जिनतीर्थ नाथ जग में जयवन्त वर्ते ।
जिनमार्ग नाथ जग में जयवन्त वर्ते ।।
जिनधर्म नाथ जग में जयवन्त वर्ते।
जयवन्त वर्ते मुझमें प्रवर्ते ।। टेक ।।
सम्यक्त्व भाव जग में जयवन्त वर्ते ।
सज्ञान निर्मल सदा जयवन्त वर्ते ।।
चारित्र सम्यक् सदा जयवन्त वर्ते।
जयवन्त वर्ते, मुझमें प्रवर्ते ।। 1।।
उत्तम क्षमा सु जग में जयवन्त वर्ते।
मार्दव स्वभाव सु जग में जयवन्त वर्ते ।।
आर्जव सहज सु जग में जयवन्त वर्ते ।
जयवन्त वर्ते मुझमें प्रवर्ते ।। 2।।
उत्तम सु शौच जग में जयवन्त वर्ते।
उत्तम सु संयम सदा जयवन्त वर्ते ।।
उत्तम तपश्चरण प्रभु जयवन्त वर्ते।
जयवन्त वर्ते, मुझमें प्रवर्ते ।। 3।।
उत्तम सु त्याग जग में जयवन्त वर्ते।
निर्ग्रन्थ भाव जग में जयवन्त वर्ते ।।
निर्ग्रन्थ रूप जग में जयवन्त वर्ते ।
जयवन्त वर्ते मुझमें प्रवर्ते ।। 4।।
उत्तम सु ब्रह्मचर्य जयवन्त वर्ते।
निर्दोष सु ब्रह्मचर्य जयवन्त वर्ते ।।
परिपूर्ण सु ब्रह्मचर्य जयवन्त वर्ते।
जयवन्त वर्ते मुझमें प्रवर्ते ।। 5।।
आत्म स्वभाव जग में जयवन्त वर्ते ।
पुरुषार्थ सम्यक् सदा जयवन्त वर्ते ।।
आराधना सततमेव जयवन्त वर्ते ।
जयवन्त वर्ते मुझमें प्रवर्ते ।। 6।।
निष्काम वंदन प्रभो जयवन्त वर्ते।
पाऊँ सु साध्य अपना जयवन्त वर्ते ।।
ज्ञायक स्वरूप अक्षय जयवन्त वर्ते।
जयवन्त वर्ते, मुझमें प्रवर्ते ।। 7।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’