मोक्ष ही तन है, मोक्ष ही धन है, मोक्ष ही ध्येय हमारा है।
कर्म में कर्त्तापना हेय, इससे करना निस्तारा है।। टेक।।
कर्मों के चक्कर में पड़ करके, हमने नित अति दुःख पाये।
रत्नत्रय पथ से च्युत हो, ठोकरमय भव पथ में धाये ।।
यह जग कर्मों का नाटक है, इसमें नहिं कोई हमारा है ।। 1 ।।
द्रव्य-भाव-नो कर्म अरे, ये तीन प्रकार बताए हैं।
द्रव्य कर्म के आठ भेद, श्री जैनागम में गाये हैं।।
राग-द्वेष-मोह ये भाव कर्म, इनसे करना छुटकारा है।। 2 ।।
नो कर्म द्रव्य के भाई हैं, इनसे भी नहिं कुछ हित होता।
इनके चक्कर में पड़ प्राणी, निज सुन्दर शिवपद को खोता ।।
इसलिए मुमुक्षु इनसे हटकर, आतमधर्म संभारा है।। 3।।
अपने स्वरूप का अनुभव कर, सम्यग्दर्शन धारण करना।
फिर ज्ञान-चरित्र को अपना करके, मोक्षमार्ग में पग धरना ।।
षोड़स अनुप्रेक्षा चिन्तन अरु, आत्मस्वरूप विचारा है।। 4।।
भो आत्मन् ! चाहे सब त्यागो, पर जैनधर्म नहिं विसराना।
यह सच्चे सुख का दाता है, इस पर चलकर शिवपुर जाना ।।
गर इसको भुला दिया किंचित्, तो मिलना नहिं किनारा है ।। 5 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह