कब होगा आत्मदर्शन सुख के कमल खिलेंगें
कब सूर्य वो उगेगा, कब सिद्ध हम बनेंगें ।।
ईर्ष्या की आग से मैं, घुट-घुट के जल रहा हूँ
सिद्धों का सुख है भीतर, फिर भी मचल रहा हूँ
सब को ही निज सा देखूं, कब नैन ऐसे होंगें || 2 ||
निज को भुला रहा हूँ, पर को लुभा रहा हूँ
नित्य आत्म चिंतनों में, दोषों को पा रहा हूँ
ये भाव मेरे सारे, अविकार कैसे होंगें || 2 ||
गुणीजन को देख कर भी, मन ये मलीन मेरा
दृष्टि है पर के सुख पे, कैसे हो दर्श तेरा
भावों की यह दशा है, हम पार कैसे होंगें || 3 ||
संकल्पों की कमी है, कोई समझ नहीं है
रस्ते पे चल पड़ा हूँ , मंजिल खबर नहीं है
है आसरा तुम्हारा, निश्चित ही पार होंगें || 4 ||
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