तुम सिद्ध शिला के ताज हो,
भूत भविष्य और आज हो।
सिद्धों का सिंहासन भी तुम,
सिद्धों का आवास हो।
तुम एकत्र भी, तुम ही सर्वत्र,
अंत भी और तुम ही अनंत।
तुम हो गुण भेदों से अभेद,
तुम पर्यायों से भी अभेद।
तुम तीन लोक जीवंतरेखा,
पंचम गति के तुम्ही प्रणेता।
तुम्ही प्रयोजन और तुम निमित्त,
लगता तुम में मेरा ये चित्त।
तुमको जो जाने भव्यजीव,
वे हो जाते हैं सिद्ध समीप।
तुम स्वयं केवल ज्ञान हो,
तुम भूला हुआ भगवान् हो।
तुम तीन लोक का हो नक्शा,
पंचम गति के शहजादे हो।
तुम जिनवाणी की वाणी से,
तुम सिद्ध शिला के राजा हो।
समवशरण की छवि लिए,
और तीर्थंकर-सा तेज लिए।
तुम स्वयं केवलज्ञान हो,
तुम कुछ नहीं, भगवान् हो।
रचनाकार: सानिध्य जैन बंसल (Sanidhya Jain Bansal), इंदौर
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