कब सहज दिगम्बर साधु | Kab Sahaj Digambar Sadhu

कब सहज दिगम्बर साधु दशा मैं पाऊँ।
कब शुद्धोपयोगी सहज दशा मैं पाऊँ॥ टेक॥

मैं जग प्रपंच से दूर रहूँ, निज आराधन में शूर रहूँ।
निर्द्वन्द्व निराकुल समता रूप रहाऊँ॥ 1॥
कुछ ख्याति लाभ की चाह नहीं, उपसर्गों की परवाह नहीं।
निष्काम रहूँ नित शुद्ध भाव निज ध्याऊँ॥ 2॥
भोगों में किंचित् सार नहीं, यहाँ लाभ का कुछ व्यापार नहीं।
हो परम जितेन्द्रिय निज प्रभुता प्रगटाऊँ ॥ 3॥
यह दुर्लभ अवसर पाया है, मेरे मन यही समाया है।
जागे सम्यक् पुरुषार्थ परम पद पाऊँ॥ 4॥

रचियता - बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्

Source - जिन भक्ति सिंधु

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