जिनागमसार
सङ्कलन एवं सम्पादन: पवन जैन, अलीगढ़
प्रेरणा: पण्डित कैलाशचन्द्र जैन, बुलन्दशहर
प्रकाशक: श्री दिगम्बर जैन मुमुक्षु मण्डल, देहरादून
संस्करण: प्रथमावृत्ति 3000, 30 अक्टूबर 1996 (वीर निर्वाण सम्वत् 2522)
पृष्ठ: लगभग 860 (विषयसूची, सारणीसूची, सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची और शुद्धिपत्र सहित)
परिचय (सार)
यह पुस्तक प्रश्नोत्तर शैली में जिनागम का सार है: द्रव्य, गुण, पर्याय और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र। हर उत्तर पूर्व आचार्यों और विद्वानों के ग्रन्थों से लिया गया है और उसका स्रोत (ग्रन्थ, गाथा, पृष्ठ) साथ में दिया है। सम्पादक के अनुसार उद्धरण बिना कुछ घटाए-बढ़ाए रखे गए हैं।
कैसे बनी: प्राक्कथन के अनुसार यह सामग्री पं. कैलाशचन्द्र जैन के प्रश्नोत्तरों से बनी, जो पहले ‘श्रीजैनसिद्धान्तप्रवेशरत्नमाला’ (8 भाग) में छपे थे। उनके पुत्र पवन जैन ने इन उत्तरों के शास्त्रीय आधार खोजकर उन्हें इस पुस्तक में संकलित किया।
आधार: आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य पद्मनन्दि, पं. टोडरमलजी, पं. दीपचन्दजी कासलीवाल, पं. राजमलजी, पं. बनारसीदासजी, पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी, पू. बहिनश्री चम्पाबेन आदि के वचन। आरम्भ में गुरुदेवश्री कानजीस्वामी का जीवनवृत्त भी है।
विषय (ग्रन्थ की विषयसूची के अनुसार)
| प्रकरण | अध्याय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1 | मङ्गलाचरण, ‘जिनागमसार’, जैनदर्शन के मूलभूत सिद्धान्त, मनुष्यभव सफल करने के लिये विशेष लक्ष्य में लेने योग्य विषय, विश्व | 1 से 16 |
| 2 | द्रव्य, जीवद्रव्य, पुद्गलद्रव्य, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य, कालद्रव्य, द्रव्यज्ञान के लाभ, द्रव्यों के अनेकान्त स्वरूप का वर्णन | 17 से 302 |
| 3 | गुण, गुणों के भेद, अनुजीवी और प्रतिजीवीगुण, गुणज्ञान के लाभ | 303 से 458 |
| 4 | पर्याय, पर्याय के भेद, पर्यायज्ञान के लाभ | 459 से 519 |
| 5 | सम्यग्दर्शन, उसके भेद, अङ्ग, दोष, और उपाय, माहात्म्य व लाभ | 521 से 586 |
| 6 | सम्यग्ज्ञान (परिभाषा एवं भेद, मतिज्ञान से केवलज्ञान), संशय-विपर्यय-अनध्यवसाय, प्रमाण और नय, उपाय और लाभ | 587 से 714 |
| 7 | सम्यक्चारित्र (निश्चयचारित्र, व्यवहारचारित्र), उपाय और लाभ | 715 से 815 |
| परिशिष्ट 1 | वीतराग प्रश्नोत्तरी (45 प्रश्नोत्तर) | 817 से 833 |
| परिशिष्ट 2 | सामान्य प्रश्नोत्तरी (165 प्रश्नोत्तर) | 834 से 854 |
| सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची | 856 से 863 |
किसके लिए उपयोगी: जो द्रव्य-गुण-पर्याय और रत्नत्रय को क्रम से, शास्त्र के प्रमाण सहित समझना चाहते हैं, स्वाध्याय मण्डल और शिक्षण शिविर। हर उत्तर के साथ स्रोत होने से मूल ग्रन्थ तक पहुँचना आसान है।
नीचे पूरी पुस्तक की पीडीएफ है।
स्रोत: JinagamSaar.pdf
JinagamSaar.pdf (28805 KB)
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