिणामों से नहीं होती।


दुक्ख-वह-सोग-तावाकंदण परिदेवणं च अप्पठियं।
अण्णट्ठियमुभयट्ठियमिदि वा बंधो असादस्स॥१४६॥

अर्थ: अब विशेष रूप असातावेदनीय कर्म के बन्ध कारणों का निरूपण करते हैं-दुःख, वध, शोक, संताप, आक्रन्दन और परिदेवन स्वयं करने से, अन्य को कराने से तथा स्वयं करने और दूसरे को कराने से असातावेदनीय कर्म का विपुलता से बन्ध होता है। वेदना परिणाम दुःख है। हनन करना वध है। वस्तु का विनाश हो जाने पर अति विकलता और दीन परिणाम होना शोक है। चित्त में खेद होना पश्चाताप रूप संताप है। अश्रुपात के साथ हृदय आदि को पीटना आक्रन्दन है। रोना और आँसू गिराना परिदेवन है। यह सब स्वयं में हो, अन्य में हो।


अरहंत-सिद्ध चेदिय-तव-गुरु-सुद-धम्म-संघपडिणीगो।
बंधदि दंसणमोहं अणंतसंसारिओ जेण२४७॥१४७॥

अर्थ: अब मोहनीयकर्म के प्रथम भेद दर्शनमोहनीय के बन्ध-कारण कहते हैं-अरहन्त, सिद्ध, चैत्य (प्रतिमा), तप, श्रुत (शास्त्र), गुरु, धर्म और मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका रूप चतुर्विध संघ के प्रतिकूल आचरण करने से जीव उस दर्शनमोहनीय कर्म का बन्ध करता है, जिससे कि वह अनन्त काल तक संसार में परिभ्रमण करता है।


तिव्वकसाओ बहुमोहपरिणदो रायदोससंतत्तो।
बंधदि चरित्तमोहं दुविहं पि चरित्तगुणघादी॥१४८॥

अर्थ: अब मोहनीयकर्म के द्वितीय भेद चारित्रमोहनीय के बन्ध-कारणों का निरूपण करते हैं-तीव्र कषाय वाला, अत्यधिक मोहयुक्त परिणाम वाला और राग-द्वेष से सन्तप्त जीव कषाय और नोकषाय रूप दोनों प्रकार के चारित्र-मोहकर्म को प्रचुरता से बाँधता है, जो कि चारित्रगुण का घातक है।


मिच्छो हु महारंभो णिस्सीलो तिव्वलोहसंजुत्तो।
णिरयाउगं णिबंधदि पावमई रुद्दपरिणामो२५१॥१४९॥

अर्थ: अब आयुकर्म के चार भेदों में से पहले नरकायु के बन्ध कारण कहते हैं-मिथ्यादृष्टि, महा आरम्भी, व्रत-शील से रहित, तीव्र लोभ से संयुक्त, पापबुद्धि और रौद्रपरिणामी जीव नरकायु को बाँधता है।


उम्मग्गदेसगो मग्गणासगो गूढहिययमाइल्लो।
२५३सढसीलो य ससल्लो तिरियाउं बंधदे जीवो२५४॥१५०॥

अर्थ: अब तिर्यंचायु के बन्ध के कारण बतलाते हैं-जो उन्मार्ग का उपदेश देता है, सन्मार्ग का नाशक है, गूढ़हृदयी और महामायावी है, किन्तु मुख से मीठे वचन बोलता है शठ-स्वभावी और शल्य-युक्त है ऐसा जीव तिर्यंचायु का बन्ध करता है।


पयडीए तणुकसाओ दाणरदी२५६ सील-संयमविहीणो।
मज्झिमगुणेहि जुत्तो मणुयाऊ बंधदे जीवो२५७॥१५१॥

अर्थ: अब मनुष्यायु के बन्ध के कारण बतलाते हैं-जो स्वभाव से ही मन्दकषायी है, दान देने में निरत है, शीलसंयम से विहीन होकर भी मनुष्योचित मध्यमगुणों से युक्त है, ऐसा जीव मनुष्यायु का बन्ध करता है।


अणुवद-महव्वदेहि य बालतवाकामणिज्जराए य।
देवाउगं णिबंधइ सम्माइट्ठी य जो जीवो२५८॥१५२॥

अर्थ: अब देवायु के बन्ध के कारणों को बतलाते हैं-जो जीव अणुव्रत या महाव्रत से संयुक्त है, बालतप और अकामनिर्जरा करने वाला है वह जीव देवायु का बन्ध करता है तथा सम्यग्दृष्टि जीव भी देवायु को बाँधता है।


मण-वयण-कायवक्को माइल्लो गारवेहिं पडिबद्धो।
असुहं बंधदि णामं तप्पडिवक्खेहिं सुहणामं२६१॥१५३॥

अर्थ: अब शुभ और अशुभ नामकर्म के बन्ध के कारण बतलाते हैं-जो जीव मन, वचन, काय से कुटिल हो, कपट करने वाला हो, अपनी प्रशंसा चाहने वाला तथा करने वाला हो, ऋद्धिगारव आदि तीन प्रकार के गारव से युक्त हो वह नरकगति आदि अशुभ नामकर्म को बाँधता है और जो इनसे विपरीत स्वभाव वाला हो अर्थात् सरल स्वभावी हो, निष्कपट हो, अपनी प्रशंसा का इच्छुक न हो और गारव-रहित हो ऐसा जीव देवगति आदि शुभनामकर्म का बन्ध करता है।


दंसणविसुद्धि विणए संपण्णत्तं च तह य सीलवदे।
अणदीचारोऽभिक्खं णाणुवजोगं च संवेगो ॥१५४॥

सत्तीदो चाग-तवा साहुसमाही तहेव णायव्वा।
विज्जावच्चं किरिया अरहंताइरियबहुसुदे भत्ती ॥१५५॥

पवयणे परमा भत्ती आवस्सयकिरियअपरिहाणी य।
मग्गपहावणयं खलु पवयणवच्छल्लमिदि जाणे ॥१५६॥

एदेहिं पसत्थेहिं सोलसभावेहिं केवलीमूले।
तित्थयरणामकम्मं बंधदि सो कम्मभूमिजो मणुसो ॥१५७॥

अर्थ (गाथा 154 से 157): अब नामकर्म की प्रकृतियों में जो सर्वोत्कृष्ट है ऐसी तीर्थंकर प्रकृति के बन्ध के कारणों को बतलाते हैं-१. दर्शन-विशुद्धि, २. विनय-सम्पन्नता, ३. निरतिचार व्रत-शीलधारणता, ४. अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगिता, ५. अभीक्ष्ण संवेगता, ६. शक्त्यनुसार त्याग, ७. शक्त्यनुसार तप, ८. साधुसमाधि, ९. वैयावृत्त्यकरणता, १०. अरहंतभक्ति, ११. आचार्यभक्ति, १२. बहुश्रुतभक्ति, १३. परम प्रवचन-भक्ति, १४. आवश्यक-क्रिया अपरिहानि, १५. मार्गप्रभावना और १६. प्रवचनवत्सलत्व इन प्रशस्त सोलह भावनाओं के द्वारा कर्मभूमियाँ मनुष्य केवली के पादमूल में तीर्थंकर नामकर्म को बाँधता है ॥१५४-१५७॥


तित्थयरसत्तकम्मा तदियभवे तब्भवे हु सिज्झेदि।
खाइयसम्मत्तो पुण उक्कस्सेण दु चउत्थभवे ॥१५८॥

अर्थ: अब ग्रन्थकार तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाला तथा क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव संसार में अधिक से अधिक कितने भव तक रह सकता है इस प्रश्न का उत्तर देते हैं-तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाला जीव उसी भव में या तीसरे भव में सिद्धि को प्राप्त करता है अर्थात् मोक्ष को पा लेता है। क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव उत्कृष्टतः चौथे भव में सिद्धि को प्राप्त करता है।


अरहंतादिसु भत्तो सुत्तरुई पढणमाणं गुणपेही।
बंधदि उच्चागोदं विवरीओ बंधदे इदरं॥१५९॥

अर्थ: अब दोनों प्रकार के गोत्रकर्म के बन्ध के कारण बतलाते हैं-जो जीव अरहंत आदि पंच परमेष्ठियों का भक्त हो, जिनेन्द्र-कथित आगमसूत्र के पठन-पाठन में प्रीति रखता हो, तत्त्वचिन्तन करने वाला हो, अपने गुणों को बढ़ाने वाला हो ऐसा जीव उच्च गोत्र का बन्ध करता है और इससे विपरीत चलने वाला नीचगोत्रकर्म का बन्ध करता है।


पर-अप्पाणं णिंदा पसंसणं णीचगोदबंधस्स।
सदसदगुणाणमुच्छादणमुब्भावणमिदि होदि॥१६०॥

अर्थ: अब नीचगोत्रकर्म के बन्ध के कारणों को और भी विशेष रूप से बतलाते हैं-परायी निन्दा करना और अपनी प्रशंसा करना, दूसरे के सद्गुणों का आच्छादन करना और अपने भीतर अविद्यमान भी गुणों का उद्भावन करना। इन कारणों से भी नीचगोत्र का बन्ध होता है।


पाणबधादिसु रदो जिणपूजा-मोक्खमग्गविग्घयरो।
अज्जेइ अंतरायं ण लहइ जं इच्छियं जेण॥१६१॥

अर्थ: अब अन्तराय कर्म के बन्ध-कारण बतलाते हैं-जो जीव प्राणियों के घात में संलग्न हैं, जिनपूजन और मोक्षमार्ग में विघ्न करने वाला है वह उस अन्तराय कर्म का उपार्जन करता है कि जिसके कारण वह अभीष्ट वस्तु को नहीं पा सकता।

टीकाकारस्य प्रशस्तिः

मूलसङ्घे महासाधुर्लक्ष्मीचन्द्रो यतीश्वरः।
तस्य पट्टे च वीरेन्दुर्विबुधो विश्ववन्दितः॥१॥

तदन्वये दयाम्भोधिर्ज्ञानभूषो गुणाकरः।
टीकां हि कर्मकाण्डस्य चक्रे सुमतिकीर्त्तियुक्॥२॥

टीकां गोम्मटसारस्य विलोक्य विहितं ध्रुवम्।
पठन्तु सज्जनाः सर्वे भाष्यमेतत् महत्परम्२७४॥३॥

प्रमादाद् भ्रमतो वापि यद्यशुद्धं कदाचन।
टीकायामत्र संशोध्यं विबुधैर्द्वेषवर्जितैः॥४॥

अर्थ (गाथा 1 से 4): श्रीकुन्दकुन्दाचार्य के मूलसंघ में महासाधु, यतीश्वर श्रीलक्ष्मीचन्द्र हुए। उनके पट्टपर विश्व-वन्दित महाविद्वान् श्रीवीरचन्द्र हुए। उनके अन्वय (परम्परा) में दया के सागर और गुणों के आकर (खानि) श्रीज्ञानभूषण हुए। उन्होंने सुमतिकीर्ति के साथ इस कर्मकाण्ड (कर्मप्रकृति) की टीका की। यह टीका गोम्मटसार (कर्मकाण्ड) को देखकर की गयी है, यह निश्चय से जानें और सभी सज्जन इस महान् परम (श्रेष्ठ) भाष्य को पढ़ें। यदि इस टीका में कदाचित् कहीं पर प्रमाद से या भ्रम से कोई अशुद्धि रह गयी हो तो द्वेषभाव से रहित विद्वज्जनों को इसका संशोधन कर देना चाहिए (ऐसी मेरी विनय है)॥१-४॥


श्रीमद्-अभयचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्तिविरचिता कर्मप्रकृतिः / मङ्गलाचरणम्


प्रक्षीणावरणाद्वैतमोहप्रत्यूहकर्मणे ।
अनन्तानन्तधीर्दृष्टिसुखवीर्यात्मने नमः॥

श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः (भाग 1/2)

१. कर्मणः त्रैविध्यम्


आत्मनः प्रदेशेषु बद्धं कर्म द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्म चेति त्रिविधम्।

अर्थ: आत्मा के प्रदेशों में बद्ध कर्म तीन प्रकार का है-१. द्रव्यकर्म, २. भावकर्म और ३. नोकर्म।


२. द्रव्यकर्मणः चातुर्विध्यम्


तत्र प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशभेदेन द्रव्यकर्म चतुर्विधम्।

अर्थ: द्रव्यकर्म प्रकृति, स्थिति, अनुभाग तथा प्रदेश के भेद से चार तरह का है।


प्रकृतिबन्धः / ३. प्रकृतेः स्वरूपम्


तत्र ज्ञानप्रच्छादनादिस्वभावः प्रकृतिः।

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय इन चार घातिकर्मों को नाश करके अनन्तानन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य इन आत्मीय गुणों को प्राप्त करने वाले आत्मा (परमात्मा) के लिए नमस्कार है। ज्ञान को ढँकना आदि स्वभाव प्रकृति है।


४. प्रकृतेः त्रैविध्यम्
सा मूलप्रकृतिरुत्तरप्रकृतिरुत्तरोत्तरप्रकृतिरिति त्रिधा।

अर्थ: वह मूल प्रकृति, उत्तर प्रकृति और उत्तरोत्तर प्रकृति इस तरह तीन प्रकार की है।


मूलप्रकृतयः


५. मूलप्रकृतेरष्ट भेदाः
तत्र ज्ञानावरणीयं दर्शनावरणीयं वेदनीयं मोहनीयमायुष्यं नाम गोत्रमन्तरायश्चेति मूलप्रकृतिरष्टधा।

अर्थ: उनमें ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये आठ मूल प्रकृति के भेद हैं।


६. ज्ञानावरणीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
तत्रात्मनो ज्ञानं विशेषग्रहणमावृणोतीति ज्ञानावरणीयं श्लक्ष्णकाण्डपटवत्।

अर्थ: उक्त आठ भेदों में पतले रेशमी वस्त्र की तरह जो आत्मा के विशेषग्रहण रूप ज्ञानगुण को ढँकता है, वह ज्ञानावरणीय है।


७. दर्शनावरणीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
दर्शनं सामान्यग्रहणमावृणोतीति दर्शनावरणीयं प्रतिहारवत्।

अर्थ: प्रतिहार की तरह जो आत्मा के सामान्य ग्रहण रूप दर्शन गुण को रोकता है वह दर्शनावरणीय है।


८. वेदनीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
सुखं दुःखं वा इन्द्रियद्वारैर्वेदयतीति वेदनीयं गुडलिप्तखड्गधारावत्।

अर्थ: गुड़-लपेटी तलवार की धार के समान जो सुख अथवा दुःख को इन्द्रियों के द्वारा अनुभव कराये, वह वेदनीय है।


९. मोहनीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
आत्मानं मोहयतीति मोहनीयं मद्यवत्।

अर्थ: शराब की तरह जो आत्मा को मोहित करे वह मोहनीय है।


१०. आयुषः लक्षणम् उदाहरणं च
शरीर आत्मनमेति धारयतीत्यायुष्यं शृङ्खलावत्।

अर्थ: शृंखला की तरह जो शरीर में आत्मा को रोक रखता है, वह आयुकर्म है।


११. नामकर्मणः लक्षणम् उदाहरणं च
नानायोनिषु नारकादिपर्यायैरात्मानं नमयति-शब्दयतीति नाम चित्रकारवत्।

अर्थ: चित्रकार की तरह जो आत्मा को नाना योनियों में नरकादि पर्यायों द्वारा नामांकित कराता है, वह नामकर्म है।


१२. गोत्रस्य लक्षणम् उदाहरणं च
उच्चनीचकुलत्वेनात्मा गीयत इति गोत्रं कुम्भकारवत्।

अर्थ: कुम्भकार की तरह जो आत्मा को उच्च अथवा नीच कुल के रूप में व्यवहृत कराता है, वह गोत्रकर्म है।


१३. अन्तरायस्य लक्षणम् उदाहरणं च
दानादिविघ्नं कर्तुमन्तरं दातृपात्रादीनां मध्यमेतीत्यन्तरायो भाण्डारिकवत्।

अर्थ: भण्डारी की तरह जो दाता और पात्र आदि के बीच में आकर आत्मा के दान आदि में विघ्न डालता है, वह अन्तराय कर्म है।


उत्तरप्रकृतयः


१४. उत्तरप्रकृतीनां भेदाः
उत्तरप्रकृतयोऽष्टचत्वारिंशदुत्तरशतम्। तद्यथा-

अर्थ: उत्तर प्रकृतियाँ एक सौ अड़तालीस हैं। वे इस प्रकार हैं-


ज्ञानावरणीयम्


१५. ज्ञानावरणीयस्य पञ्च प्रकृतयः
मतिज्ञानावरणीयं श्रुतज्ञानावरणीयमवधिज्ञानावरणीयं मनःपर्ययज्ञानावरणीयं केवलज्ञानावरणीयं
चेति ज्ञानावरणीयस्य प्रकृतयः पञ्च।

अर्थ: मतिज्ञानावरणीय, श्रुतज्ञानावरणीय, अवधिज्ञानावरणीय, मनःपर्ययज्ञानावरणीय तथा केवलज्ञानावरणीय ये पाँच ज्ञानावरणीय की प्रकृतियाँ हैं।


१६. मतिज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
तत्र पञ्चभिरिन्द्रियैर्मनसा च मननं ज्ञानं मतिज्ञानं तदावृणोतीति मतिज्ञानावरणीयम्।

अर्थ: पाँच इन्द्रियों तथा मन की सहायता से होने वाला मनन रूप ज्ञान मतिज्ञान है, उसे जो ढँकता है वह मतिज्ञानावरणीय है।


१७. श्रुतज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
मतिज्ञानगृहीतार्थादन्यस्यार्थस्य ज्ञानं श्रुतज्ञानं तदावृणोतीति श्रुतज्ञानावरणीयम्।

अर्थ: मतिज्ञान द्वारा ग्रहण किये गये अर्थ से भिन्न अर्थ का ज्ञान श्रुतज्ञान है, उसे जो आवृत करता है वह श्रुतज्ञानावरणीय है।


१८. अवधिज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
वर्णगन्धरसस्पर्शयुक्तसामान्यपुद्गलद्रव्यं तत्संबन्धिसंसारीजीवद्रव्याणि च देशान्तरस्थानि
कालान्तरस्थानि च द्रव्यक्षेत्रकालभवभावानवधीकृत्य यत्प्रत्यक्षं जानातीत्यवधिज्ञानं तदावृणोतीत्य-
वधिज्ञानावरणीयम्।

अर्थ: भिन्न देश तथा भिन्न काल में स्थित वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श युक्त सामान्य पुद्गल द्रव्य तथा पुद्गल द्रव्य के सम्बन्ध से युक्त संसारी जीव द्रव्यों को जो द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव की मर्यादा लेकर प्रत्यक्ष जानता है, वह अवधिज्ञान कहलाता है, उसका आवरण करने वाला अवधिज्ञानावरणीय है।


१९. मनःपर्ययज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
परेषां मनसि वर्तमानमर्थं यज्जानाति तन्मनःपर्ययज्ञानं तदावृणोतीति मनःपर्ययज्ञानावरणीयम्।

अर्थ: दूसरों के मन में स्थित अर्थ को जानता है, वह मनःपर्ययज्ञान है, उसे जो रोकता है, वह मनःपर्ययज्ञानावरणीय है।


२०. केवलज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
इन्द्रियाणि प्रकाशं मनश्चानपेक्ष्य त्रिकालगोचरलोकसकलपदार्थानां युगपदवभासनं केवलज्ञानं
तदावृणोतीति केवलज्ञानावरणीयम्।

अर्थ: इन्द्रिय, प्रकाश और मन की सहायता के बिना त्रिकाल गोचर लोक तथा अलोक के समस्त पदार्थों का एक साथ अवभास (ज्ञान) केवलज्ञान है, उसे जो आवृत करता है वह केवलज्ञानावरणीय है।


दर्शनावरणीयम्


चक्षुर्दर्शनावरणीयमचक्षुर्दर्शनावरणीयमवधिदर्शनावरणीयं केवलदर्शनावरणीयं निद्रा निद्रानिद्रा प्रचला
प्रचलाप्रचला स्त्यानगृद्धिरिति दर्शनावरणीयं नवधा।

अर्थ: चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय, केवलदर्शनावरणीय, निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला तथा स्त्यानगृद्धि ये नौ दर्शनावरणीय के भेद हैं।


तत्र चक्षुषा वस्तुसामान्यग्रहणं चक्षुर्दर्शनं तदावृणोतीति चक्षुर्दर्शनावरणीयम्।

अर्थ: चक्षु द्वारा वस्तु का सामान्य ग्रहण चक्षुदर्शन कहलाता है, उसका आवरण चक्षुदर्शनावरणीय है।


शेषैः स्पर्शनादीन्द्रियैर्मनसा च वस्तुसामान्यग्रहणमचक्षुर्दर्शनं तदावृणोतीत्यचक्षुर्दर्शनावरणीयम्।

अर्थ: चक्षु के अतिरिक्त शेष स्पर्शन आदि इन्द्रियों तथा मन के द्वारा वस्तु का सामान्यग्रहण अचक्षुदर्शन है, उसका आवरण अचक्षुदर्शनावरणीय है।


रूपिसामान्यग्रहणमवधिदर्शनं तदावृणोतीत्यवधिदर्शनावरणीयम्।

अर्थ: रूपी पदार्थों का सामान्यग्रहण अवधिदर्शन है, उसका आवरण अवधिदर्शनावरणीय है।


समस्तवस्तुसामान्यग्रहणं केवलदर्शनं तदावृणोतीति केवलदर्शनावरणीयम्।

अर्थ: समस्त वस्तुओं का सामान्यग्रहण केवलदर्शन है, उसका आवरण केवलदर्शनावरणीय है।


यतो गच्छतः स्थानं तिष्ठत उपवेशनमुपविशतश्शयनं च भवति सा निद्रा।

अर्थ: जिसके कारण चलते, किसी स्थान पर ठहरते, बिस्तर पर बैठते नींद आती है, उसे निद्रा कहते हैं।


२७. निद्रानिद्रायाः स्वरूपम्


उत्थापितेऽपि लोचनमुद्घाटयितुं न शक्नोति यतस्सा निद्रानिद्रा।

अर्थ: जिसके कारण उठाये जाने (जगाये जाने) पर भी आँखें न खुल सकें, उसे निद्रानिद्रा कहते हैं।


२८. प्रचलायाः स्वरूपम्


यत ईषदुन्मील्य स्वपिति सुप्तोऽपीषदीषज्जानाति सा प्रचला।

अर्थ: जिसके कारण कुछ आँख खोलकर सोये तथा सोते हुए भी कुछ-कुछ जानता रहे, उसे प्रचला कहते हैं।


२९. प्रचलाप्रचलायाः स्वरूपम्


यतो निद्रायमाणे लाला वहत्यङ्गानि चलन्ति सा प्रचलाप्रचला।

अर्थ: जिसके कारण सोते हुए लार बहे तथा अंग चलें, उसे प्रचला-प्रचला कहते हैं।


३०. स्त्यानगृद्धेः स्वरूपम्


यत उत्थापितेऽपि पुनः पुनः स्वपिति निद्रायमाणे चोत्थाय कर्माणि करोति स्वप्नायते जल्पति च सा स्त्यानगृद्धिः।

अर्थ: जिसके कारण उठा देने पर भी फिर-फिर सो जाये, नींद में उठकर कार्य करे, स्वप्न देखे, बड़बड़ाये, उसे स्त्यानगृद्धि कहते हैं।


वेदनीयम् / ३१. वेदनीयस्य द्वे प्रकृतयः


सातावेदनीयमसातावेदनीयं चेति वेदनीयं द्विधा।

अर्थ: सातावेदनीय और असातावेदनीय ये दो वेदनीय के भेद हैं।


३२. सातावेदनीयस्य स्वरूपम्


तत्रेन्द्रियसुखकारणचन्दनकर्पूरस्रग्वनितादिविषयप्राप्तिकारणं सातावेदनीयम्।

अर्थ: इन्द्रिय-सुख के कारण चन्दन, कर्पूर, माला, वनिता आदि विषयों की प्राप्ति जिससे हो, वह सातावेदनीय है।


३३. असातावेदनीयस्य स्वरूपम्
इन्द्रियदुःखकारणविषशस्त्राग्निकण्टकादिद्रव्यप्राप्तिनिमित्तमसातावेदनीयम्।

अर्थ: इन्द्रिय-दुःख के कारण विष, शस्त्र, अग्नि, कंटक आदि द्रव्यों की प्राप्ति जिसके द्वारा हो, वह असातावेदनीय है।


मोहनीयम्


३४. मोहनीयस्य द्वौ भेदौ
दर्शनमोहनीयं चारित्रमोहनीयं चेति मोहनीयं द्विधा।

अर्थ: दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय ये दो मोहनीय के भेद हैं।


३५. दर्शनमोहनीयस्य त्रयः भेदाः
तत्र मिथ्यात्वं सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वप्रकृतिश्चेति दर्शनमोहनीयं त्रिधा।

अर्थ: उनमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व तथा सम्यक्त्वप्रकृति ये तीन दर्शनमोहनीय के भेद हैं।


३६. मिथ्यात्वस्य स्वरूपम्
तत्रातत्त्वश्रद्धानकारणं मिथ्यात्वम्।

अर्थ: उक्त तीन भेदों में मिथ्यात्व वह है, जिससे तत्त्व की श्रद्धा न होकर विपरीत श्रद्धा हो।


३७. सम्यग्मिथ्यात्वस्य स्वरूपम्
तत्त्वातत्त्वश्रद्धानकारणं सम्यग्मिथ्यात्वम्।

अर्थ: जिससे तत्त्व तथा अतत्त्व दोनों का श्रद्धान हो, वह सम्यग्मिथ्यात्व है।


३८. सम्यक्त्वप्रकृतेः स्वरूपम्
तत्त्वार्थश्रद्धानरूपं सम्यग्दर्शनं चलमलिनमगाढं करोति यत्सा सम्यक्त्वप्रकृतिः।

अर्थ: जो तत्त्वार्थ की श्रद्धारूप सम्यग्दर्शन में चल, मलिन तथा अगाढ़ दोष उत्पन्न करे वह सम्यक्त्वप्रकृति है।


३९. चारित्रमोहनीयस्य द्वौ भेदौ
कषायनोकषायभेदाच्चारित्रमोहनीयं द्विधा।

अर्थ: कषाय और नोकषाय के भेद से चारित्रमोहनीय दो प्रकार का है।


४०. कषायाणां भेदाः
तत्रानन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पतः प्रत्येकं क्रोधमानमायालोभा इति कषायाः षोडश।

अर्थ: उनमें अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन के विकल्प से कषाय चार प्रकार की है और प्रत्येक के क्रोध, मान, माया तथा लोभ ये चार-चार भेद हैं। इस प्रकार कषाय के सोलह भेद हैं।


४१. अनन्तानुबन्धिकषायाणां कार्यम्
तत्रानन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभाः सम्यग्दर्शनं विराधयन्ति।

अर्थ: अनन्तानुबन्धि क्रोध, मान, माया और लोभ सम्यग्दर्शन का घात करते हैं, उसे वे प्रकट नहीं होने देते।


४२. अप्रत्याख्यानकषायाणां कार्यम्
अप्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभा देशसंयमं प्रतिबध्नन्ति।

अर्थ: अप्रख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ देशसंयम को रोकते हैं।


४३. प्रत्याख्यानकषायाणां कार्यम्
प्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभास्सकलसंयमं प्रतिबध्नन्ति।

अर्थ: प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ सकलचारित्र को रोकते हैं।


४४. संज्वलनकषायाणां कार्यम्
संज्वलनक्रोधमानमायालोभा यथाख्यातचारित्रं निवारयन्ति।

अर्थ: संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ यथाख्यात चारित्र को नहीं होने देते हैं।


तत्रानन्तानुबन्धिनः क्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं शिलाभेदशिलास्तम्भवेणूमूल-क्रिमिराग-
कम्बलसदृशास्तीव्रतमशक्तयः।

अर्थ: अनन्तानुबन्धि क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय क्रम से शिलाखण्ड, शिलास्तम्भ, वेणूमूल (बाँस की जड़) और क्रिमिराग कम्बल की तरह तीव्रतम शक्तिवाली होती है।


अप्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं भूभेदास्थि-अविशृङ्गचक्रमलसदृशास्तीव्रतरशक्तयः।

अर्थ: अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय क्रम से पृथ्वीखण्ड, हड्डी, मेढे के सींग तथा चक्रमल (ओंगन) के सदृश तीव्रतर शक्तिवाली होती है।


प्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं धूलिरेखाकाष्ठगोमूत्रतनुमल-सदृशास्तीव्रशक्तयः।

अर्थ: प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ क्रम से धूलि-रेखा, काष्ठ, गोमूत्र तथा शरीर के मल के समान तीव्रतर शक्तिवाली होती हैं।


संज्वलनक्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं जलरेखावेत्रक्षुरप्रहरिद्रारागसदृशा मन्दशक्तयः।

अर्थ: संज्वलन क्रोध, मान, माया तथा लोभ क्रम से जलरेखा बेंत, खुरपा तथा हल्दी के रंग के सदृश मन्द शक्तिवाली होती हैं।


यतो हासो भवति तद्धास्यम्।

अर्थ: जिससे हँसी आये, वह हास्य प्रकृति है।


यतो रमयति सा रतिः।

अर्थ: जिसके कारण रमे (प्रसन्न हो), वह रति है।


५१. अरतिप्रकृतेर्लक्षणम्
यतो विषण्णो भवति सारतिः।

अर्थ: जिसके कारण विषण्ण (खिन्न) हो, वह अरति है।


५२. शोकप्रकृतेर्लक्षणम्
यतः शोचयति रोदयति स शोकः।

अर्थ: जिसके कारण शोक करे, वह शोक है।


५३. भयप्रकृतेर्लक्षणम्
यतो बिभेत्यनर्थात्तद्भयम्।

अर्थ: जिसके कारण अनर्थ से डरे, वह भय है।


५४. जुगुप्साप्रकृतेर्लक्षणम्
यतो जुगुप्सा सा जुगुप्सा।

अर्थ: जिसके कारण घृणा आये, वह जुगुप्सा है।


५५. स्त्रीवेदस्य लक्षणम्
यतः स्त्रियमात्मानं मन्यमानः पुरुषे वेदयति रन्तुमिच्छति सः स्त्रीवेदः।

अर्थ: जिसके कारण अपने को स्त्री मानता हुआ पुरुष में रमण करने की इच्छा करता है, वह स्त्रीवेद है।


५६. पुंवेदस्य लक्षणम्
यतः पुमांसमात्मानं मन्यमानः स्त्रियां वेदयति रन्तुमिच्छति सः पुंवेदः।

अर्थ: जिसके कारण अपने को पुरुष मानता हुआ स्त्री में रमण करने की इच्छा करता है, वह पुंवेद है।


५७. नपुंसकवेदस्य लक्षणम्
यतो नपुंसकमात्मानं मन्यमानः स्त्रीपुंसोर्वेदयति रन्तुमिच्छति स नपुंसकवेदः।

अर्थ: जिसके कारण अपने को नपुंसक मानता हुआ स्त्री और पुरुष दोनों में रमण करने की इच्छा करता है, वह नपुंसकवेद है।


आयु:


५८. आयुष्कर्मण: चत्वार: प्रकृतय:
नारकायुष्यं तिर्यगायुष्यं मनुष्यायुष्यं देवायुष्यं चेत्यायुश्चतुर्विधम्।

अर्थ: नारकायुष्य, तिर्यगायुष्य, मनुष्यायुष्य और देवायुष्य इस प्रकार आयु के चार भेद हैं।


५९. नरकायुषो लक्षणम्
तत्र यन्नारकशरीरे आत्मानं धारयति तन्नारकायुष्यम्।

अर्थ: जो आत्मा को नारक शरीर में धारण कराता है, वह नरकायुष्य है।


६०. तिर्यगायुषो लक्षणम्
यत्तिर्यक्शरीरे जीवं धारयति तत्तिर्यगायुष्यम्।

अर्थ: जो जीव को तिर्यंच-शरीर में धारण कराता है, वह तिर्यगायुष्य है।


६१. मनुष्यायुषो लक्षणम्
यन्मनुष्यशरीरे प्राणिनं धारयति तन्मनुष्यायुष्यम्।

अर्थ: जो प्राणी को मनुष्य-शरीर में धारण कराता है, वह मनुष्यायुष्य है।


६२. देवायुषो लक्षणम्
यद्देवशरीरे देहिनं धारयति तद्देवायुष्यम्।

अर्थ: जो प्राणी को देव-शरीर में धारण कराता है, वह देवायुष्य है।


नाम


६३. नामकर्मण: द्वाचत्वारिंशत्प्रकृतय:
गतिजातिशरीरबन्धनसंघातसंस्थानाङ्गोपाङ्गसंहननवर्णगन्धरसस्पर्शानुपूर्व्यगुरुलघूपघात-परघाता-
तपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतित्रसस्थावरबादरसूक्ष्मपर्याप्तापर्याप्तप्रत्येकशरीरसाधारणशरीरस्थिरास्थिर-
शुभाशुभसुभगदुर्भगसुस्वरदुःस्वरदेयानादेययशस्कीर्त्ययशस्कीर्तिनिर्माणतीर्थकरत्वानीतिपिण्डापिण्डरूपा
नामकर्मप्रकृतयो द्वाचत्वारिंशत्।

अर्थ: गति, जाति, शरीर, बन्धन, संघात, संस्थान, अंगोपांग, संहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, त्रस, स्थावर, बादर, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक शरीर, साधारण शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर, आदेय, अनादेय, यशस्कीर्ति, अयशस्कीर्ति निर्माण तथा तीर्थकरत्व ये नामकर्म की पिण्ड-अपिण्डरूप बयालीस प्रकृतियाँ हैं।


६४. नामकर्मणः पिण्डप्रकृतीनां त्रयोनवतिः भेदाः
पिण्डप्रकृतीनां भेदे तु सर्वा नामप्रकृतयस्त्रयोनवतिः।

अर्थ: पिण्डप्रकृतियों के भेद करने पर नामकर्म की सब प्रकृतियाँ तिरानवे होती हैं।


६५. गतिनामकर्मणः चत्वारः भेदाः
नारकतिर्यङ्मनुष्यदेवगतिभेदाद् गतिनाम चतुर्धा।

अर्थ: नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति और देवगति के भेद से गति नामकर्म के चार भेद हैं।


६६. नरकगतेर्लक्षणम्
यतो जीवस्य नारकपर्यायो भवति सा नरकगतिः।

अर्थ: जिसके कारण जीव की नारकपर्याय होती है, वह नरकगति है।


६७. तिर्यग्गतेर्लक्षणम्
यतस्तिर्यक्पर्यायो भवति प्राणिनः सा तिर्यग्गतिः।

अर्थ: जिसके कारण जीव की तिर्यञ्चपर्याय होती है, वह तिर्यग्गति है।


६८. मनुष्यगतेर्लक्षणम्
यतो मनुष्यपर्याय आत्मनो भवति सा मनुष्यगतिः।

अर्थ: जिसके कारण आत्मा की मनुष्यपर्याय होती है, वह मनुष्यगति है।


६९. देवगतेर्लक्षणम्
यतो देवपर्यायो देहिनो भवति सा देवगतिः।

अर्थ: जिसके कारण प्राणी को देवपर्याय होती है, वह देवगति है।


७०. गतेः सामान्यलक्षणम्
नारकादिभवप्राप्तिर्गमनहेतुर्वा गतिनामा।

अर्थ: ७०. गति नामकर्म का सामान्य लक्षण नारक आदि भवप्राप्ति के लिए गमन का कारण गति नामकर्म है।


७१. जातिनामकर्मणः पञ्च भेदाः
एकद्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रियभेदाज्जातिनाम पञ्चधा।

अर्थ: ७१. जाति नामकर्म के पाँच भेद एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय के भेद से जाति नामकर्म के पाँच भेद है।


७२. एकेन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
तत्र स्पर्शनैन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति यतः सा एकेन्द्रियजातिः।

अर्थ: ७२. एकेन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव केवल स्पर्शन इन्द्रियवान् होता है, वह एकेन्द्रिय जाति नामकर्म है।


७३. द्वीन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनेन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति सा द्वीन्द्रियजातिः।

अर्थ: ७३. द्वीन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव केवल स्पर्शन और रसना इन्द्रिय युक्त होता है, वह द्वीन्द्रिय जाति नामकर्म है।


७४. त्रीन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनघ्राणेन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति सा त्रीन्द्रियजातिः।

अर्थ: ७४. त्रीन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव स्पर्शन, रसना तथा घ्राण इन्द्रिय युक्त होता है, वह त्रीन्द्रिय जाति नामकर्म है।


७५. चतुरिन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुष्मन्तो जीवा भवन्ति सा चतुरिन्द्रियजातिः।

अर्थ: ७५. चतुरिन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु युक्त होता है, वह चतुरिन्द्रिय जाति नामकर्म है।


७६. पञ्चेन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्रेन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति सा पञ्चेन्द्रियजातिः।

अर्थ: ७६. पंचेन्द्रियजाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु तथा श्रोत्रेन्द्रिय युक्त होता है, वह पंचेन्द्रिय जाति नामकर्म है।


७७. शरीरनामकर्मणः पञ्च भेदाः
औदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणानीति शरीरनाम पञ्चधा।

अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण, ये शरीर नामकर्म के पाँच भेद हैं।


७८. औदारिकशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
तत्र यत आहारवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धा औदारिकशरीरकरणे परिणमन्ति तदौदारिकशरीरनाम।

अर्थ: जिसके कारण आहार वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध औदारिक शरीर के रूप में परिणत होते हैं, वह औदारिक शरीर नामकर्म है।


७९. वैक्रियिकशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
यत आहारवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धा वैक्रियिकशरीररूपेण परिणमन्ति तद्वैक्रियकशरीरनाम।

अर्थ: जिसके कारण आहार वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध वैक्रियिक शरीर के रूप में परिणत होते हैं, वह वैक्रियिक शरीर नामकर्म है।


८०. आहारकशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
यत आहारवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धा आहारकशरीररूपेण परिणमन्ति तदाहारकशरीरनाम।

अर्थ: जिसके कारण आहार वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध आहारक शरीर रूप से परिणत होते हैं, उसे आहारक शरीर नामकर्म कहते हैं।


८१. तैजसशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
यतस्तैजसवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धास्तैजसशरीररूपेण परिणमन्ति तत्तैजसशरीरनाम।

अर्थ: जिसके कारण तैजस वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध तैजस शरीर रूप से परिणत होते हैं, वह तैजस शरीर नामकर्म है।


८२. कार्मणशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
कार्मणवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धाः कार्मणशरीररूपेण परिणमन्ति यतस्तत्कार्मणशरीरनाम।

अर्थ: जिसके कारण कार्मण वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध कार्मण शरीर रूप परिणत होते हैं, वह कार्मण शरीर नामकर्म है।


८३. बन्धननामकर्मणः पञ्च भेदाः
औदारिकादिशरीरपञ्चकाश्रितं बन्धननाम पञ्चधा।

अर्थ: ८३. बन्धन नामकर्म के पाँच भेद औदारिक आदि पाँच शरीरों के आश्रित बन्धन नामकर्म पाँच प्रकार का है।


८४. औदारिकशरीरबन्धननामकर्मणः लक्षणम्
तत्रौदारिकशरीराकारेण परिणतपुद्गलानां परस्परसंश्लेषरूपो बन्धो यतो भवति तदौदारिक-
शरीरबन्धननाम।

अर्थ: ८४. औदारिक शरीर बन्धन नामकर्म का लक्षण जिसके कारण औदारिक शरीर के आकार रूप से परिणत पुद्गलों का परस्पर संश्लेष रूप बन्ध होता है, वह औदारिक शरीर बन्धन नामकर्म है।


८५. वैक्रियिकादिशरीरबन्धननामकर्मणां लक्षणानि
एवं वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीराकारेण परिणतपुद्गलानां परस्परसंश्लेषरूपो बन्धो यतो भवति
तानि वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीरबन्धननामानि ज्ञातव्यानि।

अर्थ: ८५. वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर बन्धन नामकर्म इसी प्रकार जिस कारण वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर के आकार रूप से परिणत पुद्गलों का परस्पर संश्लेष रूप बन्ध होता है, उन्हें क्रमशः वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर बन्धन नामकर्म कहते हैं।


८६. संघातनामकर्मणः पञ्च भेदाः
औदारिकादिशरीरपञ्चकाश्रितानि संघातनामानि पञ्च।

अर्थ: ८६. संघात नामकर्म के पाँच भेद औदारिक आदि पाँच शरीरों के आश्रित संघात नामकर्म पाँच प्रकार का होता है।


८७. औदारिकशरीरसंघातनामकर्मणः लक्षणम्
तत्रौदारिकशरीराकारेण परिणतपरस्परबद्धपुद्गलानां तदाकारवैषम्याभावकारणमौदारिक-
शरीरसंघातनामकर्म।

अर्थ: ८७. औदारिक शरीर संघात नामकर्म का लक्षण औदारिक शरीर के आकार रूप से परिणत परस्पर बद्ध पुद्गलों के तदाकार वैषम्य के अभाव का कारण औदारिक शरीर संघात नामकर्म है।


८८. वैक्रियिकादिशरीरसंघातनामकर्मणः लक्षणम्
एवं वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीररूपेण परिणतपरस्परबद्ध-पुद्गलस्कन्धानां तत्तदाकार-
वैषम्याभावकारणानि वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीर-संघातनामानि ज्ञातव्यानि।

अर्थ: ८८. वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर संघात नामकर्म का लक्षण इसी प्रकार वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर रूप से परिणत, परस्पर बद्ध पुद्गल स्कन्धों के उस-उस आकार की विषमता के अभाव का कारण वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर संघात नामकर्म है।


८९. संस्थाननामकर्मणः षड्भेदाः
समचतुरस्रन्यग्रोधस्वातिकुब्जवामनहुण्डभेदात्संस्थाननाम षोढा।

अर्थ: समचतुरस्र, न्यग्रोध, स्वाति, कुब्ज, वामन और हुण्डक ये संस्थान नामकर्म के छह भेद हैं।


९०. समचतुरस्रसंस्थानस्य लक्षणम्
तत्र यतः सर्वत्र दशताललक्षणलक्षितप्रशस्तसंस्थानशरीराकारो भवति तत्समचतुरस्रसंस्थानं नाम।

अर्थ: जिससे सब जगह दशताल लक्षणयुक्त प्रशस्त संस्थान सहित शरीर का आकार होता है, वह समचतुरस्र संस्थान है।


९१. न्यग्रोधसंस्थानस्य लक्षणम्
यत उपरि विस्तीर्णोऽधः संकुचितशरीराकारो भवति तन्न्यग्रोधसंस्थानं नाम।

अर्थ: जिसके कारण ऊपर विस्तीर्ण तथा नीचे संकुचित शरीराकार होता है, वह न्यग्रोध संस्थान है।


९२. स्वातिसंस्थानस्य लक्षणम्
यतोऽधो विस्तीर्ण उपरि संकुचितशरीराकारो भवति तत्स्वातिसंस्थानं नाम। स्वातिर्वल्मीकं
तत्सादृश्यात्।

अर्थ: जिसके कारण नीचे विस्तीर्ण तथा ऊपर संकुचित शरीर का आकार होता है, वह वल्मीक (वामी) सदृश होने के कारण स्वातिसंस्थान कहलाता है।


९३. कुब्जसंस्थानस्य लक्षणम्
यतो ह्रस्वः शरीराकारो भवति तत्कुब्जसंस्थानं नाम।

अर्थ: जिसके कारण शरीर का आकार छोटा (कुबड़ा) होता है, वह कुब्जक संस्थान नामकर्म है।


९४. वामनसंस्थानस्य लक्षणम्
यतो दीर्घहस्तपादा ह्रस्वकबन्धश्च शरीराकारो भवति तद्वामनसंस्थानं नाम।

अर्थ: जिसके कारण हाथ और पैर लम्बे तथा कबन्ध (धड़) छोटा होता है, उसे वामन संस्थान कहते हैं।


९५. हुण्डकसंस्थानस्य लक्षणम्
यतः पाषाणपूर्णगोणिवत् ग्रन्थादिविषमशरीराकारो भवति तद् हुण्डकसंस्थानं नाम।

अर्थ: जिसके कारण पत्थर भरी हुई गौन की तरह, ग्रन्थि आदि से युक्त विषम शरीराकार होता है, उसे हुण्डक संस्थान कहते हैं।


९६. अङ्गोपाङ्गनामकर्मणस्त्रयो भेदाः
औदारिकवैक्रियिकाहारकशरीरभेदादङ्गोपाङ्गनाम त्रिधा।

अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक और आहारक ये अंगोपांग नामकर्म के तीन भेद हैं।


९७. औदारिकशरीराङ्गोपाङ्गस्य लक्षणम्
तत्रौदारिकशरीरस्य चरणद्वयबाहुद्वयनितम्बपृष्ठवक्षःशीर्षभेदादष्टाङ्गानि अङ्गुलीकर्ण-
नासिकाद्युपाङ्गानि करोति यत्तदौदारिकशरीराङ्गोपाङ्गनाम।

अर्थ: औदारिक शरीर के दो पैर, दो हाथ, नितम्ब, पीठ, वक्षस्थल तथा शीर्ष ये आठ अंग और अंगुली, कर्ण, नासिका आदि उपांग जिसके कारण होते हैं, उसे औदारिक शरीर अंगोपांग कहते हैं।


९८. वैक्रियिकाहारकशरीराङ्गोपाङ्गयोर्लक्षणे
एवं वैक्रियिकाहारकशरीरयोरपि तदङ्गोपाङ्गकारकं वैक्रियिकाहारक-शरीराङ्गोपाङ्गनामद्वयं ज्ञातव्यम्।

अर्थ: इसी तरह जिनके कारण वैक्रियिक तथा आहारक शरीर के अंगोपांग होते हैं, उन्हें क्रमशः वैक्रियिक तथा आहारक शरीर अंगोपांग कहते हैं।


९९. संहनननामकर्मणः षड् भेदाः
वज्रवृषभनाराचसंहननवज्रनाराचनाराचार्धनाराचकीलितासंप्राप्तसृपाटिकाभेदतः संहननं नाम षोढा।

अर्थ: वज्रवृषभनाराचसंहनन, वज्रनाराचनाराचार्धनाराचकीलितासंप्राप्तसृपाटिकाभेदतः संहनन नामकर्म के छह भेद हैं।


१००. वज्रवृषभनाराचसंहननस्य लक्षणम्
तत्र वज्रवत् स्थिरास्थिऋषभो वेष्टनं वज्रवत् वेष्टनकीलकबन्धो यतो भवति तद्वज्रवृषभनाराच-
संहननं नाम।

अर्थ: जिसके कारण वज्र की तरह स्थिर अस्थि और वृषभ रूप वेष्टन तथा वज्र की तरह वेष्टन और कीलक बन्ध होता है, उसे वज्रवृषभनाराच संहनन कहते हैं।


१०१. वज्रनाराचसंहननस्य लक्षणम्
यतो वज्रवत् स्थिरास्थिकीलकबन्धसामान्यवेष्टनं च भवति तद्वज्रनाराचसंहननम्।

अर्थ: जिसके कारण वज्र की तरह स्थिर अस्थि तथा कीलक बन्ध होता है तथा वेष्टन सामान्य होता है, उसे वज्रनाराच संहनन कहते हैं।


१०२. नाराचसंहननस्य लक्षणम्
यतो वज्रवत् स्थिरास्थिबन्धसामान्यकीलिकावेष्टनमेतद्द्वयं भवति तन्नाराचसंहननं नाम।

अर्थ: जिसके कारण वज्र की तरह स्थिर अस्थिबन्ध तथा सामान्य कीलक और वेष्टन होते हैं, उसे नाराच संहनन कहते हैं।


१०३. अर्धनाराचसंहननस्य लक्षणम्
यतस्सामान्यास्थिबन्धार्धकीलिका भवति तदर्धनाराचसंहननं नाम।

अर्थ: जिसके कारण सामान्य अस्थिबन्ध अर्ध कीलित होता है, उसे अर्धनाराच संहनन कहते हैं।


१०४. कीलितसंहननस्य लक्षणम्
यतः कीलित इव सामान्यास्थिबन्धो भवति तत्कीलितसंहननं नाम।

अर्थ: जिसके कारण कीलित की तरह सामान्य अस्थिबन्ध होता है, वह कीलित संहनन है।


१०५. असंप्राप्तसृपाटिकासंहननस्य लक्षणम्
यतः परस्परासंबद्धास्थिबन्धो भवति तदसंप्राप्तसृपाटिकासंहननं नाम।

अर्थ: जिसके कारण अस्थिबन्ध परस्पर असम्बद्ध होता है, उसे असम्प्राप्तसृपाटिका संहनन कहते हैं।


१०६. वर्णनामकर्मणः पञ्च भेदाः
श्वेतपीतहरितारुणकृष्णभेदाद् वर्णनाम पञ्चधा।

अर्थ: श्वेत, पीत, हरित, अरुण तथा कृष्ण के भेद से वर्ण नामकर्म पाँच प्रकार का है।


१०७. वर्णनामकर्मणः सामान्यलक्षणम्
तत्तत्स्वस्वशरीराणां श्वेतादिवर्णा न्यत्करोति तद्वर्णनाम।

अर्थ: अपने-अपने शरीर का श्वेत आदि वर्ण जिसके कारण होता है, उसे वर्ण नाम कहते हैं।


१०८. गन्धनामकर्मणः द्वौ भेदौ
सुगन्धदुर्गन्धभेदाद् गन्धनाम द्वेधा।

अर्थ: सुगन्ध और दुर्गन्ध के भेद से गन्ध नाम दो प्रकार का है।


१०९. गन्धनामकर्मणः लक्षणम्
स्वस्वशरीराणां स्वस्वगन्धं करोति यत्तद् गन्धनाम।

अर्थ: अपने-अपने शरीर की गन्ध जिस कारण होती है, उसे गन्ध नामकर्म कहते हैं।


११०. रसनामकर्मणः पञ्च भेदाः
तिक्तकटुकषायाम्लमधुरभेदाद्रसनाम पञ्चधा।

अर्थ: तिक्त, कटु, कषाय, आम्ल तथा मधुर के भेद से रस नामकर्म के पाँच भेद हैं।


१११. रसनामकर्मणः लक्षणम्
तत्तत्स्वस्वशरीराणां यत्स्वस्वरसं करोति तद्रसनाम।

अर्थ: अपने-अपने शरीर का जो अपना-अपना रस करता है, उसे रस नामकर्म कहते हैं।


११२. लवणो नाम षष्ठो रसः न पृथक्
लवणो नाम रसो लौकिकैः षष्ठोऽस्ति। स मधुररसभेद एवेति परमागमे पृथक्त्वेन नोक्तः, लवणं विना इतररसानां स्वादुत्वाभावात्।

अर्थ: लवण नामक छठा रस लोक में माना जाता है। यह मधुर रस का ही भेद है, इसलिए परमागम में अलग से नहीं कहा; क्योंकि नमक के बिना तो अन्य सभी रस फीके हैं।


११३. स्पर्शनामकर्मण: अष्टभेदा:
मृदुकर्कशगुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षभेदात्स्पर्शनामाष्टकम्।

अर्थ: मृदु, कर्कश, गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध तथा रूक्ष के भेद से स्पर्श नामकर्म आठ प्रकार का है।


११४. स्पर्शनामकर्मण: लक्षणम्
तत्तत्स्वस्वशरीराणां स्वस्वस्पर्शं करोति।

अर्थ: स्पर्श नामकर्म उस-उस अपने-अपने शरीर का अपना-अपना स्पर्श उत्पन्न करता है।


११५. आनुपूर्वीनामकर्मण: चत्वारो भेदा:
नारकतिर्यङ्मनुष्यदेवगत्यानुपूर्विभेदादानुपूर्विनाम चतुर्धा।

अर्थ: नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी के तथा देवगत्यानुपूर्वी के भेद से आनुपूर्वी के चार भेद हैं।


११६. आनुपूर्वीनामकर्मण: लक्षणम्
स्वस्वगतिगमने विग्रहतो त्यक्तपूर्वशरीराकारं करोति।

अर्थ: इसके कारण अपनी-अपनी गति में जाने के लिए विग्रहगति में पहले छोड़े गये शरीर का आकार होता है।


११७. अगुरुलघुनामकर्मण: लक्षणम्
अगुरुलघुनाम स्वस्वशरीरं गुरुत्वलघुत्ववर्जितं करोति।

अर्थ: अगुरुलघु नामकर्म अपने-अपने शरीर को गुरुत्व और लघुत्व से रहित करता है।


११८. उपघातनामकर्मण: लक्षणम्
उपघातनाम स्वबाधाकारकं तुन्दादिशरीरावयवं करोति।

अर्थ: उपघात नामकर्म अपने को बाधाकारक तोंद आदि शरीरावयवों को करता है।


११९. परघातनामकर्मण: लक्षणम्
परघातनाम परबाधाकारकं सर्पदंष्ट्र शृङ्गादिशरीरावयवं करोति।

अर्थ: परघात नामकर्म दूसरों को बाधा देने वाले सर्पदाढ़, सींग आदि शरीरावयव करता है।


१२०. आतपनामकर्मणः लक्षणम्
आतपनामोष्णप्रभां करोति तत् सूर्यबिम्बे बादरपर्याप्तपृथ्वीकायिके भवति।

अर्थ: आतप नामकर्म उष्ण प्रभा करता है। वह सूर्य बिम्ब में स्थित बादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक जीवों में होता है।


१२१. उद्योतनामकर्मणः लक्षणम्
उद्योतनाम शीतलप्रभां करोति, तत् चन्द्रतारकादिबिम्बेषु तेजोवायुसाधारणवर्जितचन्द्रतारकादि-
बिम्बजनितबादरपर्याप्ततिर्यग्जीवेषु भवति।

अर्थ: उद्योत नामकर्म शीतल प्रभा करता है। वह चन्द्र, तारागण आदि के बिम्ब में तथा तेजकायिक, वायुकायिक, साधारणकायिक जीवों के सिवाय चन्द्रतारक आदि बिम्ब में होने वाले बादर पर्याप्त तिर्यंच जीवों में होता है।


१२२. उच्छ्वासनामकर्मणः लक्षणम्
उच्छ्वासनाम उच्छ्वासनिःश्वासं करोति।

अर्थ: उच्छ्वास नामकर्म उच्छ्वास और निःश्वास को करता है।


१२३. विहायोगतिनामकर्मणः द्वौ भेदौ
विहायोगतिनाम प्रशस्ताप्रशस्तभेदाद् द्विधा।

अर्थ: विहायोगति नामकर्म प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से दो प्रकार का है।


१२४. प्रशस्तविहायोगतेः लक्षणम्
तत्र प्रशस्तविहायोगतिनाम मनोज्ञं गमनं करोति।

अर्थ: प्रशस्त विहायोगति नामकर्म मनोज्ञ गमन करता है।


१२५. अप्रशस्तविहायोगतेः लक्षणम्
अप्रशस्तविहायोगतिरप्रशस्तगमनं करोति।

अर्थ: अप्रशस्त विहायोगति अप्रशस्त-अमनोज्ञ गमन करता है।


१२६. त्रसनामकर्मणः लक्षणम्


त्रसनाम द्वीन्द्रियादीनां चलनोड्डेजनादियुक्तं त्रसकायं करोति।

अर्थ: त्रस नामकर्म चलन, उड्डेजन आदि युक्त द्वीन्द्रिय आदि रूप त्रसकाय को करता है।


१२७. स्थावरनामकर्मणः लक्षणम्


पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावरनाम पृथिव्याद्येकेन्द्रियाणां चलनो-ड्रेजनादिरहितस्थावरकायं करोति।

अर्थ: पृथ्वी, जल, तेज, वायु और वनस्पति स्थावर नामकर्म पृथ्वी आदि एकेन्द्रियों के चलन, उड्डेजन आदि रहित स्थावरकाय को करता है।


१२८. बादरनामकर्मणः लक्षणम्


बादरनाम परैर्बाध्यमानं स्थूलशरीरं करोति।

अर्थ: बादर नामकर्म दूसरों के द्वारा बाधा दिये जाने योग्य स्थूल शरीर को करता है।


१२९. सूक्ष्मनामकर्मणः लक्षणम्


सूक्ष्मनाम परैरबाध्यमानं सूक्ष्मशरीरं करोति।

अर्थ: सूक्ष्म नामकर्म दूसरों के द्वारा बाधा न दिये जाने योग्य सूक्ष्म शरीर करता है।


१३०. पर्याप्तनामकर्मणः लक्षणम्


पर्याप्तनाम स्वस्वपर्याप्तीनां पूर्णतां करोति।

अर्थ: पर्याप्त नामकर्म स्व-स्व पर्याप्तियों की पूर्णता को करता है।


१३१. अपर्याप्तनामकर्मणः लक्षणम्


अपर्याप्तनाम स्वस्वपर्याप्तीनामपूर्णतां करोति।

अर्थ: अपर्याप्त नामकर्म अपनी-अपनी पर्याप्तियों की अपूर्णता करता है।


१३२. पर्याप्तीनां षड् भेदाः


पर्याप्तयश्चाहारशरीरेन्द्रियोच्छ्वासनिःश्वासभाषामनःसम्बन्धेन षोढा भवन्ति।

अर्थ: आहार, शरीर, इन्द्रिय, उच्छ्वास-निश्वास, भाषा और मन ये पर्याप्ति के छह भेद हैं।


१२६. त्रस नामकर्म का लक्षण / १२७. स्थावर नामकर्म का लक्षण / १२८. बादर नामकर्म का लक्षण / १२९. सूक्ष्म नामकर्म का लक्षण / १३०. पर्याप्त नामकर्म का लक्षण / १३१. अपर्याप्त नामकर्म का लक्षण / १३२. पर्याप्तियों के छह भेद


१३३. आहारपर्याप्तेर्लक्षणम्
तत्राहारवर्गणायातपुद्गलस्कन्धानां खलरसभागरूपेण परिणमने आत्मनः शक्तिनिष्पत्तिराहारपर्याप्तिः।

अर्थ: १३३. आहार पर्याप्ति का लक्षण आहार वर्गणा द्वारा प्राप्त पुद्गल स्कन्धों का खल और रस भाग रूप परिणमन में जीव की शक्ति उत्पन्न होना आहार पर्याप्ति है।


१३४. शरीरपर्याप्तेर्लक्षणम्
खलभागमस्थ्यादिकठिनावयवरूपेण रसभागं रसरुधिरादिद्रवावयवरूपेण च परिणमयितुं जीवस्य
शक्तिनिष्पत्तिः शरीरपर्याप्तिः।

अर्थ: १३४. शरीर पर्याप्ति का लक्षण खल भाग को अस्थि आदि कठिन अवयव रूप से तथा रस भाग को रस, रुधिर आदि द्रव अवयव रूप से परिणत करने में जीव की शक्ति उत्पन्न होना शरीर पर्याप्ति है।


१३५. इन्द्रियपर्याप्तेर्लक्षणम्
स्पर्शनार्दीन्द्रियाणां योग्यदेशावस्थितस्वस्वविषयग्रहणे शक्तिनिष्पत्ति-रिन्द्रियपर्याप्तिः।

अर्थ: १३५. इन्द्रिय पर्याप्ति का लक्षण स्पर्शन आदि इन्द्रियों के योग्य देश में अवस्थित अपना-अपना विषय ग्रहण करने में शक्ति उत्पन्न होना इन्द्रिय पर्याप्ति है।


१३६. उच्छ्वासनिःश्वासपर्याप्तेर्लक्षणम्
आहारवर्गणायातपुद्गलस्कन्धानुच्छ्वासनिःश्वासरूपेण परिणमयितुं जीवस्य शक्तिनिष्पत्ति-
रुच्छ्वासनिःश्वासपर्याप्तिः।

अर्थ: १३६. उच्छ्वास-निःश्वास पर्याप्ति का लक्षण आहार वर्गणा द्वारा प्राप्त पुद्गल स्कन्धों को उच्छ्वास-निःश्वास रूप से परिणत करने के लिए जीव की शक्ति उत्पन्न होना उच्छ्वास-निःश्वास पर्याप्ति है।


१३७. भाषापर्याप्तेर्लक्षणम्
भाषावर्गणायातपुद्गलस्कन्धान्सत्यादिचतुर्विधवाक्स्वरूपेण परिणमयितुं जीवस्य शक्ति-
निष्पत्तिर्भाषापर्याप्तिः।

अर्थ: १३७. भाषा पर्याप्ति का लक्षण भाषा वर्गणा द्वारा प्राप्त पुद्गल स्कन्धों को सत्य आदि चार प्रकार की वाक् रूप से परिणत करने के लिए जीव की शक्ति उत्पन्न होना भाषा पर्याप्ति है।


१३८. मनःपर्याप्तेर्लक्षणम्
दृष्टश्रुतानुमितार्थानां गुणदोषविचारणादिरूपभावमनःपरिणमने मनोवर्णायातपुद्गलस्कन्धानां द्रव्यमनोरूपपरिणामेन परिणमयितुं जीवस्य शक्तिनिष्पत्तिर्मनःपर्याप्तिः।

अर्थ: देखे, सुने तथा अनुमित (अनुमान से जाने गये) अर्थों के गुण-दोष विचारणादि रूप भाव मन के परिणमन में, मनोवर्गणा रूप से प्राप्त पुद्गल स्कन्धों के द्रव्य मनरूप परिणाम द्वारा परिणत करने के लिए जीव की शक्ति उत्पन्न होना मनःपर्याप्ति है।


१३९. प्रत्येकशरीरस्य लक्षणम्
प्रत्येकशरीरनामैकस्य जीवस्यैकशरीरस्वामित्वं करोति।

अर्थ: प्रत्येक शरीर नामकर्म एक जीव को एक शरीर का स्वामी करता है।


१४०. साधारणशरीरस्य लक्षणम्
साधारणशरीरनामानन्तजीवानामेकशरीरस्वामित्वं करोति।

अर्थ: साधारण शरीर नामकर्म अनन्त जीवों को एक शरीर का स्वामी करता है।


१४१. स्थिरनामकर्मणः लक्षणम्
स्थिरनाम रसरुधिरमांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणां सप्तधातूनामचलितत्वं करोति।

अर्थ: स्थिर नामकर्म रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सात धातुओं की स्थिरता को करता है।


१४२. अस्थिरनामकर्मणः लक्षणम्
अस्थिरनाम तेषां चलितत्वं करोति।

अर्थ: अस्थिर नामकर्म उपर्युक्त सप्त धातुओं की अस्थिरता करता है।


१४३. शुभनामकर्मणः लक्षणम्
शुभनाम मस्तकादिप्रशस्तावयवं करोति।

अर्थ: शुभ नामकर्म मस्तक आदि प्रशस्त अवयव करता है।


१४४. अशुभनामकर्मणः लक्षणम्
अशुभनामापानाद्यप्रशस्तावयवं करोति।

अर्थ: अशुभ नामकर्म अपान आदि अप्रशस्त अवयवों को करता है।


१४५. सुभगनामकर्मणः लक्षणम्
सुभगनाम परेषां रुचिरत्वं करोति।

अर्थ: सुभग नामकर्म दूसरों की रुचिरता करता है।


१४६. दुर्भगनामकर्मणः लक्षणम्
दुर्भगनामारुचिरत्वं करोति।

अर्थ: दुर्भग नामकर्म दूसरों की अरुचि करता है।


१४७. सुस्वरनामकर्मणः लक्षणम्
सुस्वरनाम श्रवणरमणीयस्वरं करोति।

अर्थ: सुस्वर नामकर्म कर्णप्रिय स्वर करता है।


१४८. दुःस्वरनामकर्मणः लक्षणम्
दुःस्वरं नाम श्रवणदुस्सहं स्वरं करोति।

अर्थ: दुःस्वर नामकर्म कानों को दुःसह स्वर करता है।


१४९. आदेयनामकर्मणः लक्षणम्
आदेयनाम परेर्मान्यतां करोति।

अर्थ: आदेय नामकर्म दूसरों के द्वारा मान्यता करता है।


१५०. अनादेयनामकर्मणः लक्षणम्
अनादेयनामामान्यतां करोति।

अर्थ: अनादेय नामकर्म अमान्यता करता है।


१५१. यशस्कीर्तिनामकर्मणः लक्षणम्
यशस्कीर्तिनाम गुणकीर्तनं करोति ।

अर्थ: यशस्कीर्ति नामकर्म गुणकीर्तन करता है।


१५२. अयशस्कीर्तिनामकर्मणः लक्षणम्
अयशस्कीर्तिनाम दोषकीर्तनं करोति ।

अर्थ: अयशस्कीर्ति दोषकीर्तन (बदनामी) करता है।


१५३. निर्माणनामकर्मणः लक्षणम्
निर्माणनाम शरीरवत् स्वस्वस्थानेषु स्वस्थितानुप्राञ्जलित्वं करोति।

अर्थ: निर्माण नामकर्म शरीर के अनुसार स्व-स्व स्थानों में शरीरावयवों का उचित निर्माण करता है।


१५४. तीर्थकरत्वनामकर्मणः लक्षणम्
तीर्थकरत्वं नाम पञ्चकल्याणचतुस्त्रिंशदतिशयाष्टमहाप्रातिहार्यसमवशरणादिबहुविधौ-
चित्यविभूतिसंयुक्तार्हन्त्यलक्ष्मीं करोति ।

अर्थ: तीर्थंकर नामकर्म पंचकल्याणक, चौंतीस अतिशय, आठ प्रातिहार्य तथा समवसरण आदि अनेक प्रकार की उचित विभूति से युक्त आर्हन्त्य लक्ष्मी को करता है।


गोत्रम्


१५५. गोत्रकर्मणः द्वौ भेदौ
उच्चनीचभेदाद् गोत्रकर्म द्विधा।

अर्थ: उच्च और नीच के भेद से गोत्रकर्म दो प्रकार का है।


१५६. उच्चगोत्रस्य लक्षणम्
तत्र महाव्रताचरणयोग्योत्तमकुलकारणमुच्चैर्गोत्रम्।

अर्थ: महाव्रतों के आचरण योग्य उत्तम कुल का कारण उच्च गोत्रकर्म कहलाता है।


१५७. नीचगोत्रस्य लक्षणम्
तद्विपरीताचरणयोग्यनीचकुलकारणं नीचैर्गोत्रम् ।

अर्थ: ऊपर बताये के विपरीत आचरण योग्य नीच कुल का कारण नीच गोत्र है।


अन्तरायम्


१५८. अन्तरायकर्मण: पञ्च भेदा:
दानलाभभोगोपभोगवीर्याश्रयभेदादन्तरायकर्म पञ्चधा।

अर्थ: दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय तथा वीर्यान्तराय के भेद से अन्तराय कर्म पाँच प्रकार का है।


१५९. दानान्तरायस्य लक्षणम्
तत्र दानस्य विघ्नहेतुर्दानान्तरायम्।

अर्थ: दान के विघ्न का कारण दानान्तराय होता है।


१६०. लाभान्तरायस्य लक्षणम्
लाभस्य विघ्नहेतुर्लाभान्तरायम्।

अर्थ: लाभ के विघ्न का कारण लाभान्तराय है।


१६१. भोगान्तरायस्य लक्षणम्
भुक्त्वा परिहातव्यो भोगस्तस्य विघ्नहेतुर्भोगान्तरायम्।

अर्थ: जो एक बार भोगकर छोड़ दिया जाता है, उसे भोग कहते हैं। भोगों के अन्तराय का कारण भोगान्तराय है।


१६२. उपभोगान्तरायस्य लक्षणम्
भुक्त्वा पुनश्च भोक्तव्य उपभोगस्तस्य विघ्नहेतुरुपभोगान्तरायम्।

अर्थ: एक बार भोगकर पुन: भोगने योग्य उपभोग कहलाता है, उसके विघ्न का कारण उपभोगान्तराय है।


१६३. वीर्यान्तरायस्य लक्षणम्
वीर्यं शक्ति: सामर्थ्यं तस्य विघ्नहेतुर्वीर्यान्तरायम्।

अर्थ: शक्ति या सामर्थ्य वीर्य है, उसके विघ्न का कारण वीर्यान्तराय है।


१६४. उत्तरप्रकृतिबन्धस्य समाप्तिः
एवमुत्तरप्रकृतिबन्धः कथितः।

अर्थ: इस प्रकार उत्तर प्रकृति-बन्ध कहा।


१६५. उत्तरोत्तरप्रकृतिबन्धस्यागोचरत्वम्
उत्तरोत्तरप्रकृतिबन्धोऽगोचरो भवति।

अर्थ: उत्तरोत्तर प्रकृति-बन्ध अगोचर है।


स्थितिबन्धः


१६६. स्थितिबन्धकथनम्
अथ स्थितिबन्ध उच्यते।

अर्थ: अब स्थिति बन्ध कहते हैं।


१६७. स्थितिबन्धस्य लक्षणम्
ज्ञानावरणीयादिप्रकृतीनां ज्ञानप्रच्छादनादिस्वस्वभावापरित्यगेनावस्थानं स्थितिः।

अर्थ: ज्ञानावरणीय आदि प्रकृतियों का ज्ञान को ढँकने आदि रूप अपने स्वभाव को न छोड़ते हुए स्थित रहना स्थिति है।


१६८. स्थितिबन्धस्य समयः
तत्कालश्चोपचारात्।

अर्थ: उसके काल को उपचार से स्थितिबन्ध कहा जाता है।


१६९. ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयवेदनीयान्तरायस्य चोत्कृष्टा स्थितिः
तद्यथा ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयवेदनीयान्तरायप्रकृतीनामुत्कृष्टा स्थितिस्त्रिंशत्कोटिकोटि-
सागरोपमप्रमिता।

अर्थ: ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय तथा अन्तराय की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटि-कोटि सागर प्रमाण है।


१७०. दर्शनमोहनीयस्योत्कृष्टा स्थितिः
दर्शनमोहनीयस्य सप्ततिः कोटिकोटिसागरोपमप्रमाणा।

अर्थ: दर्शनमोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटि-कोटि सागर प्रमाण है।


१७१. चारित्रमोहनीयस्योत्कृष्टा स्थितिः
चारित्रमोहनीयस्य चत्वारिंशत्कोटिकोटिसागरोपमप्रमिता।

अर्थ: चारित्रमोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति चालीस कोटि-कोटि सागर प्रमाण है।


१७२. नामगोत्रयोरुत्कृष्ट। स्थितिः
नामगोत्रयोर्विंशतिकोटिकोटिसागरोपमप्रमात्री।

अर्थ: नाम और गोत्र की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोटिकोटि सागर प्रमाण है।


१७३. आयुकर्मणः उत्कृष्ट। स्थितिः
आयुष्यकर्मणस्त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमप्रमाणा। इत्युत्कृष्टस्थितिरुक्ता।

अर्थ: आयुकर्म की उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागर प्रमाण है। इस प्रकार उत्कृष्ट स्थिति कही।


१७४. वेदनीयस्य जघन्यस्थितिः
वेदनीयस्य जघन्यस्थितिर्द्वादशमुहूर्ता।

अर्थ: वेदनीयकर्म की जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त है।


१७५. नामगोत्रयोः जघन्यस्थितिः
नामगोत्रयोरष्टौ मुहूर्ता।

अर्थ: नाम और गोत्र की जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त है।


१७६. शेषाणां जघन्यस्थितिः
शेषाणां ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयमोहनीयायुष्यान्तरायाणां जघन्य-स्थितिरन्तर्मुहूर्ता।

अर्थ: शेष ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, आयु तथा अन्तराय की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है।


१७७. सर्वेषां कर्मणां स्थितिः
सर्वेषां कर्मणां स्थितिर्नानाविकल्पा।

अर्थ: सभी कर्मों की स्थिति नाना प्रकार की है।


१७८. स्थितिबन्धकथनस्य उपसंहारः
इति स्थितिरुक्ता।

अर्थ: इस प्रकार स्थितिबन्ध कहा।


अनुभागबन्धः


१७९. अनुभागबन्धकथनस्य प्रतिज्ञा
अथानुभाग उच्यते।

अर्थ: अब अनुभाग बन्ध कहते हैं।


१८०. अनुभागबन्धस्य लक्षणम्
कर्मप्रकृतीनां तीव्रमन्दमध्यमशक्तिविशेषोऽनुभागः।

अर्थ: कर्मप्रकृतियों की तीव्र, मन्द, मध्यम शक्ति विशेष को अनुभाग कहा है।


१८१. घातिकर्मणामनुभागः
घातिकर्मणामनुभागो लतादार्वस्थिशैलसमानचतुःस्थानः।

अर्थ: घाति कर्मों का अनुभाग लता, दारू (काष्ठ), अस्थि तथा शिला के समान चार प्रकार है।


१८२. अघातिकर्मणामनुभागः
अघातिकर्मणामशुभप्रकृतीनामनुभागो निम्बकाञ्जीरविषहालाहल-सदृशचतुःस्थानः, शुभप्रकृती-
नामनुभागो गुडखण्डशर्करामृतसमानचतुःस्थानः।

अर्थ: अघाति कर्मों की अशुभ प्रकृतियों का अनुभाग नीम, कांजीर, विष और हालाहल के समान चार प्रकार का तथा शुभ प्रकृतियों का अनुभाग गुड़, खाण्ड, शर्करा तथा अमृत के समान चार प्रकार का है।


१८३. अनुभागबन्धकथनस्योपसंहारः
इत्यनुभाग उक्तः।

अर्थ: इस प्रकार अनुभाग बन्ध कहा।


प्रदेशबन्धः


१८४. प्रदेशबन्धकथनस्य प्रतिज्ञा
अथ प्रदेश उच्यते।

अर्थ: आगे प्रदेशबन्ध कहते हैं।


१८५. प्रदेशबन्धस्य लक्षणम्
आत्मप्रदेशेषुद्व्यर्थर्धगुणहानिगुणितसमयप्रबद्धमात्राणि सिद्धराश्यनन्तैकभागप्रमितानामभव्य-
जीवस्यानन्तगुणानां सर्वकर्मपरमाणूनां परस्परप्रदेशानुपवेशलक्षणः प्रदेशबन्धः।

अर्थ: आत्मा के प्रदेशों में डेढ़ गुणहानि गुणित समयप्रबद्ध मात्र की सत्ता रहती है तथा प्रति समय सिद्धराशि के अनन्तवें भाग प्रमाण या अभव्य जीवों के अनन्तगुणे समस्त कर्म परमाणुओं का परस्पर प्रदेशों में अनुप्रवेश होना प्रदेशबन्ध है।


१८६. प्रदेशबन्धस्योपसंहारः
इति प्रदेशबन्ध उक्तः।

अर्थ: इस प्रकार प्रदेशबन्ध कहा।


१८७. द्रव्यकर्मणामुपसंहारः
एवं प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशविकल्पानि पौद्गलकानि द्रव्यकर्माणि कथितानि।

अर्थ: इस प्रकार प्रकृति, स्थिति, अनुभाग तथा प्रदेश के भेद से पौद्गलिक द्रव्य कर्म कहे।


भावकर्म


१८८. भावकर्मणः लक्षणम्
उक्तज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मोदयजनिता आत्मनोऽज्ञानरागमिथ्यादर्शनादिपरिणामविशेषा भावकर्माणि।

अर्थ: उक्त ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मों के उदय से होने वाले आत्मा के अज्ञान, राग, मिथ्यादर्शन आदि परिणामविशेष भाव कर्म हैं।


१८९. भावकर्मणां परिमाणम्
तान्यप्यसंख्यातलोकमात्राणि भवन्ति।

अर्थ: वे भाव कर्म असंख्यात लोक प्रमाण हैं।


नोकर्म


१९०. नोकर्मणः लक्षणम्
औदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसशरीरपरिणमनपुद्गलस्कन्धा नोकर्मद्रव्याणि।

अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक, आहारक तथा तैजस शरीर के रूप में परिणत पुद्गल स्कन्ध नोकर्म द्रव्य हैं।


१९१. संसारिजीवस्य लक्षणम्
एवंविधद्रव्यभावनोकर्मसंयुक्ताः पञ्चविधसंसरणपरिणताश्चतसृषु गतिषु परिवर्तमान-
जीवास्संसारिणः।

अर्थ: इस प्रकार द्रव्य कर्म, भाव कर्म तथा नोकर्म से युक्त, पाँच प्रकार के परिवर्तनों में परिणत तथा चार गतियों में भ्रमण करते हुए जीव संसारी हैं।


१९२. मुक्तजीवस्य लक्षणम्
तत्कर्मत्रयमुक्तास्सिद्धगताववस्थिताः क्षायिकसम्यक्त्वज्ञानदर्शनवीर्य-सूक्ष्मत्वावगाहनागुरु-
लघुत्वाव्याबाधरूपाष्टगुणपरिणताः सिद्धपरमेष्ठिनो जीवा मुक्ताः।

अर्थ: उक्त तीन प्रकार के कर्मों से मुक्त, सिद्ध गति में स्थित, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरुलघुत्व तथा अव्याबाधत्वरूप अष्ट गुण परिणत सिद्ध परमेष्ठी मुक्त जीव है।


१९३. संसारिजीवानां द्वौ भेदौ
तत्र संसारिणो जीवा भव्याभव्यभेदेन द्विधा।

अर्थ: संसारी जीव भव्य और अभव्य के भेद से दो प्रकार के हैं।


१९४. भव्यजीवस्य लक्षणम्
तत्र रत्नत्रयसामग्र्याः सकलकर्मक्षयं कृत्वानन्तज्ञानादिस्वरूपोपलब्धि-भवनयोग्यशक्ति-विशेषसहिता
भव्याः।

अर्थ: रत्नत्रय रूप सामग्री के द्वारा समस्त कर्मक्षय करके अनन्त-ज्ञान आदि स्वरूप प्राप्ति होने योग्य शक्ति विशेष से सहित जीव भव्य जीव कहलाते हैं।


१९५. भव्यजीवानां चतुर्दशगुणस्थानानि
तत्र चतुर्दशगुणस्थानवर्तिनो भव्याः।

अर्थ: १९५. भव्य जीवों के चौदह गुणस्थान चौदह गुणस्थानों में स्थित भव्य होते हैं।


१९६. अभव्यजीवस्य लक्षणम्
एकस्मान्मिथ्यादृष्टिगुणस्थानादनिवर्तमाना अभव्याः।

अर्थ: १९६. अभव्य जीव का लक्षण केवल एक मिथ्यात्व गुणस्थान में ही रहने वाले अभव्य जीव होते हैं।


१९७. अभव्यानां करणत्रयाभावः
तेषां कदाचिदपि सम्यग्दर्शनप्राप्तिकारणकरणत्रयविधानासम्भवात्।

अर्थ: १९७. अभव्यों के करणत्रय का अभाव उनके कभी भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के कारण करणत्रय होना असंभव है।


१९८. मिथ्यात्वगुणस्थानम्
तत्र दर्शनमोहनीयस्य मिथ्यात्वप्रकृतेरुदयादतत्त्वश्रद्धानरूपमिथ्यादर्शनपरिणतस्सर्वज्ञवीतराग-प्रणीतं
जीवादितत्त्वमश्रद्दधानस्संशयानो वान्यप्रणीतमतत्त्वं श्रद्दधानो वा जीवो मिथ्यादृष्टिरिति प्रथमगुणस्थान-
वर्ती भवति।

अर्थ: १९८. मिथ्यात्व गुणस्थान दर्शनमोहनीय की मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से अतत्त्वश्रद्धान रूप मिथ्यादर्शन से युक्त, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत जीव आदि तत्त्वों का अश्रद्धान करने वाला अथवा संशय करने वाला या अन्य प्रणीत अतत्त्वों का श्रद्धान करने वाला जीव मिथ्यादृष्टि नामक प्रथम गुणस्थानवर्ती होता है।


१९९. मिथ्यादृष्टेः सम्यक्त्वस्य विधानम्
अनादिमिथ्यादृष्टिर्वा सादिमिथ्यादृष्टिर्वा लब्धिपञ्चकसंनिधाने प्रथमोपशमसम्यक्त्वं गृह्णाति।

अर्थ: १९९. मिथ्यादृष्टि के सम्यक्त्व का विधान अनादि मिथ्यादृष्टि अथवा सादि मिथ्यादृष्टि पाँच लब्धियों के सद्भाव में प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करता है।


२००. क्षयोपशमलब्धिः
तद्यथा कदाचित्कस्यचिज्जीवस्याशुभकर्मणामनुभागः प्रतिसमयमनन्त-गुणहान्युदेति, इति तेषां
सर्वघातिस्पर्धकानामन्तगुणहानिं विधाय तद्द्रव्यस्य सदवस्था उपशमः, अनन्तहीनानुभागोदये
सत्यपि क्षयोपशम इत्युच्यते। तस्य लब्धिः क्षयोपशमलब्धिः।

अर्थ: कभी किसी जीव के अशुभ कर्मों का अनुभाग प्रतिसमय अनन्त गुण हानि क्रम से उदित होता है। इस प्रकार उन सर्वघाति स्पर्धकों की अनन्त गुणहानि करके उस द्रव्य का सदवस्था रूप उपशम अनन्त हीन अनुभाग के उदय होने पर भी क्षयोपशम कहलाता है। उसकी लब्धि क्षयोपशमलब्धि है।


२०१. विशुद्धिलब्धिः
क्षयोपशमलब्धौ सत्यामुत्पन्नसातादिप्रशस्तप्रकृतिबन्धकारणं जीवस्य यो विशुद्धि-परिणामस्तल्लाभो
विशुद्धिलब्धिः।

अर्थ: सातादि प्रशस्त प्रकृतियों के बन्ध का कारण जीव का जो विशुद्धि परिणाम क्षयोपशम लब्धि के होने पर उत्पन्न होता है उसका लाभ विशुद्धिलब्धि है।


२०२. देशनालब्धिः
षड्द्रव्यपञ्चास्तिकायसप्ततत्त्वनवपदार्थानामुपदेशकारकाचार्योपाध्याय-देशनालाभः उपदेशक-
रहितक्षेत्रे पूर्वोपदिष्टजीवादितत्त्वधारणस्मरणलाभो वा देशनालब्धिः।

अर्थ: छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय, सात तत्त्व तथा नव पदार्थों के उपदेश करने वाले आचार्य, उपाध्याय की देशना का लाभ अथवा उपदेशक रहित क्षेत्र में पूर्व उपदिष्ट जीव आदि तत्त्वों के धारण, स्मरण का लाभ देशनालब्धि है।


२०३. प्रायोग्यतालब्धिः
आयुर्वर्जितसप्तकर्मणामुत्कृष्टस्थितिं विशुद्धिपरिणामविशेषेण खण्डयित्वान्तःकोटिकोटिस्थितिं
स्थापयति लतादार्वस्थिशैलरूपघातिकर्मानुभागं खण्डयित्वा लतादारुरूपद्विस्थानं स्थापयति
तद्विशुद्धि-परिणामयोग्यतालाभः प्रायोग्यलब्धिः।

अर्थ: आयु को छोड़कर शेष सात कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति को विशुद्धि परिणामविशेष द्वारा खण्डित करके अन्तःकोटिकोटि प्रमाण स्थिति में स्थापित करना तथा लता, दारू (काष्ठ), अस्थि, शैलरूप घाति कर्मों के अनुभाग को खण्डित करके लता, दारूरूप दो स्थानों में स्थापित करना है। इस प्रकार की विशुद्धिरूप परिणामों की योग्यता का लाभ प्रायोग्यलब्धि है।


२०४. करणलब्धिः
दर्शनमोहोपशमादिकरणविशुद्धपरिणामः करण इत्युच्यते। तल्लाभः करणलब्धि।

अर्थ: दर्शनमोह के उपशम आदि करने वाला विशुद्धि परिणाम करण कहलाता है, उसका लाभ करणलब्धि है।


२०५. करणस्य त्रयो भेदाः
स च करणोऽधःप्रवृत्तकरणोऽपूर्वकरणोऽनिवृत्तिकरणश्चेति त्रिधा।

अर्थ: वह करण अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण तथा अनिवृत्तिकरण के भेद से तीन प्रकार का है।


२०६. अधःप्रवृत्तकरणस्य कालः
तत्राधःप्रवृत्तकरणकालोऽन्तर्मुहूर्तमात्रः।

अर्थ: अधःप्रवृत्तकरण का काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है।


२०७. अपूर्वकरणस्य कालः
ततः संख्येयगुणहीनोऽपूर्वकरणकालः।

अर्थ: उससे संख्यात गुणहीन अपूर्वकरण का काल है।


२०८. अनिवृत्तिकरणस्य कालः
ततः संख्येयगुणहीनोऽनिवृत्तिकरणकालः।

अर्थ: उससे संख्यात गुणहीन अनिवृत्तिकरण का काल है।


२०९. त्रयाणां करणानां कालः
त्रितयं समुदितमप्यन्तर्मुहूर्तकाल एव।

अर्थ: तीनों करणों का सम्मिलित काल भी अन्तर्मुहूर्त ही है।


२१०. करणत्रयेषु विशुद्धिः
अधःप्रवृत्तकरणप्रथमसमयादारभ्य विशुद्धिः प्रतिसमयमनन्तगुणा अप्यनिवृत्तिकरणचरमसमयं वर्तन्ते।

अर्थ: अधःप्रवृत्तकरण के प्रथम समय से आरम्भ करके विशुद्धि प्रतिसमय अनन्तगुणी होकर भी अनिवृत्तिकरण के चरम समय तक रहती है।


२११. अधःप्रवृत्तकरणकाले विशुद्धिपरिणामः
तत्राधःप्रवृत्तकरणकाले संख्यातलोकमात्रविशुद्धिपरिणामविकल्पा जघन्यमध्यमोत्कृष्टाः सन्ति।

अर्थ: अधःप्रवृत्तकरण के समय में असंख्यात लोकमात्र विशुद्धि परिणाम विकल्प जघन्य, मध्यम तथा उत्कृष्ट होते हैं।


२१२. अधःप्रवृत्तकरणस्याङ्कसंदृष्टिः
तत्राङ्कसंदृष्ट्याधःप्रवृत्तकरणलक्षणमुच्यते-प्रथमसमयनानाजीवानां विशुद्धिपरिणामविकल्पानां
जघन्यखण्डमिदम् ३९। अस्माद्द्वितीयं खण्डं विशेषाधिकम् ४०। तृतीयं विशेषाधिकं ४१। एवं
चरमचतुर्थखण्डं विशेषाधिकं ४२। द्वितीयसमये जघन्यखण्डं प्रथमसमयजघन्यखण्डाद्विशेषाधिकम्
४०। ततो द्वितीयखण्डं विशेषाधिकं ४१। ततस्तृतीयखण्डं विशेषाधिकं ४२। एवं चरमखण्डं
विशेषाधिकं ४३। एवं तृतीयादिसमयेषु जघन्यादिखण्डानि विशेषाधिकानि भवन्ति। ये
केषांचिज्जीवानामुपरिम-समयपरिणमनवर्तिनां विशुद्धिपरिणामविकल्पा अधःस्तनसमयवर्तिनां
केषांचिज्जीवानां विशुद्धिपरिणाम-विकल्पैस्सह सदृशास्सन्तीत्यधःप्रवृत्तकरणसंज्ञा युक्ता। तत्र
प्रथमसमयजघन्यखण्डं चरमसमयचरमखण्डं च केनापि जघन्योत्कृष्टेन सदृशं न भवति, तथापि
तद्द्वयं विहायेतरेषां सर्वेषां खण्डानामुपर्यधश्च सादृश्यमस्तीति, तेनाधःप्रवृत्तकरणसंज्ञा न विरुध्यते।
अस्मिन्नधःप्रवृत्तकरणे प्रशस्तप्रकृतीनामनुभागः प्रतिसमयेऽनन्तगुणं वर्धते, अप्रशस्तप्रकृतीनामनुभागः
प्रतिसमयमनन्तगुणहीनो भवति, संख्यात-सहस्रस्थितिबन्धापसरणानि भवन्ति, प्रतिसमयमनन्त-
गुणवृद्धया विशुद्धिश्च वर्तते, इत्येतानि चत्वार्यावश्यकानि सन्ति। पुनर्गुणश्रेणि-निर्जरागुण-
संक्रमस्थितिकाण्डकघातानुभागकाण्डकघाताश्चेति चत्वार्यावश्यकानि न सन्ति, तत्कारण-
विशुद्धिविशेषाभावात्।

अर्थ: अंकसंदृष्टि की अपेक्षा अधःप्रवृत्तकरण का लक्षण कहते हैं-प्रथम समय में नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम विकल्पों का जघन्य खण्ड ३९ है। इससे द्वितीय खण्ड विशेष अधिक है ४०। इससे तीसरा विशेष अधिक है ४१। इसी प्रकार अन्तिम चौथा खण्ड भी विशेष अधिक है ४२। द्वितीय समय में जघन्य खण्ड प्रथम समय के जघन्य खण्ड से विशेष अधिक है ४०। उससे द्वितीय खण्ड विशेष अधिक है ४१। उससे तृतीय खण्ड विशेष अधिक है ४२। इसी प्रकार अन्तिम चौथा खण्ड विशेष है ४३। इस प्रकार तृतीय आदि समयों में तथा अन्तिम समय में जघन्य आदि खण्ड विशेष अधिक होते हैं। जो किन्हीं जीवों के ऊपर के समय में परिणमन करने वाले विशुद्धि परिणाम विकल्प निम्न समयवर्ती किन्हीं जीवों के विशुद्धि परिणाम विकल्पों के साथ समान होते हैं। इसलिए इसकी अधःप्रवृत्तकरण संज्ञा उचित है। यद्यपि प्रथम समय का जघन्य खण्ड तथा अन्तिम समय का अन्तिम खण्ड किसी भी जघन्य या उत्कृष्ट खण्ड के सदृश नहीं होता, फिर भी उन दोनों को छोड़कर अन्य सभी खण्डों का ऊपर तथा नीचे सादृश्य है, इसलिए अधःप्रवृत्तकरण कहने में विरोध नहीं आता। इस अधःप्रवृत्तकरण में प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग प्रति समय अनन्तगुणा बढ़ता है तथा अप्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग प्रति समय अनन्तगुणा हीन होता है। संख्यात सहस्र स्थितिबन्धापसरण होते हैं तथा प्रति समय अनन्तगुणी वृद्धि के हिसाब से विशुद्धि होती है-ये चार आवश्यक होते हैं, किन्तु गुणश्रेणी निर्जरा, गुणसंक्रम, स्थितिकाण्डकघात तथा अनुभागकाण्डकघात, ये चार आवश्यक नहीं होते हैं; क्योंकि इनके कारण विशुद्धि-विशेषरूप परिणामों का अभाव है।


२१३. अपूर्वकरणम्


ततः परमपूर्वकरणप्रथमसमये गुणश्रेणिनिर्जरागुणसंक्रमस्थितिकाण्ड-कघाताश्च प्रारभ्यन्ते। अत्रापि
जघन्यमध्यमोत्कृष्टा विशुद्धिपरिणामाधःप्रवृत्तपरिणेभ्यो संख्यातलोकगुणिताः सन्ति। तत्र
प्रथमसमयवर्तिनानाजीवविशुद्धिपरिणामा असंख्यातलोकमाता अङ्कसंदृष्ट्या ४५६। एतेऽप्येकेनैव
खण्डं बहुखण्डानीव सन्ति। उपरितनसमयपरिणामैस्सादृश्याभावात्।
द्वितीयसमयपरिणामा विशेषाधिकाः ४७२। एतेऽप्येकमेव खण्डम्। उपर्यधोऽधत्व-
सादृश्याभावाद्बहुखण्डाभावः। एवं तृतीयादिसमयेष्वा-चरमसमयं विशुद्धिपरिणामा एकैकखण्डं
कृताः विशेषाधिकाः सन्ति। अत एव कारणात्पूर्वपूर्वसमयोऽप्रवृत्ता एव विशुद्धिपरिणामा उत्तरसमये
भवन्तीत्यपूर्वकरणसंज्ञा युक्ता। तस्याङ्कसंदृष्टिः -

अर्थ: इसके बाद अपूर्वकरण के प्रथम समय में गुणश्रेणि निर्जरा, गुणसंक्रम, स्थितिकाण्डघात तथा अनुभागकाण्डकघात प्रारम्भ होते हैं। यहाँ भी जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट विशुद्धि परिणाम अधःप्रवृत्तकरण के परिणामों से असंख्यात लोक गुणे होते हैं। यहाँ प्रथम समयवर्ती नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम असंख्यात लोकप्रमाण होते हैं। उनकी अंक संदृष्टि ४५६ है। ये सभी एक ही खण्ड से बहुत खण्डों की तरह होते हैं, क्योंकि ऊपर के समयवर्ती परिणामों के साथ सादृश्य का अभाव है। द्वितीय समयवर्ती परिणाम विशेष अधिक होते हैं ४७२। ये भी एक ही खण्ड है। ऊपर और नीचे अधत्व के सादृश्य का अभाव होने से बहुत खण्ड नहीं होते। इसी प्रकार तृतीय आदि समयों में चरम समय पर्यन्त विशुद्धि परिणाम एक-एक खण्ड करके ही विशेष अधिक होते हैं। इसी कारण से पूर्व-पूर्व समय में नहीं हुए अप्रवृत्त ही विशुद्धि परिणाम उत्तर समय में होते हैं, इसलिए अपूर्वकरण कहना उचित है। इसकी अंक संदृष्टि ऊपर दी है।


२१४. अनिवृत्तिकरणम्


ततः परमनिवृत्तिकरणप्रथमसमये नानाजीवानां विशुद्धिपरिणामोऽपूर्वकरणे चरमसमय-
सर्वोत्कृष्टविशुद्धिपरिणामादनन्तगुणविशुद्धिर्जघन्यमध्यमोत्कृष्टविकल्पा-भावादेकादृश एव ।
द्वितीयसमयेऽपि प्रथमसमयविशुद्धेरनन्तगुणविशुद्धिर्नानाजीवा-नामेकादृश एव विशुद्धिपरिणामो
भवति। एवं तृतीयादिसमयेष्वनिवृत्तिकरणचरमसमयं प्रतिसमयमनन्तगुणवृद्धया विशुद्ध्या
वर्धमानोऽपि नानाजीवानां विशुद्धिपरिणामो जघन्यमध्यमोत्कृष्टविकल्परहित एकादृश एव भवति।
अत एव कारणात्रिवृत्तिभेदो जघन्यमध्यमोत्कृष्टविकल्पपरिणामस्य नास्तीत्यनिवृत्तिकरणसंज्ञा युक्ता।

अर्थ: इसके बाद अनिवृत्तिकरण के प्रथम समय में नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम अपूर्वकरण में चरम समय सर्वोत्कृष्ट विशुद्धि परिणामों से अनन्तगुणे विशुद्ध जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट विकल्पों के न होने के कारण एक सदृश ही होते हैं। द्वितीय समय में भी प्रथम समय की विशुद्धि से अनन्तगुणी विशुद्धियुक्त नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम एक सदृश ही होते हैं। इसी प्रकार तृतीय आदि समयों में अनिवृत्तिकरण के चरम समय पर्यन्त प्रति समय अनन्तगुणी वृद्धि युक्त विशुद्धि से बढ़ने वाले भी नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट विकल्प रहित एक सदृश ही होते हैं। इसी कारण से जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट परिणामों में निवृत्तिभेद नहीं है, इसलिए अनिवृत्तिकरण कहना उचित है।


२१३. अपूर्वकरण / २१४. अनिवृत्तिकरण


२१५. अनिवृत्तिकरणस्य विशेषः
तस्यानिवृत्तिकरणस्य चरमसमये भव्यश्चातुर्गतिको मिथ्यादृष्टिः संज्ञी पंचेन्द्रियपर्याप्तो गर्भजो
विशुद्धिवर्धमानः शुभलेश्यो जाग्रदवस्थितो ज्ञानोपयोगवान् अनन्तानुबन्धिक्रोधमानमाया-
लोभान्मिथ्यात्व-सम्यग्मिथ्यात्वसम्यक्त्वप्रकृतिंश्चोपशमय्य प्रथमोपशमसम्यक्त्वं गृह्णाति। तस्य
कालो जघन्योत्कृष्टेनान्तर्मुहूर्तः।

अर्थ: उन अनिवृत्तिकरण के चरम समय में भव्य चारों गतियों में से किसी भी गति में वर्तमान मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, पंचेन्द्रिय, पर्याप्तक, गर्भज, जिसकी विशुद्धि बढ़ रही है, शुभ लेश्या वाला, जागृत, ज्ञानोपयोगवान्, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व तथा सम्यक्प्रकृति का उपशम करके प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करता है। उसका जघन्य तथा उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है।


२१६. सासादननाम द्वितीयगुणस्थानम्
तत्रैकसमयादारभ्य षडावलिसमयपर्यन्ते कालेऽवशिष्टे सति अनन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभानां
मध्येऽन्यतमस्य कषायस्योदये सति जीवः सम्यक्त्वं विराध्य यावन्मिथ्यात्वं प्राप्नोति तावत्सासादन-
सम्यग्दृष्टिर्द्वितीयगुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: उसमें से एक समय से लेकर षडावलि समय पर्यन्त काल शेष रहने पर अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया तथा लोभ में से किसी एक कषाय के उदय होने पर जीव सम्यक्त्व की विराधना करके जब तक मिथ्यात्व को प्राप्त होता है, तब तक सासादन सम्यग्दृष्टि नामक द्वितीय गुणस्थानवर्ती होता है।


२१७. सासादनगुणस्थानस्य कालः
तस्य कालो जघन्य एकसमय उत्कृष्टः षडावलिमात्रस्ततः परं नियमेन मिथ्यात्वप्रकृते-
रुदयान्मिथ्यादृष्टिर्भवति।

अर्थ: उसका जघन्य काल एक समय तथा उत्कृष्ट षडावलि मात्र है। उसके बाद नियम से मिथ्यात्व प्रकृति का उदय होने के कारण मिथ्यादृष्टि हो जाता है।


२१८. सम्यग्मिथ्यादृष्टिनाम तृतीयगुणस्थानम्
सम्यङ्मिथ्यात्वप्रकृतेर्हदुद्दिष्टसन्मार्गे मिथ्यात्वादिकल्पितदुर्मार्गे च श्रद्धावान् जीवः सम्यग्मिथ्या-
दृष्टिरिति तृतीयगुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से अर्हन्त द्वारा उपदिष्ट सन्मार्ग में तथा मिथ्यात्व आदि कल्पित दुर्मार्ग में श्रद्धान करने वाला जीव सम्यग्मिथ्यादृष्टि नामक तृतीय गुणस्थानवर्ती होता है।


२१९. तृतीयगुणस्थानस्य स्थितिः
तद्गुणस्थाने उत्तरगत्यायुर्बन्धो मरणं मारणान्तिकसमुद्घाताणुव्रतमहाव्रतग्रहणं च नास्ति। यदा
म्रियते तदा सम्यक्त्वं मिथ्यात्वं वा प्रतिपद्य म्रियते सम्यग्मिथ्यात्वे न म्रियते। सम्यग्मिथ्यात्व-
परिणामात्पूर्वस्मिन्सभ्यक्त्वे वा मिथ्यात्वे वा परभवायुर्बन्धे तदेवासंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थानं वा
मिथ्यादृष्टिगुणस्थानं वा प्राप्य म्रियत इत्यर्थः।

अर्थ: २१९. तृतीय गुणस्थान की स्थिति इस गुणस्थान में आगे की गति के लिए आयु बन्ध, मरण, मारणान्तिक समुद्घात तथा अणुव्रत या महाव्रत का ग्रहण नहीं होता। जब मरता है तो सम्यक्त्व अथवा मिथ्यात्व को प्राप्त करके मरता है। सम्यग्मिथ्यात्व में नहीं मरता अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व परिणाम से पहले सम्यक्त्व अथवा मिथ्यात्व में परभव की आयु का बन्ध होने पर उसी असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान अथवा मिथ्यादृष्टि गुणस्थान को प्राप्त करके मरता है।


२२०. असंयतसम्यग्दृष्टिनाम चतुर्थगुणस्थानम्
औपशमिकसम्यक्त्वे वा क्षायिकसम्यक्त्वे वा वेदकसम्यक्त्वे वा वर्तमानो जीवोऽप्रत्याख्याना-
वरणक्रोधमानमायालोभकषायोदयाद्द्वादशविधेऽसंयमे प्रवृत्तोऽसंयतसम्यग्दृष्टिरिति चतुर्थ-
गुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: २२०. असंयत सम्यग्दृष्टि नामक चौथा गुणस्थान औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायिकसम्यक्त्व अथवा वेदकसम्यक्त्व में वर्तमान जीव अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया तथा लोभ कषाय के उदय के कारण बारह प्रकार के असंयम में प्रवृत्त रहने से असंयत सम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ गुणस्थानवर्ती होता है।


२२१. देशसंयमो नाम पञ्चमगुणस्थानम्
द्वितीयकषायोदयाभावे जीवोऽणुगुणशिक्षाव्रतरूप एकादशनिलयविशिष्टे देशसंयमे वर्तमानः श्रावक
इति पञ्चमगुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: २२१. देशसंयम नामक पाँचवाँ गुणस्थान द्वितीय अर्थात् अप्रत्याख्यानावरण कषायों के अभाव में जीव अणुव्रत, गुणव्रत तथा शिक्षाव्रत रूप ग्यारह स्थान विशिष्ट देशसंयम में वर्तमान श्रावक पंचम गुणस्थानवर्ती होता है।


२२२. प्रमत्तसंयतनाम षष्ठगुणस्थानम्
प्रत्याख्यानावरणकषायोदयाभावे महाव्रतरूपं सकलसंयमं प्रतिपद्य संज्वलननोकषाय-
मध्यमानुभागोदयात्पञ्चदशसु प्रमादेषु वर्तमानो जीवः प्रमत्तसंयत इति षष्ठगुणस्थानवर्ती भवति ।

अर्थ: २२२. प्रमत्तसंयत नामक छठा गुणस्थान प्रत्याख्यानावरण कषायों के उदय के अभाव में महाव्रत रूप सकल संयम को प्राप्त करके संज्वलन नोकषाय के मध्यम अनुभाग के उदय के कारण पन्द्रह प्रमादों में वर्तमान जीव प्रमत्त संयत नामक छठे गुणस्थानवर्ती होता है।


२२३. अप्रमत्तसंयतनाम सप्तमगुणस्थानम्
संज्वलनक्रोधमानमायालोभकषायमन्दानुभागोदयात्सकलहिंसादिनिवृत्तिरूपसंयमे प्रमादरहिते
वर्तमानो जीवोऽप्रमत्तसंयत इति सप्तमगुणस्थानवर्ती भवति ।

अर्थ: २२३. अप्रमत्तसंयत नामक सातवाँ गुणस्थान संज्वलन क्रोध, मान, माया तथा लोभ कषाय के मन्द अनुभाग के उदय से सकल हिंसा आदि निवृत्तिरूप प्रमाद रहित संयम में वर्तमान जीव अप्रमत्तसंयत नामक सप्तम गुणस्थानवर्ती होता है।


२२४. सातिशयाप्रमत्तस्य लक्षणम्
स एव यदा क्षपकोपशमश्रेण्यारोहणं प्रत्यभिमुखो भवति तदा करणत्रयमध्येऽधःप्रवृत्तकरणं
करोतीति स एव सातिशयाप्रमत्त इत्युच्यते ।

अर्थ: २२४. सातिशय अप्रमत्तसंयत का लक्षण वही जब क्षपक या उपशम श्रेणी चढ़ने के अभिमुख होता है, तब तीन कारणों में से अधःप्रवृत्तकरण करता है, इसलिए वही सातिशय अप्रमत्त कहलाता है।

श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः (भाग 2/2)

२२५. अपूर्वकरणो नामाष्टमगुणस्थानम्
पुनः क्षपकश्रेणिमुपशमकश्रेणिं वा समारुह्य प्रतिसमयमनन्तगुणविशुद्ध्या वर्धमानो गुणश्रेणि-
निर्जराद्यावश्यकानि कुर्वन्नुत्तरोत्तरसमयेषु पूर्वपूर्वसमयाप्राप्तानपूर्वानेव विशुद्धिपरिणामान् प्रतिपद्यमानो
जीवः क्षपक उपशमको वापूर्वकरणसंयत इत्यष्टमगुणस्थानवर्ती भवति ।

अर्थ: २२५. अपूर्वकरण नामक आठवाँ गुणस्थान फिर क्षपकश्रेणी अथवा उपशम श्रेणी का आरोहण करके प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धि द्वारा बढ़ता हुआ गुणश्रेणी निर्जरा आदि आवश्यकों को करता हुआ उत्तरोत्तर समय में पूर्व-पूर्व समय में अप्राप्त अपूर्व ही विशुद्धि परिणामों को प्राप्त करके क्षपक अथवा उपशमक जीव अपूर्वकरण संयत नामक अष्टम गुणस्थानवर्ती होता है।


२२६. अनिवृत्तिकरणनाम नवमगुणस्थानम्
पुनरेकविंशतिचारित्रमोहनीयप्रकृतीः क्षपयन्नुपशमयंश्च प्रतिसमयं जघन्यमध्यमोत्कृष्टविकल्प-
रहितनानाजीवानामेकं सदृशविशुद्धिपरिणामस्थानं प्रतिपद्यमानश्चानिवृत्तिकरणसंयत इति
नवमगुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: २२६. अनिवृत्तिकरण नामक नवम गुणस्थान इसके बाद चारित्रमोहनीय की इक्कीस प्रकृतियों का क्षय या उपशम करता हुआ प्रति समय जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट विकल्प रहित नाना जीवों के एक सदृश विशुद्धि परिणाम स्थान को प्राप्त कर अनिवृत्तिकरण संयत नामक नवम गुणस्थानवर्ती होता है।


२२७. सूक्ष्मसांपरायनाम दशमगुणस्थानम्


पुनः सूक्ष्मत्व(कृ)ष्टिगतलोभानुभागोदयमनुभवन् चारित्रमोहनीयप्रकृतीः क्षयोपशमयन्प्रति-
समयमनन्तगुणविशुद्ध्या वर्तमानः प्रशस्तध्यानपरिणतः सूक्ष्मसाम्पराय्येति दशमगुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: फिर सूक्ष्म कृष्टिगत लोभ के अनुभाग के उदय का अनुभव करता हुआ चारित्र मोहनीय की प्रकृतियों का क्षय या उपशम करता हुआ, प्रति समय अनन्तगुणी विशुद्धि में वर्तमान, प्रशस्त ध्यान परिणत, सूक्ष्मसांपराय नामक दशम गुणस्थानवर्ती होता है।


२२८. उपशान्तकषायनाम एकादशगुणस्थानम्


एकविंशतिचारित्रमोहनीयप्रकृतीः समः निरवशेषमुपशमय्य यथाख्यातचारित्ररूप-विशुद्धि-
विशेषपरिणतः कतकफलप्रयोगादधःकृतप्रसन्नतोयसदृश-विशुद्धिपरिणामः शुद्ध(शुक्ल)ध्याननिष्ठ
उपशान्तकषाय-वीतरागछद्मस्थ इत्येकादशगुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: चारित्रमोहनीय की इक्कीस प्रकृतियों का पूर्ण रूप से उपशमन करके यथाख्यात चारित्ररूप विशुद्धि विशेष परिणत कतक फल (निर्मली) के प्रयोग से नीचे बैठ गया है मैल जिसका ऐसे निर्मल जल के समान विशुद्ध परिणाम वाला शुक्ल ध्याननिष्ठ उपशान्त कषाय-वीतराग छद्मस्थ नामक ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती होता है।


२२९. क्षीणकषायनाम द्वादशगुणस्थानम्


समस्तमोहनीयप्रकृतीर्निरवशेषं निर्मूल्य स्फटिकभाजनगतप्रसन्नतोय-समविशुद्धान्तरङ्गो द्वितीय-
शुक्लध्यानबलेन ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयान्तरायरूपघातित्रयं क्षपयन् परमार्थनिर्ग्रन्थः

अर्थ: मोहनीयकर्म की समस्त प्रकृतियों को सम्पूर्ण रूप से नष्ट करके स्फटिक पात्र में रखे स्वच्छ जल के समान विशुद्ध अन्तरंग वाला द्वितीय शुक्लध्यान के बल से ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय तथा अन्तराय रूप तीन घातिया कर्मों का क्षय करता हुआ परम निर्ग्रन्थ क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ


२२७. सूक्ष्मसांपराय नामक दशम गुणस्थान / २२८. उपशान्त कषाय नामक ग्यारहवाँ गुणस्थान / २२९. क्षीणकषाय नामक बारहवाँ गुणस्थान


क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ इति द्वादशगुणस्थानवर्ती भवति।

अर्थ: नामक बारहवें गुणस्थानवर्ती होता है।


२३०. सयोगकेवलिनाम त्रयोदशगुणस्थानम्


शुक्लध्यानाग्निनिर्दग्धघातिकर्मचतुष्टयेन्धनः प्रादुर्भूताचिन्त्यकेवल-ज्ञानदर्शनविशिष्टलोचन-
द्वयावलोकितकालत्रयवर्त्तिसमस्तवस्तुसंभूतलोकालोकान्त-सुखसुधारससंतृप्तोऽनन्तानन्त-
वीर्यामितबलः सकलात्मप्रदेशेषु निचितविशुद्धचैतन्य-स्वभावस्तीर्थंकरपुण्यविशेषोदयं संप्राप्ताष्ट-
महाप्रातिहार्यचतुस्त्रिंशदतिशय-समवसरणविभूतिसंभावितकैवल्यकल्याणो दिवाकरकोटिबिम्व-
विडम्बितप्रभाभासुरप्रक्षीणतमः परमौदारिकदिव्यदेह इतरकेवली वा स्वयोग्यगन्धकुट्यादिविभूति-
र्जगत्त्रयभव्यजनप्रबोधपारायणपरमदिव्यध्वनिशतेन्द्रवन्दितस्सयोगकेवलीति त्रयोदशगुणस्थानवर्ती
भवति।

अर्थ: शुक्लध्यान रूप अग्नि के द्वारा चार घातिया कर्मरूप ईन्धन के जल जाने से प्रकट हुए अचिन्त्य केवलज्ञान तथा केवलदर्शन रूप विशिष्ट नेत्रद्वय के द्वारा कालत्रयवर्ती समस्त वस्तु समूह से भरे हुए लोकालोक को देखने वाले, अनन्त सुखरूप सुधारस से संतृप्त, अनन्त वीर्यरूप अमित बलयुक्त, समस्त आत्म प्रदेशों में व्याप्त विशुद्ध चैतन्य स्वभाव, तीर्थंकर पुण्य विशेष के उदय से प्राप्त हुए अष्ट महाप्रातिहार्य, चौंतीस अतिशय, समवसरण विभूति के द्वारा मनाया गया है कैवल्य कल्याणक जिनका, करोड़ों सूर्यों के प्रतिबिम्ब को तिरस्कृत करने वाली प्रभा से देदीप्यमान परम औदारिक दिव्य देह से युक्त तीर्थंकर अथवा स्वयोग्य गन्धकुटी आदि विभूति से युक्त सामान्य केवली परम दिव्य-ध्वनि द्वारा तीनों लोकों के भव्य जनों को प्रबोध देने में तत्पर, सौ इन्द्रों के द्वारा वन्दनीय सयोगकेवली तेरहवें गुणस्थानवर्ती हैं।


२३१. अयोगकेवलिनाम चतुर्दशगुणस्थानम्


पुनः स एव यद्यन्तर्मुहूर्तावशेषायुस्थितिस्ततोऽधिकशेषाघातिकर्मत्रय-स्थितिस्तदाष्टभिः समयैर्दण्ड-
कपाटप्रतरलोकपूरणप्रसर्पणसंहारस्य समुद्घातं कृत्वान्तर्मुहूर्तावशेषितायुःस्थितिसमान-
शेषाघातिकर्मस्थितिरसन् सूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिनाम-तृतीयशुक्लध्यानबलेन कायवाङ्मनोनिरोधं
कृत्वायोगकेवली भवति। यदि पूर्वमेव समस्थितिं कृत्वा अघातिचतुष्टयस्तदा समुद्घातक्रियया
विना तृतीयशुक्लध्यानेन योगनिरोधं कृत्वायोगकेवली भवति।

अर्थ: फिर वहीं (सयोगकेवली) यदि अन्तर्मुहूर्त आयु स्थिति शेष रहने पर उससे अधिक शेष तीन अघातिया कर्मों की स्थिति शेष रहती तो आठ समयों द्वारा दण्ड, कपाट, प्रतर, लोकपूरण प्रर्पण पुनः प्रतर, कपाट और दण्डरूप संहार के द्वारा समुद्घात करके, अन्तर्मुहूर्त अवशिष्ट आयु स्थिति के समान शेष अघाति कर्मों की स्थिति होने पर सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती नामक तृतीय शुक्लध्यान के बल से मन, वचन, काय का निरोध करके अयोगकेवली होता है। यदि पहले ही अघाति कर्मों की स्थिति आयुकर्म की स्थिति के बराबर होती है, तब समुद्घात क्रिया के बिना तृतीय शुक्लध्यान के द्वारा योग निरोध करके अयोगकेवली होता है।


२३२. मुक्तावस्थायाः स्वरूपम्


पुनः स एवायोगकेवली सकलशीलगुणसंपन्नो व्युपरतक्रियानिवृत्ति-नामचतुर्थशुक्लध्यानेन
पञ्चलघ्वक्षरोच्चरणमात्रस्वगुणस्थानकालद्विचरमसमये देहादिद्वासप्ततिप्रकृतीः क्षपयित्वा
पुनश्चरमसमये-एकतरवेदनीयादित्रयोदशकर्मप्रकृतीः क्षपयित्वा तदनन्तरसमये निष्कर्मा-
शरीरस्सम्यक्त्वाद्यष्टगुण-पुष्टपरमशरीरात्किंचिदून-पुरुषाकारविशुद्धज्ञानदर्शनमयो जीवो घनस्वरूप
ऊर्ध्वगमनस्वभावादेकस्मिन्नेव समये लोकाग्रं गत्वा सिद्धपरमेष्ठी सन्सर्वकालमनन्तसुखतृप्तः
केवलज्ञानदर्शनद्वयनिर्मल-लोचनद्वयेन त्रिकालगोचरानन्तद्रव्यगुणपर्यायान् लोकालोको च जानन्
पश्यन्नवतिष्ठते। लोकाद्बहिः सति सहकारिधर्मास्तिकायाभावान्न गच्छति। अत एव लोकालोक-
विभागश्च। इति सकलकर्मप्रकृतिरहित-सिद्धात्मस्वरूपं प्राप्तुकामा भव्या अनवरतं परमागमाभ्यास-
जनितनिर्मलसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रतपोभावनानिष्ठा भवन्तु।

अर्थ: फिर वही अयोगकेवली समस्त शील गुण सम्पन्न व्युपरत क्रिया निवृत्ति नामक चतुर्थ शुक्लध्यान के द्वारा पाँच लघु अक्षरों के उच्चारण करने योग्य, अपने गुणस्थान काल के द्विचरम समय में देह आदि बहत्तर प्रकृतियों का क्षय करके फिर चरम समय में एकतर वेदनीय आदि तेरह कर्म प्रकृतियों का क्षय करके उसके अनन्तर समय में, निष्कर्म, अशरीर, सम्यक्त्व आदि अष्ट गुण युक्त, अन्तिम शरीर से कुछ न्यून, पुरुषाकार, विशुद्ध ज्ञान-दर्शनमय, घनस्वरूप जीव ऊर्ध्वगमन स्वभाव के कारण एक ही समय में लोक के अग्र भाग में जाकर सिद्ध परमेष्ठी होकर, अनन्तकाल तक अनन्त सुख से तृप्त केवलज्ञान तथा केवलदर्शनरूप निर्मल लोचन द्वय के द्वारा त्रिकाल गोचर अनन्त द्रव्य गुण पर्यायों को तथा लोक-अलोक को जानता-देखता अवस्थित रहता है। वह लोक के आगे, सहकारी धर्मास्तिकाय के न होने के कारण नहीं जाता और इसीलिए लोक तथा अलोक का विभाग है। इस प्रकार समस्त कर्मप्रकृतियों से रहित सिद्धों के आत्मस्वरूप को प्राप्त करने के इच्छुक भव्य जीव निरन्तर परमागम के अभ्यास द्वारा उत्पन्न निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक् तप की भावना से विशिष्ट हों।


जयन्ति विधुताशेषपापाञ्जनसमुच्चयाः ।
अनन्तानन्तधीर्दृष्टिसुखवीर्या जिनेश्वराः॥
कृतिरियमभयचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्तिनः ।
इति कर्मप्रकृतिः ।

अर्थ: जिन्होंने समस्त पाप-मल के समूह को धो डाला है तथा अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य को प्राप्त कर लिया है, वे जिनेन्द्रदेव जयवन्त हों। यह कृति अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती की है।


वर्गः शक्तिसमूहोऽणोरणूनां वर्गणोदिता!
वर्गणानां समूहस्तु स्पर्धकः स्पर्धकापहैः॥