तर्ज : जिनवाणी अमृत रसाल…
जिनशासन अम्लान, भविजन प्रगटाओ।
प्रगटाओ हाँ प्रगटाओ ।। टेक ।।
साँचे देव-शास्त्र-गुरु जानो, तत्त्व प्रयोजनभूत पिछानो।
स्व-पर भेदविज्ञान, अन्तर में भाओ ।। जिनशासन. ।। 1।।
हेय रूप समझो परभाव, उपादेय निज शुद्ध स्वभाव।
आतम है भगवान, अनुभव में लाओ ।। जिनशासन. ।। 2।।
स्वानुभूति ही जिनशासन है, सन्तों का यह ही जीवन है।
श्री जिनधर्म महान, समझो समझाओ ।। जिनशासन. ।। 3।।
सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान, सम्यग्चारित्र रत्न महान।
आतम है रत्नों की खान, निज में रम जाओ ।। जिनशासन. ।। 4 ।।
जिनशासन स्वाश्रय से प्रगटे, तब ही भव की आपद विघटे ।
आया है अवसर महान, शाश्वत पद ध्याओ ।। जिनशासन. ।। 5 ।।
अक्षय सुख का मार्ग यही है, तीन भुवन में सार यही है।
करो स्व-पर कल्याण, निज में रम जाओ ।। जिनशासन. ।। 6 ।।
नहीं प्रमादवश काल गँवाना, पीछे से फिर हो पछताना।
गाओ मंगल गान, शिव मारग पाओ ।। जिनशासन. ।। 7।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’