जिनधर्म | Jindharm

जिनधर्म ही भ्रममूल नाशक अहो मंगल जगत् में।

जिनधर्म ही शिवपथ प्रकाशक अहो उत्तम जगत् में ॥
सम्यक् अहिंसामय धरम ही शरणभूत सु जानियो ।
निजभाव भासक कर्म नाशक जिनधरम पहिचानियो ।।
रत्नत्रयमय यह धर्म उत्तम क्षमादि स्वरूप है।
निरपेक्ष पर से सहज स्वाश्रित परम आनन्दरूप है।
जिनधर्म धारे तृप्ति हो निज माँहिं निज से सहज ही।
निर्वृत्त आस्रव से सहज विज्ञानघन हो सहज ही॥
भवताप नाशे गुण प्रकाशे मुक्ति पद दातार है।
स्वानुभवमय जिनधरम ही सर्व मंगलकार है॥
महाभाग्य सु पाइयो मैंने अलौकिक जिनधरम।
निशंक हो निर्ग्रन्थ हो प्रभुवर प्रभावँ जिनधरम ॥
भो सुखार्थी सहज समझो तत्त्व मंगलमय अहो।
भो मुमुक्षु सहज धारो धर्म मंगलमय अहो ॥
स्वार्थमय संसार में निज स्वार्थसिद्धि सु कीजिए।
मध्यस्थ हो चारित्र गहो, परभाव सब तज दीजिए ॥
नहीं चूक जाना मोहवश अवसर मिला दुर्लभ अहो।
निजभाव की आराधना से है सुलभ निजपद अहो ॥


Artist: रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह