जीवन और मुक्ति | Jivan aur mukti

जंगल की आग को यूँ
ऊँचे पेड़ से निहारते,
क्या तुम बच पाओगे?
चटाई-सा रिश्ता
कर्ता और कर्म का
निगाहें फेर लेने से
क्या तुम बच पाओगे?
कीचड़ मल लेते तन पर और
घी पी लेते हो ज्वर में
कर्म चक्र से क्या बच पाओगे?
क्यों नहीं खाते सोचकर
जो उगलते हो बार-बार
क्या वापस निगल पाओगे?
तन को पोसा खूब तुमने
आत्मा का नहीं ध्यान किया
क्या ऐसे ही मुक्ति पा जाओगे?
AJ

रचनाकार: श्रीमती भावना जैन, गंज बासौदा
Instagram: @kavitayen