Karma & Krambaddhparyay

उदीरणा होती है, यह ख्याल में है, आपने उदाहरण भी उसी का दिया है। मेरा प्रश्न तो वर्तमान में उदय में आ चुकी आयु (भुज्यमान) के अपकर्षण के संबंध में है।

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भुज्यमान आयु में अपकर्षण नहीं होता। उदीरणा ही होती है।

भविष्य पर्याय की आयु (बद्धमान आयु) में ही अपकर्षण हो सकता है जैसे राजा श्रेणिक के केस में।
बद्धमान आयु में उदीरणा नहीं होती।

भुज्यमान आयु - उदीरणा
बद्धमान आयु - उत्कर्षण / अपकर्षण

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बद्धायुष्क की अकाल मृत्यु सम्भव नहीं

ध.१०/४,२,४,३९/२३७/५ परभवि आउए बद्धे पच्छा भुंजमाणाउस्स कदलीघादो णत्थि जहासरूवेण चेव वेदेत्ति जाणावणट्‌ठं ‘कमेण कालगदो’ त्ति उत्तं। परभवियाउअं बंधिय भुंजमाणाउए घादिज्जमाणे को दोसो त्ति उत्ते ण, णिज्जिण्णभुंजमाणाउस्स अपत्तपरभवियाउअउदयस्स चउगइबाहिरस्स जीवस्स अभावप्पसंगादो। = परभव सम्बन्धी आयु के बँधने के पश्चात्‌ भुज्यमान आयु का कदलीघात नहीं होता, किन्तु वह जितनी थी उतनी का ही वेदन करता है, इस बात का ज्ञान कराने के लिए ‘क्रम से काल को प्राप्त होकर’ यह कहा है। प्रश्न –परभविक आयु को बाँधकर भुज्यमान आयु का घात मानने में कौन सा दोष है ? उत्तर –नहीं, क्योंकि जिसकी भुज्यमान आयु की निर्जरा हो गयी है, किन्तु अभी तक जिसके परभविक आयु का उदय नहीं प्राप्त हुआ है, उस जीव का चतुर्गति से बाह्य हो जाने से अभाव प्राप्त होता है।

- जैनेन्द्र, सिद्धान्त कोश, भाग 3, p. 284, मरण, 4.2.
परिस्थिति
मति-श्रुत / क्षयोपशम ज्ञान का statement
केवलज्ञान
1. कोई व्यक्ति, वर्तमान भव की आयु —> 90 वर्ष, अभी वह 60 वर्ष का है, अगले भव के लिए आयु बाँध ली ।
बद्ध-आयुष्क होने से अकालमरण हो ही नहीं सकता अतः “समय पर मृत्यु हुई.”
समय पर मृत्यु हुई.
2. अगले भव की आयु नहीं बांधी हो, लेकिन घटना विशेष से अचानक मरण हो गया. और मरण के समय अगले भव की आयु बांधी.
“अकाल में मृत्यु हो गयी, अचानक मरण हो गया” - ऐसा कहने में आता है.
समय पर मृत्यु हुई.

  1. धवला के उक्त उद्धरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि परभव की आयु बंधने के बाद अकाल मरण नहीं होता. अब आयु का बंधना तो त्रिभाग शेष रहने पर यथायोग्य आठ अपकर्ष कालों में कभी भी हो सकता है. लेकिन यदि हम ऐसा कहें कि अधिकतर जीवों का अकाल मरण होता है, सो इसका मतलब तो यह हुआ कि सभी को आयु जीवन के अंतिम अंतर्मुहुर्त्त में ही बंधेंगी - यह तो अनुमान एवं आगम से सिद्ध नहीं होता.
  2. मृत्यु जब भी हो, वह केवलज्ञान की अपेक्षा तो अपने समय पर ही हुई. इससे क्रमबद्ध पर्याय सिद्धान्त का कोई विरोध नहीं है. जब क्रमबद्ध पर्याय की चर्चा भी नहीं होती थी, सामान्य लोगों को कदलीघात मरण, अकाल मृत्यु आदि के सन्दर्भ में अवग्रह भी नहीं था. आगम में अलग अलग अपेक्षा से कथन होते है, परस्पर विरोधी कथन नहीं.

Possibilities will always be infinite and actuality will be only one of them (see this discussion above). Omniscient being captures both of them - possibility as a possibility and actuality as actuality. However, we have certain limitations and can only think / predict of possible events. When things don’t go as per our predictions, we say that it happened spontaneously or all of a sudden. For us, it might appear to be uncertain / random. This does not lead to the conclusion that the event itself occurred randomly, rather it just appears to be so (to us).
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@jinesh ji bahot achha khulasa kia

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I read about a new theory today - “Determinism” which looks similar to this.

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@Abhay Check this:

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  1. यदि मरीचि के जीव ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध नहीं किया था तो आदिनाथ भगवान को कैसे पता चला कि तीर्थंकर बनेंगें? यह तो क्रमबद्धता ही हुई। और यदि यह बोला जाता है कि पुण्य बांध लिया था तो पुण्य का फल तो कामदेव चक्रवर्ती किसी भी रूप में मिल सकता था।

  2. यदि क्रमबद्धता नहीं हैं तो केवलज्ञान में भविष्य भी जानने में आया वो कैसे सिद्ध होगा क्योंकि कर्मवर्ती पर्याय तो हमारे करने पर dependent हो गयी और जब तक हम कुछ करेंगे नही तो आगे का दिखेगा कैसे??

  3. पर्याय पुद्गल होती है , यदि जीव को कर्ता माना जाय तो दो द्रव्यों में एक दुसरे के कर्ता होने का दोष नही आयगा क्या?

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:ok_hand:t2::writing_hand:कारणशुद्ध पर्याय और क्रमबद्धपर्याय में संभावित अंतर:writing_hand::ok_hand:t2:
क्रमशः-क्रमांक -3
नंबर 20 -कारणशुद्धपर्याय द्रव्य या गुणों का वर्तमान स्वरूप है ।अर्थात हम जब जब द्रव्य को ध्रुव को
देखने या अनुभवने जाएंगे तो वह वर्तमान में जैसे होगा वैसे ही अनुभव में आयगा।
वह *वर्तमान *भूत और भविष्य तीनों काल एक रूप ही है।
फिर भी उत्पाद वाली वर्तमान पर्याय त्रिकाली के वर्तमान कारणशुद्धपर्याय का आश्रय लेकर के निर्मल परिणमित होता है इसलिए यह कारणशुद्ध पर्याय द्रव्य का वर्तमान है और क्रमबद्ध पर्याय वर्तमान अपने कालक्रम में आने वाला उत्पाद रूप वर्तमान परिणमन है।

नंबर 21 -कारणशुद्धपर्याय के जानने से पर में से कार्य पने की खोज की वृत्ति मिट जाती है ।
क्योंकि हमारी शुद्धता का कारण कारणशुद्धपर्याय के रूप में हमारे अंदर ही है।

तथा क्रमबद्ध पर्याय हमें पर्याय को पलटने बदलने सुधारने की वृत्ति को मिटा कर ज्ञाता धारा प्रगट हो यह मार्ग प्रसस्त करती है।

नंबर 22 -कारणशुद्धपर्याय पारणामिक भाव रूप है।
क्योंकि समस्त द्रव्य और गुण त्रिकाल पारिणामिक रूप में ही अवस्थित है ।
और उस त्रिकाल का यह वर्तमान है तो यह वर्तमान भी पारिणामिक भाव रूप ही रहा ना ।
जबकि क्रमबद्ध पर्याय उदय उपशम क्षयोपशम या क्षायक भाव रूप ही होती हैं।जीव की अपेक्षा से जबकिअन्य द्रव्यों की क्रमबद्ध पर्याय में उदय उपशम क्षयोपशम या क्षायक ऐसे भेद नहीं होते हैं।

नंबर 23- कारणशुद्धपर्याय पर चार अभाव में से मात्र अत्यंताभाव ही लागू होता है क्योंकि दो द्रव्यों के बीच में अत्यंताभाव ही लागू होता है कारणशुद्धपर्याय द्रव्य होने से अर्थात पूर्णवस्तु होने से अन्य द्रव्य सेपृथक ही रहता है ।

जबकि क्रमबद्ध पर्याय अपने पूर्व और उत्तर की पर्योयों का वर्तमान पर्याय में अभाव होने से उनमें प्रागभाव लागू होता है।
नोट - अभी तक पिछले 2 एपिसोड में हमने जो कुछ भेजा है वह पूज्य गुरुदेव श्री की ही देन है ।
उनका ही चिंतन था उनका ही अनुभव था जो उन्होंने आगम का और आध्यात्म का मंथन करके इस कारणशुद्धपर्याय को नियमसार के आधार से और क्रमबद्ध पर्याय को समयसार आदि ग्रंथों के आधार से निकालकर हम सबको परोसा ।
यह अंतर बताने का हेतु इतना मात्र है कि कोई कारण शुद्धपर्याय को ही क्रमबद्ध पर्याय ना मान ले ।एवं कुछ लोग कारणशुद्धपर्याय को चर्चा का विषय ही नहीं बनाना चाहते क्यों क्योंकि उन्हें लगता है यह नहीं समझे तो भी हमारी मुक्ति हो सकती है ।
यह सत्य है परंतु जब तक हमें अपने कार्य का कारण पर को मानेंगे तब तक कभी हमें मोक्षमार्ग की शुरुआत नहीं होगी ।
इसलिए कारणशुद्धपर्याय हमें अपने कार्य शुद्ध पर्याय का कारणपना हमारे अंदर ही है यह बता कर स्वसन्मुख होने का परम पुरुषार्थ जगाने वाला उत्कृष्ट तत्व है ।
यदि इन अंतरों में से किसी को कुछ आगम विपरीत लगे या समझ में नहीं आए तो हमसे फोन करके पूछ सकते हैं ।
जय जिनेंद्र ।
रमेश मंगल सोनगढ़ मोबाइल नंबर 9106168984

56 minutes video where 6-7 present famous Jain munis criticise Krambaddh paryay. I don’t know when time will come when fundamental differences in Jainism will be solved.

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द्रव्य और पर्याय का स्वरूप
चर्चा क्रमांक ०५

अब पर्याय के क्रमवर्तीपने की सविस्तार चर्चा करते है। पर्याय के क्रमवर्तीपने का यह सिद्धांत विश्व व्यवस्था का मूल है। “पर्याय नाना-नाना रूप होती है। जो परिणति पहले समय में थी , वह दूसरे समय में नही होती। समय-समय में उत्पाद-व्यय रूप होता है। इसलिए पर्याय क्रमवर्ती कही जाती है।” - श्री परमात्मप्रकाश जी , दोहा ५७ का भावार्थ। इसी के आधार पर यहाँ क्रमवर्ती-पर्याय को देखते है – द्रव्य में हर समय नयी-नयी पर्याय प्रगटती है। यह कैसे प्रगटती है ? एक क्रम के साथ प्रगटती है। तथा इनका स्वभाव यह है कि यह कभी भी अपने क्रम के खिलाफ हो कर नही चलती। आगम में उदाहरण देते है कि बालपने के पश्चात् निश्चयतः युवावस्था आनी है तथा इसके पश्चात् वृद्धावस्था। ऐसा कभी सम्भव नही कि जीव बाल्यकाल के पश्चात् पहले वृद्ध हो फिर युवा हो। ऐसा क्यों नही हो सकता ? क्योंकि पर्याय का क्रमवर्तीपना ही कुछ ऐसा है। तीनों कालों की द्रव्य की कुल अनन्त पर्याये होती हैं , अनादि काल से वह अबतक तथा अब से लेकर वह अनन्तकाल तक एक series का ही अनुसरण कर रही हैं। वह सदा अपने इस क्रम में बद्ध है , इसलिए ही इसे क्रमबद्धपर्याय कहा जाता है। अथवा अपने क्रम को नियमित बनाकर आ रही है , इसलिए यह क्रमनियमित पर्याय - इस नाम से भी जानी जाती है। इन्हें समझने के लिए एक सामान्य-सा उदाहरण मोती की माला का है। जैसे माला में दाने एक-एक कर क्रमवार आते है , ऐसे ही पर्याय भी एक-एक कर क्रमवार आती है। ऐसा संभव नही कि पहले दाने के बाद तीसरा दाना माला में आए। इसी भांति ऐसा भी संभव नही कि पहली पर्याय के बाद दूसरी पर्याय न आकर कोई तीसरी-चौथी पर्याय आ जाए। यह पर्याये क्रमवार उत्पन्न होती हैं , तथा व्यतिरेक के साथ उत्पन्न होती है - यह इनका अपना लक्षण है। कोई कितना भी जोर क्यों न लगा ले , लेकिन द्रव्य में जिस समय उसकी योग्यतानुसार जैसी पर्याय प्रगटनी है , वैसी ही प्रगटेगी। यह ही एक-एक पर्याय की स्वतंत्रता का शंखनाद है। चाहे कोई नरेंद्र-सुरेंद्र-फणीन्द्र ही क्यों न हो ? लेकिन कोई भी एक समय की पर्याय तक का फेर करवाने में समर्थ नही। अर्थात् यदि किसी जीव में अभी सम्यक्त्व ग्रहण करने योग्य रूप सामर्थ्य उसकी पर्याय में नही प्रगटी है , तो वह जीव कितना ही धर्मानुसार आचरण करे , साक्षात् दिव्यध्वनि का भी श्रवण करे। किंतु वह सम्यक्त्व नही पा सकता। लेकिन यदि किसी जीव की योग्यता ऐसी हो गयी है , तो देखो ! जो शिवभूति मुनिराज एक वाक्य तक याद न रख पाते थे वह मात्र दाल-छिलका अलग होता देख सारा अध्यात्म जान गए। और उसी भव से मोक्ष भी गए। कोई अमुक कार्य होना है तो उसके लिए कारण तो सहज ही उपलब्ध होंगे , उनके लिए साधन जुटाना तो अपना मिथ्यात्व है। आगम में कहतें है न पाँच समवाय को एक करवाना नही पड़ता , वह सहज ही मिलकर एक होते है। इसलिए व्यर्थ का कर्तापन का बोझ ढोना तो बंध का ही कारण है। इसलिए निजात्मा का जो परम अकर्तापन का भाव है , वह ही उत्तम है। यहाँ प्रश्न - अमुक कार्य होने के लिए निमित्त भी तो चाहिए ? समाधान - भाई ! निमित्त उपलब्ध हो या न हो उससे कोई फेर नही पड़ता। उपादान शक्ति तो द्रव्य की ही है। जैसा कि पीछे यह जानकर आ ही रहे है कि यदि द्रव्य में किसी कार्य मे ऐसी उपादान शक्ति नही है कि कोई कोई कार्य उसमें हो तो , निमित्त ऐसे में क्या करे ? उदाहरण के लिए समवसरण में बहुत से जीव दिव्यध्वनि का श्रवण करते है। किंतु उनमें सम्यक्त्व तो कुछ ही पाते है। लेकिन सब क्यों नही पाते ? सब इसलिए नही पाते क्योंकि वहाँ त्रिकाली उपादान से तो सबमें ऐसी सामर्थ्य है कि वह सम्यक्त्व ग्रहण कर ले किन्तु क्षणिक उपादान से ऐसी तत्समय की योग्यता कुछ को ही प्रकट हुई है कि वह समकित को ग्रहण कर सके। जिन्होंने सम्यक्त्व ग्रहण किया , उनके लिए तो दिव्यध्वनि पर ऐसा आरोप आता है कि उसके कारण ही जीव ने सम्यक्त्व ग्रहण किया। किंतु हम यह नही भूल सकते कि यह उपादान शक्ति तो उस जीव की थी , जो उसने समकित पाया। यदि निमित्त के बल से ही कार्य होता हो, तब तो सब ही जीव समकित पा लेते। अब कोई कहता है कि फिर दिव्यध्वनि का आदर क्यों करे जब सम्यक्त्व तो अपने ही बल से हुआ ? यहाँ उत्तर – देखो , भव्य जीव को दिव्यध्वनि का आदर आए बिना नही रहता। क्योंकि वह अवश्य ही यह जानता है कि सम्यक्त्व अपने ही बल से होना है तो भी लोकव्यवहार में निमित्त को स्थान देना पड़ता है। वरना तो जीव कृतघ्न कहलाया जाता है। तथा निमित्त पर कार्य के होने में कारण होने का आरोप तो आता ही है। तो भी शक्ति तो उपादान की ही है - बस इतना श्रद्धान होना चाहिए। पर्याय के क्रमवर्तीपन का ही विशेष कथन आगे होगा।

क्रमबद्धपर्याय के 2 रूप हैं - एक कर्म-सापेक्ष, एक ज्ञान सापेक्ष।

जो कर्म सापेक्ष है वह तो नियत परिणमनशील है।
जो ज्ञान सापेक्ष है वह नियत ध्रुव है।

कर्म सापेक्ष क्रमबद्धपर्याय को जानने वाले - अवधि, मनःपर्यय, केवलज्ञानी
ज्ञान सापेक्ष क्रमबद्धपर्याय को जानने वाले - मात्र केवलज्ञानी

हमसब भी क्रमबद्धपर्याय को जान सकते हैं किन्तु मात्र अनुमान से।

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आगम से भी जान सकते हैं?

कैसे और किस आगम से

All agam se, sabhi anuyogo se.

मेरा यह प्रश्न है कि क्या परोक्ष प्रमाण के भेद आगम से जान सकते हैं क्या?

आगम का स्वरूप
किसी सर्वज्ञ के द्वारा प्रत्यक्ष जाने गए विषय को अनुमान से (परोक्ष से) स्वीकार कर श्रद्धा में स्थापित करके सरलतम आधुनिक भाषा में परम-श्रद्धावन्त जीवों के वचनों को आगम कहते हैं।

बिल्कुल जान सकते हैं।

उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार वह भी अनुमान ही है।

इसलिए प्रत्येक आगमिक प्रस्तुतिकरण से क्रमबद्धपर्याय प्रसिद्ध ही है।

भाई! शब्दों एवं वाक्यों से नहीं अपितु सिद्धान्तों के स्थितिकरण से ही आगम की प्रामाणिकता है और सर्वज्ञता को सिद्ध करने वाले इस प्रमाण से अरहन्त की प्रामाणिकता ही सिद्ध नहीं की जा सकेगी

[इस विषय की प्रारम्भिक चर्चा पर भी दृष्टिपात करें]

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मेरा एक ही प्रश्न हैं की कोई जीव भव्य हैं या अभव्य हैं यह केवली ने कैसे जाना हैं? कर्म के आधार पर भी जीव भव्य हैं या अभव्य हैं, यह नहीं पता चलता क्योंकि भव्यत्व पारिणामिक भाव हैं। इसलिए केवली भविष्य को जानते ही हैं, क्योंकि उन्होंने जीवो के भव्य और अभव्य बताये हैं।
और फिर कर्म के आधार पर तो केवल जीव का भविष्य जाना जा सकता हैं। क्या वे अजीव द्रव्यों का भविष्य नहीं जानते हैं। यदि जानते हैं तो कितना और कब तक का इसका नियम कैसे बताओगे?

As what we had already stated that we only know of his divine ability to know limitless through a certain disposition and not through certainty; why, my dear!, do you want to be so certain about it.

If he knows limitless as limitless, we only have a limit to reach to his certainty.

मात्र आगम से!
अभव्य-भव्य ये दो ही भेद होते होंगे सर्वज्ञ के ज्ञान में, बाकी के तो हमने/अवधि/मनःपर्यय ज्ञानियों ने अपनी-अपनी अपेक्षा उनके विभाजन समझने की दृष्टि से किये होंगे।

निश्चितता ही केवलज्ञान की दिव्यता है। अनिश्चितता ही श्रद्धा का परिमाण।

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