मेरे कर्मों ने चाल चल दी है,
और अब मेरी चाल के इंतजार में हैं !
मगर, मैं कब से इन कर्मों के
उदय, अवस्था, जो पुण्य-पाप रूप है,
तीव्र-मंद रूप है, इन्हें देखकर सोचता हूँ…
ये कर्म, ये उदय क्या है ?
यदि मैं ये समझूँ की ये जो कर्म हैं
सिर्फ पुद्गल की हैं अवस्था ..
तो जीतना क्या है, हारना क्या है ?
न ये जरूरी है, न ये अहम् है!
यदि इरादा नहीं है जीतने का
और नाहीं हारने का
तो इन्हें समझना बेकार है
फिर तो चार गति का चक्कर है!
यदि हराना है इन्हें, तो श्रद्धा में निर्णय कर लूं की,
ये दर्शनावरण, ये ज्ञानावरण, ये साता-असाता
सच मुच के हैं कर्म,
क्योंकि इनका आधार है जीव !
इनके आगे है कर्मों की वह फौज, जो रखती है
मुझे तबाह करने के सारे मनसूबे और इरादे !
मगर ऐसा जो मैं मान भी लूं
तो मैं सोचता हूँ, की ये जंग है!
ये जंग है उसके लिये,
जिसने ठानी हैं जीतने की
ये जंग जीती है पांडवों ने,
ये जंग जीती है गजकुमार ने,
ये जंग जीती है हर उस आत्मा ने
जिसने ठानी है जीतने की !
मैं सोचता हूँ, ये जो खेल है
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है ?
कि कोई कर्म रहा तो चलेगा
मगर जो मोह है, कर्मों का बादशाह
उसे मूल से पहले हराना है !
बस ये भेदज्ञान का आरा ही इसे काट सकता है !
क्योंकि यह कैसे भी चलाया जा सकता है
आगे पीछे, दाएँ-बाएँ…
मैं सोचता हूँ , ये जो खेल है
इसका यह उसूल अच्छा है!
भेदज्ञान का आरा यदि चला
तो कर्म हमेशा के लिये छोड़ जायेंगे !
मैं सोचता हूँ यदि यही हैं उसूल
तो फिर ये अच्छा है ।
अगर यही हैं ये खेल, तो खेल में मजा है !
मैं इन अवस्था से जाने कब से उलझ रहा था
इन कर्मों ने चाल चल दी है,
अब मैंने भी ये भेद ज्ञान रूपी आरा चलाया है
बस, अब तो इंतजार है, उस अवस्था का
जब मैं कर्मों से रहित
एक pure soul शुद्धात्मा को पाऊँगा!
जय जिनेंद्र!
रचनाकार: अनिता रानडिवे (ANITA RANDIVE), औरंगाबाद
Instagram: @Anita_2764