जिन शासन बड़ा निराला | Jinshasan Bada Nirala

जिन शासन बड़ा निराला मानो अमृत का प्याला
सभी द्रव्य है भिन्न-भिन्न, निर्भार हमें कर डाला रे।।टेक।।

मोह उदय से जग के प्राणी, चतुर गति भरमाये
कर्मोदय से भिन्न आत्मा, कुन्दकुन्द फरमाये।
मुनिराजों ने खोल दिया, मानो मुक्ति का ताला रे ।।1।।

वीतरागी है देव हमारे, उनसे हम क्या मांगें
रत्नत्रय के आगे स्वर्गों का वैभव भी त्यागें।
सारी दुनिया में नहीं देखा, तुमसा देने वाला रे ।।2।।

पंचम काल लगा भारी, अध्यात्म की नदियां सूख गई।
प्राणों की कीमत देने पर, जिनवाणी लिपिबद्ध हुई।
मुनिराजों ने तीर्थंकर का, विरह भुला ही डाला रे ।।3।।

आओ हम उन ऋषि मुनियों का, ऋण ये आज चुकायें |
तत्त्व ज्ञान का अमृत पीकर, अपनी प्यास बुझायें ।
काल अनंत हमें फिर कोई, दुखी न करने वाला रे।।4।।

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