श्रीमद् अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचिता कर्मप्रकृतिः (भाग 1/2)
१. कर्मणः त्रैविध्यम्
आत्मनः प्रदेशेषु बद्धं कर्म द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्म चेति त्रिविधम्।
अर्थ: आत्मा के प्रदेशों में बद्ध कर्म तीन प्रकार का है-१. द्रव्यकर्म, २. भावकर्म और ३. नोकर्म।
२. द्रव्यकर्मणः चातुर्विध्यम्
तत्र प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशभेदेन द्रव्यकर्म चतुर्विधम्।
अर्थ: द्रव्यकर्म प्रकृति, स्थिति, अनुभाग तथा प्रदेश के भेद से चार तरह का है।
प्रकृतिबन्धः / ३. प्रकृतेः स्वरूपम्
तत्र ज्ञानप्रच्छादनादिस्वभावः प्रकृतिः।
अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय इन चार घातिकर्मों को नाश करके अनन्तानन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य इन आत्मीय गुणों को प्राप्त करने वाले आत्मा (परमात्मा) के लिए नमस्कार है। ज्ञान को ढँकना आदि स्वभाव प्रकृति है।
४. प्रकृतेः त्रैविध्यम्
सा मूलप्रकृतिरुत्तरप्रकृतिरुत्तरोत्तरप्रकृतिरिति त्रिधा।
अर्थ: वह मूल प्रकृति, उत्तर प्रकृति और उत्तरोत्तर प्रकृति इस तरह तीन प्रकार की है।
मूलप्रकृतयः
५. मूलप्रकृतेरष्ट भेदाः
तत्र ज्ञानावरणीयं दर्शनावरणीयं वेदनीयं मोहनीयमायुष्यं नाम गोत्रमन्तरायश्चेति मूलप्रकृतिरष्टधा।
अर्थ: उनमें ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये आठ मूल प्रकृति के भेद हैं।
६. ज्ञानावरणीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
तत्रात्मनो ज्ञानं विशेषग्रहणमावृणोतीति ज्ञानावरणीयं श्लक्ष्णकाण्डपटवत्।
अर्थ: उक्त आठ भेदों में पतले रेशमी वस्त्र की तरह जो आत्मा के विशेषग्रहण रूप ज्ञानगुण को ढँकता है, वह ज्ञानावरणीय है।
७. दर्शनावरणीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
दर्शनं सामान्यग्रहणमावृणोतीति दर्शनावरणीयं प्रतिहारवत्।
अर्थ: प्रतिहार की तरह जो आत्मा के सामान्य ग्रहण रूप दर्शन गुण को रोकता है वह दर्शनावरणीय है।
८. वेदनीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
सुखं दुःखं वा इन्द्रियद्वारैर्वेदयतीति वेदनीयं गुडलिप्तखड्गधारावत्।
अर्थ: गुड़-लपेटी तलवार की धार के समान जो सुख अथवा दुःख को इन्द्रियों के द्वारा अनुभव कराये, वह वेदनीय है।
९. मोहनीयस्य लक्षणम् उदाहरणं च
आत्मानं मोहयतीति मोहनीयं मद्यवत्।
अर्थ: शराब की तरह जो आत्मा को मोहित करे वह मोहनीय है।
१०. आयुषः लक्षणम् उदाहरणं च
शरीर आत्मनमेति धारयतीत्यायुष्यं शृङ्खलावत्।
अर्थ: शृंखला की तरह जो शरीर में आत्मा को रोक रखता है, वह आयुकर्म है।
११. नामकर्मणः लक्षणम् उदाहरणं च
नानायोनिषु नारकादिपर्यायैरात्मानं नमयति-शब्दयतीति नाम चित्रकारवत्।
अर्थ: चित्रकार की तरह जो आत्मा को नाना योनियों में नरकादि पर्यायों द्वारा नामांकित कराता है, वह नामकर्म है।
१२. गोत्रस्य लक्षणम् उदाहरणं च
उच्चनीचकुलत्वेनात्मा गीयत इति गोत्रं कुम्भकारवत्।
अर्थ: कुम्भकार की तरह जो आत्मा को उच्च अथवा नीच कुल के रूप में व्यवहृत कराता है, वह गोत्रकर्म है।
१३. अन्तरायस्य लक्षणम् उदाहरणं च
दानादिविघ्नं कर्तुमन्तरं दातृपात्रादीनां मध्यमेतीत्यन्तरायो भाण्डारिकवत्।
अर्थ: भण्डारी की तरह जो दाता और पात्र आदि के बीच में आकर आत्मा के दान आदि में विघ्न डालता है, वह अन्तराय कर्म है।
उत्तरप्रकृतयः
१४. उत्तरप्रकृतीनां भेदाः
उत्तरप्रकृतयोऽष्टचत्वारिंशदुत्तरशतम्। तद्यथा-
अर्थ: उत्तर प्रकृतियाँ एक सौ अड़तालीस हैं। वे इस प्रकार हैं-
ज्ञानावरणीयम्
१५. ज्ञानावरणीयस्य पञ्च प्रकृतयः
मतिज्ञानावरणीयं श्रुतज्ञानावरणीयमवधिज्ञानावरणीयं मनःपर्ययज्ञानावरणीयं केवलज्ञानावरणीयं
चेति ज्ञानावरणीयस्य प्रकृतयः पञ्च।
अर्थ: मतिज्ञानावरणीय, श्रुतज्ञानावरणीय, अवधिज्ञानावरणीय, मनःपर्ययज्ञानावरणीय तथा केवलज्ञानावरणीय ये पाँच ज्ञानावरणीय की प्रकृतियाँ हैं।
१६. मतिज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
तत्र पञ्चभिरिन्द्रियैर्मनसा च मननं ज्ञानं मतिज्ञानं तदावृणोतीति मतिज्ञानावरणीयम्।
अर्थ: पाँच इन्द्रियों तथा मन की सहायता से होने वाला मनन रूप ज्ञान मतिज्ञान है, उसे जो ढँकता है वह मतिज्ञानावरणीय है।
१७. श्रुतज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
मतिज्ञानगृहीतार्थादन्यस्यार्थस्य ज्ञानं श्रुतज्ञानं तदावृणोतीति श्रुतज्ञानावरणीयम्।
अर्थ: मतिज्ञान द्वारा ग्रहण किये गये अर्थ से भिन्न अर्थ का ज्ञान श्रुतज्ञान है, उसे जो आवृत करता है वह श्रुतज्ञानावरणीय है।
१८. अवधिज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
वर्णगन्धरसस्पर्शयुक्तसामान्यपुद्गलद्रव्यं तत्संबन्धिसंसारीजीवद्रव्याणि च देशान्तरस्थानि
कालान्तरस्थानि च द्रव्यक्षेत्रकालभवभावानवधीकृत्य यत्प्रत्यक्षं जानातीत्यवधिज्ञानं तदावृणोतीत्य-
वधिज्ञानावरणीयम्।
अर्थ: भिन्न देश तथा भिन्न काल में स्थित वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श युक्त सामान्य पुद्गल द्रव्य तथा पुद्गल द्रव्य के सम्बन्ध से युक्त संसारी जीव द्रव्यों को जो द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव की मर्यादा लेकर प्रत्यक्ष जानता है, वह अवधिज्ञान कहलाता है, उसका आवरण करने वाला अवधिज्ञानावरणीय है।
१९. मनःपर्ययज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
परेषां मनसि वर्तमानमर्थं यज्जानाति तन्मनःपर्ययज्ञानं तदावृणोतीति मनःपर्ययज्ञानावरणीयम्।
अर्थ: दूसरों के मन में स्थित अर्थ को जानता है, वह मनःपर्ययज्ञान है, उसे जो रोकता है, वह मनःपर्ययज्ञानावरणीय है।
२०. केवलज्ञानावरणीयस्य स्वरूपम्
इन्द्रियाणि प्रकाशं मनश्चानपेक्ष्य त्रिकालगोचरलोकसकलपदार्थानां युगपदवभासनं केवलज्ञानं
तदावृणोतीति केवलज्ञानावरणीयम्।
अर्थ: इन्द्रिय, प्रकाश और मन की सहायता के बिना त्रिकाल गोचर लोक तथा अलोक के समस्त पदार्थों का एक साथ अवभास (ज्ञान) केवलज्ञान है, उसे जो आवृत करता है वह केवलज्ञानावरणीय है।
दर्शनावरणीयम्
चक्षुर्दर्शनावरणीयमचक्षुर्दर्शनावरणीयमवधिदर्शनावरणीयं केवलदर्शनावरणीयं निद्रा निद्रानिद्रा प्रचला
प्रचलाप्रचला स्त्यानगृद्धिरिति दर्शनावरणीयं नवधा।
अर्थ: चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय, केवलदर्शनावरणीय, निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला तथा स्त्यानगृद्धि ये नौ दर्शनावरणीय के भेद हैं।
तत्र चक्षुषा वस्तुसामान्यग्रहणं चक्षुर्दर्शनं तदावृणोतीति चक्षुर्दर्शनावरणीयम्।
अर्थ: चक्षु द्वारा वस्तु का सामान्य ग्रहण चक्षुदर्शन कहलाता है, उसका आवरण चक्षुदर्शनावरणीय है।
शेषैः स्पर्शनादीन्द्रियैर्मनसा च वस्तुसामान्यग्रहणमचक्षुर्दर्शनं तदावृणोतीत्यचक्षुर्दर्शनावरणीयम्।
अर्थ: चक्षु के अतिरिक्त शेष स्पर्शन आदि इन्द्रियों तथा मन के द्वारा वस्तु का सामान्यग्रहण अचक्षुदर्शन है, उसका आवरण अचक्षुदर्शनावरणीय है।
रूपिसामान्यग्रहणमवधिदर्शनं तदावृणोतीत्यवधिदर्शनावरणीयम्।
अर्थ: रूपी पदार्थों का सामान्यग्रहण अवधिदर्शन है, उसका आवरण अवधिदर्शनावरणीय है।
समस्तवस्तुसामान्यग्रहणं केवलदर्शनं तदावृणोतीति केवलदर्शनावरणीयम्।
अर्थ: समस्त वस्तुओं का सामान्यग्रहण केवलदर्शन है, उसका आवरण केवलदर्शनावरणीय है।
यतो गच्छतः स्थानं तिष्ठत उपवेशनमुपविशतश्शयनं च भवति सा निद्रा।
अर्थ: जिसके कारण चलते, किसी स्थान पर ठहरते, बिस्तर पर बैठते नींद आती है, उसे निद्रा कहते हैं।
२७. निद्रानिद्रायाः स्वरूपम्
उत्थापितेऽपि लोचनमुद्घाटयितुं न शक्नोति यतस्सा निद्रानिद्रा।
अर्थ: जिसके कारण उठाये जाने (जगाये जाने) पर भी आँखें न खुल सकें, उसे निद्रानिद्रा कहते हैं।
२८. प्रचलायाः स्वरूपम्
यत ईषदुन्मील्य स्वपिति सुप्तोऽपीषदीषज्जानाति सा प्रचला।
अर्थ: जिसके कारण कुछ आँख खोलकर सोये तथा सोते हुए भी कुछ-कुछ जानता रहे, उसे प्रचला कहते हैं।
२९. प्रचलाप्रचलायाः स्वरूपम्
यतो निद्रायमाणे लाला वहत्यङ्गानि चलन्ति सा प्रचलाप्रचला।
अर्थ: जिसके कारण सोते हुए लार बहे तथा अंग चलें, उसे प्रचला-प्रचला कहते हैं।
३०. स्त्यानगृद्धेः स्वरूपम्
यत उत्थापितेऽपि पुनः पुनः स्वपिति निद्रायमाणे चोत्थाय कर्माणि करोति स्वप्नायते जल्पति च सा स्त्यानगृद्धिः।
अर्थ: जिसके कारण उठा देने पर भी फिर-फिर सो जाये, नींद में उठकर कार्य करे, स्वप्न देखे, बड़बड़ाये, उसे स्त्यानगृद्धि कहते हैं।
वेदनीयम् / ३१. वेदनीयस्य द्वे प्रकृतयः
सातावेदनीयमसातावेदनीयं चेति वेदनीयं द्विधा।
अर्थ: सातावेदनीय और असातावेदनीय ये दो वेदनीय के भेद हैं।
३२. सातावेदनीयस्य स्वरूपम्
तत्रेन्द्रियसुखकारणचन्दनकर्पूरस्रग्वनितादिविषयप्राप्तिकारणं सातावेदनीयम्।
अर्थ: इन्द्रिय-सुख के कारण चन्दन, कर्पूर, माला, वनिता आदि विषयों की प्राप्ति जिससे हो, वह सातावेदनीय है।
३३. असातावेदनीयस्य स्वरूपम्
इन्द्रियदुःखकारणविषशस्त्राग्निकण्टकादिद्रव्यप्राप्तिनिमित्तमसातावेदनीयम्।
अर्थ: इन्द्रिय-दुःख के कारण विष, शस्त्र, अग्नि, कंटक आदि द्रव्यों की प्राप्ति जिसके द्वारा हो, वह असातावेदनीय है।
मोहनीयम्
३४. मोहनीयस्य द्वौ भेदौ
दर्शनमोहनीयं चारित्रमोहनीयं चेति मोहनीयं द्विधा।
अर्थ: दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय ये दो मोहनीय के भेद हैं।
३५. दर्शनमोहनीयस्य त्रयः भेदाः
तत्र मिथ्यात्वं सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वप्रकृतिश्चेति दर्शनमोहनीयं त्रिधा।
अर्थ: उनमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व तथा सम्यक्त्वप्रकृति ये तीन दर्शनमोहनीय के भेद हैं।
३६. मिथ्यात्वस्य स्वरूपम्
तत्रातत्त्वश्रद्धानकारणं मिथ्यात्वम्।
अर्थ: उक्त तीन भेदों में मिथ्यात्व वह है, जिससे तत्त्व की श्रद्धा न होकर विपरीत श्रद्धा हो।
३७. सम्यग्मिथ्यात्वस्य स्वरूपम्
तत्त्वातत्त्वश्रद्धानकारणं सम्यग्मिथ्यात्वम्।
अर्थ: जिससे तत्त्व तथा अतत्त्व दोनों का श्रद्धान हो, वह सम्यग्मिथ्यात्व है।
३८. सम्यक्त्वप्रकृतेः स्वरूपम्
तत्त्वार्थश्रद्धानरूपं सम्यग्दर्शनं चलमलिनमगाढं करोति यत्सा सम्यक्त्वप्रकृतिः।
अर्थ: जो तत्त्वार्थ की श्रद्धारूप सम्यग्दर्शन में चल, मलिन तथा अगाढ़ दोष उत्पन्न करे वह सम्यक्त्वप्रकृति है।
३९. चारित्रमोहनीयस्य द्वौ भेदौ
कषायनोकषायभेदाच्चारित्रमोहनीयं द्विधा।
अर्थ: कषाय और नोकषाय के भेद से चारित्रमोहनीय दो प्रकार का है।
४०. कषायाणां भेदाः
तत्रानन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पतः प्रत्येकं क्रोधमानमायालोभा इति कषायाः षोडश।
अर्थ: उनमें अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन के विकल्प से कषाय चार प्रकार की है और प्रत्येक के क्रोध, मान, माया तथा लोभ ये चार-चार भेद हैं। इस प्रकार कषाय के सोलह भेद हैं।
४१. अनन्तानुबन्धिकषायाणां कार्यम्
तत्रानन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभाः सम्यग्दर्शनं विराधयन्ति।
अर्थ: अनन्तानुबन्धि क्रोध, मान, माया और लोभ सम्यग्दर्शन का घात करते हैं, उसे वे प्रकट नहीं होने देते।
४२. अप्रत्याख्यानकषायाणां कार्यम्
अप्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभा देशसंयमं प्रतिबध्नन्ति।
अर्थ: अप्रख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ देशसंयम को रोकते हैं।
४३. प्रत्याख्यानकषायाणां कार्यम्
प्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभास्सकलसंयमं प्रतिबध्नन्ति।
अर्थ: प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ सकलचारित्र को रोकते हैं।
४४. संज्वलनकषायाणां कार्यम्
संज्वलनक्रोधमानमायालोभा यथाख्यातचारित्रं निवारयन्ति।
अर्थ: संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ यथाख्यात चारित्र को नहीं होने देते हैं।
तत्रानन्तानुबन्धिनः क्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं शिलाभेदशिलास्तम्भवेणूमूल-क्रिमिराग-
कम्बलसदृशास्तीव्रतमशक्तयः।
अर्थ: अनन्तानुबन्धि क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय क्रम से शिलाखण्ड, शिलास्तम्भ, वेणूमूल (बाँस की जड़) और क्रिमिराग कम्बल की तरह तीव्रतम शक्तिवाली होती है।
अप्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं भूभेदास्थि-अविशृङ्गचक्रमलसदृशास्तीव्रतरशक्तयः।
अर्थ: अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय क्रम से पृथ्वीखण्ड, हड्डी, मेढे के सींग तथा चक्रमल (ओंगन) के सदृश तीव्रतर शक्तिवाली होती है।
प्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं धूलिरेखाकाष्ठगोमूत्रतनुमल-सदृशास्तीव्रशक्तयः।
अर्थ: प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया और लोभ क्रम से धूलि-रेखा, काष्ठ, गोमूत्र तथा शरीर के मल के समान तीव्रतर शक्तिवाली होती हैं।
संज्वलनक्रोधमानमायालोभा यथाक्रमं जलरेखावेत्रक्षुरप्रहरिद्रारागसदृशा मन्दशक्तयः।
अर्थ: संज्वलन क्रोध, मान, माया तथा लोभ क्रम से जलरेखा बेंत, खुरपा तथा हल्दी के रंग के सदृश मन्द शक्तिवाली होती हैं।
यतो हासो भवति तद्धास्यम्।
अर्थ: जिससे हँसी आये, वह हास्य प्रकृति है।
यतो रमयति सा रतिः।
अर्थ: जिसके कारण रमे (प्रसन्न हो), वह रति है।
५१. अरतिप्रकृतेर्लक्षणम्
यतो विषण्णो भवति सारतिः।
अर्थ: जिसके कारण विषण्ण (खिन्न) हो, वह अरति है।
५२. शोकप्रकृतेर्लक्षणम्
यतः शोचयति रोदयति स शोकः।
अर्थ: जिसके कारण शोक करे, वह शोक है।
५३. भयप्रकृतेर्लक्षणम्
यतो बिभेत्यनर्थात्तद्भयम्।
अर्थ: जिसके कारण अनर्थ से डरे, वह भय है।
५४. जुगुप्साप्रकृतेर्लक्षणम्
यतो जुगुप्सा सा जुगुप्सा।
अर्थ: जिसके कारण घृणा आये, वह जुगुप्सा है।
५५. स्त्रीवेदस्य लक्षणम्
यतः स्त्रियमात्मानं मन्यमानः पुरुषे वेदयति रन्तुमिच्छति सः स्त्रीवेदः।
अर्थ: जिसके कारण अपने को स्त्री मानता हुआ पुरुष में रमण करने की इच्छा करता है, वह स्त्रीवेद है।
५६. पुंवेदस्य लक्षणम्
यतः पुमांसमात्मानं मन्यमानः स्त्रियां वेदयति रन्तुमिच्छति सः पुंवेदः।
अर्थ: जिसके कारण अपने को पुरुष मानता हुआ स्त्री में रमण करने की इच्छा करता है, वह पुंवेद है।
५७. नपुंसकवेदस्य लक्षणम्
यतो नपुंसकमात्मानं मन्यमानः स्त्रीपुंसोर्वेदयति रन्तुमिच्छति स नपुंसकवेदः।
अर्थ: जिसके कारण अपने को नपुंसक मानता हुआ स्त्री और पुरुष दोनों में रमण करने की इच्छा करता है, वह नपुंसकवेद है।
आयु:
५८. आयुष्कर्मण: चत्वार: प्रकृतय:
नारकायुष्यं तिर्यगायुष्यं मनुष्यायुष्यं देवायुष्यं चेत्यायुश्चतुर्विधम्।
अर्थ: नारकायुष्य, तिर्यगायुष्य, मनुष्यायुष्य और देवायुष्य इस प्रकार आयु के चार भेद हैं।
५९. नरकायुषो लक्षणम्
तत्र यन्नारकशरीरे आत्मानं धारयति तन्नारकायुष्यम्।
अर्थ: जो आत्मा को नारक शरीर में धारण कराता है, वह नरकायुष्य है।
६०. तिर्यगायुषो लक्षणम्
यत्तिर्यक्शरीरे जीवं धारयति तत्तिर्यगायुष्यम्।
अर्थ: जो जीव को तिर्यंच-शरीर में धारण कराता है, वह तिर्यगायुष्य है।
६१. मनुष्यायुषो लक्षणम्
यन्मनुष्यशरीरे प्राणिनं धारयति तन्मनुष्यायुष्यम्।
अर्थ: जो प्राणी को मनुष्य-शरीर में धारण कराता है, वह मनुष्यायुष्य है।
६२. देवायुषो लक्षणम्
यद्देवशरीरे देहिनं धारयति तद्देवायुष्यम्।
अर्थ: जो प्राणी को देव-शरीर में धारण कराता है, वह देवायुष्य है।
नाम
६३. नामकर्मण: द्वाचत्वारिंशत्प्रकृतय:
गतिजातिशरीरबन्धनसंघातसंस्थानाङ्गोपाङ्गसंहननवर्णगन्धरसस्पर्शानुपूर्व्यगुरुलघूपघात-परघाता-
तपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतित्रसस्थावरबादरसूक्ष्मपर्याप्तापर्याप्तप्रत्येकशरीरसाधारणशरीरस्थिरास्थिर-
शुभाशुभसुभगदुर्भगसुस्वरदुःस्वरदेयानादेययशस्कीर्त्ययशस्कीर्तिनिर्माणतीर्थकरत्वानीतिपिण्डापिण्डरूपा
नामकर्मप्रकृतयो द्वाचत्वारिंशत्।
अर्थ: गति, जाति, शरीर, बन्धन, संघात, संस्थान, अंगोपांग, संहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, त्रस, स्थावर, बादर, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येक शरीर, साधारण शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर, आदेय, अनादेय, यशस्कीर्ति, अयशस्कीर्ति निर्माण तथा तीर्थकरत्व ये नामकर्म की पिण्ड-अपिण्डरूप बयालीस प्रकृतियाँ हैं।
६४. नामकर्मणः पिण्डप्रकृतीनां त्रयोनवतिः भेदाः
पिण्डप्रकृतीनां भेदे तु सर्वा नामप्रकृतयस्त्रयोनवतिः।
अर्थ: पिण्डप्रकृतियों के भेद करने पर नामकर्म की सब प्रकृतियाँ तिरानवे होती हैं।
६५. गतिनामकर्मणः चत्वारः भेदाः
नारकतिर्यङ्मनुष्यदेवगतिभेदाद् गतिनाम चतुर्धा।
अर्थ: नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति और देवगति के भेद से गति नामकर्म के चार भेद हैं।
६६. नरकगतेर्लक्षणम्
यतो जीवस्य नारकपर्यायो भवति सा नरकगतिः।
अर्थ: जिसके कारण जीव की नारकपर्याय होती है, वह नरकगति है।
६७. तिर्यग्गतेर्लक्षणम्
यतस्तिर्यक्पर्यायो भवति प्राणिनः सा तिर्यग्गतिः।
अर्थ: जिसके कारण जीव की तिर्यञ्चपर्याय होती है, वह तिर्यग्गति है।
६८. मनुष्यगतेर्लक्षणम्
यतो मनुष्यपर्याय आत्मनो भवति सा मनुष्यगतिः।
अर्थ: जिसके कारण आत्मा की मनुष्यपर्याय होती है, वह मनुष्यगति है।
६९. देवगतेर्लक्षणम्
यतो देवपर्यायो देहिनो भवति सा देवगतिः।
अर्थ: जिसके कारण प्राणी को देवपर्याय होती है, वह देवगति है।
७०. गतेः सामान्यलक्षणम्
नारकादिभवप्राप्तिर्गमनहेतुर्वा गतिनामा।
अर्थ: ७०. गति नामकर्म का सामान्य लक्षण नारक आदि भवप्राप्ति के लिए गमन का कारण गति नामकर्म है।
७१. जातिनामकर्मणः पञ्च भेदाः
एकद्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रियभेदाज्जातिनाम पञ्चधा।
अर्थ: ७१. जाति नामकर्म के पाँच भेद एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय के भेद से जाति नामकर्म के पाँच भेद है।
७२. एकेन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
तत्र स्पर्शनैन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति यतः सा एकेन्द्रियजातिः।
अर्थ: ७२. एकेन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव केवल स्पर्शन इन्द्रियवान् होता है, वह एकेन्द्रिय जाति नामकर्म है।
७३. द्वीन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनेन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति सा द्वीन्द्रियजातिः।
अर्थ: ७३. द्वीन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव केवल स्पर्शन और रसना इन्द्रिय युक्त होता है, वह द्वीन्द्रिय जाति नामकर्म है।
७४. त्रीन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनघ्राणेन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति सा त्रीन्द्रियजातिः।
अर्थ: ७४. त्रीन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव स्पर्शन, रसना तथा घ्राण इन्द्रिय युक्त होता है, वह त्रीन्द्रिय जाति नामकर्म है।
७५. चतुरिन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुष्मन्तो जीवा भवन्ति सा चतुरिन्द्रियजातिः।
अर्थ: ७५. चतुरिन्द्रिय जाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु युक्त होता है, वह चतुरिन्द्रिय जाति नामकर्म है।
७६. पञ्चेन्द्रियजातिनामकर्मणः लक्षणम्
यतः स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्रेन्द्रियवन्तो जीवा भवन्ति सा पञ्चेन्द्रियजातिः।
अर्थ: ७६. पंचेन्द्रियजाति नामकर्म का लक्षण जिसके कारण जीव स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु तथा श्रोत्रेन्द्रिय युक्त होता है, वह पंचेन्द्रिय जाति नामकर्म है।
७७. शरीरनामकर्मणः पञ्च भेदाः
औदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणानीति शरीरनाम पञ्चधा।
अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण, ये शरीर नामकर्म के पाँच भेद हैं।
७८. औदारिकशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
तत्र यत आहारवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धा औदारिकशरीरकरणे परिणमन्ति तदौदारिकशरीरनाम।
अर्थ: जिसके कारण आहार वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध औदारिक शरीर के रूप में परिणत होते हैं, वह औदारिक शरीर नामकर्म है।
७९. वैक्रियिकशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
यत आहारवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धा वैक्रियिकशरीररूपेण परिणमन्ति तद्वैक्रियकशरीरनाम।
अर्थ: जिसके कारण आहार वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध वैक्रियिक शरीर के रूप में परिणत होते हैं, वह वैक्रियिक शरीर नामकर्म है।
८०. आहारकशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
यत आहारवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धा आहारकशरीररूपेण परिणमन्ति तदाहारकशरीरनाम।
अर्थ: जिसके कारण आहार वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध आहारक शरीर रूप से परिणत होते हैं, उसे आहारक शरीर नामकर्म कहते हैं।
८१. तैजसशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
यतस्तैजसवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धास्तैजसशरीररूपेण परिणमन्ति तत्तैजसशरीरनाम।
अर्थ: जिसके कारण तैजस वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध तैजस शरीर रूप से परिणत होते हैं, वह तैजस शरीर नामकर्म है।
८२. कार्मणशरीरनामकर्मणः लक्षणम्
कार्मणवर्गणायाताः पुद्गलस्कन्धाः कार्मणशरीररूपेण परिणमन्ति यतस्तत्कार्मणशरीरनाम।
अर्थ: जिसके कारण कार्मण वर्गणा द्वारा आये हुए पुद्गल स्कन्ध कार्मण शरीर रूप परिणत होते हैं, वह कार्मण शरीर नामकर्म है।
८३. बन्धननामकर्मणः पञ्च भेदाः
औदारिकादिशरीरपञ्चकाश्रितं बन्धननाम पञ्चधा।
अर्थ: ८३. बन्धन नामकर्म के पाँच भेद औदारिक आदि पाँच शरीरों के आश्रित बन्धन नामकर्म पाँच प्रकार का है।
८४. औदारिकशरीरबन्धननामकर्मणः लक्षणम्
तत्रौदारिकशरीराकारेण परिणतपुद्गलानां परस्परसंश्लेषरूपो बन्धो यतो भवति तदौदारिक-
शरीरबन्धननाम।
अर्थ: ८४. औदारिक शरीर बन्धन नामकर्म का लक्षण जिसके कारण औदारिक शरीर के आकार रूप से परिणत पुद्गलों का परस्पर संश्लेष रूप बन्ध होता है, वह औदारिक शरीर बन्धन नामकर्म है।
८५. वैक्रियिकादिशरीरबन्धननामकर्मणां लक्षणानि
एवं वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीराकारेण परिणतपुद्गलानां परस्परसंश्लेषरूपो बन्धो यतो भवति
तानि वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीरबन्धननामानि ज्ञातव्यानि।
अर्थ: ८५. वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर बन्धन नामकर्म इसी प्रकार जिस कारण वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर के आकार रूप से परिणत पुद्गलों का परस्पर संश्लेष रूप बन्ध होता है, उन्हें क्रमशः वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर बन्धन नामकर्म कहते हैं।
८६. संघातनामकर्मणः पञ्च भेदाः
औदारिकादिशरीरपञ्चकाश्रितानि संघातनामानि पञ्च।
अर्थ: ८६. संघात नामकर्म के पाँच भेद औदारिक आदि पाँच शरीरों के आश्रित संघात नामकर्म पाँच प्रकार का होता है।
८७. औदारिकशरीरसंघातनामकर्मणः लक्षणम्
तत्रौदारिकशरीराकारेण परिणतपरस्परबद्धपुद्गलानां तदाकारवैषम्याभावकारणमौदारिक-
शरीरसंघातनामकर्म।
अर्थ: ८७. औदारिक शरीर संघात नामकर्म का लक्षण औदारिक शरीर के आकार रूप से परिणत परस्पर बद्ध पुद्गलों के तदाकार वैषम्य के अभाव का कारण औदारिक शरीर संघात नामकर्म है।
८८. वैक्रियिकादिशरीरसंघातनामकर्मणः लक्षणम्
एवं वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीररूपेण परिणतपरस्परबद्ध-पुद्गलस्कन्धानां तत्तदाकार-
वैषम्याभावकारणानि वैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीर-संघातनामानि ज्ञातव्यानि।
अर्थ: ८८. वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर संघात नामकर्म का लक्षण इसी प्रकार वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर रूप से परिणत, परस्पर बद्ध पुद्गल स्कन्धों के उस-उस आकार की विषमता के अभाव का कारण वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीर संघात नामकर्म है।
८९. संस्थाननामकर्मणः षड्भेदाः
समचतुरस्रन्यग्रोधस्वातिकुब्जवामनहुण्डभेदात्संस्थाननाम षोढा।
अर्थ: समचतुरस्र, न्यग्रोध, स्वाति, कुब्ज, वामन और हुण्डक ये संस्थान नामकर्म के छह भेद हैं।
९०. समचतुरस्रसंस्थानस्य लक्षणम्
तत्र यतः सर्वत्र दशताललक्षणलक्षितप्रशस्तसंस्थानशरीराकारो भवति तत्समचतुरस्रसंस्थानं नाम।
अर्थ: जिससे सब जगह दशताल लक्षणयुक्त प्रशस्त संस्थान सहित शरीर का आकार होता है, वह समचतुरस्र संस्थान है।
९१. न्यग्रोधसंस्थानस्य लक्षणम्
यत उपरि विस्तीर्णोऽधः संकुचितशरीराकारो भवति तन्न्यग्रोधसंस्थानं नाम।
अर्थ: जिसके कारण ऊपर विस्तीर्ण तथा नीचे संकुचित शरीराकार होता है, वह न्यग्रोध संस्थान है।
९२. स्वातिसंस्थानस्य लक्षणम्
यतोऽधो विस्तीर्ण उपरि संकुचितशरीराकारो भवति तत्स्वातिसंस्थानं नाम। स्वातिर्वल्मीकं
तत्सादृश्यात्।
अर्थ: जिसके कारण नीचे विस्तीर्ण तथा ऊपर संकुचित शरीर का आकार होता है, वह वल्मीक (वामी) सदृश होने के कारण स्वातिसंस्थान कहलाता है।
९३. कुब्जसंस्थानस्य लक्षणम्
यतो ह्रस्वः शरीराकारो भवति तत्कुब्जसंस्थानं नाम।
अर्थ: जिसके कारण शरीर का आकार छोटा (कुबड़ा) होता है, वह कुब्जक संस्थान नामकर्म है।
९४. वामनसंस्थानस्य लक्षणम्
यतो दीर्घहस्तपादा ह्रस्वकबन्धश्च शरीराकारो भवति तद्वामनसंस्थानं नाम।
अर्थ: जिसके कारण हाथ और पैर लम्बे तथा कबन्ध (धड़) छोटा होता है, उसे वामन संस्थान कहते हैं।
९५. हुण्डकसंस्थानस्य लक्षणम्
यतः पाषाणपूर्णगोणिवत् ग्रन्थादिविषमशरीराकारो भवति तद् हुण्डकसंस्थानं नाम।
अर्थ: जिसके कारण पत्थर भरी हुई गौन की तरह, ग्रन्थि आदि से युक्त विषम शरीराकार होता है, उसे हुण्डक संस्थान कहते हैं।
९६. अङ्गोपाङ्गनामकर्मणस्त्रयो भेदाः
औदारिकवैक्रियिकाहारकशरीरभेदादङ्गोपाङ्गनाम त्रिधा।
अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक और आहारक ये अंगोपांग नामकर्म के तीन भेद हैं।
९७. औदारिकशरीराङ्गोपाङ्गस्य लक्षणम्
तत्रौदारिकशरीरस्य चरणद्वयबाहुद्वयनितम्बपृष्ठवक्षःशीर्षभेदादष्टाङ्गानि अङ्गुलीकर्ण-
नासिकाद्युपाङ्गानि करोति यत्तदौदारिकशरीराङ्गोपाङ्गनाम।
अर्थ: औदारिक शरीर के दो पैर, दो हाथ, नितम्ब, पीठ, वक्षस्थल तथा शीर्ष ये आठ अंग और अंगुली, कर्ण, नासिका आदि उपांग जिसके कारण होते हैं, उसे औदारिक शरीर अंगोपांग कहते हैं।
९८. वैक्रियिकाहारकशरीराङ्गोपाङ्गयोर्लक्षणे
एवं वैक्रियिकाहारकशरीरयोरपि तदङ्गोपाङ्गकारकं वैक्रियिकाहारक-शरीराङ्गोपाङ्गनामद्वयं ज्ञातव्यम्।
अर्थ: इसी तरह जिनके कारण वैक्रियिक तथा आहारक शरीर के अंगोपांग होते हैं, उन्हें क्रमशः वैक्रियिक तथा आहारक शरीर अंगोपांग कहते हैं।
९९. संहनननामकर्मणः षड् भेदाः
वज्रवृषभनाराचसंहननवज्रनाराचनाराचार्धनाराचकीलितासंप्राप्तसृपाटिकाभेदतः संहननं नाम षोढा।
अर्थ: वज्रवृषभनाराचसंहनन, वज्रनाराचनाराचार्धनाराचकीलितासंप्राप्तसृपाटिकाभेदतः संहनन नामकर्म के छह भेद हैं।
१००. वज्रवृषभनाराचसंहननस्य लक्षणम्
तत्र वज्रवत् स्थिरास्थिऋषभो वेष्टनं वज्रवत् वेष्टनकीलकबन्धो यतो भवति तद्वज्रवृषभनाराच-
संहननं नाम।
अर्थ: जिसके कारण वज्र की तरह स्थिर अस्थि और वृषभ रूप वेष्टन तथा वज्र की तरह वेष्टन और कीलक बन्ध होता है, उसे वज्रवृषभनाराच संहनन कहते हैं।
१०१. वज्रनाराचसंहननस्य लक्षणम्
यतो वज्रवत् स्थिरास्थिकीलकबन्धसामान्यवेष्टनं च भवति तद्वज्रनाराचसंहननम्।
अर्थ: जिसके कारण वज्र की तरह स्थिर अस्थि तथा कीलक बन्ध होता है तथा वेष्टन सामान्य होता है, उसे वज्रनाराच संहनन कहते हैं।
१०२. नाराचसंहननस्य लक्षणम्
यतो वज्रवत् स्थिरास्थिबन्धसामान्यकीलिकावेष्टनमेतद्द्वयं भवति तन्नाराचसंहननं नाम।
अर्थ: जिसके कारण वज्र की तरह स्थिर अस्थिबन्ध तथा सामान्य कीलक और वेष्टन होते हैं, उसे नाराच संहनन कहते हैं।
१०३. अर्धनाराचसंहननस्य लक्षणम्
यतस्सामान्यास्थिबन्धार्धकीलिका भवति तदर्धनाराचसंहननं नाम।
अर्थ: जिसके कारण सामान्य अस्थिबन्ध अर्ध कीलित होता है, उसे अर्धनाराच संहनन कहते हैं।
१०४. कीलितसंहननस्य लक्षणम्
यतः कीलित इव सामान्यास्थिबन्धो भवति तत्कीलितसंहननं नाम।
अर्थ: जिसके कारण कीलित की तरह सामान्य अस्थिबन्ध होता है, वह कीलित संहनन है।
१०५. असंप्राप्तसृपाटिकासंहननस्य लक्षणम्
यतः परस्परासंबद्धास्थिबन्धो भवति तदसंप्राप्तसृपाटिकासंहननं नाम।
अर्थ: जिसके कारण अस्थिबन्ध परस्पर असम्बद्ध होता है, उसे असम्प्राप्तसृपाटिका संहनन कहते हैं।
१०६. वर्णनामकर्मणः पञ्च भेदाः
श्वेतपीतहरितारुणकृष्णभेदाद् वर्णनाम पञ्चधा।
अर्थ: श्वेत, पीत, हरित, अरुण तथा कृष्ण के भेद से वर्ण नामकर्म पाँच प्रकार का है।
१०७. वर्णनामकर्मणः सामान्यलक्षणम्
तत्तत्स्वस्वशरीराणां श्वेतादिवर्णा न्यत्करोति तद्वर्णनाम।
अर्थ: अपने-अपने शरीर का श्वेत आदि वर्ण जिसके कारण होता है, उसे वर्ण नाम कहते हैं।
१०८. गन्धनामकर्मणः द्वौ भेदौ
सुगन्धदुर्गन्धभेदाद् गन्धनाम द्वेधा।
अर्थ: सुगन्ध और दुर्गन्ध के भेद से गन्ध नाम दो प्रकार का है।
१०९. गन्धनामकर्मणः लक्षणम्
स्वस्वशरीराणां स्वस्वगन्धं करोति यत्तद् गन्धनाम।
अर्थ: अपने-अपने शरीर की गन्ध जिस कारण होती है, उसे गन्ध नामकर्म कहते हैं।
११०. रसनामकर्मणः पञ्च भेदाः
तिक्तकटुकषायाम्लमधुरभेदाद्रसनाम पञ्चधा।
अर्थ: तिक्त, कटु, कषाय, आम्ल तथा मधुर के भेद से रस नामकर्म के पाँच भेद हैं।
१११. रसनामकर्मणः लक्षणम्
तत्तत्स्वस्वशरीराणां यत्स्वस्वरसं करोति तद्रसनाम।
अर्थ: अपने-अपने शरीर का जो अपना-अपना रस करता है, उसे रस नामकर्म कहते हैं।
११२. लवणो नाम षष्ठो रसः न पृथक्
लवणो नाम रसो लौकिकैः षष्ठोऽस्ति। स मधुररसभेद एवेति परमागमे पृथक्त्वेन नोक्तः, लवणं विना इतररसानां स्वादुत्वाभावात्।
अर्थ: लवण नामक छठा रस लोक में माना जाता है। यह मधुर रस का ही भेद है, इसलिए परमागम में अलग से नहीं कहा; क्योंकि नमक के बिना तो अन्य सभी रस फीके हैं।
११३. स्पर्शनामकर्मण: अष्टभेदा:
मृदुकर्कशगुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षभेदात्स्पर्शनामाष्टकम्।
अर्थ: मृदु, कर्कश, गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध तथा रूक्ष के भेद से स्पर्श नामकर्म आठ प्रकार का है।
११४. स्पर्शनामकर्मण: लक्षणम्
तत्तत्स्वस्वशरीराणां स्वस्वस्पर्शं करोति।
अर्थ: स्पर्श नामकर्म उस-उस अपने-अपने शरीर का अपना-अपना स्पर्श उत्पन्न करता है।
११५. आनुपूर्वीनामकर्मण: चत्वारो भेदा:
नारकतिर्यङ्मनुष्यदेवगत्यानुपूर्विभेदादानुपूर्विनाम चतुर्धा।
अर्थ: नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी के तथा देवगत्यानुपूर्वी के भेद से आनुपूर्वी के चार भेद हैं।
११६. आनुपूर्वीनामकर्मण: लक्षणम्
स्वस्वगतिगमने विग्रहतो त्यक्तपूर्वशरीराकारं करोति।
अर्थ: इसके कारण अपनी-अपनी गति में जाने के लिए विग्रहगति में पहले छोड़े गये शरीर का आकार होता है।
११७. अगुरुलघुनामकर्मण: लक्षणम्
अगुरुलघुनाम स्वस्वशरीरं गुरुत्वलघुत्ववर्जितं करोति।
अर्थ: अगुरुलघु नामकर्म अपने-अपने शरीर को गुरुत्व और लघुत्व से रहित करता है।
११८. उपघातनामकर्मण: लक्षणम्
उपघातनाम स्वबाधाकारकं तुन्दादिशरीरावयवं करोति।
अर्थ: उपघात नामकर्म अपने को बाधाकारक तोंद आदि शरीरावयवों को करता है।
११९. परघातनामकर्मण: लक्षणम्
परघातनाम परबाधाकारकं सर्पदंष्ट्र शृङ्गादिशरीरावयवं करोति।
अर्थ: परघात नामकर्म दूसरों को बाधा देने वाले सर्पदाढ़, सींग आदि शरीरावयव करता है।
१२०. आतपनामकर्मणः लक्षणम्
आतपनामोष्णप्रभां करोति तत् सूर्यबिम्बे बादरपर्याप्तपृथ्वीकायिके भवति।
अर्थ: आतप नामकर्म उष्ण प्रभा करता है। वह सूर्य बिम्ब में स्थित बादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक जीवों में होता है।
१२१. उद्योतनामकर्मणः लक्षणम्
उद्योतनाम शीतलप्रभां करोति, तत् चन्द्रतारकादिबिम्बेषु तेजोवायुसाधारणवर्जितचन्द्रतारकादि-
बिम्बजनितबादरपर्याप्ततिर्यग्जीवेषु भवति।
अर्थ: उद्योत नामकर्म शीतल प्रभा करता है। वह चन्द्र, तारागण आदि के बिम्ब में तथा तेजकायिक, वायुकायिक, साधारणकायिक जीवों के सिवाय चन्द्रतारक आदि बिम्ब में होने वाले बादर पर्याप्त तिर्यंच जीवों में होता है।
१२२. उच्छ्वासनामकर्मणः लक्षणम्
उच्छ्वासनाम उच्छ्वासनिःश्वासं करोति।
अर्थ: उच्छ्वास नामकर्म उच्छ्वास और निःश्वास को करता है।
१२३. विहायोगतिनामकर्मणः द्वौ भेदौ
विहायोगतिनाम प्रशस्ताप्रशस्तभेदाद् द्विधा।
अर्थ: विहायोगति नामकर्म प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से दो प्रकार का है।
१२४. प्रशस्तविहायोगतेः लक्षणम्
तत्र प्रशस्तविहायोगतिनाम मनोज्ञं गमनं करोति।
अर्थ: प्रशस्त विहायोगति नामकर्म मनोज्ञ गमन करता है।
१२५. अप्रशस्तविहायोगतेः लक्षणम्
अप्रशस्तविहायोगतिरप्रशस्तगमनं करोति।
अर्थ: अप्रशस्त विहायोगति अप्रशस्त-अमनोज्ञ गमन करता है।
१२६. त्रसनामकर्मणः लक्षणम्
त्रसनाम द्वीन्द्रियादीनां चलनोड्डेजनादियुक्तं त्रसकायं करोति।
अर्थ: त्रस नामकर्म चलन, उड्डेजन आदि युक्त द्वीन्द्रिय आदि रूप त्रसकाय को करता है।
१२७. स्थावरनामकर्मणः लक्षणम्
पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावरनाम पृथिव्याद्येकेन्द्रियाणां चलनो-ड्रेजनादिरहितस्थावरकायं करोति।
अर्थ: पृथ्वी, जल, तेज, वायु और वनस्पति स्थावर नामकर्म पृथ्वी आदि एकेन्द्रियों के चलन, उड्डेजन आदि रहित स्थावरकाय को करता है।
१२८. बादरनामकर्मणः लक्षणम्
बादरनाम परैर्बाध्यमानं स्थूलशरीरं करोति।
अर्थ: बादर नामकर्म दूसरों के द्वारा बाधा दिये जाने योग्य स्थूल शरीर को करता है।
१२९. सूक्ष्मनामकर्मणः लक्षणम्
सूक्ष्मनाम परैरबाध्यमानं सूक्ष्मशरीरं करोति।
अर्थ: सूक्ष्म नामकर्म दूसरों के द्वारा बाधा न दिये जाने योग्य सूक्ष्म शरीर करता है।
१३०. पर्याप्तनामकर्मणः लक्षणम्
पर्याप्तनाम स्वस्वपर्याप्तीनां पूर्णतां करोति।
अर्थ: पर्याप्त नामकर्म स्व-स्व पर्याप्तियों की पूर्णता को करता है।
१३१. अपर्याप्तनामकर्मणः लक्षणम्
अपर्याप्तनाम स्वस्वपर्याप्तीनामपूर्णतां करोति।
अर्थ: अपर्याप्त नामकर्म अपनी-अपनी पर्याप्तियों की अपूर्णता करता है।
१३२. पर्याप्तीनां षड् भेदाः
पर्याप्तयश्चाहारशरीरेन्द्रियोच्छ्वासनिःश्वासभाषामनःसम्बन्धेन षोढा भवन्ति।
अर्थ: आहार, शरीर, इन्द्रिय, उच्छ्वास-निश्वास, भाषा और मन ये पर्याप्ति के छह भेद हैं।
१२६. त्रस नामकर्म का लक्षण / १२७. स्थावर नामकर्म का लक्षण / १२८. बादर नामकर्म का लक्षण / १२९. सूक्ष्म नामकर्म का लक्षण / १३०. पर्याप्त नामकर्म का लक्षण / १३१. अपर्याप्त नामकर्म का लक्षण / १३२. पर्याप्तियों के छह भेद
१३३. आहारपर्याप्तेर्लक्षणम्
तत्राहारवर्गणायातपुद्गलस्कन्धानां खलरसभागरूपेण परिणमने आत्मनः शक्तिनिष्पत्तिराहारपर्याप्तिः।
अर्थ: १३३. आहार पर्याप्ति का लक्षण आहार वर्गणा द्वारा प्राप्त पुद्गल स्कन्धों का खल और रस भाग रूप परिणमन में जीव की शक्ति उत्पन्न होना आहार पर्याप्ति है।
१३४. शरीरपर्याप्तेर्लक्षणम्
खलभागमस्थ्यादिकठिनावयवरूपेण रसभागं रसरुधिरादिद्रवावयवरूपेण च परिणमयितुं जीवस्य
शक्तिनिष्पत्तिः शरीरपर्याप्तिः।
अर्थ: १३४. शरीर पर्याप्ति का लक्षण खल भाग को अस्थि आदि कठिन अवयव रूप से तथा रस भाग को रस, रुधिर आदि द्रव अवयव रूप से परिणत करने में जीव की शक्ति उत्पन्न होना शरीर पर्याप्ति है।
१३५. इन्द्रियपर्याप्तेर्लक्षणम्
स्पर्शनार्दीन्द्रियाणां योग्यदेशावस्थितस्वस्वविषयग्रहणे शक्तिनिष्पत्ति-रिन्द्रियपर्याप्तिः।
अर्थ: १३५. इन्द्रिय पर्याप्ति का लक्षण स्पर्शन आदि इन्द्रियों के योग्य देश में अवस्थित अपना-अपना विषय ग्रहण करने में शक्ति उत्पन्न होना इन्द्रिय पर्याप्ति है।
१३६. उच्छ्वासनिःश्वासपर्याप्तेर्लक्षणम्
आहारवर्गणायातपुद्गलस्कन्धानुच्छ्वासनिःश्वासरूपेण परिणमयितुं जीवस्य शक्तिनिष्पत्ति-
रुच्छ्वासनिःश्वासपर्याप्तिः।
अर्थ: १३६. उच्छ्वास-निःश्वास पर्याप्ति का लक्षण आहार वर्गणा द्वारा प्राप्त पुद्गल स्कन्धों को उच्छ्वास-निःश्वास रूप से परिणत करने के लिए जीव की शक्ति उत्पन्न होना उच्छ्वास-निःश्वास पर्याप्ति है।
१३७. भाषापर्याप्तेर्लक्षणम्
भाषावर्गणायातपुद्गलस्कन्धान्सत्यादिचतुर्विधवाक्स्वरूपेण परिणमयितुं जीवस्य शक्ति-
निष्पत्तिर्भाषापर्याप्तिः।
अर्थ: १३७. भाषा पर्याप्ति का लक्षण भाषा वर्गणा द्वारा प्राप्त पुद्गल स्कन्धों को सत्य आदि चार प्रकार की वाक् रूप से परिणत करने के लिए जीव की शक्ति उत्पन्न होना भाषा पर्याप्ति है।
१३८. मनःपर्याप्तेर्लक्षणम्
दृष्टश्रुतानुमितार्थानां गुणदोषविचारणादिरूपभावमनःपरिणमने मनोवर्णायातपुद्गलस्कन्धानां द्रव्यमनोरूपपरिणामेन परिणमयितुं जीवस्य शक्तिनिष्पत्तिर्मनःपर्याप्तिः।
अर्थ: देखे, सुने तथा अनुमित (अनुमान से जाने गये) अर्थों के गुण-दोष विचारणादि रूप भाव मन के परिणमन में, मनोवर्गणा रूप से प्राप्त पुद्गल स्कन्धों के द्रव्य मनरूप परिणाम द्वारा परिणत करने के लिए जीव की शक्ति उत्पन्न होना मनःपर्याप्ति है।
१३९. प्रत्येकशरीरस्य लक्षणम्
प्रत्येकशरीरनामैकस्य जीवस्यैकशरीरस्वामित्वं करोति।
अर्थ: प्रत्येक शरीर नामकर्म एक जीव को एक शरीर का स्वामी करता है।
१४०. साधारणशरीरस्य लक्षणम्
साधारणशरीरनामानन्तजीवानामेकशरीरस्वामित्वं करोति।
अर्थ: साधारण शरीर नामकर्म अनन्त जीवों को एक शरीर का स्वामी करता है।
१४१. स्थिरनामकर्मणः लक्षणम्
स्थिरनाम रसरुधिरमांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणां सप्तधातूनामचलितत्वं करोति।
अर्थ: स्थिर नामकर्म रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सात धातुओं की स्थिरता को करता है।
१४२. अस्थिरनामकर्मणः लक्षणम्
अस्थिरनाम तेषां चलितत्वं करोति।
अर्थ: अस्थिर नामकर्म उपर्युक्त सप्त धातुओं की अस्थिरता करता है।
१४३. शुभनामकर्मणः लक्षणम्
शुभनाम मस्तकादिप्रशस्तावयवं करोति।
अर्थ: शुभ नामकर्म मस्तक आदि प्रशस्त अवयव करता है।
१४४. अशुभनामकर्मणः लक्षणम्
अशुभनामापानाद्यप्रशस्तावयवं करोति।
अर्थ: अशुभ नामकर्म अपान आदि अप्रशस्त अवयवों को करता है।
१४५. सुभगनामकर्मणः लक्षणम्
सुभगनाम परेषां रुचिरत्वं करोति।
अर्थ: सुभग नामकर्म दूसरों की रुचिरता करता है।
१४६. दुर्भगनामकर्मणः लक्षणम्
दुर्भगनामारुचिरत्वं करोति।
अर्थ: दुर्भग नामकर्म दूसरों की अरुचि करता है।
१४७. सुस्वरनामकर्मणः लक्षणम्
सुस्वरनाम श्रवणरमणीयस्वरं करोति।
अर्थ: सुस्वर नामकर्म कर्णप्रिय स्वर करता है।
१४८. दुःस्वरनामकर्मणः लक्षणम्
दुःस्वरं नाम श्रवणदुस्सहं स्वरं करोति।
अर्थ: दुःस्वर नामकर्म कानों को दुःसह स्वर करता है।
१४९. आदेयनामकर्मणः लक्षणम्
आदेयनाम परेर्मान्यतां करोति।
अर्थ: आदेय नामकर्म दूसरों के द्वारा मान्यता करता है।
१५०. अनादेयनामकर्मणः लक्षणम्
अनादेयनामामान्यतां करोति।
अर्थ: अनादेय नामकर्म अमान्यता करता है।
१५१. यशस्कीर्तिनामकर्मणः लक्षणम्
यशस्कीर्तिनाम गुणकीर्तनं करोति ।
अर्थ: यशस्कीर्ति नामकर्म गुणकीर्तन करता है।
१५२. अयशस्कीर्तिनामकर्मणः लक्षणम्
अयशस्कीर्तिनाम दोषकीर्तनं करोति ।
अर्थ: अयशस्कीर्ति दोषकीर्तन (बदनामी) करता है।
१५३. निर्माणनामकर्मणः लक्षणम्
निर्माणनाम शरीरवत् स्वस्वस्थानेषु स्वस्थितानुप्राञ्जलित्वं करोति।
अर्थ: निर्माण नामकर्म शरीर के अनुसार स्व-स्व स्थानों में शरीरावयवों का उचित निर्माण करता है।
१५४. तीर्थकरत्वनामकर्मणः लक्षणम्
तीर्थकरत्वं नाम पञ्चकल्याणचतुस्त्रिंशदतिशयाष्टमहाप्रातिहार्यसमवशरणादिबहुविधौ-
चित्यविभूतिसंयुक्तार्हन्त्यलक्ष्मीं करोति ।
अर्थ: तीर्थंकर नामकर्म पंचकल्याणक, चौंतीस अतिशय, आठ प्रातिहार्य तथा समवसरण आदि अनेक प्रकार की उचित विभूति से युक्त आर्हन्त्य लक्ष्मी को करता है।
गोत्रम्
१५५. गोत्रकर्मणः द्वौ भेदौ
उच्चनीचभेदाद् गोत्रकर्म द्विधा।
अर्थ: उच्च और नीच के भेद से गोत्रकर्म दो प्रकार का है।
१५६. उच्चगोत्रस्य लक्षणम्
तत्र महाव्रताचरणयोग्योत्तमकुलकारणमुच्चैर्गोत्रम्।
अर्थ: महाव्रतों के आचरण योग्य उत्तम कुल का कारण उच्च गोत्रकर्म कहलाता है।
१५७. नीचगोत्रस्य लक्षणम्
तद्विपरीताचरणयोग्यनीचकुलकारणं नीचैर्गोत्रम् ।
अर्थ: ऊपर बताये के विपरीत आचरण योग्य नीच कुल का कारण नीच गोत्र है।
अन्तरायम्
१५८. अन्तरायकर्मण: पञ्च भेदा:
दानलाभभोगोपभोगवीर्याश्रयभेदादन्तरायकर्म पञ्चधा।
अर्थ: दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय तथा वीर्यान्तराय के भेद से अन्तराय कर्म पाँच प्रकार का है।
१५९. दानान्तरायस्य लक्षणम्
तत्र दानस्य विघ्नहेतुर्दानान्तरायम्।
अर्थ: दान के विघ्न का कारण दानान्तराय होता है।
१६०. लाभान्तरायस्य लक्षणम्
लाभस्य विघ्नहेतुर्लाभान्तरायम्।
अर्थ: लाभ के विघ्न का कारण लाभान्तराय है।
१६१. भोगान्तरायस्य लक्षणम्
भुक्त्वा परिहातव्यो भोगस्तस्य विघ्नहेतुर्भोगान्तरायम्।
अर्थ: जो एक बार भोगकर छोड़ दिया जाता है, उसे भोग कहते हैं। भोगों के अन्तराय का कारण भोगान्तराय है।
१६२. उपभोगान्तरायस्य लक्षणम्
भुक्त्वा पुनश्च भोक्तव्य उपभोगस्तस्य विघ्नहेतुरुपभोगान्तरायम्।
अर्थ: एक बार भोगकर पुन: भोगने योग्य उपभोग कहलाता है, उसके विघ्न का कारण उपभोगान्तराय है।
१६३. वीर्यान्तरायस्य लक्षणम्
वीर्यं शक्ति: सामर्थ्यं तस्य विघ्नहेतुर्वीर्यान्तरायम्।
अर्थ: शक्ति या सामर्थ्य वीर्य है, उसके विघ्न का कारण वीर्यान्तराय है।
१६४. उत्तरप्रकृतिबन्धस्य समाप्तिः
एवमुत्तरप्रकृतिबन्धः कथितः।
अर्थ: इस प्रकार उत्तर प्रकृति-बन्ध कहा।
१६५. उत्तरोत्तरप्रकृतिबन्धस्यागोचरत्वम्
उत्तरोत्तरप्रकृतिबन्धोऽगोचरो भवति।
अर्थ: उत्तरोत्तर प्रकृति-बन्ध अगोचर है।
स्थितिबन्धः
१६६. स्थितिबन्धकथनम्
अथ स्थितिबन्ध उच्यते।
अर्थ: अब स्थिति बन्ध कहते हैं।
१६७. स्थितिबन्धस्य लक्षणम्
ज्ञानावरणीयादिप्रकृतीनां ज्ञानप्रच्छादनादिस्वस्वभावापरित्यगेनावस्थानं स्थितिः।
अर्थ: ज्ञानावरणीय आदि प्रकृतियों का ज्ञान को ढँकने आदि रूप अपने स्वभाव को न छोड़ते हुए स्थित रहना स्थिति है।
१६८. स्थितिबन्धस्य समयः
तत्कालश्चोपचारात्।
अर्थ: उसके काल को उपचार से स्थितिबन्ध कहा जाता है।
१६९. ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयवेदनीयान्तरायस्य चोत्कृष्टा स्थितिः
तद्यथा ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयवेदनीयान्तरायप्रकृतीनामुत्कृष्टा स्थितिस्त्रिंशत्कोटिकोटि-
सागरोपमप्रमिता।
अर्थ: ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय तथा अन्तराय की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटि-कोटि सागर प्रमाण है।
१७०. दर्शनमोहनीयस्योत्कृष्टा स्थितिः
दर्शनमोहनीयस्य सप्ततिः कोटिकोटिसागरोपमप्रमाणा।
अर्थ: दर्शनमोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटि-कोटि सागर प्रमाण है।
१७१. चारित्रमोहनीयस्योत्कृष्टा स्थितिः
चारित्रमोहनीयस्य चत्वारिंशत्कोटिकोटिसागरोपमप्रमिता।
अर्थ: चारित्रमोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति चालीस कोटि-कोटि सागर प्रमाण है।
१७२. नामगोत्रयोरुत्कृष्ट। स्थितिः
नामगोत्रयोर्विंशतिकोटिकोटिसागरोपमप्रमात्री।
अर्थ: नाम और गोत्र की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोटिकोटि सागर प्रमाण है।
१७३. आयुकर्मणः उत्कृष्ट। स्थितिः
आयुष्यकर्मणस्त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमप्रमाणा। इत्युत्कृष्टस्थितिरुक्ता।
अर्थ: आयुकर्म की उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागर प्रमाण है। इस प्रकार उत्कृष्ट स्थिति कही।
१७४. वेदनीयस्य जघन्यस्थितिः
वेदनीयस्य जघन्यस्थितिर्द्वादशमुहूर्ता।
अर्थ: वेदनीयकर्म की जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त है।
१७५. नामगोत्रयोः जघन्यस्थितिः
नामगोत्रयोरष्टौ मुहूर्ता।
अर्थ: नाम और गोत्र की जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त है।
१७६. शेषाणां जघन्यस्थितिः
शेषाणां ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयमोहनीयायुष्यान्तरायाणां जघन्य-स्थितिरन्तर्मुहूर्ता।
अर्थ: शेष ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, आयु तथा अन्तराय की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है।
१७७. सर्वेषां कर्मणां स्थितिः
सर्वेषां कर्मणां स्थितिर्नानाविकल्पा।
अर्थ: सभी कर्मों की स्थिति नाना प्रकार की है।
१७८. स्थितिबन्धकथनस्य उपसंहारः
इति स्थितिरुक्ता।
अर्थ: इस प्रकार स्थितिबन्ध कहा।
अनुभागबन्धः
१७९. अनुभागबन्धकथनस्य प्रतिज्ञा
अथानुभाग उच्यते।
अर्थ: अब अनुभाग बन्ध कहते हैं।
१८०. अनुभागबन्धस्य लक्षणम्
कर्मप्रकृतीनां तीव्रमन्दमध्यमशक्तिविशेषोऽनुभागः।
अर्थ: कर्मप्रकृतियों की तीव्र, मन्द, मध्यम शक्ति विशेष को अनुभाग कहा है।
१८१. घातिकर्मणामनुभागः
घातिकर्मणामनुभागो लतादार्वस्थिशैलसमानचतुःस्थानः।
अर्थ: घाति कर्मों का अनुभाग लता, दारू (काष्ठ), अस्थि तथा शिला के समान चार प्रकार है।
१८२. अघातिकर्मणामनुभागः
अघातिकर्मणामशुभप्रकृतीनामनुभागो निम्बकाञ्जीरविषहालाहल-सदृशचतुःस्थानः, शुभप्रकृती-
नामनुभागो गुडखण्डशर्करामृतसमानचतुःस्थानः।
अर्थ: अघाति कर्मों की अशुभ प्रकृतियों का अनुभाग नीम, कांजीर, विष और हालाहल के समान चार प्रकार का तथा शुभ प्रकृतियों का अनुभाग गुड़, खाण्ड, शर्करा तथा अमृत के समान चार प्रकार का है।
१८३. अनुभागबन्धकथनस्योपसंहारः
इत्यनुभाग उक्तः।
अर्थ: इस प्रकार अनुभाग बन्ध कहा।
प्रदेशबन्धः
१८४. प्रदेशबन्धकथनस्य प्रतिज्ञा
अथ प्रदेश उच्यते।
अर्थ: आगे प्रदेशबन्ध कहते हैं।
१८५. प्रदेशबन्धस्य लक्षणम्
आत्मप्रदेशेषुद्व्यर्थर्धगुणहानिगुणितसमयप्रबद्धमात्राणि सिद्धराश्यनन्तैकभागप्रमितानामभव्य-
जीवस्यानन्तगुणानां सर्वकर्मपरमाणूनां परस्परप्रदेशानुपवेशलक्षणः प्रदेशबन्धः।
अर्थ: आत्मा के प्रदेशों में डेढ़ गुणहानि गुणित समयप्रबद्ध मात्र की सत्ता रहती है तथा प्रति समय सिद्धराशि के अनन्तवें भाग प्रमाण या अभव्य जीवों के अनन्तगुणे समस्त कर्म परमाणुओं का परस्पर प्रदेशों में अनुप्रवेश होना प्रदेशबन्ध है।
१८६. प्रदेशबन्धस्योपसंहारः
इति प्रदेशबन्ध उक्तः।
अर्थ: इस प्रकार प्रदेशबन्ध कहा।
१८७. द्रव्यकर्मणामुपसंहारः
एवं प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशविकल्पानि पौद्गलकानि द्रव्यकर्माणि कथितानि।
अर्थ: इस प्रकार प्रकृति, स्थिति, अनुभाग तथा प्रदेश के भेद से पौद्गलिक द्रव्य कर्म कहे।
भावकर्म
१८८. भावकर्मणः लक्षणम्
उक्तज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मोदयजनिता आत्मनोऽज्ञानरागमिथ्यादर्शनादिपरिणामविशेषा भावकर्माणि।
अर्थ: उक्त ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मों के उदय से होने वाले आत्मा के अज्ञान, राग, मिथ्यादर्शन आदि परिणामविशेष भाव कर्म हैं।
१८९. भावकर्मणां परिमाणम्
तान्यप्यसंख्यातलोकमात्राणि भवन्ति।
अर्थ: वे भाव कर्म असंख्यात लोक प्रमाण हैं।
नोकर्म
१९०. नोकर्मणः लक्षणम्
औदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसशरीरपरिणमनपुद्गलस्कन्धा नोकर्मद्रव्याणि।
अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक, आहारक तथा तैजस शरीर के रूप में परिणत पुद्गल स्कन्ध नोकर्म द्रव्य हैं।
१९१. संसारिजीवस्य लक्षणम्
एवंविधद्रव्यभावनोकर्मसंयुक्ताः पञ्चविधसंसरणपरिणताश्चतसृषु गतिषु परिवर्तमान-
जीवास्संसारिणः।
अर्थ: इस प्रकार द्रव्य कर्म, भाव कर्म तथा नोकर्म से युक्त, पाँच प्रकार के परिवर्तनों में परिणत तथा चार गतियों में भ्रमण करते हुए जीव संसारी हैं।
१९२. मुक्तजीवस्य लक्षणम्
तत्कर्मत्रयमुक्तास्सिद्धगताववस्थिताः क्षायिकसम्यक्त्वज्ञानदर्शनवीर्य-सूक्ष्मत्वावगाहनागुरु-
लघुत्वाव्याबाधरूपाष्टगुणपरिणताः सिद्धपरमेष्ठिनो जीवा मुक्ताः।
अर्थ: उक्त तीन प्रकार के कर्मों से मुक्त, सिद्ध गति में स्थित, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरुलघुत्व तथा अव्याबाधत्वरूप अष्ट गुण परिणत सिद्ध परमेष्ठी मुक्त जीव है।
१९३. संसारिजीवानां द्वौ भेदौ
तत्र संसारिणो जीवा भव्याभव्यभेदेन द्विधा।
अर्थ: संसारी जीव भव्य और अभव्य के भेद से दो प्रकार के हैं।
१९४. भव्यजीवस्य लक्षणम्
तत्र रत्नत्रयसामग्र्याः सकलकर्मक्षयं कृत्वानन्तज्ञानादिस्वरूपोपलब्धि-भवनयोग्यशक्ति-विशेषसहिता
भव्याः।
अर्थ: रत्नत्रय रूप सामग्री के द्वारा समस्त कर्मक्षय करके अनन्त-ज्ञान आदि स्वरूप प्राप्ति होने योग्य शक्ति विशेष से सहित जीव भव्य जीव कहलाते हैं।
१९५. भव्यजीवानां चतुर्दशगुणस्थानानि
तत्र चतुर्दशगुणस्थानवर्तिनो भव्याः।
अर्थ: १९५. भव्य जीवों के चौदह गुणस्थान चौदह गुणस्थानों में स्थित भव्य होते हैं।
१९६. अभव्यजीवस्य लक्षणम्
एकस्मान्मिथ्यादृष्टिगुणस्थानादनिवर्तमाना अभव्याः।
अर्थ: १९६. अभव्य जीव का लक्षण केवल एक मिथ्यात्व गुणस्थान में ही रहने वाले अभव्य जीव होते हैं।
१९७. अभव्यानां करणत्रयाभावः
तेषां कदाचिदपि सम्यग्दर्शनप्राप्तिकारणकरणत्रयविधानासम्भवात्।
अर्थ: १९७. अभव्यों के करणत्रय का अभाव उनके कभी भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के कारण करणत्रय होना असंभव है।
१९८. मिथ्यात्वगुणस्थानम्
तत्र दर्शनमोहनीयस्य मिथ्यात्वप्रकृतेरुदयादतत्त्वश्रद्धानरूपमिथ्यादर्शनपरिणतस्सर्वज्ञवीतराग-प्रणीतं
जीवादितत्त्वमश्रद्दधानस्संशयानो वान्यप्रणीतमतत्त्वं श्रद्दधानो वा जीवो मिथ्यादृष्टिरिति प्रथमगुणस्थान-
वर्ती भवति।
अर्थ: १९८. मिथ्यात्व गुणस्थान दर्शनमोहनीय की मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से अतत्त्वश्रद्धान रूप मिथ्यादर्शन से युक्त, सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत जीव आदि तत्त्वों का अश्रद्धान करने वाला अथवा संशय करने वाला या अन्य प्रणीत अतत्त्वों का श्रद्धान करने वाला जीव मिथ्यादृष्टि नामक प्रथम गुणस्थानवर्ती होता है।
१९९. मिथ्यादृष्टेः सम्यक्त्वस्य विधानम्
अनादिमिथ्यादृष्टिर्वा सादिमिथ्यादृष्टिर्वा लब्धिपञ्चकसंनिधाने प्रथमोपशमसम्यक्त्वं गृह्णाति।
अर्थ: १९९. मिथ्यादृष्टि के सम्यक्त्व का विधान अनादि मिथ्यादृष्टि अथवा सादि मिथ्यादृष्टि पाँच लब्धियों के सद्भाव में प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करता है।
२००. क्षयोपशमलब्धिः
तद्यथा कदाचित्कस्यचिज्जीवस्याशुभकर्मणामनुभागः प्रतिसमयमनन्त-गुणहान्युदेति, इति तेषां
सर्वघातिस्पर्धकानामन्तगुणहानिं विधाय तद्द्रव्यस्य सदवस्था उपशमः, अनन्तहीनानुभागोदये
सत्यपि क्षयोपशम इत्युच्यते। तस्य लब्धिः क्षयोपशमलब्धिः।
अर्थ: कभी किसी जीव के अशुभ कर्मों का अनुभाग प्रतिसमय अनन्त गुण हानि क्रम से उदित होता है। इस प्रकार उन सर्वघाति स्पर्धकों की अनन्त गुणहानि करके उस द्रव्य का सदवस्था रूप उपशम अनन्त हीन अनुभाग के उदय होने पर भी क्षयोपशम कहलाता है। उसकी लब्धि क्षयोपशमलब्धि है।
२०१. विशुद्धिलब्धिः
क्षयोपशमलब्धौ सत्यामुत्पन्नसातादिप्रशस्तप्रकृतिबन्धकारणं जीवस्य यो विशुद्धि-परिणामस्तल्लाभो
विशुद्धिलब्धिः।
अर्थ: सातादि प्रशस्त प्रकृतियों के बन्ध का कारण जीव का जो विशुद्धि परिणाम क्षयोपशम लब्धि के होने पर उत्पन्न होता है उसका लाभ विशुद्धिलब्धि है।
२०२. देशनालब्धिः
षड्द्रव्यपञ्चास्तिकायसप्ततत्त्वनवपदार्थानामुपदेशकारकाचार्योपाध्याय-देशनालाभः उपदेशक-
रहितक्षेत्रे पूर्वोपदिष्टजीवादितत्त्वधारणस्मरणलाभो वा देशनालब्धिः।
अर्थ: छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय, सात तत्त्व तथा नव पदार्थों के उपदेश करने वाले आचार्य, उपाध्याय की देशना का लाभ अथवा उपदेशक रहित क्षेत्र में पूर्व उपदिष्ट जीव आदि तत्त्वों के धारण, स्मरण का लाभ देशनालब्धि है।
२०३. प्रायोग्यतालब्धिः
आयुर्वर्जितसप्तकर्मणामुत्कृष्टस्थितिं विशुद्धिपरिणामविशेषेण खण्डयित्वान्तःकोटिकोटिस्थितिं
स्थापयति लतादार्वस्थिशैलरूपघातिकर्मानुभागं खण्डयित्वा लतादारुरूपद्विस्थानं स्थापयति
तद्विशुद्धि-परिणामयोग्यतालाभः प्रायोग्यलब्धिः।
अर्थ: आयु को छोड़कर शेष सात कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति को विशुद्धि परिणामविशेष द्वारा खण्डित करके अन्तःकोटिकोटि प्रमाण स्थिति में स्थापित करना तथा लता, दारू (काष्ठ), अस्थि, शैलरूप घाति कर्मों के अनुभाग को खण्डित करके लता, दारूरूप दो स्थानों में स्थापित करना है। इस प्रकार की विशुद्धिरूप परिणामों की योग्यता का लाभ प्रायोग्यलब्धि है।
२०४. करणलब्धिः
दर्शनमोहोपशमादिकरणविशुद्धपरिणामः करण इत्युच्यते। तल्लाभः करणलब्धि।
अर्थ: दर्शनमोह के उपशम आदि करने वाला विशुद्धि परिणाम करण कहलाता है, उसका लाभ करणलब्धि है।
२०५. करणस्य त्रयो भेदाः
स च करणोऽधःप्रवृत्तकरणोऽपूर्वकरणोऽनिवृत्तिकरणश्चेति त्रिधा।
अर्थ: वह करण अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण तथा अनिवृत्तिकरण के भेद से तीन प्रकार का है।
२०६. अधःप्रवृत्तकरणस्य कालः
तत्राधःप्रवृत्तकरणकालोऽन्तर्मुहूर्तमात्रः।
अर्थ: अधःप्रवृत्तकरण का काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है।
२०७. अपूर्वकरणस्य कालः
ततः संख्येयगुणहीनोऽपूर्वकरणकालः।
अर्थ: उससे संख्यात गुणहीन अपूर्वकरण का काल है।
२०८. अनिवृत्तिकरणस्य कालः
ततः संख्येयगुणहीनोऽनिवृत्तिकरणकालः।
अर्थ: उससे संख्यात गुणहीन अनिवृत्तिकरण का काल है।
२०९. त्रयाणां करणानां कालः
त्रितयं समुदितमप्यन्तर्मुहूर्तकाल एव।
अर्थ: तीनों करणों का सम्मिलित काल भी अन्तर्मुहूर्त ही है।
२१०. करणत्रयेषु विशुद्धिः
अधःप्रवृत्तकरणप्रथमसमयादारभ्य विशुद्धिः प्रतिसमयमनन्तगुणा अप्यनिवृत्तिकरणचरमसमयं वर्तन्ते।
अर्थ: अधःप्रवृत्तकरण के प्रथम समय से आरम्भ करके विशुद्धि प्रतिसमय अनन्तगुणी होकर भी अनिवृत्तिकरण के चरम समय तक रहती है।
२११. अधःप्रवृत्तकरणकाले विशुद्धिपरिणामः
तत्राधःप्रवृत्तकरणकाले संख्यातलोकमात्रविशुद्धिपरिणामविकल्पा जघन्यमध्यमोत्कृष्टाः सन्ति।
अर्थ: अधःप्रवृत्तकरण के समय में असंख्यात लोकमात्र विशुद्धि परिणाम विकल्प जघन्य, मध्यम तथा उत्कृष्ट होते हैं।
२१२. अधःप्रवृत्तकरणस्याङ्कसंदृष्टिः
तत्राङ्कसंदृष्ट्याधःप्रवृत्तकरणलक्षणमुच्यते-प्रथमसमयनानाजीवानां विशुद्धिपरिणामविकल्पानां
जघन्यखण्डमिदम् ३९। अस्माद्द्वितीयं खण्डं विशेषाधिकम् ४०। तृतीयं विशेषाधिकं ४१। एवं
चरमचतुर्थखण्डं विशेषाधिकं ४२। द्वितीयसमये जघन्यखण्डं प्रथमसमयजघन्यखण्डाद्विशेषाधिकम्
४०। ततो द्वितीयखण्डं विशेषाधिकं ४१। ततस्तृतीयखण्डं विशेषाधिकं ४२। एवं चरमखण्डं
विशेषाधिकं ४३। एवं तृतीयादिसमयेषु जघन्यादिखण्डानि विशेषाधिकानि भवन्ति। ये
केषांचिज्जीवानामुपरिम-समयपरिणमनवर्तिनां विशुद्धिपरिणामविकल्पा अधःस्तनसमयवर्तिनां
केषांचिज्जीवानां विशुद्धिपरिणाम-विकल्पैस्सह सदृशास्सन्तीत्यधःप्रवृत्तकरणसंज्ञा युक्ता। तत्र
प्रथमसमयजघन्यखण्डं चरमसमयचरमखण्डं च केनापि जघन्योत्कृष्टेन सदृशं न भवति, तथापि
तद्द्वयं विहायेतरेषां सर्वेषां खण्डानामुपर्यधश्च सादृश्यमस्तीति, तेनाधःप्रवृत्तकरणसंज्ञा न विरुध्यते।
अस्मिन्नधःप्रवृत्तकरणे प्रशस्तप्रकृतीनामनुभागः प्रतिसमयेऽनन्तगुणं वर्धते, अप्रशस्तप्रकृतीनामनुभागः
प्रतिसमयमनन्तगुणहीनो भवति, संख्यात-सहस्रस्थितिबन्धापसरणानि भवन्ति, प्रतिसमयमनन्त-
गुणवृद्धया विशुद्धिश्च वर्तते, इत्येतानि चत्वार्यावश्यकानि सन्ति। पुनर्गुणश्रेणि-निर्जरागुण-
संक्रमस्थितिकाण्डकघातानुभागकाण्डकघाताश्चेति चत्वार्यावश्यकानि न सन्ति, तत्कारण-
विशुद्धिविशेषाभावात्।
अर्थ: अंकसंदृष्टि की अपेक्षा अधःप्रवृत्तकरण का लक्षण कहते हैं-प्रथम समय में नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम विकल्पों का जघन्य खण्ड ३९ है। इससे द्वितीय खण्ड विशेष अधिक है ४०। इससे तीसरा विशेष अधिक है ४१। इसी प्रकार अन्तिम चौथा खण्ड भी विशेष अधिक है ४२। द्वितीय समय में जघन्य खण्ड प्रथम समय के जघन्य खण्ड से विशेष अधिक है ४०। उससे द्वितीय खण्ड विशेष अधिक है ४१। उससे तृतीय खण्ड विशेष अधिक है ४२। इसी प्रकार अन्तिम चौथा खण्ड विशेष है ४३। इस प्रकार तृतीय आदि समयों में तथा अन्तिम समय में जघन्य आदि खण्ड विशेष अधिक होते हैं। जो किन्हीं जीवों के ऊपर के समय में परिणमन करने वाले विशुद्धि परिणाम विकल्प निम्न समयवर्ती किन्हीं जीवों के विशुद्धि परिणाम विकल्पों के साथ समान होते हैं। इसलिए इसकी अधःप्रवृत्तकरण संज्ञा उचित है। यद्यपि प्रथम समय का जघन्य खण्ड तथा अन्तिम समय का अन्तिम खण्ड किसी भी जघन्य या उत्कृष्ट खण्ड के सदृश नहीं होता, फिर भी उन दोनों को छोड़कर अन्य सभी खण्डों का ऊपर तथा नीचे सादृश्य है, इसलिए अधःप्रवृत्तकरण कहने में विरोध नहीं आता। इस अधःप्रवृत्तकरण में प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग प्रति समय अनन्तगुणा बढ़ता है तथा अप्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग प्रति समय अनन्तगुणा हीन होता है। संख्यात सहस्र स्थितिबन्धापसरण होते हैं तथा प्रति समय अनन्तगुणी वृद्धि के हिसाब से विशुद्धि होती है-ये चार आवश्यक होते हैं, किन्तु गुणश्रेणी निर्जरा, गुणसंक्रम, स्थितिकाण्डकघात तथा अनुभागकाण्डकघात, ये चार आवश्यक नहीं होते हैं; क्योंकि इनके कारण विशुद्धि-विशेषरूप परिणामों का अभाव है।
२१३. अपूर्वकरणम्
ततः परमपूर्वकरणप्रथमसमये गुणश्रेणिनिर्जरागुणसंक्रमस्थितिकाण्ड-कघाताश्च प्रारभ्यन्ते। अत्रापि
जघन्यमध्यमोत्कृष्टा विशुद्धिपरिणामाधःप्रवृत्तपरिणेभ्यो संख्यातलोकगुणिताः सन्ति। तत्र
प्रथमसमयवर्तिनानाजीवविशुद्धिपरिणामा असंख्यातलोकमाता अङ्कसंदृष्ट्या ४५६। एतेऽप्येकेनैव
खण्डं बहुखण्डानीव सन्ति। उपरितनसमयपरिणामैस्सादृश्याभावात्।
द्वितीयसमयपरिणामा विशेषाधिकाः ४७२। एतेऽप्येकमेव खण्डम्। उपर्यधोऽधत्व-
सादृश्याभावाद्बहुखण्डाभावः। एवं तृतीयादिसमयेष्वा-चरमसमयं विशुद्धिपरिणामा एकैकखण्डं
कृताः विशेषाधिकाः सन्ति। अत एव कारणात्पूर्वपूर्वसमयोऽप्रवृत्ता एव विशुद्धिपरिणामा उत्तरसमये
भवन्तीत्यपूर्वकरणसंज्ञा युक्ता। तस्याङ्कसंदृष्टिः -
अर्थ: इसके बाद अपूर्वकरण के प्रथम समय में गुणश्रेणि निर्जरा, गुणसंक्रम, स्थितिकाण्डघात तथा अनुभागकाण्डकघात प्रारम्भ होते हैं। यहाँ भी जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट विशुद्धि परिणाम अधःप्रवृत्तकरण के परिणामों से असंख्यात लोक गुणे होते हैं। यहाँ प्रथम समयवर्ती नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम असंख्यात लोकप्रमाण होते हैं। उनकी अंक संदृष्टि ४५६ है। ये सभी एक ही खण्ड से बहुत खण्डों की तरह होते हैं, क्योंकि ऊपर के समयवर्ती परिणामों के साथ सादृश्य का अभाव है। द्वितीय समयवर्ती परिणाम विशेष अधिक होते हैं ४७२। ये भी एक ही खण्ड है। ऊपर और नीचे अधत्व के सादृश्य का अभाव होने से बहुत खण्ड नहीं होते। इसी प्रकार तृतीय आदि समयों में चरम समय पर्यन्त विशुद्धि परिणाम एक-एक खण्ड करके ही विशेष अधिक होते हैं। इसी कारण से पूर्व-पूर्व समय में नहीं हुए अप्रवृत्त ही विशुद्धि परिणाम उत्तर समय में होते हैं, इसलिए अपूर्वकरण कहना उचित है। इसकी अंक संदृष्टि ऊपर दी है।
२१४. अनिवृत्तिकरणम्
ततः परमनिवृत्तिकरणप्रथमसमये नानाजीवानां विशुद्धिपरिणामोऽपूर्वकरणे चरमसमय-
सर्वोत्कृष्टविशुद्धिपरिणामादनन्तगुणविशुद्धिर्जघन्यमध्यमोत्कृष्टविकल्पा-भावादेकादृश एव ।
द्वितीयसमयेऽपि प्रथमसमयविशुद्धेरनन्तगुणविशुद्धिर्नानाजीवा-नामेकादृश एव विशुद्धिपरिणामो
भवति। एवं तृतीयादिसमयेष्वनिवृत्तिकरणचरमसमयं प्रतिसमयमनन्तगुणवृद्धया विशुद्ध्या
वर्धमानोऽपि नानाजीवानां विशुद्धिपरिणामो जघन्यमध्यमोत्कृष्टविकल्परहित एकादृश एव भवति।
अत एव कारणात्रिवृत्तिभेदो जघन्यमध्यमोत्कृष्टविकल्पपरिणामस्य नास्तीत्यनिवृत्तिकरणसंज्ञा युक्ता।
अर्थ: इसके बाद अनिवृत्तिकरण के प्रथम समय में नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम अपूर्वकरण में चरम समय सर्वोत्कृष्ट विशुद्धि परिणामों से अनन्तगुणे विशुद्ध जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट विकल्पों के न होने के कारण एक सदृश ही होते हैं। द्वितीय समय में भी प्रथम समय की विशुद्धि से अनन्तगुणी विशुद्धियुक्त नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम एक सदृश ही होते हैं। इसी प्रकार तृतीय आदि समयों में अनिवृत्तिकरण के चरम समय पर्यन्त प्रति समय अनन्तगुणी वृद्धि युक्त विशुद्धि से बढ़ने वाले भी नाना जीवों के विशुद्धि परिणाम जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट विकल्प रहित एक सदृश ही होते हैं। इसी कारण से जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट परिणामों में निवृत्तिभेद नहीं है, इसलिए अनिवृत्तिकरण कहना उचित है।
२१३. अपूर्वकरण / २१४. अनिवृत्तिकरण
२१५. अनिवृत्तिकरणस्य विशेषः
तस्यानिवृत्तिकरणस्य चरमसमये भव्यश्चातुर्गतिको मिथ्यादृष्टिः संज्ञी पंचेन्द्रियपर्याप्तो गर्भजो
विशुद्धिवर्धमानः शुभलेश्यो जाग्रदवस्थितो ज्ञानोपयोगवान् अनन्तानुबन्धिक्रोधमानमाया-
लोभान्मिथ्यात्व-सम्यग्मिथ्यात्वसम्यक्त्वप्रकृतिंश्चोपशमय्य प्रथमोपशमसम्यक्त्वं गृह्णाति। तस्य
कालो जघन्योत्कृष्टेनान्तर्मुहूर्तः।
अर्थ: उन अनिवृत्तिकरण के चरम समय में भव्य चारों गतियों में से किसी भी गति में वर्तमान मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, पंचेन्द्रिय, पर्याप्तक, गर्भज, जिसकी विशुद्धि बढ़ रही है, शुभ लेश्या वाला, जागृत, ज्ञानोपयोगवान्, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व तथा सम्यक्प्रकृति का उपशम करके प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करता है। उसका जघन्य तथा उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है।
२१६. सासादननाम द्वितीयगुणस्थानम्
तत्रैकसमयादारभ्य षडावलिसमयपर्यन्ते कालेऽवशिष्टे सति अनन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभानां
मध्येऽन्यतमस्य कषायस्योदये सति जीवः सम्यक्त्वं विराध्य यावन्मिथ्यात्वं प्राप्नोति तावत्सासादन-
सम्यग्दृष्टिर्द्वितीयगुणस्थानवर्ती भवति।
अर्थ: उसमें से एक समय से लेकर षडावलि समय पर्यन्त काल शेष रहने पर अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया तथा लोभ में से किसी एक कषाय के उदय होने पर जीव सम्यक्त्व की विराधना करके जब तक मिथ्यात्व को प्राप्त होता है, तब तक सासादन सम्यग्दृष्टि नामक द्वितीय गुणस्थानवर्ती होता है।
२१७. सासादनगुणस्थानस्य कालः
तस्य कालो जघन्य एकसमय उत्कृष्टः षडावलिमात्रस्ततः परं नियमेन मिथ्यात्वप्रकृते-
रुदयान्मिथ्यादृष्टिर्भवति।
अर्थ: उसका जघन्य काल एक समय तथा उत्कृष्ट षडावलि मात्र है। उसके बाद नियम से मिथ्यात्व प्रकृति का उदय होने के कारण मिथ्यादृष्टि हो जाता है।
२१८. सम्यग्मिथ्यादृष्टिनाम तृतीयगुणस्थानम्
सम्यङ्मिथ्यात्वप्रकृतेर्हदुद्दिष्टसन्मार्गे मिथ्यात्वादिकल्पितदुर्मार्गे च श्रद्धावान् जीवः सम्यग्मिथ्या-
दृष्टिरिति तृतीयगुणस्थानवर्ती भवति।
अर्थ: सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से अर्हन्त द्वारा उपदिष्ट सन्मार्ग में तथा मिथ्यात्व आदि कल्पित दुर्मार्ग में श्रद्धान करने वाला जीव सम्यग्मिथ्यादृष्टि नामक तृतीय गुणस्थानवर्ती होता है।
२१९. तृतीयगुणस्थानस्य स्थितिः
तद्गुणस्थाने उत्तरगत्यायुर्बन्धो मरणं मारणान्तिकसमुद्घाताणुव्रतमहाव्रतग्रहणं च नास्ति। यदा
म्रियते तदा सम्यक्त्वं मिथ्यात्वं वा प्रतिपद्य म्रियते सम्यग्मिथ्यात्वे न म्रियते। सम्यग्मिथ्यात्व-
परिणामात्पूर्वस्मिन्सभ्यक्त्वे वा मिथ्यात्वे वा परभवायुर्बन्धे तदेवासंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थानं वा
मिथ्यादृष्टिगुणस्थानं वा प्राप्य म्रियत इत्यर्थः।
अर्थ: २१९. तृतीय गुणस्थान की स्थिति इस गुणस्थान में आगे की गति के लिए आयु बन्ध, मरण, मारणान्तिक समुद्घात तथा अणुव्रत या महाव्रत का ग्रहण नहीं होता। जब मरता है तो सम्यक्त्व अथवा मिथ्यात्व को प्राप्त करके मरता है। सम्यग्मिथ्यात्व में नहीं मरता अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व परिणाम से पहले सम्यक्त्व अथवा मिथ्यात्व में परभव की आयु का बन्ध होने पर उसी असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान अथवा मिथ्यादृष्टि गुणस्थान को प्राप्त करके मरता है।
२२०. असंयतसम्यग्दृष्टिनाम चतुर्थगुणस्थानम्
औपशमिकसम्यक्त्वे वा क्षायिकसम्यक्त्वे वा वेदकसम्यक्त्वे वा वर्तमानो जीवोऽप्रत्याख्याना-
वरणक्रोधमानमायालोभकषायोदयाद्द्वादशविधेऽसंयमे प्रवृत्तोऽसंयतसम्यग्दृष्टिरिति चतुर्थ-
गुणस्थानवर्ती भवति।
अर्थ: २२०. असंयत सम्यग्दृष्टि नामक चौथा गुणस्थान औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायिकसम्यक्त्व अथवा वेदकसम्यक्त्व में वर्तमान जीव अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया तथा लोभ कषाय के उदय के कारण बारह प्रकार के असंयम में प्रवृत्त रहने से असंयत सम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ गुणस्थानवर्ती होता है।
२२१. देशसंयमो नाम पञ्चमगुणस्थानम्
द्वितीयकषायोदयाभावे जीवोऽणुगुणशिक्षाव्रतरूप एकादशनिलयविशिष्टे देशसंयमे वर्तमानः श्रावक
इति पञ्चमगुणस्थानवर्ती भवति।
अर्थ: २२१. देशसंयम नामक पाँचवाँ गुणस्थान द्वितीय अर्थात् अप्रत्याख्यानावरण कषायों के अभाव में जीव अणुव्रत, गुणव्रत तथा शिक्षाव्रत रूप ग्यारह स्थान विशिष्ट देशसंयम में वर्तमान श्रावक पंचम गुणस्थानवर्ती होता है।
२२२. प्रमत्तसंयतनाम षष्ठगुणस्थानम्
प्रत्याख्यानावरणकषायोदयाभावे महाव्रतरूपं सकलसंयमं प्रतिपद्य संज्वलननोकषाय-
मध्यमानुभागोदयात्पञ्चदशसु प्रमादेषु वर्तमानो जीवः प्रमत्तसंयत इति षष्ठगुणस्थानवर्ती भवति ।
अर्थ: २२२. प्रमत्तसंयत नामक छठा गुणस्थान प्रत्याख्यानावरण कषायों के उदय के अभाव में महाव्रत रूप सकल संयम को प्राप्त करके संज्वलन नोकषाय के मध्यम अनुभाग के उदय के कारण पन्द्रह प्रमादों में वर्तमान जीव प्रमत्त संयत नामक छठे गुणस्थानवर्ती होता है।
२२३. अप्रमत्तसंयतनाम सप्तमगुणस्थानम्
संज्वलनक्रोधमानमायालोभकषायमन्दानुभागोदयात्सकलहिंसादिनिवृत्तिरूपसंयमे प्रमादरहिते
वर्तमानो जीवोऽप्रमत्तसंयत इति सप्तमगुणस्थानवर्ती भवति ।
अर्थ: २२३. अप्रमत्तसंयत नामक सातवाँ गुणस्थान संज्वलन क्रोध, मान, माया तथा लोभ कषाय के मन्द अनुभाग के उदय से सकल हिंसा आदि निवृत्तिरूप प्रमाद रहित संयम में वर्तमान जीव अप्रमत्तसंयत नामक सप्तम गुणस्थानवर्ती होता है।
२२४. सातिशयाप्रमत्तस्य लक्षणम्
स एव यदा क्षपकोपशमश्रेण्यारोहणं प्रत्यभिमुखो भवति तदा करणत्रयमध्येऽधःप्रवृत्तकरणं
करोतीति स एव सातिशयाप्रमत्त इत्युच्यते ।
अर्थ: २२४. सातिशय अप्रमत्तसंयत का लक्षण वही जब क्षपक या उपशम श्रेणी चढ़ने के अभिमुख होता है, तब तीन कारणों में से अधःप्रवृत्तकरण करता है, इसलिए वही सातिशय अप्रमत्त कहलाता है।