कल्पद्रुम स्तवन | Kalpadrum Stavan
कल्पद्रुम यह समवशरण है भव्यजीव का शरणागार।
जिनमुखघन से सदा बरसती चिदानन्दमय अमृतधार ॥
जहाँ धर्म वर्षा होती वह समवशरण अनुपम छविमान ।
कल्पवृक्ष सम भव्यजनों को देता गुण अननत की खान ॥
सुरपति की आज्ञा से धनपति रचना करते हैं सुखकार।
निज की कृति ही भाषित होती अति आश्चर्यमयी मनहार ॥१॥
निज ज्ञायक स्वभाव में जमकर प्रभु ने जब ध्याया शुक्लध्यान।
मोहभाव क्षयकर प्रगटाया यथाख्यात चारित्र महान ॥
तब अर्न्तमुहूर्त में प्रगटा केवलज्ञान महा सुखकार।
दर्पण में प्रतिबिम्ब तुल्य जो लोकालोक प्रकाशनहार ॥२॥
गुण अनन्तमय कला प्रकाशित चेतन-चन्द्र अपूर्व महान।
राग आग की दाह रहित शीतल झरना झरता अभिराम ॥
निज वैभव में तन्मय होकर भोगें प्रभु आनन्द अपार ।
ज्ञेय झलकते सभी ज्ञान में किन्तु न ज्ञेयों का आधार ॥३॥
दर्शन ज्ञान वीर्य सुख है सदा सुशोभित चेतनराज ।
चौतिस अतिशय आठ प्रातिहार्यो से शोभित है जिनराज ।
अन्तर्बाह्य प्रभुत्व निरखकर भव्य लहें आनन्द अपार ।
प्रभु चरण कमल मैं वन्दन कर पाई सुख शान्ति अपार ॥४॥
स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह
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