जिनागम की विद्वत्ता का व्यापार क्या आगमसम्मत है | Jinagam Ki Vidvatta Ka Vyapar Kya Aagamsammat Hai

लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

[यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देने चाहता हूँ कि इस आलेख में प्ररूपित-दोष सभी विद्वानों में नहीं हैं। कुछ विरले विद्वान् आज भी जिनवाणी-सम्मत समीचीन-आचरण कर रहे हैं। किन्तु आज बहुसंख्यक-विद्वान् धन के लोभ में शास्त्र-विरुद्ध आचरण कर रहे हैं, और यह ‘धर्म के व्यावसायीकरण’ की कुप्रवृत्ति दिनों दिन विकरालरूप लेती जा रही है। इसी बिडम्बनापूर्ण-स्थिति की समीक्षा इस आलेख के माध्यम से की जा रही है।]

विद्वत्ता का व्यापार करना क्या जिनागम-सम्मत है? यह एक ज्वलंत-प्रश्न बनकर आज जैनसमाज के मध्य प्रस्तुत है। और इसके बारे में पक्ष एवं विपक्ष, दोनों के लिये अनेकप्रकार के तर्क भी दिये जा रहे हैं और कुतर्क भी। ‘वर्तमान-परिस्थितियों’ और ‘समाज में धर्मप्रभावना के संकट’ की दुहाई देकर बाकायदा ‘धर्म का धंधा’ वैध ठहराने की कवायद चल रही है। इस कुत्सित-व्यापार में लिप्त लोग बिना किसी शर्म या संकोच के यहाँ तक कह देते हैं कि ‘‘जो लोग स्वयं तो समाज के काम में आते नहीं हैं, वे ही ‘कोरे आदर्शवाद’ की दुहाई देते हैं।’’

उनके कई कुतर्कों से आज का व्यापारिक-दृष्टिकोण वाला समाज भी सहमत दिखाई देता है, क्योंकि ये व्यावसायिक-पंडितगण जिनवाणी के निर्देशों की जगह समाज के आधुनिक-सुविधावादियों के अनुकूल बनकर उनके समय व साधनों की सुविधा को ध्यान में रखते हुये ‘सब कुछ एडजेस्ट करने’ को तैयार रहते हैं। बस, इन्हें दी जानेवाली दक्षिणा का लिफाफा उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप या उससे भी ज्यादा दरियादिली से देने की वचनबद्धता रहनी चाहिये।

इन विषमतम होती जा रही परिस्थितियों में सत्य का पक्ष लेनेवाले दिनोंदिन दुर्लभतम होते जा रहे हैं। अत: समाज के विभिन्न-वर्गों द्वारा इस विषय में आगम, युक्ति एवं व्यवहार-सम्मत पक्षों के स्पष्टीकरण की भारी माँग बहुत समय से लोग मुझसे कर रहे थे। अत: बहुत सारे पक्षों का विचार करते हुये मैंने यह आलेख लिखने का निर्णय लिया।

यहाँ यह स्पष्टीकरण करना मैं अपेक्षित समझता हूँ कि धर्मोपदेश देने एवं धार्मिक-पूजा-विधियों का अनुष्ठान कराने के बदले में धनराशि, मिठाई-फल आदि एवं भेंटस्वरूप वस्त्रादि लेना, यह सब कार्य वैदिक-परम्परा के पुजारियों व कर्मकांड करानेवालों के लिये किये जाते रहे हैं। उनके धर्म में तो कर्मकांड करानेवाले ब्राह्मण को यदि दक्षिणास्वरूप ये सब नहीं दिये जायें, तो करवानेवाले यजमान का वह अनुष्ठान ही अधूरा माना जाता है। उनके यहाँ ‘निर्माल्य-द्रव्य’ जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण-वृत्ति में तो पढ़ाने व पूजा-पाठ, अनुष्ठान आदि करके उसके बदले दक्षिणा में धनराशि व भोज्य-पदार्थ, कपड़े, बर्तन, गाय-भैंस, जमीन-जायदाद आदि लेकर ही आजीविका चलाने का प्रावधान है।

इसके विपरीत निर्ग्रन्थ-जैन-परम्परा तो त्यागमूलक है। इसमें श्रावक पूजा-पाठ, अनुष्ठान, प्रवचन आदि व्यक्ति आत्महित व लोकहित की उदात्त-भावना से करता/कराता है। इन्हें कराकर बदले में धन आदि कमाने की अनुमति जिनागम में कहीं भी किसी भी रूप में नहीं दी गयी है। यहाँ यह बात अच्छी तरह समझ लेना अनिवार्य है।

सर्वप्रथम मैं इस विषय के परिदृश्य में समसामयिक विविध-बिन्दुओं की तथ्यात्मक-प्रस्तुति करना अपेक्षित समझता हूँ। जिनकी समीक्षा किये बिना सत्य और तथ्य का निर्णय करना असंभव है। अत: उनकी क्रमिक-प्रस्तुति यहाँ अपेक्षित है:

  1. पूजन, विधान एवं प्रतिष्ठाविधि का आचार्यत्व, इसके अन्तर्गत आचार्यत्व तीन प्रकार का होता है: ‘गृहस्थाचार्य’, ‘विधानाचार्य’ और ‘प्रतिष्ठाचार्य’ का। यहाँ मैं जिनवाणी की आज्ञानुसार यह स्पष्टीकरण करना अपेक्षित समझता हूँ कि जो व्यक्ति ‘गृहस्थाचार्य’ का दायित्व निर्वाह करता है, वह ‘विधानाचार्य’ या ‘प्रतिष्ठाचार्य’ का दायित्व निर्वाह नहीं कर सकता है। क्योंकि इनके गुणों व योग्यताओं में वैसा ही अंतर है, जैसा कि प्राइमरी-टीचर (टी.जी.टी.) और पी.जी.टी. एवं यूनीवर्सिटी के लेक्चरर आदि अध्यापकों में होता है। जैसे प्राइमरी का अध्यापक (टी.जी.टी.) उच्च-माध्यमिक-कक्षाओं को नहीं पढ़ा सकता है और उच्च-माध्यमिक-कक्षाओं का अध्यापक (पी.जी.टी.) कॉलेज या यूनीवर्सिटी की कक्षाओं को पढ़ाने के योग्य नहीं है। उसीप्रकार ‘गृहस्थाचार्य’ का प्राथमिक-स्तर वाला विद्वान् ‘विधानाचार्य’ के दायित्व के योग्य नहीं है। और ‘विधानाचार्य’ के रूप में पूजा-पाठ अनुष्ठान आदि कराने वाले विद्वान् जिनमंदिर एवं जिनबिम्ब आदि की प्रतिष्ठाविधि कराने के पात्र नहीं हो सकते हैं क्योंकि इन तीनों की गुण-गरिमा एवं योग्यताओं में बहुत व्यापक अंतर जिनवाणी में बताये गये हैं।

(इस त्रिविध-आचार्यत्व के विषय में मैंने एक शोध-आलेख अक्टूबर 2002 में लिखा था, जो कि तभी मेरे सम्पादन में प्रकाशित होनेवाली शोध- पत्रिका ‘प्राकृतविद्या’ वर्ष 14, अंक 3 में प्रकाशित हुआ था।)

(क) ‘गृहस्थाचार्य’ - इस विषय में जिनवाणी में ‘सबसे प्राथमिक-स्तर का कार्य’ शादी-विवाह आदि की पूजन, फेरे, सांसारिक-प्रयोजनों के भवनों (आवासीय भवनों - फ्लैट, मकान, कोठी, फार्महाउस, ऑफिस, फैक्ट्री) आदि का भूमिपूजन-शिलान्यास-गृहप्रवेश आदि से सम्बन्धित धार्मिक-विधियाँ करवाना बताया गया है; क्योंकि इसमें विधि, द्रव्य, पात्र आदि की शुद्धि की संभावना न्यूनतम मानी गयी है। इन्हें अनुष्ठित करवानेवाले विद्वान् को जिनवाणी में ‘गृहस्थाचार्य’ कहा गया है। क्योंकि यह गृहस्थी के काम हैं, अतः इनका अनुष्ठान कराने वाले को ‘गृहस्थाचार्य’ कहा जाना उचित-प्रयोग है।

जिनवाणी में ‘गृहस्थाचार्य’ के गुणों में भी निःस्पृहता एवं जिनाज्ञा को सर्वोपरि मानना ही प्रमुख-गुण माना गया है। और इन गुणों का स्पष्ट-अभिप्राय यही है कि ‘गृहस्थाचार्य’ को न तो इस वर्ग के पूजन-पाठ आदि क्रियाओं के बदले में नगद या सामान के रूप में कुछ भी भेंटस्वरूप लिया जाना चाहिये और न ही इनकी आकांक्षा रखनी चाहिये।

साथ ही जिनवाणी में इन कार्यों की जो भी धार्मिक-विधि बतायी गयी है, उसका पूर्ण-निष्ठा से व पूरी तरह (न कि ‘‘पूजा तीन प्रकार की, छोटी बड़ी मंझोल। जब जैसा मौका लगे, तब तैसी ली खोल’’ - की तिकड़मबाजी का फार्मूला अपनाना) से अनुपालन करना चाहिये। यहाँ यह ध्यान रखा जाये कि विधि का अनुपालन जिनवाणी के निर्देशों के अनुसार किया जाये, न कि करवानेवाले की सुविधा के अनुसार एडजेस्ट करके जिनवाणी की मर्यादा का उल्लंघन किया जाये।

ज्ञातव्य है कि इन गृहस्थाचार्यों को ‘पंचाध्यायी-उत्तरार्द्ध’, गाथा 648-652 में ‘गृही’ - आचार्य कहा गया है।

(ख) ‘विधानाचार्य’ - उपर्युक्त दोनों ही गुण (निर्लोभी-वृत्ति एवं जिनवाणी के निर्देशों के अनुसार विधि-विधान करना) जिनमंदिर जी में विधान आदि के एवं जिनमंदिर आदि के भवनों आदि के शिलान्यास आदि करवानेवाले ‘विधानाचार्य’ के लिये भी अनिवार्य-गुणों के रूप कहे गये हैं। इनके साथ ही योग्य-धर्माचरण का जिनवाणी के निर्देशों के अनुसार अनुपालन करना भी अनिवार्य-गुण कहा गया है। इसी कारण ‘विधानाचार्य’ को ‘मध्यम-श्रेणी का याजक’ कहा गया है। चूँकि ये जिनमंदिर जी की धार्मिक-विधियों को अनुष्ठित कराते हैं, अतः इन्हें ‘विधानाचार्य’ कहा जाना युक्तिसंगत है।

‘‘देश-कालादि-भावज्ञो, निर्मलो बुद्धिमान् वरः।
सद्वाण्यादि-गुणोपेतः, याजकोस्त्र प्रशस्यते।।’’

‘‘बाल नहीं होय नहीं वृद्ध, नहीं हीन-अंग,
क्रोधी क्रियाहीन नहिं, मूरख गनीजिये।
दुष्ट नहीं होय, नहीं व्यसन-विषैं सुरत,
पूजा-पाठ बाँचने में बुद्धिसार लीजिये।।
दया करि भीगि रह्यो हृदयकमल जास,
सुन्दर-सरूप पाय, दान सदा कीजिये।
मीठे हैं वचन मुख अक्षर स्पष्ट कहै,
कहै बिनै गुरु की सो ‘पण्डित’ कहीजिये।।’’
( वृहद् सिद्धचक्रमंडल-विधान, पृ. 2-3)

‘‘देश-काल-विधि-निपुणमति, निर्मलभाव उदार।
मधुरबैन नैना सुघर, सो ‘याजक’ निरधार।।’’
(सिद्धचक्र-विधान, संतलाल कवि)

‘‘प्रथम विधानाचार्य पुरुष सज्जाति सम्यक्त्वी हो।
देशव्रती श्रद्धालु पापभीरु ‘निर्लोभी’ सुधी हो।।’’
( कल्पद्रुमविधान, पृ. 2)

इन लक्षणों में ‘विधानाचार्य’ को ‘दान देने वाला’, ‘निर्लोभी’ एवं ‘निर्मलभाव-वाला’ कहकर यह स्पष्ट-निर्देश कर दिया है कि वह पूजन-विधान आदि किसी भी धार्मिक-अनुष्ठान का आचार्यत्व उदात्त-भक्तिभावना से ही करता है, न कि दक्षिणा के लोभ में व्यापार-वृत्ति से।

( ग ) ‘प्रतिष्ठाचार्य’ - इनके अतिरिक्त जो जिनमंदिर जी एवं जिनबिम्ब आदि की प्रतिष्ठाविधि के विधायक बनते हैं, उन प्रतिष्ठाचार्यों को ‘उत्तम-श्रेणी का याजक’ माना गया है। इसका कारण मात्र बड़े व उत्कृष्ट-कार्यों के कराना नहीं है, बल्कि इनके स्वयं के सर्वोत्कृष्ट-आचरण के साथ अधिकतम-निष्ठा एवं समर्पण के साथ विधि को अनुष्ठित करना है। जिनमंदिर जी एवं जिनबिम्ब आदि की प्रतिष्ठाविधि जैसे उत्कृष्ट-कार्यों तो कारणपना इसमें है ही।

इतना ही नहीं, जिनवाणी में ‘प्रतिष्ठाचार्य’ को जिनवाणी के चारों अनुयोगों का मर्मज्ञ होना, स्वयं उत्तम-श्रेणी का सदाचारी व निर्लोभी होना आदि विशेषताओं से सुशोभित होना भी उसके अनिवार्य-गुणों में माना गया है।

इस विषय में कहा गया है: ‘‘देस-कुल-जाइ-सुद्धो, णिरुवम-अंगो विसुद्ध-सम्मत्तो।
पढमाणियोग-कुसलो, पइट्ठा-लक्खण-विहि-विदण्हू।।
सावय-गुणोववेदी, उवासयज्झयण-सत्थ-थिरबुद्धी।
एवं गुणो पइट्ठायरिओ जिणसासणे भणिओ।।’’

  • (उपासकाध्ययन/वसुनंदि, श्रावकाचार, 388, 389)

अर्थात् जो देश, जाति और कुल से निर्दोष-आचरणवाला हो, अंग-सौष्ठव से युक्त हो, निर्मल-सम्यग्दर्शन से सहित हो, प्रथमानुयोग में कुशल अर्थात् महापुरुषों के सदाचरण का ज्ञाता हो, प्रतिष्ठाशास्त्र में प्रतिपादित (प्रतिमा, पात्र आदि के) लक्षणों और प्रतिष्ठाविधि का विशेषज्ञ हो, सत्-श्रावकों के गुणों से सुपरिचित हो, उपासकाध्ययन अर्थात् श्रावकाचार के शास्त्रों में स्थिरमति (अर्थात् श्रावकाचार के नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करनेवाला) हो, इत्यादि गुणों से युक्त हो; उसे ‘प्रतिष्ठाचार्य’ जानना चाहिये।

इसके अतिरिक्त ‘प्रतिष्ठा-विधान-संग्रह’ पृष्ठ 59 पर ‘‘लोभानलप्लुष्टमशान्त-शीलम् प्राप्नोत्यनर्थं गुरुवाग्विरुद्धः इहान्यतः भ्रमदभ्रदुःखम्’’ कहकर स्पष्ट-निर्देश कर दिया है कि जो अशान्तशील-व्यक्ति ‘प्रतिष्ठाचार्य’ होकर भी लोभ की अग्नि में जलता है अर्थात् तृष्णातुर होकर प्रतिष्ठाविधि के बदले में धन आदि की प्राप्ति का लोभ करता है, वह अनर्थों को प्राप्त करता है, गुरु के वचनों का विरोधी-आचरण करता है, इस लोक में तो दुःख भोगता ही है, अगले-जन्म में नरक के भयंकर-दुःख भोगता है।

तथा ‘प्रतिष्ठा-तिलक’ पृष्ठ 11 पर प्रतिपादित ‘प्रतिष्ठाचार्य’ के लक्षणों में ‘‘जिनेज्यादि-क्रियानिष्ठो भूरिसत्त्वार्थबान्धवः’’ कहकर स्पष्ट-निर्देश कर दिया है कि ‘प्रतिष्ठाचार्य’ को स्वयं अन्तरंग से जिनेन्द्र भगवान् की पूजा- प्रतिष्ठाविधि में निष्ठावान् होना चाहिये। एवं वह दरिद्री नहीं हो, पर्याप्त-धनसम्पन्न हो (ताकि लोभ की गुंजाइश ही नहीं हो) और प्राणीमात्र के हितैषी-बंधुत्व के भाव से वह निःस्पृही होकर जिनेन्द्र देव की प्रतिष्ठाविधि को सबहुमान सम्पन्न करे।

किन्तु आजकल देखा तो यहाँ तक जा रहा है कि लोग ‘प्रतिष्ठाचार्य’ जैसे गरिमापूर्ण-पदों पर आसीन होकर इन कार्यों के निमित्त खरीदी जाने वाली सामग्री को स्वयं जुटाने के नाम पर मोटा-कमीशन खाते हैं। यहाँ तक कि जिन-प्रतिमाओं के क्रय आदि में भी मूर्तिकारों से सैटिंग करके मोटा-कमीशन खाते हैं। इतना ही नहीं, वे अपने पद का दुरुपयोग करते हुये जिनवाणी के निर्देशों के विपरीत जिन-प्रतिमाओं को शास्त्र-सम्मत बताने का घोर-पाप भी बिना किसी हिचक के करने लगे हैं।

यह ‘दलाली’ की वृत्ति जिनशासन के साथ ‘छल’ है। ‘अमानत में खयानत’ जैसा अक्षम्य-अपराध है। समाज और दानदातार के प्रति घोर-विश्वासघात है। यह तो ‘निर्माल्य-द्रव्य’ के सेवन से भी भयंकर-स्थिति है। ऐसा करनेवाला व्यक्ति ‘प्रतिष्ठाचार्य’ या ‘विधानाचार्य’ तो क्या, ‘गृहस्थाचार्य’ जैसे पद पर भी आसीन होने के लिये नितान्त-अयोग्य है ही, साथ ही वह ‘जैन’ कहलाने के योग्य भी नहीं है।

चूँकि ‘जैन’ तो ‘जिनशासन के अनुयायी भक्त’ को कहा जाता है, जो जिनधर्म की प्रभावना करता है। ऐसे जिनाज्ञा का उल्लंघन करनेवाले दलाल-लोग तो जिनशासन के ही विरोधी हैं। इसीलिये ये जिनाज्ञा के उल्लंघन के अपराधी होने से ‘सामाजिक-बहिष्कार’ किये जाने योग्य हैं।

(आजकल की स्थितियाँ इन मामलों में भयावहरूप से विकृत हो चुकी हैं। इनका कुछ वर्णन मैं यहाँ करना चाहता हूँ। यद्यपि समाज में यत्किंचित् रूप से जुड़ा रहने के कारण जितनी जानकारियाँ मुझे हैं, उतनी ही बता सकूँगा। उनके अलावा भी कई और विकृतरूप आजकल समाज में प्रचलित हो सकते हैं, जिनका निर्णय सुधी-पाठकगण अपने विवेक से कर सकते हैं।)

प्रतिष्ठाचार्यों के द्वारा पहले से तय करके लाखों की धनराशि जिनबिम्ब प्रतिष्ठाविधि के लिये दक्षिणा के रूप में ली जाने लगी है। जो इनके अनिवार्य-गुण ‘निर्लोभिता’ से पूरी तरह विपरीत है। यह पद श्रद्धालु व धर्मनिष्ठ-व्यक्ति को दिया जाता है, न कि धर्म का व्यापार करनेवाले को।

इतना ही नहीं, प्रतिष्ठाचार्यों के द्वारा बोलियों में भी अपनी दक्षता (अर्थात् वे कितनी चतुराई से लोगों से बोलियाँ बढ़वाते हैं) का कमीशन लेना। यह धनराशि भी पंचकल्याणक-प्रतिष्ठा-महोत्सव में लगने वाली बोलियों के अनुसार पचास हजार से लेकर कुछ लाख रुपयों तक की हो जाती है।

प्रतिष्ठाचार्यों के द्वारा टेंटवाले से, लाइट-माइकवाले से, जुलूस के लिये हाथी-घोड़े आदि के संयोजक से, रसोइये (कैटरर) से, इन्द्र आदि की पोशाकें सप्लाई करनेवाले से, अन्य सहयोगी-प्रतिष्ठाचार्यों से, बैंडवालों से, सेवादलों से - इत्यादि से सैटिंग करके मोटा-कमीशन वसूला जाता है, जो कि लाखों की धनराशि में बैठता है।

प्रतिष्ठाचार्यों के द्वारा जिन-प्रतिमाओं के शास्त्र-सम्मत चयन के नाम पर पहले से सैटिंग करके जयपुर में उन्हीं मूर्तिकारों के पास ले जाया जाता है, जिन्होंने कारीगर की गल्ती या लापरवाही से जो मूर्तियाँ शास्त्र-विरुद्ध बना दी गयी हैं; या फिर जिन मूर्तियों के पाषाण/धातु में दोष है, उनसे उन सदोष-मूर्तियों को विशिष्टप्रकार के लेप आदि से नयनाभिराम बनवाकर उस आकार की मूर्तियों के बाजारभाव से डेढ़-दो गुने दामों में समाज/जिनबिम्ब-भेंटकर्ता को ‘यही शास्त्र-सम्मत हैं’ - कहकर खरीदवा देते हैं। जो आजकल दुग्ध-धवल नितान्त-बेदाग जिनबिम्ब दिखाई दे रहे हैं, उन पर यदि खरीदते समय पीछे से तेज प्रकाश डलवाकर ऊपर पानी डाला जाये; तो उसके पाषाण में विद्यमान दाग-धब्बों को स्पष्टरूप से देखा जा सकता है। इनकी यह दुग्ध-धवलता स्वाभाविक नहीं होती है, बल्कि विशेषप्रकार के लेप से कृत्रिमरूप से बनायी जाती है। और यह स्पष्ट जान लीजिये कि ‘लेप करके सुधारीं गयीं जिन-प्रतिमायें प्रतिष्ठाविधि के योग्य नहीं होती हैं।’

इतना ही नहीं, इन कर्मों व पाप के भय से पूरी तरह निर्भय हो चुके प्रतिष्ठाचार्यों के द्वारा पंचकल्याणक-प्रतिष्ठा-महोत्सव के निमित्त खरीदी जाने वाली पूजन-सामग्री, शिखर का कलश एवं पंचमेरु-अष्टमंगल-अष्टप्रातिहार्य आदि की खरीद में भी बेझिझक कमीशन खाया जाता है। समाज के कुछ प्रमुख-लोग इन सब बातों से भलीभाँति परिचित होते हुये भी पूरी तरह अनजान की तरह चुप्पी साधे रहते हैं; क्योंकि ऐसे ‘कुटिलमति’ एवं ‘बेधड़कपापी’ प्रतिष्ठाचार्यों के नामों की संस्तुति किसी बड़े शीर्षस्थ-संगठन अथवा प्रतिष्ठाविधि में सन्निधि प्रदान करनेवाले आचार्यों/मुनिराजों के द्वारा बलपूर्वक की जाती है कि ‘‘यदि इन पंडितजी को ही ‘प्रतिष्ठाचार्य’ बनाओगे, तभी हमारा आशीर्वाद/सन्निधि/सहयोग प्रतिष्ठाविधि में मिलेगा। अन्यथा कोई अन्य रास्ता खोज लो।’’

इसके बदले में वे ‘प्रतिष्ठाचार्य’ पूरी ईमानदारी से इस ‘उपकार’ का ‘प्रतिदान’ करते हैं और उस संगठन/संस्थान को अथवा उन मुनिराज की किसी संस्था को कई लाखों की धनराशि पंचकल्याणक-प्रतिष्ठा-महोत्सव में आयी दानराशि में से स्थानीय आयोजक-समाज के द्वारा पूरा दबाव डालकर दिलवाते हैं। इसप्रकार पारस्परिक-सहयोग की युति ईमानदारी से निभायी जाती है! सब मिल-बाँटकर दानस्वरूप आयी धनराशि की ‘बंदर-बाँट’ करते हैं। जो ‘प्रतिष्ठाचार्य’ इतना सब कराने के बाद भी स्थानीय आयोजक-समाज को कुछ धनराशि सारे खर्चों के बाद भी बचत के रूप में उपलब्ध करवा देते हैं, वे ‘सुप्रतिष्ठित-प्रतिष्ठाचार्य’ बनते हैं। अन्य जगहों की समाज/संगठन के लोग, जिन्हें अपने मंदिर जी के पंचकल्याणक-प्रतिष्ठा-महोत्सव या वेदी-प्रतिष्ठा-महोत्सव कराने हैं, उनके आगे-पीछे समय देने की याचना करते हुये घूमने को विवश होते हैं। और उनकी हर अनुचित-शर्त को चुपचाप शिरोधार्य करते हैं।

इतना ही नहीं, इन बड़ी प्रतिष्ठाविधियों में मंच से बोलनेवाले तथाकथित बड़े नाम वाले पंडितों, जो कि ‘लोकरंजन के विशेषज्ञों’ के रूप में प्रसिद्धि को प्राप्त हैं, को बुलवाने में भी ये ‘प्रतिष्ठाचार्य’ खुलेआम दोनों तरफ से कमीशन खाते हैं (समाज से पंडितों को बुलवाने में और पंडितों से उन्होंने मोटी-दक्षिणा दिलवाने में)। इन प्रतिष्ठाचार्यों के आतंक के आगे समाज/संगठन विवश होकर सब कुछ चुपचाप सहते हैं। इसप्रकार ये ‘प्रतिष्ठाचार्य’ गर्व से सिर उठाकर चलते हैं।

इतना सब करके भी इनका अहं संतुष्ट नहीं होता है, तो ये ‘प्रतिष्ठाचार्य’ समारोह के अन्त में अपना धूमधाम से सम्मान कराते हैं, जिसमें शॉल, श्रीफल, रजत या स्वर्णमयी प्रशस्तिपत्र, पूरे अंगवस्त्र (सिरोपाव) तथा अपने पूरे परिवारजनों के कपड़े बिना किसी लज्जाभाव के लिये जाते हैं।

इतना ही नहीं, इन प्रतिष्ठाचार्यों के द्वारा जो चढ़ी हुई सामग्री या उपयोग किये गये वस्त्राभूषण आदि हैं, वे सभी अपना कॉपीराइट मानकर समेटकर ले जायी जाती हैं। चढ़ी हुई द्रव्य को तो ये बेच देते हैं तथा वस्त्राभूषण आदि को अगली प्रतिष्ठाविधि में उपयोग करने को ले जाते हैं और उस समाज/ संगठन से भी उनके पूरे पैसे वसूलते हैं। इसप्रकार ये ‘प्रतिष्ठाचार्य’ कई जगहों से उनकी कीमत वसूलकर अपनी अदम्य-तृष्णावृत्ति को तृप्त करने की चेष्टा करते हैं।

ये ‘प्रतिष्ठाचार्य’ प्रशस्ति-खोदनेवाले शिल्पियों, पोशाकें सिलनेवाले दर्जियों, प्रतिष्ठामंच बनानेवाले राज-मिस्त्रियों आदि श्रमजीवियों से भी निर्लज्जतापूर्वक कमीशन खाने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं। उल्टे उन पर ‘काम दिलवाने का अहसान’ जताते हैं।

और भी न जाने कौन-कौन से कृत्य ये ‘प्रतिष्ठाचार्य’ बिना किसी हिचक या भय के करते हैं; मैं कहने में असमर्थ हूँ। इतना लिखने में भी मेरा हाथ सैकड़ों बार काँप गया कि ‘जिनधर्म की प्रभावना के लेखन का संकल्प’ लेकर तुम यह सब क्या लिख रहे हो? परन्तु समाज को जागृत करने एवं सत्य को उजागर करने के समाज के लोगों के सैकड़ों अनुरोधों ने मुझे यह लिखने को मानो विवश कर दिया है।

जैसी हालत इन प्रतिष्ठाचार्यों की बतायी गयी है, लगभग कमोबेश वही स्थिति विधानाचार्यों एवं गृहस्थाचार्यों की भी है। ये भी जितना छोटा या बड़ा आयोजन हो, उसके अनुरूप तथा जिसकी जितनी हिम्मत पड़ती है, उतनी मात्रा में ‘नंबर एक’ (जो दक्षिणा पहले से तय की जाती है) और ‘नंबर दो’ (जो ऊपरी कमाई छल-छद्म व तिकड़मबाजी के कौशल से की जाती है) में भरपूर ‘निर्माल्य-द्रव्य’ का भोगोपभोग कर रहे हैं।

प्रतिष्ठाचार्यों आदि के बारे में जितनी जानकारियाँ मुझे पीड़ित-समाजों/संगठनों व सहयोगी-प्रतिष्ठाचार्यों, पंडितों से प्राप्त हो सकीं, उनका सीमित-शब्दावली में मैंने उल्लेख किया है; क्योंकि मैं सामाजिक-आयोजनों में बहुत सक्रिय नहीं रहता हूँ।

[मेरी दिनचर्या में प्रतिदिन (दिल्ली में रहने पर) विधिपूर्वक प्रक्षाल-पूजन, पूरी-निष्ठा से विश्वविद्यालय की नौकरी व गृहस्थी के अनिवार्य-दायित्वों को निभाते हुये आत्महित की दृष्टि से स्वाध्याय करना रहता है। समाज के सज्जनों के विशेष-आग्रहों पर कुछ ऐसे विषयों पर भी लिख देता हूँ। अन्यथा तो जिन विषयों पर लेखन से मुझे आत्मिक-संतुष्टि मिलती है, उन्हीं आध्यात्मिक व धार्मिक-विषयों पर लिखता हूँ। इसीलिये आज के इन प्रतिष्ठाचार्यों आदि के विषय में बहुत अधिक नहीं जानता हूँ।]

2. जिनवाणी का स्वाध्याय करने का दायित्व :-

आजकल जिनवाणी का प्रचार-प्रसार करने के लिये भी कुछ विद्वान् अग्रगामी हुये हैं। यह समाज के लिये बहुत सुखद-स्थिति है। किन्तु यहाँ यह बात गम्भीरता से ध्यान देने योग्य है कि इनकी योग्यताओं में जिनवाणी की नय-विवक्षा का सुस्पष्ट-ज्ञान होना के साथ-साथ समीचीन-प्रतिपादनशैली व निर्लोभी-वृत्ति का होना अनिवार्य-गुणों के रूप में बताया गया है। आचार्य गुणभद्र जिनवाणी के वक्ता के गुणों का निरूपण करते हुये लिखते हैं -

‘‘प्राज्ञः प्राप्त-समस्त-शास्त्रहृदयः, प्रव्यक्त-लोकस्थितिः।
प्रास्ताशः प्रतिभापरः प्रशमवान्, प्रागेव दृष्टोत्तरः।।
प्रायः प्रश्नसहः प्रभुः परमनोहारी परा निन्दया।
ब्रूयाद् धर्मकथां गुणी गुणनिधिः, प्रस्पष्ट-मिष्टाक्षरः।।’’

  • (आत्मानुशासन, 5)

अर्थात् जो बुद्धिमान् हो, समस्त शास्त्रों के रहस्य का वेत्ता हो, लोकव्यवहार का ज्ञाता हो, लोकैषणा से अत्यन्त-दूर हो, प्रतिभावान् हो, प्रश्नकर्ता के प्रश्न के उत्तर का पहले से जानकार हो, प्रश्नसह हो अर्थात् दूसरों के प्रश्नों से विचलित नहीं होता हो, उच्च-विचारों का धनी हो, अपनी वाणी से दूसरों का क्लेश दूरकर उन्हें तत्त्वज्ञान की ओर आकृष्ट करने में समर्थ हो, दूसरों की निंदा नहीं करता हो, गुणवान् हो, स्पष्ट अक्षरों से युक्त मृदुवचनों का उच्चारण करता हो - इत्यादि गुणों से युक्त व्यक्ति ही ‘जिनवाणी का वक्ता’ होने योग्य है।

इसमें प्रयुक्त ‘प्रास्ताशः’ पद स्पष्ट करता है कि जिनवाणी के वक्ता को जिनवाणी के स्वाध्याय के बदले में समाज या श्रोताओं से किसी प्रकार की धन आदि की आशा तक नहीं करनी चाहिये।

आचार्य सोमसेन ने भी जिनवाणी के वक्ता के गुणों में ‘निर्लोभः’ विशेषण देकर यह स्पष्ट बता दिया है कि जिनवाणी के वक्ता को समाज या श्रोताओं से किसी प्रकार के धन आदि का लोभ-भाव नहीं रखना चाहिये।

(आ. गुणभद्र के शिष्य, शब्दरत्नप्रदीप, 1/20)

जबकि आज के अधिकांश नवयुवा-विद्वान् न तो विधिवत् जिनवाणी के अधीती होते हैं और न ही वे निर्लोभी-वृत्ति से मात्र जिनशासन की प्रभावना के उद्देश्य से प्रवचन आदि कार्य करते हैं। यह कार्य इन विद्वानों के लिये या तो स्पष्टरूप से आजीविका हो चुका है अथवा ‘पार्टटाइम-आजीविका’ या ‘अतिरिक्त-आमदनी का स्रोत’ बना हुआ है। आज बहुत कम ही विद्वान् ऐसे मिलेंगे, जो मात्र आत्महित या तत्त्वप्रभावना की उदात्त-दृष्टि से स्वाध्याय या प्रवचन आदि के कार्यों को करते हैं और इनके बदले में समाज से कुछ भी नगद या भेंटस्वरूप वस्त्रादि नहीं लेते हैं।

पंडितप्रवर टोडरमल जी इस विषय में स्पष्टरूप से दोटूक लिखते हैं कि ‘‘जिनवाणी का वक्ता जिनवाणी के स्वाध्याय/व्याख्यान के द्वारा अपनी आजीविका का साधनों नहीं करे।’’ उन्होंने आजीविका के लिये निजी-व्यवसाय, नौकरी आदि से जीविका का उपार्जन करने का स्पष्ट-निर्देश दिया है। ताकि उसे जिनवाणी का स्वाध्याय करने के बदले में धनराशि या भेंट-तिलक आदि लेकर उस निर्माल्य-द्रव्य से अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण आदि नहीं करना पड़े।

यहाँ ‘निर्माल्य-द्रव्य’ का स्वरूप स्पष्ट करना प्रासंगिकरूप से अपेक्षित है। जो दानस्वरूप मंदिर जी या किसी भी धर्मायतन में धनराशि या सामग्री संचित होती है, उसे यदि समाज की ओर से कोई अनुरोधपूर्वक भी दे, तो भी वह ‘निर्माल्य-द्रव्य’ की श्रेणी में ही आता है। उसके प्रति जिनवाणी में स्पष्टरूप से दोटूक निर्देश हैं कि ‘‘उसका न तो ग्रहण किया जाये और न ही किसी भी रूप में अपने व अपने परिवार के हित/सुविधा के लिये उसका उपयोग/उपभोग किया जाये।’’

‘निर्माल्य-द्रव्य’ के विषय में युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्द लिखते हैं: ‘‘जिणुद्धार-पत्तिट्ठा, जिणपूजा-तित्थवंदणं विसयं।
धणं जो भुंजदि सो, भुंजदि जिणदिट्ठंणरयगयदुक्खं।।’’
(नियमसार, गा.32)

अर्थात् जो जिनमंदिर जी आदि के जीर्णोद्धार, जिनमंदिर जी एवं जिनबिम्ब आदि की प्रतिष्ठाविधि, जिनेन्द्रदेव के पूजन-विधान आदि कार्यों, जिन-तीर्थों की वंदना आदि कार्यों, इत्यादि प्रशस्त-कार्यों के निमित्त दी गयी धनराशि को जो (अपने विषय-भोग के निमित्त) भोगता है, वह अपने समस्त पुण्य को भोग लेता (नष्ट कर देता) है और नरकगति के दु:खों को भोगता है: ऐसा केवली-भगवान् ने कहा है।

प्रवचनकार-विद्वानों की व्यावसायिक-वृत्ति :-

यह विषय भी समसामयिक-संदर्भों में सावधानीपूर्वक मननीय है। क्योंकि

  1. आजकल प्रवचनकार-विद्वान् स्वाध्यायरूप तत्त्वचर्चा करने को आत्महित की प्रक्रिया की जगह एक व्यवसाय के रूप में लेने लगे हैं। इसीलिये वे बाकायदा पहले से जिसकी जितनी मार्केट-वैल्यू है व मौके की माँग जितनी है; उसी के अनुरूप लिफाफे की मोटाई एवं वजन तय कर लेते हैं। अपने मनमाफिक धनराशि नहीं मिलने की स्थिति में वे अपनी उस कार्यक्रम के लिये अनुपलब्धता व्यक्त कर देते हैं, क्योंकि उन्हें न तो जिनवाणी की चर्चा हितकारी व प्रिय लगता है और न ही वे जिनशासन की प्रभावना के पक्षधर हैं। उनका तो एकमात्र लक्ष्य जिनवाणी की चर्चा का व्यापार करके अधिक से अधिक धनराशि एकत्रित करना है। यह श्रद्धा का व्यापार है। लोग उनसे आत्महितकारी जिनवाणी सुनकर अपने को धन्य मानते हैं और वे जिनवाणी के प्रवक्ता जिनवचनों की कीमत न करके लिफाफे की कीमत करते हैं। पंडितगण लोगों को ‘परिग्रह पाप है’ सिखाकर उसी परिग्रह रूपी पाप को भक्तों से लेकर स्वयं को धनवान् बनाते हैं!

वे विद्वान् ऐसे कार्यों के लिये तय करने के बाद भी यदि कहीं से ज्यादा धनराशि का ऑफर मिल जाये, तो बीमारी से लेकर दुर्घटना जैसे कोई भी बहाना बनाकर अपने वचन के निर्वाह में असमर्थता व्यक्त कर देते हैं। वैसे यह कार्य ‘गृहस्थाचार्य’ एवं ‘विधानाचार्य’ भी आजकल जब तब करते रहते हैं। क्योंकि उन्हें न तो भगवान् की भक्ति है और न अपने वचन की कीमत है। उन्हें तो पैसा ही भगवान् है। लोभकषाय के वशीभूत होकर मायाचारी होने का यह निदर्शन कई धनार्थी-विद्वान्-प्रवचनकारों में देखा जा रहा है।

कुछ विद्वान् तो अन्य-आजीविका नहीं मिल सकने के कारण मजबूरी में स्वाध्याय आदि कार्य करके बदले में धनराशि या भेंट-तिलक सामग्री आदि लेकर जीवन-यापन करते हैं (यद्यपि यह कदापि क्षम्य नहीं है और जिनवाणी में ऐसा करने की कदापि अनुमति कहीं भी नहीं दी गयी है; अतः साधन-विहीनता/निर्धनता/रोजगार न मिलने आदि कारणों से जिनवाणी का स्वाध्याय आदि करके धनार्जन की अनुमति नहीं दी जा सकती है। क्योंकि यह ‘निर्माल्य-द्रव्य’ ही है। और ‘निर्माल्य-द्रव्य’ का सेवन कोई भी जैनकुलोत्पन्न-व्यक्ति नहीं कर सकता है। अन्यथा वह कहने मात्र को ‘जैनकुलोत्पन्न’ कहलायेगा। यथार्थतः वह नीचगोत्र के परिणामों को भोग रहा है)।

तथापि कई विद्वान् लोग प्रचुर-साधन-सम्पन्न होकर भी, करोड़ों की चल-अचल-सम्पत्ति के स्वामी होकर भी निर्लज्जतापूर्वक पूजा-पाठ एवं स्वाध्याय आदि धर्म-कार्य करके बदले में धनराशि या भेंट-तिलक सामग्री आदि ग्रहण करते हैं। (ऐसी स्थिति देखकर मुझे भारतीय की एक प्रसिद्ध रियासत के नबाव का वह किस्सा स्मरण हो आता है कि वे अपनी कंजूस-वृत्ति के कारण उनसे मिलने आनेवाले राजा-महाराजा/नबाव-वाइसराय आदि से उनके मँहगे सिगार-सिगरेट आदि माँग लेते थे। इतना ही नहीं, अकूत-सम्पत्ति के स्वामी होने पर भी नीचगोत्रकर्म के उदयरूप के परिणामों के कारण वे उन लोगों के द्वारा पीकर फेंके गये जूठे सिगार-सिगरेट आदि को पुनः जलाकर उनसे अपनी धूम्रपान-संबंधी तलब् मिटाते थे। लोग उन्हें तिरस्कार-पूर्वक ‘‘जूठन-खानेवाला भिखारी-नबाव’’ कहते थे। क्योंकि अपार धन-सम्पत्ति होने पर भी वे अपनी कुल-गरिमा के विपरीत ऐसा नीच-आचरण करते थे। ठीक यही स्थिति त्रिलोक-श्रेष्ठ जैनकुल पाकर और उसमें भी जिनवाणी के प्रचार-प्रसार के उत्कृष्ट-कार्यों को करके उनके बदले में निकृष्टजनों के योग्य ‘निर्माल्य-द्रव्य’ का सेवन करते हैं, वे भी ऐसी ही निंदनीय-बिडम्बना के पात्र बनते हैं।)

यहाँ मैं स्वनामधन्य जैन-विद्वत्-परम्परा के पं. टोडरमल जी, पं. दौलतराम जी आदि अनेकों जिनधर्म-प्रभावक-मनीषियों का सबहुमान स्मरण करना चाहता हूँ, जिन्होंने सारे जीवन अपने लेखन, प्रवचन आदि के द्वारा जिनधर्म की अनवरत रूप से प्रभावना की; किन्तु कभी भी इन कार्यों को अपनी आजीविका का साधन नहीं बनाया। अपनी आजीविका के निमित्त ये छोटा-मोटा व्यापार, नौकरी आदि कुछ भी कार्य न्यायोचित-रीति से करते रहे; किन्तु इन्होंने कभी ‘धर्म का धन्धा’ नहीं किया, उसे आजीविका का साधन नहीं बनाया।

साथ ही मैं यहाँ स्पष्टरूप से उल्लेख करना चाहता हूँ आध्यात्मिकसत्पुरुष गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का, जिनके अनुयायियों में जिनशासन की प्रभावना हेतु जिनवाणी के स्वाध्याय/प्रवचन आदि की युग-परिवर्तनकारी-प्रक्रिया संचालित हुई, जिसने विगत लगभग सौ वर्षों में जैनसमाज में धर्मप्रभावना एवं तत्त्वज्ञान के प्रति जनजागृति की दिशा और दशा ही बदलकर रख दी है। उन श्री कानजी स्वामी ने स्वयं तो मात्र आत्महित के लिये तत्त्वप्रचार किया ही, साथ ही अपने अनुयायियों को भी पूरी निःस्पृही-वृत्ति से समर्पित होकर गाँव-गाँव, घर-घर में जिनधर्म के तत्त्वज्ञान के प्रचार-प्रसार की प्रेरणा दी। साथ ही उन्होंने अपने अनुयायियों को भी यह संकल्प कराया कि जिनवाणी के स्वाध्याय/प्रवचन आदि किसी भी धार्मिक-अनुष्ठान के बदले में कदापि किसी भी रूप में धन-भेंट आदि का लोभ नहीं करना। मात्र मार्गव्यय ही समाज से लेना, जो यथार्थ में खर्च हुआ हो। उसके अतिरिक्त एक पैसे का भी आकर्षण/अपेक्षा समाज से नहीं करना।

मुझे अच्छीतरह से वे दिन याद हैं, जब उनकी उपस्थिति में सोनगढ़ एवं देश के विभिन्न स्थानों पर उनके सान्निध्य में लगनेवाले शिविरों में अपार-जनसमूह पहुँचता था। और उनके मंगल-प्रवचनों से प्रभावित होकर अपने ग्राम-नगर आदि में स्वाध्याय की कक्षायें आदि संचालित करता था; तो समाज के कुछ विद्वान् उन मुमुक्षु-विद्वानों पर यह आरोप लगाते थे कि ‘‘इन्हें तो सोनगढ़ से पैसा मिलता है इन प्रवचन, कक्षाओं के लिये।’’ और ऐसा कहकर वे निंदक-विद्वान् स्वयं समाज से जो प्रवचन आदि के बदले धनराशि एवं कपड़े आदि भेंटें लेते थे, उनको लेना सही है: यह सिद्ध करते थे।

किन्तु मुमुक्षु-विद्वानों के प्रति ऐसे मिथ्या-प्रचार के पीछे सर्वाधिक-सक्रिय रहे उत्तरप्रदेश के एक मुखर-विद्वान् (नामोल्लेख नहीं करूँगा, वे दिवंगत हो चुके हैं और मैं किसी को अपमानित करना के लिये नहीं लिखता हूँ। मात्र यथार्थ का अवबोध कराना ही मेरे लेखन का लक्ष्य है) पहले तो सोनगढ़ जाकर गुरुदेवश्री कानजी स्वामी से बोले कि ‘‘स्वामी जी! आप जो जिनधर्म की व्याख्या करते हो, वह बिल्कुल-सही है। परन्तु आप जो प्रवचन आदि के बदले में पैसा/भेंटें आदि नहीं लेने की बात करते हो, यही हमारे आपका विरोध किये जाने का मूल-कारण है। यदि हम पूजन-विधान, प्रवचन आदि के बदले में पैसा भेंटें आदि नहीं लेंगे, तो हमारा घर-खर्च कैसे चलेगा। आप ऐसा करें कि आप अपने ट्रस्ट से या अपने भक्त-सेठों से हमें हर महीने पैसे दिलवाने का वचन दें, तो हम समाज से पैसा भेंटें आदि लेना बंद कर देंगे। और आपके द्वारा जो जिनधर्म की सच्ची-व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है, उसी का मैं भी पूरी निष्ठा और समर्पण से प्रचार-प्रसार करूँगा।’’

तब गुरुदेवश्री कानजी स्वामी ने स्पष्ट-शब्दों में इसके लिये मना कर दिया कि ‘‘मैं किसी को भी धार्मिक-अनुष्ठान या प्रवचन आदि धर्मप्रभावना के कार्यों के बदले में पैसा भेंटें आदि देने को नहीं कर सकता हूँ। क्योंकि यह जिनाज्ञा के विरुद्ध है। और मैं ऐसे किसी कार्य के विषय में चर्चा तक नहीं करना चाहता हूँ, जो जिनेन्द्रदेव की आज्ञा के विरुद्ध हो।’’

तब वे विद्वान् बोले कि ‘‘यदि ऐसा है, तो मैं आपके व सोनगढ़ से होने वाले तत्त्वप्रचार के विरुद्ध समाज में प्रचार करूँगा कि आप जिनवाणी के विरुद्ध बोलते हो, और जो आपके अनुसार तत्त्वप्रचार करते हैं, उन्हें सोनगढ़ से पैसा मिलता है।’’ यह सुनकर गुरुदेवश्री ने कहा कि ‘‘भाई! तुम्हारी जैसी मति-गति होनी केवली-भगवान् ने देखी है, वैसी ही तो होगी। परन्तु मैं जिनवाणी की आज्ञा के विरुद्ध किसी भी कार्य का समर्थन नहीं करूँगा। जिनधर्म का प्रचार-प्रसार जिसे रुचे, वह समर्पित होकर करे। परन्तु इसको व्यापार बनाने की अनुमोदना मैं कभी भी नहीं कर सकता हूँ। यह पाप है, नरक-निगोद का कारण है।’’

वे विद्वान् तब गुरुदेवश्री को उनकी बात न मानने का परिणाम भुगतने का चेलैंज देकर चले गये और सारे जीवन उनके विरोध में अनर्गल-आरोप लगाते रहे। और सोनगढी-विद्वानों को सोनगढ़-ट्रस्ट से पैसा मिलने का दुष्प्रचार करते रहे। साथ ही समाज को गुरुदेवश्री और उनके अनुयायियों से खतरा बताते हुये उनके बहिष्कार करने की बातें करते रहे। किन्तु उनके इस दुष्प्रचार का यह सुफल हुआ कि जो लोग सोनगढ़-ट्रस्ट और गुरुदेवश्री कानजी स्वामी से परिचित नहीं थे, उनके मन में भी जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि ‘‘देखें तो सोनगढ़ में क्या होता है? कानजी स्वामी क्या कहते हैं?’’ और वे सोनगढ़ पहुँचते, वहाँ के प्रशान्त-अध्यात्ममय वातावरण में गुरुदेवश्री के मंगल-प्रवचनों को सुनते। उनसे अनुप्राणित होकर अपने ग्राम-नगर में उसके प्रचार-प्रसार के लिये समर्पित होकर जुट जाते। परन्तु मात्र तत्त्वप्रचार की उदात्त-भक्तिभावना से, न कि धर्म के व्यापार के लिये।

इस पूरे आलेख में मैंने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से तथ्यों को सप्रमाण प्रस्तुत किया है। किसी की निंदा-स्तुति या कटाक्ष आदि की दृष्टि से कुछ भी नहीं लिखा है।

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स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 98-111

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