जिनवाणी भक्ति | Jinvani bhakti

माँ तेरी विनय करती हूँ तुझे ही रोज ध्याती हूँ
तेरी ही शरण में रहकर, गति से मुक्ति पाती हूँ

श्रुत के अवर्णवाद से, अनादि काल भटका मैं
भटकने से ही सीखा है, न भटकूँगा अब भव-भव में
लिखे अनुभव की स्याही से, जो अनुपम ग्रंथ हैं पाया
प्रथम श्रुत स्कंध के नायक, झुका अपना मस्तक मैं।।1।।

तेरी वाणी तेरी अर्चा, मेरा भव पार कराती है
तेरा स्वाध्याय ही आगम, विनय करना सिखाती है
स्व पर का भेद करके ही, मुझे निज से मिलाती है
यही मुक्ति दिलाती है, सहज रहना सिखाती है ।।2।।

तेरे ही ज्ञान से मैंने, सफल पर्याय को पाया
मेरी ही द्रव्य दृष्टि से स्वयं को हर्षमय पाया
जगत के कर्म पाश से, रहित ये जीव है पाया
निरखलो खुदको खुदसे ही, निरखने का अवसर पाया।।3।।

जग के विषय भोगों से, चित्त को हटाती है
सुधा का पान कराती है, प्रभु से प्रीति बढ़ाती है
“जिण सत्थादो अट्ठे” का जो, नित अभ्यास कराती है
इसी को गुनने मनने से, आत्म को शांति आती है।।4।।

प्रवचनसार गाथा -"जिण सत्थादो अट्ठे” -
"दृग मोह क्षय हो इसलिए स्वाध्याय करना चाहिए "
AJ

रचनाकार: शास्त्री माही जैन (Shastri Mahi Jain), बंसा, दमोह, मध्य प्रदेश
Instagram: @mahiJain274
YouTube: https://www.youtube.com/watch?v=tiFkLqaRJew&list=PLXcBKWNnm5zU&index=45