जो मङ्गल चार जगत में | jo ma ngala chara jagata mem

जो मङ्गल चार जगत में हैं, हम गीत उन्हीं के गाते हैं,

मङ्गलमय श्री जिन-चरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥ टेक ॥
जहाँ राग-द्वेष की गन्ध नहीं, बस अपने से ही नाता है,
जहाँ दर्शन-ज्ञान-अनन्तवीर्य सुख का सागर लहराता है।
जो दोष अठारह रहित हुए हम मस्तक उन्हें नवाते हैं
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥1 ॥

जो द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित नित सिद्धालय के वासी हैं,
आतम को प्रतिबिम्बित करते जो अजर-अमर अविनाशी हैं।
जो हम सबके आदर्श सदा, हम उनको ही नित ध्याते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥2॥

जो परम दिगम्बर वनवासी गुरु रत्नत्रय के धारी हैं,
आरम्भ-परिग्रह के त्यागी जो निज चैतन्य विहारी हैं।
चलते-फिरते सिद्धों से गुरु-चरणों में शीश झुकाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥3 ॥

प्राणों से प्यारा धर्म हमें केवली भगवान का कहा हुआ,
चैतन्यराज की महिमामय यह वीतराग रस भरा हुआ।
इसको धारण करनेवाले भव-सागर से तिर जाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं॥4॥


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन