काल चक्र का खेल | Kal chakr ka khel

अनादि काल की इस धारा में,
जीव अकेला बहता है।
मिथ्यात्व की निद्रा में सोकर,
कर्मों का बंधन सहता है।

न सुख यहाँ है, न दुःख स्थायी,
सब पर्याय का खेल यहाँ।
सम्यक् श्रद्धा का दीप जले तो,
निज स्वरूप का मेल यहाँ।

सम्यग्दर्शन दीपक बन जाए,
संयम जिसका पथ बन जाए।
क्षीण हों जब घाति कर्म सभी,
आत्मा सिद्धशिला चढ़ जाए।

रचनाकार: दर्शन जैन (Darshan Jain), सिलवानी
Instagram: @darshan_j72