विरले लोग ही भक्तिकी ओर आकर्षित रहते हैं। किसी आदर्श-विशेषसे अनुरक्त होकर भगवान्के चरणोंमें आत्मार्पण करना सबके लिए सरल नहीं है। अपने आदर्शकी पूजा के लिए मनमें एक अनन्य श्रद्धा चाहिए और असामान्य निष्ठा । संसारी जन अपनी मायाकी ममतामें इतने आकण्ठ-मग्न रहते हैं कि भगवान्का आदर्श उन्हें लुभा ही नहीं पाता । फिर जिनराजके आदर्श-वीतरागताके प्रति आकर्षित होना तो बहुत ही कठिन काम है। जब तक मनुष्यके मनको निराकुल, निर्विकारी और अनन्तद्रष्टा होनेकी भावनाएँ आन्दोलित नहीं करतीं, वह कैसे जिनभक्ति के पथका पथिक बन सकता है। पर यह इतनी गहरी अबोधता है कि मनुष्यका इस ओर जरा भी ध्यान नहीं जाता और वह अपने प्रवाहकी थपेड़ोंसे आहत होकर भी उसमें बराबर बहता ही जाता है। विचलित होता है, परतु हृदयमें कुछ वेगवान् स्पन्दन नहीं होता जो इस धारासे दूर होकर किसी दूसरी दिशामें जानेकी ओर गति दे ।
कलाकार इस मानवीय परिस्थितिसे पूर्ण परिचित हैं। उन्हें मालूम है कि इस अविराम गतिशील प्रवाहका वेग किस प्रकार मन्द हो सकता हैं। वे अपनी गन्तव्य दिशाकी ओर संकेत करते हैं और कहते हैं:-“जिनराज-चरन मन, मति बिसरै । को जानै किहि बार काल की, धार अचानक आनि परै । जिनराज-चरन मन, मति बिसरै ।।” रे मन, तू कभी भी जिनेन्द्र भगवान्के चरणोंको मत भूल_
रे मन किसे मालूम है, कव काल गरजता हुआ आ पहुंचेगा और अचानक ही हमें अपना ग्रास बना लेगा । रे मन, तू कभी भी जिनेन्द्र भगवान्के चरणोंको न भूल ।
जिनराजके चरण सामान्य चरण नहीं हैं। उनके दर्शन मात्रसे समस्त दुख दसों दिशाओंमें भाग जाते हैं और पूजा करनेसे समस्त पाप-समूह खिर जाते हैं। और कोई ऐसा देव नहीं है, जो प्राणियोंको इस संसार-सागरसे पार होनेका कोई हितकर मार्ग दिखला सके । रे मन, तू कभी भी जिनेन्द्र भगवान् के चरणोंको न भूल ।
"इक चित ध्यावत वांछित पावत, आवत मंगल, विघन टरै ।
भगवान्के चरणोंका तन्मयताके साथ ध्यान करनेसे जो शुभ उपयोग रहता है उससे मन-चिन्तित वस्तुकी प्राप्ति होती है, मङ्गल और आनन्द के प्रसङ्ग आते हैं और समस्त विघ्न-बाधाएँ विलीन हो जाती हैं। इतना ही नहीं, मस्तकपर जो मोह-रज विद्यमान रहती है, वह भी भगवान्के चरणोंमें सिर झुकाते ही तत्काल झर जाती है। रे मन, तू कभी भी जिनेन्द्र भगवान्के चरणोंको न भूल । देखिए, कलाकार किस स्पष्टताके साथ अपना आत्म-निवेदन कर रहे हैं। वे कहते हैं:-