[कल्याण मन्दिर संस्कृत स्तोत्र के रचयिता श्री कुमुदचन्द्राचार्य हैं। इसमें भगवान् पार्श्वनाथ की स्तुति होने से इसका नाम पार्श्वनाथ स्तोत्र भी है परन्तु स्तोत्र ‘कल्याण मन्दिर’ शब्दों से प्रारम्भ होने के कारण इसका यही नाम पड़ गया है। कहा जाता है कि उज्जयिनी में वादविवाद में इसके प्रभाव से एक अन्य देव की मूर्ति से श्री पार्श्वनाथ की प्रतिमा प्रकट हो गयी थी। इस स्तोत्र की अपूर्व महिमा मानी गयी है। इसके पाठ और जाप से समस्त विघ्न बाधायें दूर होती हैं तथा सुख शान्ति मिलती है।]
दोहा-परम-ज्योति परमात्मा, परम-ज्ञान परवीन।
वंदूं परमानंद मय घट-घट-अन्तर-लीन॥१॥
निर्भय करन परम-परधान। भव-समुद्र-जल-तारन-यान॥
शिव-मंदिर अघ-हरन अनिंद। वंदहु पास-चरन अरविन्द॥
कमठ-मान-भंजन वर-वीर। गरिमा-सागर गुन-गंभीर॥
सुर-गुरु पार लहैं नहिं जास। मैं अजान जंपूँ जस तास॥२॥
प्रभु-स्वरूप अति अगम अथाह। क्यों हम-सेती होय निवाह॥
ज्यों दिन अंध उलूको पोत,कहि न सकै रवि-किरण-उदोत॥३॥
मोह-हीन जाने मनमाहिं। तोहु न तुम गुन वरने जाहिं॥
प्रलय-पयोधि करै जल बौन,प्रगटहिं रतन गिनै तिहिं कौन॥४॥
तुम असंख्य निर्मल गुणखान। मैं मतिहीन कहूँ निज बान॥
ज्यों बालक निज बांह पसार। सागर परमित कहै विचार॥५॥
जे जोगीन्द्र करहिं तप-खेद। तऊ न जानहिं तुम गुनभेद
भक्तिभाव मुझ मन अभिलाख। ज्यों पंछी बोलै निज भाख।६
तुम जस-महिमा अगम अपार। नाम एक त्रिभुवन-आधार॥
आवै पवन पदमसर होय गीषम-तपन निवारै सोय॥७॥
तुम आवत भवि-जन घटमाहिं।कर्मनि-बन्ध शिथिल ह्वै जाहिं
ज्यों चन्दन-तरु बोलहिं मोर। डरहिं भुजंग लगे चहुँ ओर॥८॥
तुम निरखत जन दीनदयाल। संकटतैं छूटैं तत्काल॥
ज्यों पशु घेर लेहिं निशि चोर। जे तज भागहिं देखत भोर।९
तू भविजन-तारक किमि होहि। ते चितधार तिरहिं ले तोहि।
यह ऐसैं कर जान स्वभाव तिरहिं मसक ज्यों गभित वाव।१०
जिहँ सब देव किये वश वाम। तैं छिन में जीत्यो सो काम॥
ज्यों जल करै अगनि-कुल हान। बड़वानल पीवै सो पान॥११।
तुम अनन्त गरवा गुन लिए। क्योंकर भक्ति धरो निज हिये॥
ह्वै लघुरूप तिरहिं नसार। यह प्रभु महिमा अगम अपार॥१२॥
क्रोध निवार कियो मन शांत। कर्म-सुभट जीते किहि भाँत।
यह पटतर देखहु संसार। नील विरछ ज्यों दहै तुषार॥१३॥
मुनिजन हिये कमल निज टोहि।सिद्धरूप सम ध्यावहिं तोहि॥
कमल-कर्णिका बिन-नहिं और।कमल बीज उपजन की ठौर।१४
जब तुव ध्यान धरै मुनि कोय। तब विदेह-परमातम होय॥
जैसे धातु शिला-तनु त्याग। कनक स्वरूप धवै जब आग॥१५॥
जाके मन तुम करहु निवास। विनशि जाय क्यों विग्रह तास॥
ज्यों महंत बिच आवे कोय। विग्रहमूल निवारै सोय॥१६॥
करहिं विबुध जे आतमध्यान। तुम प्रभावतैं होय निधान।
जैसे नीर सुधा अनुमान। पीवत विष-विकारकी हान॥१७॥
तुम भगवन्त विमल गुणलीन। समल रूप मानहिं मतिहीन॥
ज्यों नीलिआ रोग दृग गहै। वर्ण विवर्ण शंखसों कहै।१८॥
दोहा-निकट रहत उपदेश सुन तरुवर भयो अशोक।
ज्यों रवि ऊगत जीव सब, प्रगट होत भुविलोक॥१९॥
सुमनवृष्टि ज्यों सुर करहिं, हेठ बीठमुख सोहिं।
त्यों तुम सेवत सुमनजन बंध अधोमुख होंहिं॥२०॥
उपजी तुम हिय उदधितैं, वाणी सुधा समान।
जिहँ पीवत भविजन लहहिं, अजर अमर-पदथान॥२१॥
कहहिं सार तिहुँ लोककी, ये सुर-चामर दोय।
भावसहित जो जिन नमैं, तिहँ गति ऊरध होय॥२२॥
सिंहासन गिरिमेरु सम, प्रभु धुनि गरजत घोर।
श्याम सुतनु घनरूप लखि, नाचत भविजन मोर॥२३॥
छबि-हत होत अशोक दल, तुम भामंडल देख।
वीतराग के निकट रह रहत न राग विशेष॥२४॥
सीख कहै तिहुँ लोक को ये सुर दुंदुभि-नाद।
शिवपथ-सारथि-वाह जिन, भजहु तजहु परमाद॥२५॥
तीन छत्र त्रिभुवन उदित, मुक्तागण छबि देत।
त्रिविध रूप धर मनहु शशि सेवत नखत समेत॥२६॥
पद्धरि छन्द
प्रभु तुम शरीर दुति रतन जेम।
परताप पुंज जिम शुद्ध हेम॥
अति धवल सुजस रूपा समान।
तिनके गढ़ तीन विराजमान॥२७॥
सेवहिं सुरेन्द्र कर नमत भाल।
तिन सीस मुकुट तज देहिं माल॥
तुम चरण लगत लहलहै प्रीति।
नहिं रमहिं और जन सुमन रीति॥२८॥
प्रभु भोग-विमुख तन गरम दाह।
जन पार करत भवजल निवाह॥
ज्यों माटी - कलश सुपक्व होय।
लेभार अधोमुख तिरहिं तोय॥२९॥
तुम महाराज निरधन निराश।
तज विभव विभव सब जगप्रकाश॥
अक्षर स्वभाव सुलिखैं न कोय।
महिमा भगवंत अनंत सोय॥३०॥
कर कोप कमठ निज बैर देख।
तिन करी धूलि वरषा विशेष॥
प्रभु तुम छाया नहिं भई हीन।
सो भयो पापि लंपट मलीन॥३१॥
गरजत घोर घन अंधकार।
चमकंत विज्जु जल मुसल-धार॥
वरषत कमठ धर ध्यान रुद्र।
दुस्तर करन्त निज भव-समुद्र॥३२॥
वास्तु छन्द
मेघमाली मेघमाली आप बल फोरि। भेजे तुरत पिशाचगण, नाथ पास उपसर्ग कारण। अग्नि जाल झलकंत मुख,
धुनिकरत जिमि मत्तवारण। कालरूप विकराल तन, मुंडमाल
हित कंठ। ह्वै निशंक वह रंक निज, करै कर्म दृढगंठ।३३॥
चौपाई
जे तुम चरण-कमल तिहुँकाल, सेवहिं तज माया जंजाल।
भाव भगति मन हरष अपार, धन्य-धन्य जग तिन अवतार।३४
भवसागर में फिरत अजान, मैं तुम सुजस सुन्यो नहिं कान।
जो प्रभु-नाम-मंत्र मन धरै, तासों विपति भुजंगम डरै॥३५॥
मन-वांछित फल जिनपद माहिं, मैं पूरब भव पूजे नाहिं।
माया-मगन फिर्यो अज्ञान,करहिं रंक-जन मुझ अपमान॥३६॥
मोहतिमिर छायो दृग मोहि, जन्मान्तर देख्यो नहिं तोहि।
तो दुर्जन मुझ संगति गहै, मरम छेदके कुवचन कहैं॥३७॥
सुन्यो कान जस पूजे पाय, नैनन देख्यो रूप अघाय।
भक्ति हेतु न भयो चित चाव,दुखदायक किरिया बिन भाव३८
महाराज शरणागत पाल, पतित-उधारण दीनदयाल।
सुमरन करहुं नाय निज शीश;मुझ दुख दूर करहु जगदीश।३९
कर्म-निकंदन-महिमा सार, अशरण-शरण सुजस विस्तार।
नहिं सेये प्रभु तुमरे पाय, तो मुझ जन्म अकारथ जाय॥४०॥
सुरगन-वंदित दया-निधान, जग-तारण जगपति अनजान।
दुख-सागरतैं मोहि निकासि, निर्भय थान देहु सुखरासि॥४१॥
मैं तुम चरण कमल गुणगाय, बहु-विधि भक्ति करी मनलाय।
जनम-जनम प्रभु पाऊँ तोहि, यह सेवाफल दीजै मोहि॥४२॥
दोधकांत वेसरी छंद-षट्पद।
इहविधि श्री भगवंत, सुजस जे भविजन भाषहिं॥
ते जिन पुण्यभंडार, संचि चिर-पाप प्रणासहिं॥
रोम-रोम हुलसंति, अंग प्रभु-गुण मन ध्यावहिं।
स्वर्ग संपदा भुंज वेग पंचमगति पावहिं॥४३॥
यह कल्याणमंदिर कियो, कुमुदचंद्रकी बुद्धि।
भाषा कहत ‘बनारसी’ कारण समकित-शुद्धि॥४४॥
इस प्रकार कल्याणमन्दिर का कविवर बनारसीदास जी कृत
भाषानुवाद समाप्त हुआ।
Artist: कविवर बनारसीदास
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ३१९ से ३२४