कव्वाली धुन- राग
जिसे अपने स्वरूप को रंग लागे ।
हो.. जिसे अपने स्वरूप को रंग लागे ।।
उसे जग में कुछ भी न सुहावे।
उसे जग में कुछ भी न सुहावे ।।
ये तन मैं नहीं ये धन मैं नहीं
ये इंद्रिय अरु ये मन मैं नहीं
हो जिसे पुद्गल से जीव जुदा दिख जावे
वो तत्त्वों के सार को पा जावे…
ये पुण्य-पाप के भाव सभी
हैं आस्रव रूप विभाव सभी
गुरु ज्ञान अरु राग भिन्न समझावे
जो समझे निहाल वो हो जावे…
जो अपने स्वरूप का ध्यान करे
उस पर्यय से मैं पार अरे
जब ध्याता-ध्येय-ध्यान भेद मिट जावे
तब आत्मा को आत्मा मिल जावे…
गुण दर्श ज्ञान चारित्र कहे
जो देखे इनको भेद लहे
गुणभेद पे दृष्टि ना जावे
वो शिव रमणी में रम जावे…
पं. ज्ञायक जैन शास्त्री , अहमदाबाद
Singer name - Visuddhi Jain