ज्ञानी और अज्ञानी का अर्थ | Jnani Aur Ajnani Ka Arth

ज्ञानी और अज्ञानी का अर्थ

-प्रो. वीरसागर जैन

एक शब्द का एक ही अर्थ नहीं होता, अपितु अनेक अर्थ होते हैं | एक शब्द का एक ही अर्थ मानना एकान्तवाद है और उसके अनन्त अर्थ समझकर जहाँ जो उचित हो उसे ग्रहण करना अनेकान्तवाद है | जरा देखिए, ‘ज्ञानी’ और ‘अज्ञानी’ - ये दोनों बहुत ही अधिक प्रयोग में आनेवाले शब्द हैं और प्रायः सभी लोग समझते हैं कि इनका अर्थ तो बहुत सरल है, सबको पता है, लेकिन ऐसा नहीं है | ‘ज्ञानी’ और ‘अज्ञानी’ -इन शब्दों का भी कोई एक ही अर्थ नहीं है, अपितु अनेक अर्थ हैं | यथा-

  1. जिसमें ज्ञान गुण है, वह ज्ञानी है और जिसमें ज्ञान गुण नहीं है, वह अज्ञानी है | इस परिभाषा के अनुसार सभी जीव द्रव्य ज्ञानी हैं और पुद्गलादि सभी अजीव द्रव्य अज्ञानी हैं |

  2. जो सही जानता है वह ज्ञानी है और जो गलत जानता है वह अज्ञानी है | जैसे कि जो रस्सी को रस्सी जानता है वह ज्ञानी है और जो रस्सी को सर्प जानता है वह अज्ञानी है |

  3. जिसे सम्यग्दर्शन (सम्यग्ज्ञान) हुआ है वही ज्ञानी है और जिसे सम्यग्दर्शन (सम्यग्ज्ञान) नहीं हुआ है वह अज्ञानी है | अर्थात् सम्यग्दृष्टि जीव ही ज्ञानी है और शेष सभी मिथ्यादृष्टि जीव अज्ञानी हैं | सम्यग्दृष्टि रस्सी को सर्प जाने तो भी ज्ञानी है और मिथ्यादृष्टि रस्सी को रस्सी जाने तो भी अज्ञानी है |

  4. जिसने संयम धारण किया है वही ज्ञानी है और जिसने संयम धारण नहीं किया वह अज्ञानी है | अर्थात् संयमी जीव ही ज्ञानी है और शेष सभी सम्यग्दृष्टि जीव भी अज्ञानी हैं।

  5. जिसने सकल संयम धारण किया है वही ज्ञानी है और जिसने सकल संयम धारण नहीं किया वह अज्ञानी है | अर्थात् सकल संयमी जीव ही ज्ञानी है और शेष सभी देश संयमी जीव भी अज्ञानी हैं।

  6. जिसे केवलज्ञान हुआ है वह ज्ञानी है और जिसे केवलज्ञान नहीं हुआ है वह अज्ञानी है | अर्थात् केवलज्ञानी जीव ही ज्ञानी है और शेष सभी सम्यक् क्षयोपशम ज्ञानी जीव भी अज्ञानी हैं ।

  7. जब जिस विषय की चर्चा चल रही हो तब उस विषय को जाननेवाला ही ज्ञानी है और उसे नहीं जाननेवाला अज्ञानी है | जैसे कि जब प्राकृत, संस्कृत या अंग्रेजी भाषा की बात चल रही हो तब उस भाषा को जाननेवाला ही ज्ञानी है और उसे नहीं जाननेवाले सब अज्ञानी हैं | जब इतिहास, भूगोल या व्याकरण की बात चल रही हो तब उस विषय को जाननेवाला ही ज्ञानी है और उसे नहीं जाननेवाले सब अज्ञानी हैं।

इसी प्रकार और भी अनंत विवक्षाएँ हो सकती हैं | हो क्या सकती हैं, होती ही हैं, जिन्हें हम शब्द-अर्थ-ज्ञान, निश्चय-व्यवहार, नैगम-संग्रह आदि अनन्त नयों और नाम-स्थापना आदि निक्षेपों के आधार से ही भलीभांति समझ सकते हैं | तथा इसके लिए अनेकान्तवाद को समझना और स्वीकार करना अपरिहार्य है, अन्य कोई गति नहीं है ।