जिनालय दर्शन पाठ
श्री जिन मंदिर झलक देखते ही होता है हर्ष महान्।
सर्व पाप मल क्षय हो जाते होता अतिशय पुण्य प्रधान॥१॥
जिन मंदिर के निकट पहुँचते ही जगता उर में उल्लास।
धवल शिखर का नील गगन से बातें करता उच्च निवास॥२॥
स्वर्ण कलश की छटा मनोरम सूर्य किरण आभासी पीत।
उच्च गगन में जिन ध्वज लहराता तीनों लोकों को जीत॥३॥
तोरण द्वारों की शोभा लख पुलकित होते भव्य हृदय।
सोपानों से चढ मंदिर में करते है प्रवेश निर्भय॥४॥
नि सहि नि उच्चारण कर शीष झुका गाते जयगान।
जिन गुण संपति प्राप्ति हेतु मंदिर में आए है भगवान्॥५॥
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ३०४