कल्याणमंदिर स्तोत्र एवं पर्यावरण-संरक्षण | Kalyanamandir Stotr Evan Paryavaran Sanrakshan

कल्याणमंदिर स्तोत्र एवं पर्यावरण-संरक्षण

-प्रो. वीरसागर जैन

भारतीय वाङ्ङ्ग्य में जैन वाङ्ङ्ग्य का असाधारण स्थान है। परिमाण, गुणवत्ता, विविधता आदि अनेक दृष्टियों से जैन वाङ्ग्य को साहित्य-समीक्षकों ने अनुपम सिद्ध किया है। ज्ञान-विज्ञान की प्रायः प्रत्येक शाखा पर और वह भी साहित्य की प्रायः प्रत्येक विधा पर विपुल मात्रा में जैन वाङ्मय उपलब्ध होता है।

जैनवाङ्मय की इसी महत्ता से प्रभावित होकर महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने एक स्थान पर लिखा है कि- “सृष्टि की रचना किसने की- यह तो मुझे पता नहीं, पर साहित्य की सृष्टि तो जैन लेखकों ने ही की है।”

बहरहाल, जैन वाद्मय में भी जैन-स्तोत्र-साहित्य का आसाधारण स्थान है । डॉ. नेमिचन्द्र शास्त्री (संस्कृतकाव्य के विकास में जैन कवियों का योगदान, पृष्ट ) के अनुसार संस्कृत भाषा में 1000 से अधिक जैन स्तोत्र उपलब्ध होते हैं तथा इन स्तोत्रों में भक्ति, अध्यात्म, और दर्शन की कलकल त्रिवेणी प्रवाहित है, जिसमें अवगाहन कर संसार का अधम प्राणी भी पतितपावन परमात्मा बन जाता है । जैन-संस्कृत-स्तोत्र-साहित्य के आद्यप्रणेता आचार्य समन्तभद्र (दूसरी शताब्दी) माने जाते हैं । आचार्य समन्तभद्र के स्तोत्र समूचे जैन दर्शन को बड़े ही स्पष्ट शब्दों में और वह भी तार्किक रीति से प्रस्तुत करने में अत्यन्त समर्थ हैं । स्तुति, स्तुत्य, स्तोता, स्तुतिफल, स्तुतिविधि आदि सभी विषयों पर आचार्य समन्तभद्र ने बड़े ही उत्तम विचार अपने स्तोत्रों में अभिव्यक्त किये हैं। भाव एवं कला दोनों ही दृष्टियों से आचार्य समन्तभद्र के स्तोत्र बड़े ही उत्कृष्ट सिद्ध होते हैं।

आचार्य समन्तभद्र के इन स्तोत्रों के सम्बन्ध में डॉ. प्रेमसागर ने लिखा है कि- "आचार्य समन्तभद्र के स्वयंभू-स्तोत्र तथा स्तुति-विद्या समूचे भारतीय भम्ति साहित्य के जगमगाते रत्न हैं । हृदय की भक्तिपरक ऐसी धड़कन नहीं जो इनमें सफलता के साथ अभिव्यक्त न हुई हो ।“

आचार्य समन्तभद्र के स्तोत्रकाव्यों में ‘स्वयंभूस्तोत्र’ या ‘वृहत्स्वयंभूस्तोत्र’ सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसमें कुल 143 संस्कृत-छन्दों में वृषभादि चतुर्विंशति तीर्थकरों की स्तुति की गई है।

आचार्य समन्तभद्र के इस स्तोत्र का परवर्ती जैन भक्तिकाव्य पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा है। पच्चीसों कृतियाँ तो ‘स्वयंभूस्तोत्र’ के नाम से ही लिखी गई है। इसके अतिरिक्त इस स्तोत्र के विषय एवं शैली का अनुकरण करते हुए तो विविध भाषाओं और विविध कालखण्डों में आज तक शताधिक कृतियों की रचना हुई है। आचार्य समन्तभद्र के ‘स्वयंभूस्तोत्र’ के अतिरिक्त संस्कृत-जैन-स्तोत्र-साहित्य में अत्यधिक प्रचलित कतिपय स्तोत्र निम्नलिखित हैं-

  1. भक्तामरस्तोत्र (आचार्य मानतुंग, सातवीं शती)
  2. कल्याणमंदिरस्तोत्र (आचार्य सिद्धसेन, अपरनाम कुमुदचन्द्र, सातवीं शती)
  3. विषापहारस्तोत्र (महाकवि धनंजय, आठवीं शती)
  4. जिनसहस्रनामस्तोत्र (आचार्य जिनसेन, आठवीं शती)
  5. एकीभावस्तोत्र (आचार्य वादिराजसूरि, ग्यारहवीं शती)
  6. पार्श्वनाथस्तोत्र (कविवर द्यानतराय, अठारहवीं शती)
  7. महावीराष्टकस्तोत्र (कविवर पं. भागचन्द, उन्नीसवीं शती)

इन स्तोत्रों का हजारों जैन साधक, अनपढ स्त्री-पुरुष तक भी कंठस्थ करके प्रायः प्रतिदिन पाठ करते हैं | जैन भक्ति-काव्य-संग्रह की प्रायः प्रत्येक पुस्तक में इनका संकलन उपलब्ध होता है | इन स्तोत्रों पर संस्कृत, हिन्दी आदि भाषाओं में अनेक टीकाएँ भी लिखी गई हैं । उनका हिन्दी, मराठी, कन्नड़, गुजराती, अंग्रजी आदि प्रायः सभी बहुप्रचलित भाषाओं में गद्यानुवाद और पद्यानुवाद भी किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त इनकी मधुर स्वरों मे ऑडियो-वीडियो कैसेट्स और सीडीज भी बनी हैं।

इन स्तोत्रों की लोकप्रियता का एक प्रमाण यह है कि सामान्य लोग इनका असली नाम तक नहीं जानते, फिर भी इन्हें अपने ही रखे हुए नाम के द्वारा बहुत अधिक पढ़ते-सुनते हैं । जैसे- ‘भक्तामर-स्तोत्र’ का वास्तविक नाम तो ‘वृषभदेव-स्तोत्र’ है, किन्तु उसका प्रथम पद ‘भक्तामर’ है- भक्तामरप्रणतमौलिमणिप्रभाणाम्.. …अतः उसका नाम जनसाधारण में ‘भक्तामर-स्तोत्र’ ही प्रचलित हो गया है । इसी प्रकार देवागम-स्तोत्र और कल्याणमंदिरस्तोत्र का भी मूल नाम तो क्रमशः ‘आप्तमीमांसा’ और ‘पार्श्वनाथस्तोत्र’ है, किन्तु जनसाधारण में उनके नाम उनके प्राथमिक पदों के आधार पर ही उपर्युक्तानुसार पड़ गये हैं।

यहाँ हम ‘कल्याणमंदिरस्तोत्र’ के वैशिष्ट्य पर संक्षिप्त चर्चा करना चाहते हैं। ‘कल्याणमंदिरस्तोत्र’ की भी अनेकानेक विशेषताएँ हैं, परन्तु यहाँ हम पर्यावरण-संरक्षण की दृष्टि से ही उसका विशेष अध्ययन करना चाहते हैं |

आधुनिक युग में पर्यावरण-संरक्षण सम्पूर्ण विश्व का एक महत्त्वपूर्ण विषय बन गया है। बड़े-बड़े समाजशास्त्री और राजनेता भी इस विषय पर चिन्तित है कि वर्तमान मे हमारा पर्यावरण इतना अधिक प्रदूषित क्यों हो गया है और इसका संरक्षण कैसे किया जाए। उनके अनुसार यदि यह पर्यावरण इसी तरह प्रदूषित होता चला गया तो शीघ्र ही सारी दुनिया नष्ट हो जाएगी, यहाँ जीवन ही नहीं बचेगा।

इस प्रकार पर्यावरण-प्रदूषण आज विश्व की कितनी बड़ी ज्वलन्त समस्या है और उसका समाधान होना आज कितना आवश्यक है- यह हम सभी जानते हैं और प्रातः प्रतिदिन समाचारपत्रों में पढ़ते हैं। यहाँ उस विषय में अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।

तथा यह भी सर्वविदित है कि जैनधर्म के सिद्धान्त पर्यावरण-संरक्षण की दिशा में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैनधर्म में कदम-कदम पर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति तक को जीव मानकर उनकी किंचित् भी विराधना न करने की शिक्षा दी गई है। यथा-

“पृथिव्यपतेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः।” - तत्त्वार्थसूत्र

“करि प्रमाद जल भूमि वृक्ष पावक न विराधे।” - छहढाला

‘कल्याणमंदिरस्तोत्र’ में भी पर्यावरण-संरक्षण की दृष्टि से अध्ययन करने योग्य प्रभूत सामग्री है। इसमें अप्रत्यक्ष रीति से प्रकृति-चित्रण का सुन्दर वर्णन करते हुए मानव को पर्यावरण-संरक्षण की शिक्षा दी गई है।

‘कल्याणमंदिरस्तोत्र’ में कुल 44 श्लोक हैं, जिनमें से लगभग 30 श्लोकों में प्राकृतिक विविध उपादानों का उल्लेख हुआ है- यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है।

‘कल्याणमंदिरस्तोत्र’ में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति- इन पाँचों प्रकृति के मूलभूत उपादानों का अनेकशः उल्लेख हुआ है। यथा-

  1. पृथ्वी का उल्लेख काव्य-संख्या 15, में हुआ है।
  2. जल का उल्लेख काव्य-संख्या 5, 7, 17, 32, में हुआ है।
  3. अग्नि का उल्लेख काव्य-संख्या 33, 15,11 में हुआ है।
  4. वायु का उल्लेख काव्य संख्या 7,10 में हुआ है।
  5. वनस्पति का उल्लेख काव्य संख्या 19,13, 8 में हुआ है।

इन प्रयोगों की कतिपय पंक्तियाँ मूलतः द्रष्टव्य हैं -

  1. नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी । (काव्य 13)
  2. प्रीणाति पद्मसरसः सरसोऽनिलोऽपि । (काव्य 7)
  3. जल्पन्ति वा निजगिरा पक्षिणोऽपि। (काव्य 6)
  4. चित्रं विभो कथमवाङ्मुखवृन्तमेव, विष्वक् पतत्यविरला सुरपुष्पवृष्टिः। (काव्य 20)

इसके अतिरिक्त उपमा आदि के बहाने भी प्रकृति के अनेकानेक उपादानों का कवि ने उल्लेख किया है,

जिनमें से प्रमुख हैं -

  1. कमल काव्य-संख्या 1, 42, 43, 40,14
  2. सागर काव्य-संख्या 35, 41, 12, 1, 4, 5
  3. धूमकेतु काव्य-संख्या 2
  4. कौशिक काव्य-संख्या 3
  5. सूर्य काव्य-संख्या 3, 19
  6. पक्षी काव्य-संख्या 6
  7. मयूर काव्य-संख्या 8
  8. चन्दन काव्य-संख्या 8
  9. पद्मसरोवर काव्य-संख्या 7
  10. आतप काव्य-संख्या 7
  11. निदाघ काव्य-संख्या 7
  12. विपिन काव्य-संख्या 13
  13. पाला काव्य-संख्या 13
  14. कमलकर्णिका काव्य-संख्या 14
  15. पशु काव्य-संख्या 9
  16. हस्ति काव्य-संख्या 10
  17. बड़वाग्नि काव्य-संख्या 11
  18. शंख काव्य-संख्या 18
  19. अशोक वृक्ष काव्य-संख्या 19, 24
  20. पुष्पवृष्टि काव्य-संख्या 20
  21. छाया काव्य-संख्या 31
  22. घन काव्य-संख्या 32
  23. मूसलधार काव्य-संख्या 32
  24. संध्या काव्य-संख्या 34
  25. तिमिर काव्य-संख्या 37 26. अंकुर काव्य-संख्या 39
  26. सुमन काव्य-संख्या 28
  27. माला काव्य-संख्या 28
  28. तारे काव्य-संख्या
  29. चन्द्र काव्य-संख्या
  30. मेघगर्जना काव्य-संख्या
  31. बर्फ काव्य-संख्या 13
  32. तडित् काव्य-संख्या

इस प्रकार ‘कल्याणमंदिरस्तोत्र’ में अनेक स्थानों पर प्रकृति के उक्त उपादानों द्वारा बड़े ही सुरम्य वातावरण की सृष्टि की गई है। उदाहरणार्थ निम्नलिखित काव्य भी दृष्टव्य है-

धर्मोपदेश-समये सविधानुभावादास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोकः।
अभ्युदगते दिनपतौ समहीरुहोऽपि किं वा विबोधमुपयाति न जीव लोकः।।१९।।

बहुत कहाँ तक कहें, ‘कल्याणमन्दिरस्तोत्र’ को पढ़ते समय पाठक का मन पूरी तरह प्राकृतिक पर्यावरण में मग्न हो जाता है। वह अनुभव करता चलता है कि उसमें कहीं सूर्य है, कहीं चन्द्र है, कहीं तारान्वित चन्द्र है और कहीं पूर्ण चन्द्र है। कहीं सरोवर है, कहीं कमल है और कहीं कमल-कर्णिका है। सरोवर भी अनेक प्रकार के हैं अथवा अनेक विम्बों के साथ में हैं। जैसे कि- कहीं विशाल रत्नाकर अपना तल प्रकट कर अपनी अमूल्य रत्नराशि को दिखा रहा है, कहीं बड़वानल के रूप में उफन रहा है, कहीं पद्मसरोवर के रूप में हैं जिसमें कमल खिल रहे हैं और उसकी शीतल-सुरक्षित वायु पथिकों की थकान उतार रही है, कहीं ऐसा भी है कि उसमें मशक तैर रही है और कहीं उलटा घड़ा तैर रहा है, इत्यादि इत्यादि। इसी प्रकार पाठक देखता है कि कहीं पक्षी चहचहा रहे हैं, कहीं पुष्पवर्षा हो रही है, कहीं धूल उड़ रही है, कहीं बादल गरज रहे हैं, कहीं पाला पड़ रहा है जिससे वृक्ष जल रहे हैं, कहीं उल्लू बोल रहा है तो कहीं वनमयूर चंदन के वृक्ष पर बैठकर बोल रहे हैं, कहीं ग्वाले को देखकर चोर गायों को छोड़कर भाग रहे हैं, इत्यादि इत्यादि।

इसप्रकार अनेक प्रकार के चित्रों/ बिम्बों/दृश्यों की संरचना कर उन्हें अत्यन्त मनोहर रूप में उपस्थित कर आचार्यदेव ने परोक्ष रूप से पाठकों को पर्यावरण के प्रति सजग किया है और उसे पर्यावरण-संरक्षण की शिक्षा भी दी है -यह कहा जा सकता है।