जिनदत्त चरित्रम् (आचार्य गुणभद्र), हिन्दी अनुवाद सहित | Jinadatta Charitram (Acharya Gunabhadra)

जिनदत्त चरित्रम् (आचार्य गुणभद्र), हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: आचार्य गुणभद्रस्वामी
अनुवाद एवं सम्पादन: मुनि मार्दवसागर, ब्र॰ डॉ॰ राजेन्द्र जैन
प्रकाशक: जैन विद्यापीठ, सागर (म॰ प्र॰)
संस्करण: २०१७ (आवृत्ति ११००)

नौ सर्गों का संस्कृत महाकाव्य, श्रेष्ठी जिनदत्त का जीवन चरित्र: आहारदान का महत्त्व, पूर्वभव, विदेश यात्रा, विवाह, मुनि दीक्षा, तपस्या और स्वर्ग प्राप्ति।

Jinadatta Charitram by Acharya Gunabhadra: a Sanskrit mahakavya in nine sargas on the life of the merchant Jinadatta, with Hindi translation by Muni Mardavsagar and Br. Dr. Rajendra Jain.


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प्रथमः सर्गः

जिनदत्त-चरित्रम्


महामोह - तमश्छन्न- भुवनाम्भोज - भानवः ।
सन्तु सिद्धयङ्गनासङ्ग-सुखिनः संपदे जिनाः ॥१॥

अर्थ: अतिगाढ़ मोहरूप घने अंधकार से घिरे हुए, तीनों लोकों के प्राणीरूप कमलों के विकास में कारणभूत सिद्धिरूपी स्त्री के संयोग से सुखी अरहंत-सिद्धपरमात्मा अविनश्वर मोक्ष सम्पत्ति के लिए होवें ॥१॥


यदायत्ता जगद्वस्तु-व्यवस्थेयं नमामि ताम् ।
जिनेन्द्रवदनाम्भोज-राजहंसीं सरस्वतीम् ॥२॥

अर्थ: हे सरस्वती देवी ! यदि तू न होती तो इस संसाररूपी कारागार में अवरुद्ध हुए दीन दुखी प्राणियों का जिनेन्द्र भगवान् कैसे उद्धार करते ? उन्हें किस तरह सुख का मार्ग बतलाकर मोक्ष नगर पहुँचाते ? और यों ही क्या वे हमारे उपकारी ही होते ? जो कुछ भी उनके प्रति हमारी भक्ति व श्रद्धा है, वह सब तेरे ही द्वारा करायी गई है; तू ही इसमें प्रधान कारण है । संसार के समस्त पदार्थों का ज्ञान तेरे ही कारण से होता है इसलिए; हे संसार के प्राणियों की एकमात्र रक्षयित्री, जगद्धात्री ! जिनेन्द्र भगवान् के वदनरूपी कमल पर अतिशय शोभित होने वाली दिव्यध्वनिरूपी राजहंसी पूज्य माँ ! तेरे लिये हमारा बार-बार नमस्कार है ॥२॥


मिथ्याग्रहाहिना१ दष्टं सद्धर्म्मामृत - पानतः ।
आश्वासयन्ति२ विश्वं३ ये तान् स्तुवे यति-नायकान् ॥३॥

अर्थ: मुनियों के शिरताज, अहिंसा आदि पाँच महाव्रतों के निर्दोष पालक, सदसद्विवेकी गुरुदेव आपके लिए भी हमारा भक्ति भरा नमस्कार है यदि आप जिनेन्द्र भगवान के उपदेशों से अपनी आत्मा को उन्नत कर मोहनीय कर्म के साथ युद्ध न करते और उसकी ही आज्ञा का पालन करते रहते तो ऐसा कभी भी अवसर प्राप्त न होता कि हम भी उस मोहनीय के विरुद्ध कुछ भी आँख उठाकर देख सकते । यह सब आप ही का प्रसाद है कि मोहनीय कर्म द्वारा भेजे गये मिथ्यात्वरूपी सर्प से डसे गये भी संसार के भव्यजीव आपके सद् धर्मोपदेशरूपी अमृत से अपने अभीष्ट (स्व स्वरूप) की सिद्धि कर रहे हैं अन्यथा अनंत सुख स्वरूप मोक्ष की प्राप्ति इस संसार के जीवों को दुर्लभ ही नहीं असंभव ही हो जाती, वे इसे कभी प्राप्त न कर सकते ॥३॥


मालिन्योद्द्योतयोर्हेतू असत्सन्तौ४ स्वभावतः ।
गुणानां न तयो र्निन्दास्तुती तेन तनोम्यहम् ॥४॥

अर्थ: कवि लोग प्रायः अपने-अपने रचित ग्रंथों के आदि में दुर्जनों की निंदा और सज्जनों की प्रशंसा किया करते हैं एवं उनसे अपने काव्य के दोषों की मार्जना का विचार भी प्रक्ट करते हैं परंतु उनके उस लम्बे-चौड़े प्रशंसा व निंदा के प्रस्ताव से सज्जन वा दुर्जन कोई भी सहमत नहीं होते । वे लोग, जो उनके मन में आती है अपने स्वभावानुसार दोषोद्घाटन, गुण प्रकाशन आदि किये बिना नहीं रहते । इसलिए मैं (गुणभद्रस्वामी) अपने इस ग्रंथ में व्यर्थ ही सज्जन-प्रशंसा और दुर्जन-निंदा का लोकानुगत गीत गाकर समय और शक्ति नष्ट नहीं करना चाहता ॥४॥


मनो मम चतुर्वर्ग - मार्गमुक्ता - फलोज्ज्वलाम् ।
जिनदत्त - कथाहार-लतिकां कर्तुमीहते५ ॥५॥

अर्थ: यह जिनदत्त सेठ की कथा मनुष्य के जीवन के कर्तव्य स्वरूप धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषाथों को प्रकट करने वाली है। जो लोग अपने जीवन को सदाचारी, पवित्र, इहलोक-परलोक में सुख प्रदान करने वाला बनाना चाहते हैं, उनके लिये अतुलनीय यह सत्य दृष्टांत है, इसलिए हमारी इच्छा हुई है कि ऐसे उत्तम पुरुष का जीवन लोगों को बतलाया जाये, अतः उसे हम यहाँ लिखते हैं ॥५॥


अथास्ति भरतक्षेत्रे जम्बुद्वीपस्य दक्षिणे ।
श्रीमानंगाभिधो देशो देवावास इवापरः ॥६॥

अर्थ: अथानन्तर जम्बूद्वीप के दक्षिण भाग में भरतक्षेत्र है, उस क्षेत्र में एक अङ्ग नाम का देश है, वह अपनी शोभा से दूसरे स्वर्गलोक के समान जान पड़ता है ॥६॥


क्रीडामत्तामरा यत्र कोपयन्ति स्वकामिनीः ।
उद्यानेषु विलासाढ्य-वनपालि - विलोकिनः ॥७॥

अर्थ: इस देश में अति रमणीय उद्यान हैं। यहाँ मनुष्य रति आदि क्रीड़ाओं में उन्मत्त हुए अपनी कामनियों को कुपित करते हैं । वन-पालक इन विलासियों को निरंतर देखते हैं अर्थात् यहाँ के बगीचों में विहार करने के लिए लोग आते रहते हैं ॥७॥


सविभ्रमाः सपद्माश्च सर्व - सेव्य - पयोधराः ।
कुटिला यत्र राजन्ते नद्यः पण्याङ्गना इव ॥८॥

अर्थ: इस देश में गंगा आदि नदियों का खूब जोर-शोर है। कमलों के समूह के समूह उनमें खिले हुए दिखलाई पड़ते हैं, भंवर कुँए सरीखे गहरे हो-होकर लोगों के मन में डर और कौतूहल पैदा करते हैं। उनका जल स्वच्छ और मधुर है। यहाँ की नदियाँ टेढ़ी-मेढ़ी बहती हुईं वेश्याओं के समान सुन्दर प्रतीत होती हैं ॥८॥


[अङ्गदेश का वर्णन]


पन्थानं पथिका कामं नाक्रमन्ति समुत्सुकाः।
अपि यद्गोपिकाकान्त-रूपासक्ताः पदे - पदे ॥९॥

अर्थ: यहाँ की स्त्रियाँ बहुत सुंदर हैं, उनके उस सौंदर्य का वर्णन करना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। उच्च घरानों की नारियों की तो बात ही क्या है ? सामान्य क्षुद्र ग्वालों की कन्याएँ जो धूप की उष्णता में, जाड़े की सरसराहट में सर्वदा कुम्हलाई रहती हैं, उनके अप्रतिमरूप को देखकर ही पथिक लोग आकर्षित होते हैं जिससे उन्हें मार्ग तय करने में विलंब होता है ॥९॥


भान्ति यत्र भुवो ग्राम्याः सर्वतः खल-संकुलाः।
समृद्धिभिस्तथाप्युच्चैः सञ्जनानन्द - हेतवः ॥१०॥

अर्थ: इस अङ्ग देश के अनेकों ग्राम हैं। इनकी शोभा भी अनोखी है। चारों ओर हरियाली, धान्य से भरे खलियान हैं। इनकी समृद्धि सज्जनों के आनंद की हेतु हैं। अभिप्राय यह है कि ग्रामीण जन गाँवों में गोधनादि से समृद्धिप्राप्त कर सज्जनों के आनंद के साधन हैं। सरलता से उच्च आशय धारण करते हैं ॥१०॥


निगमानां न चान्योन्यं यस्मिन् सीमावगम्यते।
निष्पन्नैः सर्वतः सर्व-सस्यजातैर्निरन्तरैः ॥११॥

अर्थ: यहाँ के नगर एवं गाँव एक-दूसरे के अति सन्निकट हैं। सभी हरे-भरे और फले - फूले हैं। किस की सीमा कहाँ से कहाँ तक है यह प्रतीत ही नहीं होता है, सब जगह सदा विविध धान्य उत्पन्न होते रहते हैं, किसी को किसी प्रकार का अभाव नहीं है ॥११॥


सच्छायाः प्रोन्नता यत्र मार्गस्थाश्च विजातिभिः।
सेव्यन्ते पादपा युक्त-मेतन्ननु कुजन्मनाम् ॥१२॥

अर्थ: यहाँ के मार्गों में अनेक जाति के सघन, छायादार, विशाल और उन्नत वृक्ष हैं । सभी पथिकों द्वारा उनका उपभोग किया जाता है । इससे प्रतीत होता है कि वृक्षों के पाप कर्म का यह कुफल है क्योंकि उत्तम वस्तु सर्व सेव्य नहीं होती ॥१२॥


खन्याकर-समुत्थानं दधाना बहुधा धनम् ।
जाता वसुमती यत्र यथार्थेयं समन्ततः ॥१३॥

अर्थ: यहाँ खानों की भी कमी नहीं है । हीरा, माणिक, पन्ना आदि की अनेकों खानें हैं इनसे प्रतीत होता है कि पृथ्वी का सार्थक नाम वसुमति (वसुन्धरा या वसुधा) है । ‘वसु’ का अर्थ धन होता है, जो इससे सहित हो वह वसुमती है, इसे जो धारण करे वह वसुधा है । इस देश में सोने-चाँदी, हीरा आदि की खानों को देखकर सहज ही पृथ्वी का ‘वसुमति’ नाम सार्थक हो जाता है ॥१३॥


राजते जनता यत्र जिनधर्म्मरता सदा ।
दारिद्र्य - दुर्नयाताङ्क-भीतीतिभि-रसंगता ॥१४॥

अर्थ: धर्म, सुख का कारण है । जहाँ जिनधर्म और धर्मात्माओं का निवास है, वहाँ आधि-व्याधि, शोक-संताप, ईति-अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहों की वृद्धि, टिड्डियों की वृद्धि, तोतों की वृद्धि, स्वचक्र, परचक्र का उपद्रव ये सात ईतियाँ, भय-इहलोक, परलोक, अनरक्षा, अगुप्ति, मरण, वेदना, आकस्मिक ये सात भय आ नहीं सकते । प्रजा निरन्तर अपने धर्म कार्यों में रत है, इसलिए अन्याय और तज्जन्य क्लेशों का भी यहाँ अभाव है ॥१४॥


कल्याण-भूमयो यत्र जिनानां विहितोत्सवाः ।
भक्त्यागतमरैर्भान्ति पापापोहन - पण्डिताः ॥१५॥

अर्थ: इस देश की पावन भूमियों में तीर्थङ्करादि के कल्याणक-गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान व मोक्ष निरन्तर सम्पादित किये जाते हैं । जिनालयों में हमेशा नाना प्रकार के उत्सव होते रहते हैं । पूजा/ विधानादि किये जाते हैं । यहाँ न केवल मनुष्य ही आते हैं अपितु पाप कर्म के नाश करने हेतु देव लोग भी आते हैं ।१५॥


मध्येऽस्ति तस्य देशस्य वसन्तादिपुरं१ पुरम् ।
निर्भर्त्सितामराधीश- नगरं निज - शोभया ॥१६॥

अर्थ: इस अङ्ग देश के मध्य में वसन्तपुर नाम का अति रमणीक नगर है । यह अपनी शोभा से अमरपुरी को भी तिरस्कृत करता है ॥१६॥


महीप्रवेशमाविश्य चौरेणेव पयोधिना ।
खातिकाव्याजतो बब्रे यद्रत्नहरणेच्छया ॥१७॥

अर्थ: इसके चारों ओर बहुत ही गहरी एक खाई थी और उसको देखकर लोग कभी-कभी यह अनुमान लगाया करते थे कि इस नगर में रत्न अधिक हैं इसलिए उनको चुराने के लिए खाई का रूप धारण कर समुद्र पृथ्वी में घुसकर अपनी अभीष्ट सिद्धि करना चाहता है ॥१७॥


यत्सद्म-दीर्घिकापद्मैः विकासो नाप्यते स्फुटम् ।
प्राकार - कोटि - संरुद्ध-दिवाकर - करत्वतः ॥१८॥

अर्थ: कोट की अत्यन्त ऊँचाई होने से रवि रश्मियाँ पूर्णरूप से नहीं आ पाती थीं । इसलिए बावड़ियों के कमल पूर्ण विकसित नहीं हो पाते थे । वस्तुतः यहाँ इस नगर की सुरक्षा के लिए बने हुए कोट की अधिक ऊँचाई को प्रदर्शित किया है ॥१८॥


यत्कामिनी-कपोलानां कान्तिं हर्तुमिवेन्दुना३ ।
क्षालनाय कलङ्कस्य भ्राम्यते४ सौध-सन्निधौ५ ॥१९॥

अर्थ: यहाँ धनिकों के महल और अट्टालिकायें बड़ी-बड़ी ऊँची थीं । उनकी ऊँचाई से चंद्रमंडल थोड़ी दूर रह जाता था और वह चन्द्रमा उससे वहाँ की रमणीय रमणियों के मनोहर कपोलों की कान्ति को हरण कर अपने कान्तिविहीन कलंक को मार्जन करने की इच्छा वाला मालूम होता था ॥१९॥


सुदर्शनकृतानन्दाः सत्यासक्ताः समाः सदा ।
प्रद्युम्नमोदिनो यत्र समाना विष्णुना जनाः ॥२०॥

अर्थ: सातिशय पुण्यशालिनी इस नगरी में सर्व भव्य-जन महान् पुण्यवान् हैं। देव, शास्त्र, गुरु की भक्ति के प्रकर्ष को सूचित करने वाली यहाँ की जनता का रूप लावण्य है। इनके देखने मात्र से आनन्द उत्पन्न होता है अर्थात् सभी मनोहर हैं, सुंदर हैं, दर्शनीय हैं। ये सतत सत्यभाषी हैं, मधुरालापी, सदाचारी, सरल और मन्दकषायी हैं। कामदेव को भी तृप्त करने वाले ये जन, विष्णु के समान भोगानुभव करते हैं अर्थात् धर्म-पुरुषार्थ पूर्वक काम-पुरुषार्थ का सेवन करते हैं ॥२०॥


यन्नारी-नयनापाङ्ग-रङ्गेऽनङ्गेन वल्गता ।
वासो निःसंशयं चक्रे शान्तानामपि मानसे ॥२१॥

अर्थ: यहाँ प्रमदाजन की रूपराशि-कान्ति अद्वितीय है। इनके नयन कटाक्ष, कामदेव को कभी उन्मत्त करने वाले हैं। साधारणजन की क्या बात, शांतचित्त साधुजन के मन को भी चंचल करने में समर्थ हैं ॥२१॥


चित्रं विचित्र - कूटापि जिनसद्म - परम्परा ।
मानोन्नता निहन्त्याशु यस्मिन् पापानि पश्यताम् ॥२२॥

अर्थ: इस नगरी के जिनालयों की छटा अनूठी ही है। चित्र-विचित्र कलाओं से अनेकों कूटशिखर बनाये गये हैं। विशाल और उन्नत जिनालयों के दर्शन करने से ऐसा प्रतीत होता है मानों ये ऊँचाई से शीघ्र ही दर्शकों के पाप पुञ्ज को नष्ट करने वाले हैं अर्थात् देखते ही दर्शकों के मानसिक कालुष्य को नष्टकर परम शांति प्रदान करते हैं ॥२२॥


जालावलम्बि-शीतांशु-करस्पर्शः सुखावहः ।
प्रत्यक्षेऽपि प्रिय-स्त्रीभी रतान्ते यत्र सेव्यते ॥२३॥

अर्थ: यहाँ यत्र-तत्र क्रीड़ा गृह बने हुए हैं । उनमें अनेकों झरोखे हैं, उनसे चन्द्रमा की किरणें रात्रि में प्रविष्ट हो कामियों का स्पर्श कर उन्हें उत्तेजित कर शांति प्रदान करती हैं । अपनी-अपनी प्रियाओं के साथ रति सुखानुभव कर भ्रमित, जन अन्त में चंद्रमा की सुखद शीतल किरणों का सेवन कर श्रम को दूर करते हैं । सुखोत्पादक चन्द्र-ज्योत्स्ना एवं शीतल-वायु, मिथुनों की श्रांति एवं क्लान्ति को दूर कर देती है ॥२३॥


यान्तीनां यत्र सङ्केत-निकेतं निशि योषिताम् ।
निजाभरणभाभार-प्रसरो विघ्नकारकः ॥२४॥

अर्थ: इस नगरी का विलास वैभव अपूर्व है । यत्र-तत्र संकेत गृह बने हुए हैं । रात्रि में पण्यस्त्रियाँ/वेश्याएँ अथवा अन्य भोग स्त्रियाँ इन सांकेतिक निकेतनों में नाना आभरणों से सज्जित अलंकारों की प्रभा से भरित जाती-आती हैं । इनके निरंकुश संचार में आभरणों की प्रभा के भार का फैलाव विघ्नकारक प्रतीत होता है ॥२४॥


नित्यं सत्त्याग-सम्पन्ना जना यत्र विमत्सराः ।
एकान्त-सञ्चितद्रव्यं लज्जयन्ति धनाधिपम् ॥२५॥

अर्थ: इस नगरी के नागरिक धर्म भावना और त्याग भाव से संयुक्त हैं । परस्पर मात्सर्य भाव से रहित हैं । न्याय-नीतिपूर्वक धनोपार्जन करते हैं, अतुल वैभव से कुबेर को भी तिरस्कृत करते हैं अर्थात् इनकी निरुत्सुक, त्यागमयी विभूति के समक्ष स्वयं धनद/कुबेर लज्जानुभव करता है । संसार में कुबेर सर्वोत्तम धनिक माना जाता है, किन्तु इस वसन्तपुर के वैभव के समक्ष उसका भी मान गलित प्रतीत होता है ॥२५॥


पद्मरागप्रभाजाल-लिप्ताङ्गी मणि - कुट्टिमे ।
शङ्कते कामिनी यत्र कर्तुं कुंकुम - मण्डनम् ॥२६॥

अर्थ: जहाँ पद्मरागमणि की कान्ति से द्योतित अङ्ग वालीं मणिमय कृत्रिम पुत्तलिकाएँ बनीं हैं, जिनको देखते ही कामीजन शंकाकुल हो जाते हैं, उन्हें यथार्थ कामिनी समझते हैं; सोचते हैं ये साक्षात् रमणियाँ कुंकमार्चन कर अपने मुख की शोभा बढ़ा रही हैं ॥२६॥


भुजङ्ग-सङ्गतो यस्य न समश्चन्द्रशेखरः ।
बभूव भूपतिस्तत्र नाम्ना श्रीचन्द्रशेखरः ॥२७॥

अर्थ: चन्द्रशेखर-महादेव को कहा जाता है । उस नगरी में इसे भ्रमित करने वाला चन्द्रशेखर नाम का राजा हुआ । यह वस्तुतः शिवजी की भी अवहेलना करने वाला यथा नाम तथा गुण संपन्न हुआ ॥२७॥


नूनं निवेशिता कान्तिस्तत्तन्नौ १ विधिना पुरा ।
मध्यादिन्दोः कथं तत्र कलङ्क-किणतान्यथा ॥२८॥

अर्थ: राजा के शरीर की कान्ति नामकर्मरूप विधाता ने अद्वितीय बनायी थी, यही नहीं प्रत्येक आङ्गोपाङ्ग की रचना करने में मानो चंद्रमा की समस्त कलाओं का निचोड़ लेकर प्रयोग किया था; अन्यथा चंद्रमा के मध्य स्थित कलङ्क यहाँ भी आ जाता ? किंतु उस कलङ्क से चंद्रशेखर नृपति सर्वथा रहित था । अभिप्राय यह है कि चंद्रमा तो कलंक सहित होता है परन्तु राजा चंद्रशेखर निष्कलंक सौंदर्य सम्पन्न था ॥२८॥


बभूव भुवने यस्य कीर्त्तिः कुन्देन्दुनिर्मला ।
दिगङ्गना यया रेजुः सहारलतिका इव ॥२९॥

अर्थ: उस राजा की कीर्ति, श्वेत कुन्दपुष्प की सुवासना एवं पूर्ण शुभ्र चंद्रमा की चाँदनी के समान निर्मल दिग्दिगन्त में व्याप्त थी । संसार में मात्र व्याप्त ही नहीं थी अपितु दिशारूपी वधुओं ने उसे अपने गले का सुंदर हार बनाकर गले में धारण कर लिया था । जिससे वह सुशोभित हो रही थी अर्थात् कण्ठहार के समान राजा का यश दिशाओं ने धारण किया था ॥२९॥


[वसंतपुर के चन्द्रशेखर राजा का वर्णन]


विच्छिन्नमण्डलाभोगा विकला क्षणनाशिनी ।
यस्यारिसंहतिर्जाता मूर्त्तिरिन्दोरिवादिमा ॥३०॥

अर्थ: इस राजा का शत्रु समूह सर्वथा विच्छिन्न था, कहीं भी कोई समूह बनाकर राजा के प्रति निन्दा आदि व्यवहार नहीं करते थे । शत्रु सेना स्वयं दूज के चाँद के समान विकल छिन्न-भिन्न हो जाती अर्थात् राजा के बल पौरुष के समक्ष शत्रुगण हतप्रभ हो गये थे ॥३०॥


तीव्र - प्रताप - सम्पन्नो यो जगत्तापनाशनः ।
अविग्रहोऽपि सर्वाङ्ग-सौन्दर्य - जितमन्मथः १ ॥३१॥

अर्थ: यद्यपि चंद्रशेखर नृपति का प्रताप अद्वितीय था किन्तु उस में संताप नहीं था अर्थात् आतंक रहित प्रभुत्व होने से संपूर्ण प्रजा का संताप नष्ट करने वाला था । इस श्लोक में दो अर्थ वाले शब्दों के माध्यम से विरोध जैसा मालूम पड़ता है, अतः विरोधाभास अलंकार है किन्तु दूसरा अर्थ विचार करने पर विरोध दूर हो जाता है । वह इस प्रकार है कि जो प्रकृष्ट ताप से सहित है, वह जगत के ताप को कैसे नष्ट कर सकता है ? यहाँ तीव्र-प्रताप-सम्पन्नः शब्द का दूसरा अर्थ महा तेजस्वी करने पर वह राजा महाप्रतापी था, अतः जगत के क्लेश को शान्त करने में समर्थ था इसी तरह से जो स्वयं शरीर से रहित है, वह सर्वाङ्ग सौन्दर्य से कामदेव को कैसे जीत सकता है ? यहाँ भी अविग्रह शब्द का दूसरा अर्थ कलह रहित करने पर विरोध का परिहार हो जाता है, वह राजा शत्रु विहीन होने से कलह रहित होकर भी शारीरिकरूप से कामदेव को जीतने वाला था ॥३१॥


कामार्थयोस्तथा भूपो यः कदापि न मोदते ।
जिनोदिते यथा धर्म-मार्गे नित्यमतन्द्रितः२ ॥३२॥

अर्थ: इस भूपति के काम और अर्थ दोनों पुरुषार्थ होड़ लगाये बढ़ रहे थे। किंतु राजा इनमें मुग्ध न होकर जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित यथार्थ जिनधर्मरूप पुरुषार्थ की सिद्धि में ही सतत तत्पर रहता था। प्रमाद रहित जिनधर्म के मार्ग में आरूढ़ रहता हुआ नाना प्रकार से धर्म मार्ग का द्योतन करता था ॥३२॥


राजविद्याश्चतस्रोऽपि भासयामास शेमुषी१ ।
विभेव भास्वतो२ यस्य ककुभः३ सहसंभवाः ॥३३॥

अर्थ: चारों राज विद्याएँ १. प्रान्वीक्षिकी (विज्ञान), २. वेदत्रयी, ३. वार्ता (अर्थशास्त्र), ४. दण्डनीति (राजनीति) पूर्णतः प्रकाशित हो रही थीं । वह अपनी राजकीय विद्याओं का भी पूर्ण जानकार था इसकी बुद्धि जिस प्रकार सूर्य अपने उदय से दिशाओं को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार समस्त विद्याओं को प्रकाशित करती थी ॥३३॥


४प्रिप्रिये प्रणतानन्त-सामन्तैः स तथा न हि ।
यथा स्वयं जगद्वन्द्य-मुनीन्द्र-पद-वन्दनैः ॥३४॥

अर्थ: राजा में नम्रता भी खूब थी । इसे अपने चरणों में नमते हुए सामंतों को देखकर उतनी खुशी न होती थी जितनी कि जगत् के एक हितु संत साधुओं के चरणों में स्वयं नमते हुए होती थी ॥३४॥


ईर्ष्या स्वभावतः स्त्रीणा-मिति मिथ्या कृतं श्रिया ।
मेदिनी-सुखसक्तेऽपि यत्तत्र रसिका स्वयम् ॥३५॥

अर्थ: संसार में यह लोकोक्ति प्रचलित है कि स्त्रियों में स्वभाव से ईर्ष्या होती है अर्थात् एक दूसरे का उत्कर्ष सहन नहीं कर सकतीं किंतु इसकी राजलक्ष्मी ने इस चर्चा को मिथ्या/असत्य कर दिया था, क्योंकि इस राजा के लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ निवास करती थी ॥३५॥


स्वरूप - सम्पदा जिग्ये यया मदनसुन्दरी ।
समभूद्वल्लभा तस्य नाम्ना मदनसुन्दरी ॥३६॥

अर्थ: इस राजा की प्रिय पत्नी मदनसुंदरी थी। यह राजा को अत्यंत प्रिय थी। इसने अपनी रूप राशि से कामदेव की पत्नी रति-मदनसुंदरी को भी जीत लिया था अर्थात् मदनसुंदरी यथा नाम तथा गुण थी ॥३६॥


यस्याः सौन्दर्यमालोक्य विस्मिताः सुरयोषितः ।
नूनमद्यापि नो जाताः सनिमेष-विलोचनाः ॥३७॥

अर्थ: इसके उपमातीत सौंदर्य को देखकर कल्पना चतुर कविगण तो यहाँ तक अनुमान लगाते थे कि देवाङ्गनाएँ जो निमेष रहित अपलक नेत्रवाली हैं वे इसी के रूप को देखकर आश्चर्य से आँखें फाड़े ही रह गईं ॥३७॥


सर्वाङ्ग - रमणीयाङ्ग्या व्यवधानं विभूषणैः ।
कोमलाङ्ग्याः कृतं कान्तेर्यस्याः सारङ्गचक्षुषः ॥३८॥

अर्थ: उसका प्रत्येक अङ्ग स्वभाव से ही सुंदर था, आभूषणों के द्वारा उसका सौंदर्य नहीं बढ़ता था अपितु आभूषण उसकी शोभा में व्यवधान स्वरूप ही थे। ऐसी सुन्दरता पञ्च परमेष्ठी की भक्ति से प्राप्त होती है ॥३८॥


लीला - कमलमुलंङ्घ्य यस्या मुखसरोरुहे ।
निपपात महामोदा-दिन्दिन्दिर - परम्परा ॥३९॥

अर्थ: उस रानी के मुखरूपी कमल पर क्रीड़ा कमल को छोड़कर अत्यंत हर्ष से भौरों की पंक्ति पड़ रही थी अर्थात् उसका मुख कमल पुष्प की सुगंधी के समान सुवासित था जिससे उसके मुखरूपी कमल पर भौरों की पंक्तियाँ मंडराती थीं ॥३९॥


यस्या मुखेन्दुना साम्यं मन्ये प्रापयितुं शशी ।
१कीर्यतेऽद्यापि धात्रा२ धौतान्यपक्षयोः ॥४०॥

अर्थ: उसका मुख, चन्द्र-कान्ति से बढ़कर था । चंद्रमा अपने भ्रमण से शुक्ल और कृष्ण पक्ष करता रहता है । ऐसा प्रतीत होता है कि उस महादेवी के मुख की समानता को पाने के प्रयास में ही वह इस प्रकार घूमता रहता है ॥४०॥


दधाना नवलावण्यं प्रवालाधरपल्लवा ।
शृङ्गारवारिधेर्वेला विधिना ३विहितेव या ॥४१॥

अर्थ: नवीन लावण्य को धारण करने वाली उसके दोनों अधर (ओठ) मूंगे के समान रक्त वर्ण थे । इसका रूप-लावण्य सुन्दरता के अन्तिम छोर को प्राप्त अर्थात् अनुपम था ॥४१॥


यया मुक्ताभिरामान्तर्निर्मला गुणसङ्गता ।
हृदि हारलतेवोच्चैः सद्द्रष्टिर्निदधे परा४ ॥४२॥

अर्थ: इसके हृदय में जिस प्रकार निर्मल बहुमूल्य मोतियों का गुंफित हार शोभित होता था उसी प्रकार इसके चित्त में मुक्त स्वरूप में स्थित आत्माओं के ध्यान से निर्मल गुणों से विशिष्ट सम्यग्दर्शन व सुन्दर नेत्रों से भी शोभित होती थी ॥४२॥


नयनाली न रेमाते५ तां विहाय महीभृतः ।
स्वभाव-सुकुमाराङ्गी ६माकन्दस्येव मञ्जरीम् ॥४३॥

अर्थ: राजा के नयनरूपी भ्रमर, स्वभाव से कोमलाङ्गी, सुकुमारी को प्राप्त कर अन्यत्र जाना नहीं चाहते थे और आम्र मञ्जरी के समान रानी की रूप राशि के पान करने में मत्त (भौँरा) की भाँति राजा की दृष्टि इसी की ओर लगी रहती थी ॥४३॥


अथ तत्रैव सद्धर्म-नीर-निर्द्धौत-पातकः ।
जीवदेव इति श्रेष्ठी बभूव वणिजां पतिः ॥४४॥

अर्थ: इसी नगरी में जीवदेव नामक श्रेष्ठी था यह वणिकपति अर्थात् व्यापारियों में सर्वोत्तम धनाढ्य था । सद्धर्मरूपी निर्मल जल से इसने अपने पाप पङ्क का प्रक्षालन किया था अर्थात् अत्यन्त धर्मात्मा था। निरन्तर धर्म ध्यान में लीन रहता था ॥४४॥


नार्थानां बहुभेदानां सङ्ख्यानं यस्य वेश्मनि ।
विज्ञातं वाग्विलासे वा संप्रकाशे महाकवेः ॥४५॥

अर्थ: इसके शुभोदय से असंख्य पदार्थों से इसका गृह शोभित था । बोलने की कला के कौशल में महाकवि के समान जान पड़ता था ॥४५॥


पूजया जिननाथाना-मतिथीनां च सेवया ।
दीनादिकृपया चापि यत्समोऽजनि नापरः ॥४६॥

अर्थ: वह सेठ प्रतिदिन भक्तिपूर्वक जिनेन्द्रदेव की पूजा और अतिथियों की सेवा करता था । दीन दरिद्री व दुःखी लोगों को दया भाव से मुँह माँगा दान देता था, इसलिए इसकी बराबरी इस गुण में कोई भी उस नगर का धनाढ्य नहीं कर सकता था ॥४६॥


असत्यवचनं लेभे जिह्वाग्रे यस्य नास्पदम् ।
मानसे वा महासत्यं दुराचार- विजृम्भिणाम् ॥ ४७॥

अर्थ: यह सदैव सत्य भाषण करता था, मिथ्या भाषण कभी सेठ की जिह्वा का स्पर्श ही नहीं कर सका। दुराचारी के साथ भी अनुचित व्यवहार नहीं करता था, मन सदैव शुभ परिणामों से पवित्र रहता था ॥४७॥


[वसंतपुर के जीवदेव सेठ का वर्णन]


निरन्तर - सदाचार- नीरधाराभिषेकतः ।
ववृधे विदुषा येन शश्वत्सज्जनता-लता ॥४८॥

अर्थ: उस विद्वान् सेठ ने निरन्तर सदाचाररूपी सलिल की धारा से अभिसिंचित सज्जनतारूपी लता का विस्तार किया था अर्थात् सेठजी सदाचारी व सज्जन थे ॥४८॥


सद्मानि येन जैनानि कारितानि विरेजिरे ।
सुधा-सितानि तुङ्गानि मूर्तिमन्ति यशांसि वा ॥४९॥

अर्थ: इस श्रेष्ठी ने विशाल उत्तुंग अनेक जिनालयों का निर्माण कराया, ये जिनभवन अत्यंत शोभा युक्त थे, शुभ्र वर्ण के थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों इस (सेठ का) पुण्य से वर्द्धित यश ही मूर्तिमानरूप धारण कर अटल खड़ा है, व्याप रहा है ॥४९॥


भोगभौमं स्वभोगेन धनदं धनसम्पदा ।
यो जिगाय महाभागो १याचकामर-भूरुहः ॥५०॥

अर्थ: इसने अपने भोगों से भोगभूमि को, धन सम्पदा से कुबेर को और याचकों को इच्छित दान देने से कल्पवृक्षों को जीत लिया था अर्थात् वह सेठ भोगवान्, सम्पत्तिशाली, महादानी था ॥५०॥


जीवञ्जसेति विख्याता २तस्यासीत्सहचारिणी ।
यथा ज्योत्स्ना शशाङ्कस्य दया संयमिनो यथा ॥५१॥

अर्थ: इस सेठ के जीवञ्जसा नाम की परम सुंदरी पत्नी थी, यह चन्द्रमा की चाँदनी के समान सुंदर और संयमीजनों के समान दयालु थी ॥५१॥


[जीवञ्जसा सेठानी का वर्णन]


विशुद्धोभयपक्षा या राजहंसीव मानसम्।
मुमोच तस्य न स्वच्छं गम्भीरञ्च कदाचन ॥५२॥

अर्थ: दोनों कुलों को विशुद्ध करने वाली शुभ भावना में तत्पर मनरूपी मानसरोवर में राजहंसी के समान सेठानी ने कभी भी हृदय की गम्भीरता और स्वच्छता को नहीं छोड़ा था ॥५२॥


खनिरौचित्यरत्नानां विनय - द्रुम - मञ्जरी१।
सतीव्रत-पताकेव पश्यतां मोहनौषधिः२ ॥५३॥

अर्थ: वह सद्गृहणियों के उचित गुणरूपी रत्नों की खानि थी, विनयरूपी वृक्ष की मंजरी सदृश थी, पतिव्रत धर्म की ध्वजा स्वरूप और देखने वालों को मोहित करने वाली औषधि थी । अभिप्राय यह है कि धन पाकर प्रायः व्यक्ति मदोन्मत्त अहंकारी और व्यसनी हो जाता है किन्तु इस सेठानी का जीवन इसका अपवाद था, अतुल वैभव होते हुए भी यह विनम्र थी, सीता के समान सती और सर्वजन प्रिय थी अर्थात् अपने मधुर व्यवहार से सबकी प्रियपात्रा थी ॥५३॥


केलिकोपान्तरायं स भुञ्जानः सुखमुत्तमम्।
दिनानि गमयामास धर्मार्थार्जनकोविदः ॥५४॥

अर्थ: इस प्रकार वह दम्पति निरन्तर निर्विघ्न नाना भोगों, क्रीड़ाओं और मनोरथों के साथ धर्म पुरुषार्थ की वृद्धि करते हुए अर्थोपार्जन सहित अपना काल सुखपूर्वक व्यतीत कर रहे थे ॥५४॥


गृहीत - गन्ध - पुष्पादि प्राभृता सपरिच्छदा३।
अथैकदा जगामासौ प्रातरेव जिनालयम् ॥५५॥

अर्थ: एक दिन प्रातःकाल सेठानी जीवञ्जसा स्नानादि से निवृत्त होकर गंध-पुष्पादि पूजा की सामग्री लेकर सपरिवार जिनमंदिर में गई ॥५५॥


त्रिःपरीत्य ततः स्तुत्वा जिनांश्च चतुराशया ।
संस्नाप्य पूजयित्वा च प्रयाता यतिसंसदम् ॥५६॥

अर्थ: जिन मंदिर में पहुँचकर जिनेन्द्र भगवन्तों की मन, वचन एवं काय की शुद्धिपूर्वक, जन्म, जरा, मरण विनाशक तीन परिक्रमा लगाई । उस चतुर हृदय वाली सेठानी ने स्तुति करके जिन प्रतिमाओं का अभिषेक कर पूजा की । तत्पश्चात् मुनियों की सभा में गई और धर्म सुनने की इच्छा से वह वहाँ नमस्कार पूर्वक बैठ गई ॥५६॥


अस्ति यत्र समस्तार्थ-भासी दिव्यावधीक्षणः ।
गुणचन्द्रगणाधीशो भव्याम्भोरुहभास्करः ॥५७॥

अर्थ: वहाँ समस्त तत्त्वार्थ को कहने वाले, दिव्य अवधिज्ञानरूपी नेत्रों को धारण करने वाले मुनियों के नायक श्री गुणचंद्र नाम के आचार्य विराजमान थे, वे भव्यरूपी कमलों को प्रमुदित करने के लिए सूर्य के समान थे ॥५७॥


तं ससंघं ततो नत्वा निविष्टा निकटे ततः ।
कथ्यमानां प्रसङ्गेन कथां पौराणिकीं तदा ॥५८॥

शुश्राव तां कृता यस्यां प्रशंसा पुत्रतः स्त्रियाम् ।
अपुत्राणां प्रबन्धेन निन्दोत्पत्तिरपि ध्रुवा ॥५९॥युग्मम्॥

अर्थ (श्लोक 58 से 59): वह उन यतिराज की ससंघ वंदना, प्रणाम कर उनके समीप बैठ गई, धर्मोपदेश चल रहा था, उसी समय प्रसंग के अनुसार आचार्य परमेष्ठी एक पौराणिक कथा का वर्णन कर रहे थे । उस कथा में पुत्रवन्ती स्त्रियों की प्रशंसा और पुत्र विहीना स्त्रियों की निंदा का भी प्रकरण बतलाया । नियम से पुत्र विहीन नारी निंदा की पात्र होती है ऐसा उसने सुना ॥५८,५९॥


[सेठानी का जिनालय जाना व पुत्रोत्पत्ति के बारे में पूछना]


तां निशम्य महाशोक-शङ्कुनेव हता हृदि ।
चिन्तयामास साध्वीति- वाष्पपूर्णविलोचना ॥६०॥

अर्थ: इस कथा को सुनकर जीवञ्जसा सेठानी का हृदय संतापरूपी कील से बिंध गया, उसके नयन अश्रुपूरित हो गये, मुख म्लान हो गया और वह चिन्तातुर हो शोक सागर में डूब गई ॥६०॥


अशोकस्तबकेनेव यौवनेन ममामुना ।
रागिणा केवलं किन्तु न यत्र फलसम्भवः ॥६१॥

अर्थ: वह विचारने लगी, ओह ! मेरा यह यौवन अशोक वृक्ष के समान मात्र सुंदर पल्लवों का गुच्छा है, यह रागियों को प्रेमोत्पादक है परन्तु पुत्र प्राप्तिरूप फल रहित होने से निष्प्रयोजन है ॥६१॥


वारिधेरिव लावण्यं विरसं मम सर्वथा ।
न यत्रापत्यपद्मानि तेन कान्त-जलेन किम् ॥६२॥

अर्थ: मेरा सौंदर्य सागर के खारे जल के समान सब प्रकार से नीरस है । उस निर्मल जल से भरे सरोवर से भी क्या प्रयोजन है जिसमें कमल समूह न खिलें, उसी प्रकार मेरे इस सौंदर्य से क्या प्रयोजन है जिसमें पुत्ररूपी कमल उत्पन्न न हों ॥६२॥


नाममात्रेण सा स्त्रीति गुणशून्येन कीर्त्यते ।
पुत्रोत्पत्यानया पूता यथा शक्रवधूटिका ॥६३॥

अर्थ: पुत्र को उत्पन्न करना, नारी का गुण है, इसके बिना वह स्त्री केवल नाम मात्र की ही स्त्री है जैसे शक्र वधूटी (इन्द्रगोप) एक प्रकार का लाल कीड़ा और इन्द्राणी भी हुई तो क्या वह कुल वर्द्धन करने में समर्थ है अर्थात् नहीं अथवा सर्प की बांबी से भी निकलने वाली धूम को शक्रवधूटिका कहते हैं किन्तु उसमें वधु के गुण हैं क्या ? नहीं, नाम मात्र की शक्रवधूटिका है ॥६३॥


प्रसादोऽपि न मे भर्तुः शोभायै सूनुना विना ।
शब्दानुशासनेनेव विद्वत्ताया विजृम्भितम् ॥६४॥

अर्थ: सेठानी जीवञ्जसा विचार करती हैं कि मेरे पति का महल भी पुत्र के बिना शोभा को प्राप्त नहीं होता है जिस प्रकार बिना व्याकरण के विद्वत्ता का विस्तार नहीं होता है द्वितीय अर्थ-जैसे सिर्फ व्याकरण शास्त्र के द्वारा विद्वत्पने का विस्तार नहीं होता वैसे ही पुत्र के बिना मेरे द्वारा घर का विस्तार, कुल परम्परा की वृद्धि, शोभा नहीं हो सकती ॥६४॥


साहं मोहतमश्छन्ना निशेवोद्वेगदायिनी ।
दीयते यदि नो पुत्र-प्रदीपः कुलवेश्मनि ॥६५॥

अर्थ: मैं केवल मोह तम से आच्छन्न उद्वेगदायिनी ही हूँ क्योंकि कुल प्रकाशक दीप स्वरूप पुत्र उत्पन्न नहीं कर सकी । घर का अंधकार पुत्र के द्वारा ही नष्ट होता है । मेरा सेवन कर पतिदेव का मात्र उद्वेग ही बढ़ेगा अतः मेरा जीवन व्यर्थ है ॥६५॥


चिन्तयति सा बाला कपोलन्यस्तहस्तका ।
पातयामास सभ्यानां नेत्रभृङ्गान् मुखाम्बुजे ॥६६॥

अर्थ: सेठानी जीवञ्जसा पुत्र के न होने से इस तरह अपने मन में नाना तरह के संकल्प- विकल्प कर रही थी और अपने एक हाथ की हथेली पर कपोल रखे गर्म-गर्म श्वाँस छोड़ ही रही थी कि उसके उस उदासीनता भरे मुख पर सभा के लोगों की एकाएक दृष्टि जा पड़ी । बस ! सभासदों का देखना था कि जिस प्रकार वर्षा ऋतु में मेघवर्षा के कारण तालाबों के बांध टूट जाते हैं उसी प्रकार उसके हृदय सरोवर का बांध टूट गया उसके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बह चली और टप-टप आँसू पृथ्वी पर गिरने लगे ॥६६॥


पेतुर्यथायथा तस्याः सुभ्रुवो बाष्प-बिन्दवः ।
भेजुस्तथातथा दुःखं मानसानि सभासदाम् ॥६७॥

अर्थ: जैसे-जैसे सेठानी के अश्रु बिन्दु गिरे वैसे-वैसे वहाँ उपस्थित सभासदों के मन दुखी होने लगे अर्थात् सभा में चारों ओर शोक का वातावरण छा गया और उसके दुख से सभी दुखी हो गये ॥६७॥


सभां विस्मयसम्पन्नां तां च दुःखभरालसाम् ।
अथालोक्य जगादासौ कृपयेति यतीश्वरः ॥६८॥

अर्थ: आश्चर्य चकित सभा और दुःख के भार से पीड़ित सेठानी को देखकर परम कृपालु यतिराज आश्वासन देते हुए इस प्रकार दिव्यवाणी में बोले ॥६८॥


विशुद्ध - हृदयेऽकार्षीः शोकसागर - मज्जनम् ।
मा वृथैव यतः शीघ्रं सफलास्ते मनोरथाः ॥६९॥

निशाकर-कराकार- कीर्तिव्याप्त - जगत्रयः ।
गाम्भीर्यौदार्यशौण्डीर्य-सौन्दर्यकुलमन्दिरम् ॥७०॥

त्रिवर्ग - रचना - सूत्र- धारस्तव तनूरूहः ।
समग्र - गुण - माणिक्य रोहणाद्रिरिवापरः ॥७१॥

भद्रं भूषयिता भव्यो गगने भानुमानिव ।
कुलं कतिपयैरेव वासरैः साधुवत्सले ! ॥७२॥विशेषकम्॥

अर्थ (श्लोक 69 से 72): हे विशुद्धहृदय वाली, साधु वत्सले ! तुम क्यों व्यर्थ में अपने को शोकरूपी सागर में स्नान कराती हो ? वृथा ही क्लेश मत करो, तुम्हारा मनोरथ शीघ्र ही सफल होने वाला है, श्री ऋषिराज कहने लगे, हे भद्रे ! तुम्हारा पुत्र चन्द्रमा के समान सुरूपवान्, तीनलोक व्यापी कीर्तिवाला, गाम्भीर्य, औदार्य, वीरता आदि गुणों से मण्डित, सौन्दर्य का घर, त्रिवर्ग का सूत्रधार अर्थात् धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पुरुषार्थों को एक साथ वृद्धिंगत करने में निपुण, समग्र गुणयुत साक्षात् माणिक्य पर्वत के समान, गगन में जिस प्रकार सूर्य अपने प्रताप से समस्त दिशाओं को प्रकाशित/शोभित करता है उसी प्रकार कुछ ही दिनों में तुम्हारे कुल को शोभित करने वाला कुलभूषण, भद्र परिणामी पुत्र होगा ॥६९,७०,७१,७२॥


उल्लासं कमपि प्राप तेन सा वचसा यतेः ।
घर्मान्त - तोयदोन्मुक्त- तोयेनेव लता तदा ॥७३॥

अर्थ: इस प्रकार उन साधु के उत्तम वचनों को सुनकर सेठानी को परमानंद हुआ, मन में उल्लास उमड़ा, मानों धूप से सूखी लता को शीतल मेघ जल मिल गया है अर्थात् ग्रीष्मऋतु की भीषण धूप से लताएँ कुम्हला जाती हैं वर्षार्ऋतु आते ही वृष्टि होने पर जल पाकर प्रफुल्लित हो जाती हैं, उसी प्रकार पुत्राभाव की पीड़ा से शोकाकुल सेठानी पुत्रोत्पत्ति सुनकर हर्षित हो उठी ॥७३॥


महाविस्मय-सम्पन्ना सा शशंस सभां मुनिम् ।
नत्वा ज्ञातयथाभावि-वृत्तान्ता साप्यगाद्गृहम् ॥७४॥

अर्थ: मुनिराज के वचनों से अपने भविष्य में होने वाले पुत्रोत्पत्ति के समाचार को जानकर महान् आश्चर्य से भरी उस सेठानी ने उस धर्मसभा की भूरि-भूरि प्रशंसा की और वह मुनिराज को नमस्कार करके घर चली गई ॥७४॥


किंवन्दत्या तया चक्रे श्रेष्ठिनोऽपि मनस्तदा ।
अनल्प - कालसम्पन्न- सफलाशेषवाञ्छितम् ॥७५॥

अर्थ: शनैः-शनैः सेठानी को पुत्र प्राप्ति संबंधी किंवदन्ती चारों ओर फैल गई । सेठ ने भी सुना, कि अल्पकाल में ही हमारा मनोरथ सफल होगा । वाञ्छित पदार्थ की प्राप्ति की अभिलाषा किसे नहीं होती ? सभी को होती है ॥७५॥


अथ केष्वपि जातेषु वासरेषु बभार सा ।
गर्भ - मभ्रलवच्छन्न- भानुबिम्बमिवेन्द्रदिक् ॥७६॥

अर्थ: थोड़े दिनों के बाद सेठानी ने गर्भ धारण किया । वह जिस प्रकार प्रातःकाल में अरुणोदय से पहले गर्भस्थ सूर्य के प्रताप से पूर्वदिशा अधिक दीप्त होने लगती है उसी प्रकार गर्भ में आये हुए पुण्यात्मा पुत्र के गुणों से अधिक दीप्त होने लगी, उदरस्थ बालक के होने से उसके शरीर की एक विलक्षण शोभा हो गई ॥७६॥


गुणानामिव भारेण गर्भस्थस्य शिशोस्तदा ।
मन्दं मन्दं महीपीठे विचक्राम मृगेक्षणा ॥७७॥

अर्थ: मृगनयनी सेठानी गर्भ स्थित बालक के गुणों के भार से मानों बोझल हुई पृथ्वीतल पर धीरे-धीरे चलने लगी ॥७७॥


मलीमसमुखौ जातौ स्तनौ तस्याः समुन्नतौ ।
तदुत्पादादिव स्वस्य मन्यमानावधः स्थितिम् ॥७८॥

अर्थ: बालक के जन्म होने से अपनी निम्न अवस्था को मानते हुए की तरह, उस सेठानी के ऊँचे उठे हुए दोनों स्तनों का अग्रभाग श्यामवर्ण का हो गया ॥७८॥


गर्भस्थ-यशसेवाऽस्याः पाण्डुताजनि गण्डयोः ।
तेजसैव भ्रुवोश्चक्रे सोत्क्षेपं वचनक्षणे ॥७९॥

अर्थ: उसके गण्डस्थल कपोल पीले पड़ गये मानों गर्भस्थ बालक का यश ही बाहर आकर बिखर गया हो। उसकी वचनावली के साथ चमकती भौंहो का क्षेप मानों बालक के तेज का द्योतन/प्रकट करता था ॥७९॥


रोमराजिस्तदा तस्यास्तथाभूद्बहिरुद्गता ।
शङ्केऽहं पूर्वसन्ताप- शिखिधूमशिखेव सा ॥८०॥

अर्थ: अञ्जसा सेठानी के शरीर की बाहर निकली हुई रोमावली ऐसी प्रतीत होती थी मानों पुत्राभाव की शोकरूपी अग्नि के धुऑं की पंक्ति ही मानों बाहर निकल रही हो ॥८०॥


जृम्भारम्भो मुखे तस्या विशेषात्समजायत ।
उष्मणेव तदा तस्य महाभागस्य तेजसाम् ॥८१॥

अर्थ: वह बार-बार जंभाई लेने लगी । श्वास भी उष्ण आने लगी । मानों महाभाग्यशाली पुत्र के तेज से ही वह ऊष्ण हो गई हो ॥८१॥


पूजोत्सवे जिनेन्द्राणां दौहृदं विदधे सुधीः ।
प्रफुल्ल-वदनाम्भोजं बन्धुवर्गं च सर्वतः ॥८२॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान की परमपूजा करूँ, नाना प्रकार पूजोत्सव मनाऊँ इस प्रकार के दोहले उसे उत्पन्न हुए और समस्त बन्धु-वर्गों के प्रसन्नता से मुख कमल खिल उठे ॥८२॥


[जिनपूजा रूप दोहला को पूर्ण करना]


पूर्णेऽथ समये साध्वी प्रसूता सुतमुत्तमम् ।
प्राचीव भास्कराकारं प्रभाते बालभास्करम् ॥८३॥

अर्थ: नवमास पूर्ण होने पर उस पतिव्रता सेठानी ने प्रातःकाल में देदीप्यमान बालकरूपी सूर्य को पूर्व दिशा की तरह उत्पन्न किया । सूर्य की लालिमा से जिस प्रकार रात्रि जन्य अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार सबके मनोरथों को सिद्ध करने वाले तेजस्वी बालक को जन्म दिया ॥८३॥


श्रेष्ठिना वाञ्छिता-दुच्चैरधिकं मुदितात्मना ।
दत्तं वक्त्रमनालोक्य पुत्रजन्मनिवेदिनम् ॥८४॥

अर्थ: हे श्रेष्ठिन् ! आपके पुत्र रत्न उत्पन्न हुआ है । इस प्रकार की सूचना सुनकर सेठ महामुदित आनंद गात्र हो गया, उसके हर्ष की सीमा न थी, उसने आनन्दातिरेक से पुत्र प्रसव की सूचना देने वाले का मुख भी नहीं देखा, सुनने के साथ ही वाञ्छा से अधिक प्रचुर धन उसे प्रदान किया ॥८४॥


नृत्य-वादित्र-सङ्गीत-मय-माशु समन्ततः ।
तदादृत्या विनैवाशु तद्बभूव पुरं तदा ॥८५॥

अर्थ: शीघ्र ही सेठ के परिश्रम के बिना ही पुत्र के जन्म से सारा नगर उत्सवमय हो उठा । सब जगह नृत्यकार नृत्य करने लगे, वादित्र बज उठे, संगीत होने लगा ॥८५॥


स न कोऽपि नरस्तत्र यो नानन्द-भरालसः ।
समभूद्याचको वापि यो न पूर्णमनोरथः ॥८६॥

अर्थ: उस समय नगरी में एक भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो आनंद विभोर न हो, न कोई ऐसा याचक था जिसका मनोरथ पूर्ण न हुआ हो अर्थात् सेठ अपने सदाचार से सर्वप्रिय था, उसके हर्ष से सभी झूम उठे । याचकों को किमिच्छक दान दिया, अतः सभी सफल मनोरथ हो गये ॥८६॥


जातकर्म कृतं तस्य सोत्सवं सकलं ततः ।
यथाक्रमं पुनश्चक्रे पूजयित्वा जिनेश्वरान् ॥८७॥

जिनदत्ताभिधां तस्य बन्धुवृद्धैः समन्वितः ।
कृतकृत्यमिवात्मानं मेनेऽसौ नैगमाधिपः ॥८८॥ युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 87 से 88): सेठ जी जैनधर्म के पूर्णभक्त थे । सर्वज्ञ प्रणीत शासन के अनुसार प्रवृत्ति करना ही वे श्रेयस्कर और उत्तम समझते थे, इसलिये उन्होंने आगमानुसार अपने पुत्र के जातकर्म आदि संस्कार करा बड़े ठाट-बाट से जिनेन्द्र भगवान की पूजन कराई और अपने वृद्ध बंधु-बांधवों के साथ उन्होंने उस बालक का नाम जिनदत्त रखा ॥८७,८८॥


ववृधे बन्धुपद्माना- मानन्दं विदधत्परम् ।
उपविन्दन् कलाश्चित्रं-कोऽपि बालदिवाकरः ॥८९॥

अर्थ: वह बाल रवि अपने बन्धुवर्गरूपी कमलों को प्रफुल्लित करता हुआ नाना विचित्र कलाओं के कौशल के साथ वृद्धिंगत होने लगा ॥८९॥


तत्यजेऽम्भोज-गर्भाभं तनुजातेन शैशवम् ।
शनैः शनैः सदाचार-पुरुषेणेव कैतवम् ॥९०॥

अर्थ: जैसे सदाचारी पुरुष के द्वारा धीरे-धीरे मायाचारी का त्याग कर दिया जाता है, उसी प्रकार जिनदत्त बालक ने कमल दल के समान आभा वाली शिशु अवस्था को छोड़कर बाल्यावस्था में प्रवेश किया ॥९०॥


[जातकर्म एवं नामकरण संस्कार]


ततोऽसौ श्रेष्ठिना तेन श्रावकस्य महामतेः ।
समर्पितः प्रयत्नेन पठनाय यथाविधि ॥९१॥

वासरैर्गणितैरेव सर्व - शास्त्र - महार्णवम् ।
स ततार महाबुद्धि- नावा विनय-सङ्गतः ॥९२॥

शस्त्राण्यपि ततस्तेन विज्ञातानि महात्मना ।
धनुरादीनि यत्नेन समाराध्याशु तद्विदः ॥९३॥

प्रागल्भ्यं किमपि प्राप व्यवहारविधौ तथा ।
यथा तातादयस्तस्य जाताः प्रज्ञानुजीविनः ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 91 से 94): श्रावकोत्तम श्रीमान् सेठ जीवदेव ने अपने सुयोग्य पुत्र को, बुद्धिमान श्रावक उपाध्याय को यथाविधि शिक्षित होने के लिए समर्पित कर दिया अर्थात् ज्ञानवान सेठ ने पुत्र का विद्यारम्भ संस्कार विधिपूर्वक संपन्न किया ॥९१॥ कुछ थोड़े ही दिन व्यतीत होने पर विनय से सहित उस बालक जिनदत्त ने महाबुद्धिरूपी नाव के द्वारा सम्पूर्ण शास्त्ररूपी महासमुद्र को तैर लिया अर्थात् वह बालक कुछ ही दिनों में संपूर्ण शास्त्रों का पारगामी हो गया ॥९२॥ चतुर जिनदत्त को केवल इन मानसिक शक्ति को बढ़ाने वाले शास्त्रों को पढ़कर ही संतोष न हुआ। उसने प्रसिद्ध शस्त्र-अस्त्र-शास्त्रियों से उनकी शुश्रूषा कर धनुर्विद्या, तलवार चलाना आदि शारीरिक शक्ति बढ़ाने वाली विद्याएँ भी सीख लीं एवं वह उनमें भी पारंगत हो गया ॥९३॥ जिनदत्त ने व्यवहार में भी उत्कृष्ट योग्यता प्राप्त की। जिस प्रकार उसके दादा आदि वंश परम्परानुसार प्रज्ञा सम्पन्न थे उसी प्रकार यह भी बुद्धिजीवी हुआ ॥९४॥


तनौ तस्य ततश्चक्रे यौवनेन तथा पदम् ।
अनङ्गेन यथा स्त्रीषु १संमोहायुधमादधौ ॥९५॥

अर्थ: अब जिनदत्त किशोर अवस्था का परित्याग कर यौवनावस्था में प्रविष्ट हुआ। कामदेव के समान स्त्रियों में सम्मोह उत्पन्न करने वाले साक्षात् कामबाणों को मानों धारण किया ॥९५॥


गगनमिव सितांशो रश्मिभिः सत्तपोभि
र्यतिरिव नरनाथो न्याय - मार्गेरुपेतः ।
तरुरिव नवपुष्पैः राजहंसैः समन्तात्
सर इव शुशुभेऽसौ विभ्रमैर्यौवनस्य ॥९६॥

अर्थ: जिस प्रकार चंद्रमा की किरणों से आकाश शोभित होता है, श्रेष्ठ तपों के तपने से मुनीश्वर श्रेष्ठ समझे जाते हैं, न्याय मार्गों का अनुसरण करने से राजा प्रशंसनीय गिना जाता है, नवीन पुष्पों से वृक्ष शोभित होता है और राजहंसों से सरोवर अच्छा मालूम होता है, उसी प्रकार यौवन लक्ष्मी के आने से वह अपने शारीरिक संगठन के कारण अधिक तेजस्वी और शोभायमान दिखने लगा ॥९६॥


सकल - सुभग - सीमा माननीयो जनानां
जिनपति - पद - भक्तो भव्य - वात्सल्य - सक्तः ।
कुल - कमल - २विवस्वान्कीर्तिवीचीसरस्वा-
ननुपम - गुणराशिश्चन्द्रसौम्यो ननन्द ॥९७॥

अर्थ: जिनदत्त सम्पूर्ण सौंदर्य से परिपूर्ण जनसमुदाय के द्वारा माननीय, जिनेन्द्र भगवान के चरणों में अविचल भक्ति रखने वाला, साधर्मियों के प्रति वात्सल्य भाव रखने में तत्पर, अनुपम गुणों की राशि स्वरूप अपने कुलरूपी कमल को विकसित करने के लिए सूर्य के समान था । वह कीर्तिरूपी लहरों के निधान समुद्र को चंद्रमा की चाँदनी के समान विकसित करता था ॥९७॥

द्वितीय सर्ग:

दधानस्यापि तस्याथ यौवनं नयनामृतम् ।
बभूव मानसं नित्यं नारी-सुख-पराङ्मुखम् ॥१॥

अर्थ: जिनदत्त युवावस्था आने के कारण अन्य युवकों के समान काम विकार से पीड़ित नहीं हुए । यद्यपि उनका शरीर नेत्रों के लिए अमृत के समान यौवन के प्रभाव से दमक उठा था, तो भी उनके मन पर उसका वैसा प्रभाव न पड़ा था ॥१॥


काव्यामृतरसास्वाद्-विनोदेन कदाचन ।
वादजल्पवितण्डादि-चर्चया चतुरोऽन्यदा ॥२॥

वाहनेन तुरंगाणां शास्त्राभ्यासेन कर्हिचित् ।
परीक्षणेन रत्नानां साधूनां सेवयान्यदा ॥३॥

पूजोत्सवैर्जिनेन्द्राणां राजकार्यैः कदापि च ।
इत्यादिचारुचेष्टाभि-रसक्तो विषयेष्वसौ ॥४॥

अर्थ (श्लोक 2 से 4): वह अपने उन दिनों के समय को कभी तो काव्यरूपी अमृत के आस्वादन करने में बिताता था, कभी विनोद की क्रीड़ाओं को करने में लगाता, कभी अपने गुरुओं के साथ वाचनिक शक्ति को बढ़ाने के लिए वाद करने में खर्च करता, कभी वितंडा, कभी जल्प और कभी अन्य किसी प्रकार से शास्त्र चर्चा करने में लगाता था । वे कभी घोड़े पर चढ़ने से अपने मन को प्रसन्न करते थे, कभी रत्नों की परीक्षा कर अपना उस विषय का पांडित्य दिखलाता था, कभी साधुओं की सेवाकर आशीर्वाद ग्रहण करता था, कभी जिनेन्द्र भगवान की पूजा-भक्ति कर अपना आस्तिक्य दिखलाता था और कभी राजकार्य कर राजभक्त होने का तथा राजनीति निपुणता का अपना परिचय देता था। इस प्रकार नाना शुभ चेष्टाओं में रत रहते हुए विषयों से सदा अनासक्त रहता था ॥२,३,४॥


समस्त-सुख-सम्पत्ति-समृद्धो बुध-वल्लभः ।
दिनानि गमयामास वयस्यैः१ सहितो मुदा ॥५॥

अर्थ: समस्त सुख सम्पत्ति का भोग करते हुए भी काम भोगों से विरक्त विद्वानों का प्रिय वह अपने समवयस्क मित्रों के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताने लगा ॥५॥


विमुखं तं ततो ज्ञात्वा तस्मिन् दारपरिग्रहे ।
सबन्धुर्विदधेः यत्नं सूनो रञ्जयितुं मनः ॥६॥

अर्थ: यौवन वृद्धि में भी निर्विकार कुमार को देखकर, पारिवारिक जन उसका मन रंजायमान करने की सोचने लगे कि यह स्त्री-परिग्रह किस प्रकार स्वीकार करे, इसके लिए कोई उपाय सोचना चाहिए, विवाह के लिए इसका तनिक भी भाव नहीं है । अतः सभी जन उसका मन विवाह की ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करने लगे ॥६॥


यत्र चित्ररतक्रीडा-रसिकानि विलासिनाम् ।
मिथुनानि निषीदन्ति२ तेषूद्यानेषु३ नीयते ॥७॥

अर्थ: उन उद्यानों में जिनदत्त को ले जाया गया जहाँ नाना प्रकार की रति-क्रीड़ा के रसिक विलासी स्त्री-पुरुषों के जोड़े बैठते हैं ॥७॥


क्रीडत्कान्ता-स्तनाभोग-सङ्गसंक्रान्तकुंकुमाः ।
वापीः पद्माननास्तस्य दर्शयन्ति जना निजाः ॥८॥

अर्थ: परिवारजनों के द्वारा ऐसी वापियाँ उसे दिखायीं जातीं हैं, जहाँ जल-क्रीड़ा करती हुई कमलमुखी कामनियों के स्तन मंडल की कुंकुमों से पीतिमा को धारण किये हुए हैं ॥८॥


दर्शनादेव याश्चित्तं मोहयन्ति यतेरपि ।
स्नानादिविधये तस्य नियुक्तास्ता मृगीदृशः ॥९॥

अर्थ: ऐसी मृगनयनियों को स्नानादि की विधि के लिए नियुक्त किया जिनको देखने मात्र से ही साधुओं के भी मन में विकार उत्पन्न हो जाये ॥९॥


पण्याङ्गनाजना यत्र द्रावयन्ति मुखेन्दुभिः ।
चेतांसि पश्यतामाशु चन्द्रकान्तमणेरिव ॥१०॥

अर्थ: जहाँ श्रृंगार रस भरी वेश्याएँ अपने मुखचन्द्रों से भोगियों के मन को द्रवित कर देती हैं, उन्हें देखते ही शीघ्र चन्द्रकान्तमणि के समान पुरुषों का मन सार्द्र/द्रवित हो जाता है ॥१०॥


इतस्ततः स्थिताः स्फार-शृङ्गाराः स्मर-जीवितम्।
गमयन्ति गताशङ्कं छेकास्तेनैव तं यथा ॥११॥

अर्थ: उसके चारों ओर कामभोग शृंगारादि से जीविका चलाने वाले घेरे रहते परन्तु कुमार के मन को विकृत करने में कोई समर्थ नहीं हुआ । सभी को निराशा ही हाथ लगी ॥११॥


विचित्राणि च वस्त्राणि समं माल्य विलेपनैः ।
विभूषणैश्च यच्छन्ति प्रत्यहं तस्य ते निजाः ॥१२॥

अर्थ: परिवार के लोगों द्वारा नाना प्रकार के सुंदर आकर्षण भरे वस्त्र-आभूषण, सुगन्धित माला लेपादि उसके लिए प्रतिदिन दिये जाते थे॥१२॥


ताः कथास्तानि गीतानि तानि शास्त्राणि नर्म तत् ।
कुर्वन्ति सुहृदस्तस्य दीप्यते येन मन्मथः ॥१३॥

अर्थ: उसके मित्र उसे रागवर्द्धक कथाएँ कहते थे, कामोद्दीपक राग-रागनियोंमय संगीत सुनाते थे, ऐसे कामशास्त्र सुनाये-पढ़ाये जाते थे ताकि उसके हृदय में कामवासना जागे ॥१३॥


प्रारभ्यते पुरस्तस्य परंप्रेक्षणकं च तत् ।
रागसागर-कल्लोलैः प्लाव्यन्ते येन देहिनः ॥१४॥

अर्थ: जिससे प्राणियों के हृदय में राग का सागर उमड़ पड़े इसी प्रकार के उसे नाटक दृश्य आदि दिखलाये जाते थे। उसी प्रकार की नाट्य-शालाओं में ले जाया जाता है ॥१४॥


अथैकदा जगामासौ नित्यमण्डितसंज्ञितम् ।
वयस्यैः सहितस्तुङ्गं कोटिकूटं जिनालयम् ॥१५॥

अर्थ: एक दिन की बात है कि अपने मित्रों के साथ जिनदत्त दर्शन करने की इच्छा से ऊँचे करोड़ों शिखरों वाले नित्यमण्डित नाम के जिन चैत्यालय में गया ॥१५॥


सोपानपदवीं दिव्यां समारुह्य ततः स्थितः ।
ददर्श क्षणमात्रं स द्वार-मण्डप-मुत्तमम् ॥१६॥

अर्थ: इसकी अनुपम कला का निरीक्षण करता हुआ कुमार धीरे-धीरे सीढ़ियों पर चढ़ने लगा । द्वार मण्डप पर पहुँचा । उस उत्तम द्वार मण्डप की श्री शोभा को देखकर सहसा वहीं स्थित हो गया ॥१६॥


यावत्तत्र जगत्सार,-शिल्पिकल्पित-रूपके ।
दत्तदृष्टिरसौ तावद्, दृष्टैका शालभंजिका ॥१७॥

अर्थ: विस्मित होता हुआ कुमार क्रमशः उस मण्डप के एक-एक कलात्मक चित्रों को निर्निमेष दृष्टि से देखने लगा। शिल्पियों की कल्पना के रूपों के देखते-देखते सहसा उसकी सरल निर्विकार दृष्टि एक अनुपमरूप राशिमय पुत्तलिका/आकृति से जा टकराई ॥१७॥


तस्या दर्शनमात्रेण चित्रन्यस्त१ इव स्थितः ।
पपौ रूपामृतं चास्याः स्तिमितायतलोचनः ॥१८॥

अर्थ: उस पर दृष्टि पड़ते ही वह मंत्र मुग्ध सा अचल हो गया मानो उस प्रतिच्छाया को हृदय में प्रविष्ट कराना चाहता हो। वह मुस्कुराता हुआ उसके रूपामृत का पान करने लगा ॥१८॥


ततस्तस्य सकामस्य पतिता पादपद्मयोः ।
दृष्टिर्भृङ्गीव संसक्ता स्पन्दनेऽपि पराङ्मुखी ॥१९॥

अर्थ: उनके नेत्र ज्यों ही उस मूर्ति के चरणरूपी कमलों पर पड़े, तो वे भ्रमरी के समान उनकी ही गंध लेते रहे। वह दृष्टि हिलने/डुलने में भी अक्षम हो गई ॥१९॥


निधान-कलशेनेव नितम्बेन मनोभुवः२ ।
कटीतटं समाकृष्टा संप्राप्ता क्रमयोगतः ॥२०॥

अर्थ: अपने नितम्बोंरूपी कलशों से इसने मानों साक्षात् कामदेव को ही धारण किया है। इसके बाद उसकी आकर्षक दृष्टि कमर को देखने लगी ॥२०॥


लावण्यनीरसम्पूर्णे नाभिकुण्डे ममज्ज३ सा ।
मदनानल्सन्ताप-पीडितेव ततश्चिरम् ॥२१॥

अर्थ: उसके बाद कामरूपी अग्नि के संताप से जिनदत्त की दृष्टि ने सौंदर्यरूपी जल से भरे नाभि कुण्ड में चिरकाल तक अवगाहन किया । अर्थात् पुत्तलिका की सुंदर नाभि को देखा ॥२१॥


ताञ्जहार ततस्तस्याः रोमराजिरनुत्तरा ।
रूपातिशयतो न्यस्ता प्रशस्तिरिव शंभुना ॥२२॥

अर्थ: इसके रोमों की पंक्तियाँ बड़ी ही मनोहर हैं ऐसा प्रतीत होता है मानो महादेव/भाग्य ने अतिशय रूप के ऊपर प्रशस्ति अंकित की हो ॥२२॥


आचक्राम प्रयासेन प्रस्खलन्ती मुहुर्मुहुः ।
मध्यमस्याः कृशोदर्यास्त्रिबलीभङ्गबन्धुरम् ॥२३॥

अर्थ: इसकी चाल कितने आकर्षक रूप में प्रतिबिम्बित की गई है, प्रयासपूर्वक स्खलित होती हुई बार-बार मन्द-मन्द गमन कर रही थी । उस कन्या का उदर अत्यन्त कृश और तीन रेखाओं की पंक्ति के भंगिमा से सुन्दर था ॥२३॥


स्तनान्तरे ततस्तस्याः सा लीना समजायत ।
ययौ यथा समस्ताङ्ग-सम्मोहं मुग्धमानसः ॥२४॥

अर्थ: जैसे मोहित मन वाला पूरे अंगों से संमोह को प्राप्त होता है उसी तरह उस जिनदत्त की दृष्टि उसके स्तनों के मध्य भाग में लीनता को प्राप्त हो गई ॥२४॥


आललम्बे मनोहारि-हारावलिमसौ शनैः ।
कण्ठं हि यत्नतः प्राप रेखात्रितयसुन्दरम् ॥२५॥

अर्थ: इसके बाद वह दृष्टि मनोहर हार के ऊपर पड़ी तो उसका सहारा ले किसी प्रकार तीन रेखाओं से सुंदर कंठ तक पहुँचने की कोशिश करने लगी ॥२५॥


आललम्बे ततस्तस्याः सा बाहुलतिकां क्रमात् ।
समस्त-भुवन-भ्रान्त - श्रान्तानङ्ग-मृगाश्रयम् ॥२६॥

अर्थ: उसके बाद जिनदत्त की दृष्टि समस्त संसार में भ्रमण करने से थके हुए कामदेवरूपी हिरण के आश्रय स्थान के समान उस पुत्तलिका की बाहुओं पर पड़ी तो वे उसी का अवलोकन करते रहे ॥२६॥


रतिं कामपि सा लेभे लावण्यातिशयान्विते ।
मुखेन्दौ मदनोद्दाम-दाहशान्त्यर्थिनी यथा ॥२७॥

अर्थ: जैसे ही उत्कट काम के संताप की शांति को चाहने वाली जिनदत्त की दृष्टि सौंदर्य के अतिशय से सहित मुखरूपी चंद्रमा पर पड़ी तो उसने कोई अपूर्व प्रीति को प्राप्त किया ॥२७॥


केशपाशे पुनस्तस्याः कामपाश इवापरे ।
बद्धा मृगीव सात्यन्तं गन्तुमन्यत्र नाशकत् ॥२८॥

अर्थ: पुनः उसकी दृष्टि उस पुत्तलिका के केशपाश पर पड़ी तो वह केशपाश उसके लिए दूसरे कामपाश के समान प्रतीत हुए । अत्यन्त बंधी हुई मृगी के समान उसकी वह दृष्टि अन्य जगह जाने के लिए समर्थ नहीं हुई ॥२८॥


कान्तिलावण्यसद्रूप-सौभाग्यातिशया इमे ।
प्रतिच्छन्देऽप्यहो यस्याः सा स्वयं ननु कीदृशी ॥२९॥

अर्थ: इसके चित्र में कान्ति, लावण्य श्रेष्ठरूप सौभाग्य उत्तम चिह्न इस प्रकार आकर्षक चित्रित हैं, वह स्वयं तो न जाने कितनी अनुपम सुंदरी होगी ? ॥२९॥


कदापि नैव सम्पन्नो विकारो मम चेतसः ।
एतस्या दर्शनाच्चेय-मवस्था मम वर्तते ॥३०॥

अर्थ: आज तक मेरे मन में कभी भी विकार उत्पन्न नहीं हुआ आज इसके देखने मात्र से मेरी यह विषयासक्त अवस्था हुई है, अन्य की तो बात ही क्या ? ॥३०॥


किमिदं पूर्वसम्बन्ध-प्रेमदुर्ललितं स्फुटम् ।
येन जाता ममैवेय-मासेचनक-दर्शना ॥३१॥

अर्थ: वह विचारने लगा, या इसके साथ मेरा पूर्व भव का प्रेम संबंध है जो आज प्रकट हुआ है । अन्यथा इसके दर्शनरूपी सिंचन से मेरा मन क्यों आर्द्र हो आसक्त होता ? ॥३१॥


अथवा क्वापि कस्यापि पूर्वकर्मविपाकतः ।
झटित्येव मनो याति नूनं तन्मयतामिव ॥३२॥

अर्थ: अथवा यही सत्य है कोई-कोई पूर्व भव के संचित कर्म का विपाक ही उदय में आया है, तभी तो शीघ्र ही मेरा मन तन्मयता को प्राप्त हो गया है ॥३२॥


यदीयं भविता तन्वी मूलप्रकृतिवर्जिता ।
न प्राणधारणोपायं तदा स्वस्य विलोकये ॥३३॥

अर्थ: यदि यह मूर्ति किसी आधार के आश्रय न हुई, किसी की प्रतिमूर्ति न निकली, तो मेरा जीवन मुझे संकटमय ही दिखाई देता है ॥३३॥


नूनं सचेतनैवेयं कापि कामलताथवा ।
चोरयामास नश्चित्तं चन्द्रास्या कथमन्यथा ॥३४॥

अर्थ: निश्चय से यही चेतना सहित-सी प्रतीत हो रही है अथवा किसी कामलता का रूप है । यदि ऐसा न होता तो किस प्रकार यह चन्द्रमुखी मेरे मन को चुराती ? यह कोई अनुपम सुन्दरी कन्या का प्रतिबिम्ब जरूर है ॥३४॥


अचेतने यतो रूपं शोभायै किल केवलम्।
सम्बन्धेन विना चेत्थं नानुरागविजृम्भितम् ॥३५॥

अर्थ: अचेतन पदार्थ में जो रूपातिशय रहता है, उससे केवल उसकी शोभा ही होती है, किसी को किसी प्रकार का अनुराग विशेष नहीं होता और मुझे इससे अनुराग विशेष हो रहा है। अतः यह किसी सचेतना सुन्दरी का चित्राम होना चाहिए ॥३५॥


भुज्यते यदि संसारे सौख्यं विषयगोचरम्।
तदानन्दनिधानेन सार्द्धमेवंविधेन हि ॥३६॥

अर्थ: पहले तो सांसारिक भोग भोगना ही बुरा है और यदि वे भोगे ही जायें, तो ऐसी ही आनंद दायक अनुपम सुंदर स्त्री के साथ उन्हें भोगना चाहिए ॥३६॥


यद्येतया समं नैव भुञ्जे भोगाननारतम्।
हिमम्लानाम्बुजेनेव यौवनेनापि किं मम ॥३७॥

अर्थ: यदि इसके साथ ही मैंने संसार सुख न भोगे, तो फिर पाले से म्लान किये गये आभा रहित कमल के समान, मेरा यह नवयौवन ही निरर्थक है ॥३७॥


करे करोति किं चाप-मस्यां सत्यां मनोभुवः।
इयमेव यतो विश्व-वशीकरण-सन्मणिः ॥३८॥

अर्थ: इसके साक्षात् होने मात्र से काम ने मेरे ऊपर अपना बाण ताना है। इसलिये यह संसार में सुंदरियों की शिरोमणि है ॥३८॥


एवं विधा यतः सन्ति संसारे रतिभूमयः ।
विरज्यते ततो नातो१ ज्ञाततत्त्वैरपि ध्रुवम् ॥३९॥

अर्थ: अहा ! अब मालूम हुआ, संसार में ऐसी ही अनेक मनोहारिणी रमणियाँ हैं इसलिए बड़े-बड़े तत्त्वों के जानने वाले लोग भी इनके रूप में फँसकर संसार से विरक्त नहीं हो पाते ॥३९॥


रुद्रादयोऽप्यहो यासां दृष्टिपातोपजीविनः ।
मादृशां स्मरमुग्धानां मोहने तासु का कथा ॥४०॥

अर्थ: अरे ! रुद्र आदिक अनेक तेजस्वी महापुरुष भी इनके कटाक्ष बाणों से भिंद गये और आसक्त हो इनमें ही जब रमण करने लग गये, तो मुझ सरीखे क्षुद्र पुरुष की तो बात ही क्या है ? ॥४०॥


प्रविशामि किमङ्गानि किं स्पृशामि पिवामि किम् ।
नेत्रपात्रैरिमामाशु सौन्दर्यामृतवापिकाम् ॥४१॥

अर्थ: मुझे यह सौन्दर्यामृतरूपी जल की भरी वापी मालूम पड़ती है इसलिए मैं इसके समस्त सौन्दर्यरूपी जल को क्या अपने नेत्ररूपी पात्रों से पी जाऊँ ? क्या इसके समस्त अंगों को स्पर्श कर डालूँ और इसमें प्रविष्ट हो एकमेक हो जाऊँ ? ॥४१॥


इत्याद्यनेकसंकल्प-कारिणः सहचारिणा ।
विज्ञातं मकरन्देन२ दृष्ट्या तस्य मनोगतम् ॥४२॥

अर्थ: इस प्रकार अनेकों संकल्पों में निमग्न जिनदत्त स्तंभित हो अपने जिनदर्शन के उद्देश्य को भूल रहे थे कि इतने में इनके साथी मकरंद ने इनके मन में स्थित भावों को देखने मात्र से जान लिया ॥४२॥


विबृद्धाः च चिरादेते फलिता मे मनोरथाः ।
सिक्तश्चायं सुधासेकैः श्रेष्ठिसन्तानपादपः ॥४३॥

अर्थ: वह मित्र सोचता है कि चिरकाल के बाद मेरे मनोरथ फलित हुए हैं । यह सेठ का पुत्ररूपी वृक्ष आज प्रेमामृत की बिंदुओं के द्वारा सिंचित किया गया है ॥४३॥


स्मित्वा१ स्वैरमुवाचेय-मेतयैव सखे ! मनः ।
किं हृतं भवतो येन स्तम्भितो वा व्यवस्थितः ॥४४॥

अर्थ: आनंद से गद्गद् हो वह कहने लगा हे जिनदत्त ! आप हँसकर अपने भावों को स्वतंत्रता पूर्वक कहो, आपका मन क्या उस चित्र में स्थित सुंदरी के द्वारा हरा गया है ? जिससे आप इस प्रकार सावधान खड़े रह गये हो ॥४४॥


भवानेव विजानातीत्युक्त्वादाय करेण तम्२ ।
स विवेश जिनाधीश-मन्दिरं तद्गताशयः ॥४५॥

अर्थ: आप ही जानते हैं क्या हुआ ? इस प्रकार उत्तर देकर उसको हाथ से पकड़कर, कुमार उस कन्या के रूप में आसक्त चित्त होता हुआ जिनालय में प्रविष्ट हुआ ॥४५॥


ततः प्रदक्षिणीकृत्य स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकशः ।
जिनाज्जगाम तां पश्यन्नाकृष्टिक्रममालयम्३ ॥४६॥

अर्थ: सावधान हो कुमार जिनदत्त ने जिनमंदिर में श्री जिनेन्द्र प्रभु की भक्ति से प्रदक्षिणा कर नाना प्रकार अनेकों सुंदर स्तोत्रों द्वारा स्तुति कर, उस पुत्तलिका में आसक्त हो उसे देखता हुआ बिना इच्छा के घर लौटा ॥४६॥


स्थितस्तत्र समुद्भूत-तीव्रवेगस्मरज्वरः ।
स तल्पे कल्पितानल्प-पद्मपल्लवसंस्तरे ॥४७॥

अर्थ: घर पहुँचकर जिनदत्त की हालत विलक्षण हो गई, इन्हें एक साथ काम-ज्वर ने तीव्र आघात से घायल कर दिया । काम-ज्वर के असह्य आताप से इतने घबड़ा गये कि अगणित कमल पत्र पुष्पों की शय्या पर लेटकर भी उनको शांति प्राप्त न हो सकी ॥४७॥


नाशनायाभवत्तस्य नोदन्या सह निद्रया ।
विनोदेन न केनापि स रेमे तां तदा स्मरन् ॥४८॥

अर्थ: निद्रा ने मानों रूठकर उसका साथ छोड़ दिया उस चित्राम कन्या के विरह में खाना-पीना सब कुछ छूट गया । रात-दिन उसके स्मरण के सिवाय वह कुछ भी विनोदादिक नहीं करता था ॥४८॥


जलार्द्रञ्चन्दनःचन्द्रः कर्पूरः शिशिरं पयः ।
ज्वलत्कामानलस्यास्य सञ्जाता घृतविप्लुषः ॥४९॥

अर्थ: शीतल जल से मिश्रित चन्दन द्रव, चन्द्र रश्मियाँ, कपूर लेपन, बर्फ का पानी आदि पदार्थ इस कामदाह से ज्वलित कुमार की कामाग्नि जलाने में घी का काम करने लगे अर्थात् जितना शीतोपचार किया जाता, उतना ही उसका काम-ज्वर अधिक होता जाता है ॥४९॥


वरं मरणमेवास्तु मा वियोगः प्रियैः सह ।
समाप्यन्ते समस्तानि येन दुःखानि सर्वतः ॥५०॥

अर्थ: वह विचारने लगा, उस कामिनी के वियोग की अपेक्षा मरण ही मेरे लिए श्रेयस्कर है । क्योंकि प्रियजनों के वियोग से उत्पन्न समस्त दुःख मरण से ही समाप्त हो सकते हैं ॥५०॥


अदृष्टापि मनोमोहं या ममेत्थं ततान् ताम् ।
पुष्पेषो ! कुरुषे किं न शरसंहतिजर्जराम् ॥५१॥

अर्थ: अरे काम ! जिसकी केवल प्रतिमूर्ति ही देखकर मेरा मन इतना मुग्ध हो गया जिसने अपने साक्षात् दर्शन न देकर अपनी तस्वीर दिखाकर ही मेरा मन हरण कर लिया, उसको तुम क्यों नहीं बाणों की वर्षा से जर्जरित करते ? मेरे मन को चुराने से वह अपराधिनी है, उसको तुम्हें दंड देना चाहिए ॥५१॥


इत्यादिकं जजलपासा-वसम्बद्धं प्रबन्धतः ।
एकयापि तया मेने व्याप्तामिव जगत्रयीम् ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार यद्वा-तद्वा गुनगुनाता था और उसने उस एक स्वरूप को ही तीनों जगत् रूप समझा । वह सर्वत्र अपनी मनोहारिणी की छवि ही छवि देखने लगा ॥५२॥


जिगांसतस्तदा तस्य पञ्चमेन निवारिताः ।
हुङ्काराः सन्ततश्वासैः प्रम्लानाधरपल्लवैः ॥५३॥

अर्थ: काम-ज्वर की तीव्र उष्ण-श्वासों से उसके ओष्ठ म्लान हो सूख गये, इसलिए मन बहलाने के लिए गाने की इच्छा होने पर भी वह न गा सका । उसकी हूँ हूँ कार शब्द ध्वनि भी रोक दी गई ॥५३॥


समग्र-गुण-सम्पूर्णं कर्णशूल-करं परम् ।
गीतं तेन तदा मेने मनोज-ज्या-रवोपमं ॥५४॥

अर्थ: और उसकी इस इच्छा को देख जो कोई मधुर स्वर से गाने लगा, उसके उस स्वर को उसने कामदेव के धनुष की टंकार के समान भयंकर कर्ण पीड़ा करने वाला समझा ॥५४॥


किञ्च प्रसारयामास भूयोभूयो१ भुजद्वयम् ।
आलिङ्गितुमिव व्योम-भूमिमाशास्तथैक्षतः ॥५५॥

अर्थ: उनकी उत्तरोत्तर इस काम-ज्वर से भयंकर ही दशा हो गई । वे अपनी दोनों बाहुओं को पसार कर उसके आलिंगन की इच्छा से कभी पृथ्वी पर लेटने लगे । कभी आकाश में हाथ बढ़ाने लगे और कभी दिशा-विदिशाओं में उठ-उठकर भागने लगे ॥५५॥


मूर्च्छा-प्रलाप-वैवर्ण्य-स्वेद-रोमाञ्च-कम्पितम् ।
तस्यासीत्सततं गात्रं सन्निपात-ज्वरादिव ॥५६॥

अर्थ: उसके शरीर में निरंतर सन्निपात-ज्वर के समान काम-ज्वर से होने वाली सब चेष्टाएँ होने लगीं । उसे रह-रहकर मूर्च्छा आ घेरती मनमानाप्रलाप करता, मुख की कांति क्षीण हो गई, पसीना छूटने लगा, शरीर रोमाञ्चित हो काँपने भी लगा ॥५६॥


इत्यालोच्य ततस्तस्य सुहृदः स्मरसंभवाम् ।
दशामावेदयामासु-राशु२ ताताय३ तत्पराः ॥५७॥

अर्थ: इस प्रकार कुमार को काम के बाणों से विद्ध और उसकी दशों अवस्थाओं को देखकर, उसके दक्ष मित्रों ने उसे कामासक्त जानकर, शीघ्र उसके पिता के पास जाकर संपूर्ण वृतान्त कह सुनाया ॥५७॥


यावन्मानधनोऽद्यापि न याति दशमीमयम् ।
दशां कन्तोः कुमारस्य कुरु तावत्समीहितम् ॥५८॥

अर्थ: मित्र कहने लगे हे मान्य आर्यवर ! आपके पुत्र की दयनीय दशा है, वह काम वेदना से अत्यंत पीड़ित हो चुका है । उसकी दसवीं दशा जब तक प्राण घातक न हो, उसके पूर्व ही उसके इच्छित कार्य की सिद्धि का शीघ्र उपाय करिये ॥५८॥


उदन्तं१ तं समाकर्ण्य रोमाञ्च-कवचाञ्चितः।
सञ्जहास शनैरास्यं पश्यंस्तेषां मुहुर्मुहुः ॥५९॥

अर्थ: मित्रों की वार्ता सुन सेठ हर्ष से झूम उठा, शरीर रोमाञ्चित हो गया, उसका मुख-मण्डल हास्यमय हो गया और उन्हें वह बार-बार देखने लगा ॥५९॥


कुण्ठीभवन्त्यहो यस्य चेतसो वज्रसूचयः।
तस्यापि भेदने शक्ताः कटाक्षाः किल योषिताम् ॥६०॥

अर्थ: सेठ विचारने लगा अहो। जिसके चित्त को भेदन करने में वज्र की सूईयाँ भी मोंथली हो गई, उसके मन को स्त्रियों के कटाक्ष भेदने में समर्थ हो गये ॥६०॥


सञ्चिन्त्येति ततस्तांश्च ताम्बूलाम्बरभूषणैः।
संविभज्य जगामासौ यत्रास्ते देहसम्भवः२ ॥६१॥

अर्थ: इस प्रकार विचार कर और सूचित करने वाले जनों को ताम्बूल, वस्त्र एवं आभूषणादि प्रदान कर वह अपने पुत्र के पास गया ॥६१॥


तं विलोक्य तथाभूतं श्रेष्ठिनेति विचिन्तितम्।
दुःसाध्या कार्यसंसिद्धिः कुमारः पुनरीदृशः ॥६२॥

अर्थ: पुत्र की दयनीय एवं अत्यन्त क्षीण दशा को देखकर वह चिन्तित हो गया, विचारने लगा इसकी कार्य सिद्धि अत्यंत दुःसाध्य है ॥६२॥


विधैर्वशेन नो जाने कार्यं स्यादिह कीदृशम् ।
तथाप्याश्वासयामीति तं जगाद सुतं ततः ॥६३॥

अर्थ: विधाता ही जाने इसका कार्य किस प्रकार का होगा, न जाने साध्य है या असाध्य, जो हो इस समय इसे आश्वासन ही देना उचित है, विश्वास दिलाता हूँ, इस प्रकार मन में विचार कर वह पुत्र से कहने लगा ॥६३॥


मुञ्च खेदं महाबुद्धे ! मानसं सकलाः क्रियाः ।
कुरु स्नानादिकाः शीघ्रं पूरये तव वाञ्छितम् ॥६४॥

अर्थ: हे महाभाग ! मानसिक खेद का परित्याग करो, प्रसन्न हो अपनी स्नानादि समस्त क्रियाओं को यथाविधि करो, हे मनोहर ! शीघ्र तुम्हारे मनोवाञ्छित कार्य को पूरा करूँगा ॥६४॥


यदीह राजकन्यापि खेचरी वापि सुन्दरी ।
उत्सङ्गसङ्गतां पुत्र ! करिष्यामि तथापि ते ॥६५॥

अर्थ: जिस पर तुम्हारा मन मुग्ध हुआ है चाहे वह राजकन्या ही क्यों न हो, विद्याधर कन्या रहे अथवा सुंदर कन्या हो, हे प्रिय ! शीघ्र ही मैं तुम्हारा उसके साथ सङ्गम कराऊँगा अर्थात् विधिवत् आगमानुकूल विवाह कराऊँगा ॥६५॥


कार्यान्तरं परित्यज्य तथा वत्स ! विधास्यते ।
मया यत्नो यथा तथ्यो निष्पत्त्यैव भविष्यति ॥६६॥

अर्थ: हे पुत्र ! अन्य समस्त कार्यों का त्यागकर, प्रथम वह कार्य करूँगा जिससे तुम्हारे मनोरथ की सिद्धि होगी ॥६६॥


समाश्वास्येति तं श्रेष्ठी स जगाम तदालयम् ।
तां विलोक्य ततस्तेन विस्मितेन धुतं शिरः ॥६७॥

अर्थ: उपर्युक्त साहस भरे वचनों से पुत्र को कुछ संतुष्ट कर सेठ जीवदेव, अपने पुत्र की प्यारी मनोहारिणी मूर्ति को देखने के लिए, नित्य मंडित चैत्यालय की तरफ गये और वहाँ उसे देखकर अपना सिर हिलाने लगे ॥६७॥


विश्वातिशायिनी कान्ति रूपं विश्वविमोहकम् ।
लज्जाकर मिदं चास्य लावण्यं विश्वयोषिताम् ॥६८॥

अर्थ: विश्वकांति को तिरस्कृत करने वाली इसकी सौम्य कान्ति और इसकी रूप राशि विश्व को मोहित करने वाली है, इसका यह सौंदर्य विश्व की स्त्रियों को लज्जा उत्पन्न करने वाला है ॥६८॥


प्रतिबिम्बमिदं यस्याः सास्ति काचन सुन्दरी ।
अदृष्टमीदृशं रूपं निर्मातुं न हि शक्यते ॥६९॥

अर्थ: अहा ! संसार की समस्त नारियों के रूप और लावण्य को अपने रूप और लावण्य के प्रभाव से जीतने वाली यह मूर्ति धन्य है । अवश्य ही यह किसी न किसी की प्रतिमूर्ति है । बिना किसी कन्या के रूप देखे, ऐसी मूर्ति का बनाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव है ॥६९॥


युक्तं यदत्र पुत्रस्य मनो लीनमजायत ।
यदस्या दर्शनात्तेऽपि नूनं मुह्यन्ति नाकिनः ॥७०॥

अर्थ: मेरे पुत्र का मन इसमें लीन हुआ यह ठीक ही है क्योंकि इसके देखने मात्र से मनुष्य क्या देव भी मुग्ध हो जायेंगे ॥७०॥


एवम्विधेऽपि यच्चित्तं नानुरागभरालसम् ।
समग्ररसशून्यात्मा नरः पाषाण एव सः ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार का समस्त रसों के सामंजस्य से युक्त अद्भुत चित्र देखकर, यदि किसी मनुष्य का चित्त द्रवित नहीं हो, तो वह मनुष्य नहीं शून्यात्मा पाषाण ही है ॥७१॥


सम्भाव्येति समाहूतस्तेनासौ येन शिल्पिना ।
कृता सा सोऽपि संपृष्टः केयं क्वास्ते च कीदृशी ॥७२॥

अर्थ: इस प्रकार उस सेठ ने विचार कर इस चित्र को चित्रित करने वाले शिल्पी को बुलवाया तथा यह कन्या कौन है ? कहाँ है ? और कैसी है ? इस तरह के प्रश्न पूछे ॥७२॥


तेनाभाणि महाभाग ! चम्पायां विमलात्मनः ।
श्रेष्ठिनो विमलस्येयं विमलादिमतीः सुता ॥७३॥

अर्थ: उत्तर में शिल्पी ने कहा- सेठ जी चम्पानगरी में निर्मल मन वाले विमल सेठ रहते हैं, उनकी यह विमलमती नाम की पुत्री है ॥७३॥


वेणीवलय-विस्रस्त - पुष्पभ्राम्यन्मधुव्रता ।
कपोल-फलकोद्भूत-स्वेदबिन्दु - चितानना ॥७४॥

अर्थ: उस समय यह अपने केशपाश की चोटी में चारों तरफ पुष्प लगाये थी । उनकी सुगन्धि से गुंजारते हुए भ्रमर इसके शिर पर भ्रमण कर अपूर्व ही शोभा बढ़ा रहे थे । खेल में परिश्रम पड़ने के कारण, इसके मुख के गालरूपी पटिए पर पसीने की सूक्ष्म-सूक्ष्म बूँदें झलक रही थीं ॥७४॥


चेलाञ्चलं तथा चारु हारावलिमसौ शनैः ।
संयम्य सर्वतो बद्ध-लक्षा मण्डलचारिणी ॥७५॥

कन्यका कमनीयांगी१ क्रीडन्ती कन्दुकेन सा ।
समं सखीभिरालोकि विस्मितेन मया चिरम् ॥७६॥युग्मम्॥

अर्थ (श्लोक 75 से 76): इसके वस्त्र का अंचल-चंचल हो रहा था । सुंदर हार को सब ओर से संभाल कर अपने निर्दिष्ट कार्य की ओर धीरे-धीरे सखियों सहित गमन करती हुई, यह अत्यन्त कमनीय कन्या गेंद से अपनी सखियों के साथ खेल रही थी । उस समय मैंने बड़े आश्चर्य से उसे चिरकाल तक निहारा ॥७५,७६॥


आगत्येदं ततः साधो मत्वात्यन्तं मनोहरम् ।
अत्र २तद्रूपमाकल्पि शतांशादिव किञ्चन ॥७७॥

अर्थ: इसकी सुंदरता पर प्रसन्न हो मैंने वहाँ से आकर यह मूर्ति यहाँ उकेर दी । यद्यपि मैंने उसी कन्या को मन में रखकर यह मूर्ति बनाई है तो भी मुझे विश्वास है कि यह पूरी तरह से वैसी नहीं बन पाई है । यह केवल उसका सौवाँ हिस्सा है ॥७७॥


ततो वितीर्य हृष्टात्मा स तस्मै पारितोषिकम् ।
जिनदत्तप्रतिच्छन्दं लेखयामास तत्पटे ॥७८॥

अर्थ: कारीगर के उपर्युक्त वचन सुनकर सेठ जी बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने उसे खूब पारितोषक दिया और जिनदत्त की प्रतिमूर्ति उसी पट पर उससे चित्रित करने को कहा ॥७८॥


तं समर्प्य ततस्तत्र प्रेषिता वरणाय ताम् ।
पटिष्ठाः श्रेष्ठिना वक्तुं चम्पायां नरसत्तमाः ॥७९॥

अर्थ: जब मूर्ति पट पर अंकित हो गई तो सेठ जी ने संदेश-कुशल श्रेष्ठ-पुरुष शीघ्र ही बुलवाये और उन्हें चंपापुरी में विमल सेठ के यहाँ जाने को कहकर रवाना कर दिया ॥७९॥


तैर्गत्वा दर्शितो लेखः श्रेष्ठिनः सपदस्तदा ।
मेने तेनापि संसिद्धं तद्दृष्ट्वाशु समीहितम् ॥८०॥

अर्थ: संदेशवाहक लोग यथासमय चंपापुरी पहुँचे और विमल सेठ के यहाँ जाकर जिनदत्त का चित्रपट तथा सेठ जी का पत्र दिखाकर बोले-श्रीमान ! हमारे सेठ ने आपकी सेवा में यह अपने पुत्र का चित्र और यह पत्र भेजा है, सेठ ने भी चित्र देखा एवं पत्र पढ़कर अपने कर्त्तव्य कार्य को घर बैठे शीघ्र ही सम्यक् रूप से सफल हुआ माना ॥८०॥


दत्त्वास्मै कन्यकामेतां कृतकृत्यो भवाम्यहम् ।
संभाव्येति चकारैषां गौरवं गुणसागरः ॥८१॥

अर्थ: इस जिनदत्त के लिए इस कन्या को प्रदान कर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा । वस्तुतः मेरी कन्या के योग्य ही यह वर है, इस प्रकार विचार कर गुणों के सागर विमल सेठ ने इन पत्रवाहकों का खूब पुरस्कार-सत्कार किया ॥८१॥


तातोपान्तगता सापि तमद्राक्षीत्पटं सुता ।
दर्शनादेव चास्याभून्मनोभूशरशल्यिता ॥८२॥

अर्थ: सेठ जी के पास कार्यवश आई हुई पुत्री विमलमति ने जब उस चित्र को देखा तो उसका चित्त भी अचानक ही काम के बाणों से घायल हो गया ॥८२॥


सङ्क्रान्तमिव तद्रूपं तदा तस्या हृदि ध्रुवम् ।
यत्तस्य दर्शनात्सापि समभून्निश्चलाखिला ॥८३॥

अर्थ: चित्र के देखने मात्र से उसके मन की विलक्षण दशा हो गई । उसके मन में उस चित्र का रूप मानो सङ्क्रान्त/चित्रित/अंकित ही हो गया, इस रूप से वह परिपूर्ण निश्चेष्ट खड़ी रह गई ॥८३॥


सखी वसन्तलेखास्या जग्राहाञ्चलमुत्सुका ।
अन्तरेऽत्र तया सापि हुंकृत्वैव निवारिता ॥८४॥

अर्थ: उसी समय उसकी सखी वसंतलेखा ने उत्सुकतावश, उस विमलमती का अंचल खींच कर उसे सावधान किया किन्तु विमलमती ने हूँ कहकर उसे रोका ॥८४॥


सा ददर्श यथालब्ध-लक्षं शून्यं जहास च ।
अस्फुटार्थं जजल्पातस्तातेनाज्ञायि तन्मनः ॥८५॥

अर्थ: उस कन्या को लक्ष्यसिद्ध, संज्ञा शून्य, अस्पष्टालाप आदि चेष्टाओं से उस चित्र पर मुग्ध हुई जानकर पिता ने, उसके मनोनुकूल कार्य करने का निश्चय किया ॥८५॥


आलोच्य बन्धुभिः सार्द्धं कार्यमार्यजनोचितम् ।
संविभक्ता गतास्तेऽपि सलेखाः श्रेष्ठिना ततः ॥८६॥

अर्थ: सेठ ने बन्धुओं के साथ आर्य-जनों के योग्य क्या कार्य है, ऐसा विचार-विमर्श कर पत्रवाहक भेजे और वे भी चले गये ॥८६॥


लेखार्थमथ निश्चित्य जिनदत्तपिता स्वयम् ।
कृत्वा यथोचितां तत्र सामग्रीं प्राहिणोत्सुतम् ॥८७॥

अर्थ: लेख-पत्र द्वारा स्वीकृति पाते ही सेठ ने चम्पानगरी की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया, विवाहोत्सव के अनुकूल समस्त सामग्री एकत्रित कर बन्धु-बांधवों को आमंत्रित कर निमन्त्रित किया एवं बड़े साज-बाज के साथ पुत्र को लेकर चल दिये ॥८७॥


प्राप्तः सोऽपि ततश्चम्पा-मकम्पां रिपुसंहतेः ।
तर्जयन्तीं ध्वज-व्रातैः पुरन्दर-पुरीमिव१ ॥८८॥

तदुद्याने स्थितस्तेन विहितोचित-सत्क्रियः ।
तत्काल-मङ्गलारम्भ - व्यग्राशेष-परिग्रहः ।८९॥

जातेऽथ समये तत्र समुत्सव-शतान्विते ।
संस्नात-कल्पितानल्प-माल्याम्बर-विभूषणः ॥९०॥

गीत-नृत्य-समासक्तोऽ- नन्त-सीमन्तिनी-जनः ।
चतुर्विध-महावाद्य - बधिरीकृत-दिङ्मुखः ॥९१॥

चारु-पौरांगना-नेत्र - शतपत्र-दलाश्रितः ।
दीनानाथ-जनाँस्तन्वन् कृतकृत्यान्समन्ततः ॥९२॥

तत्कालोचित-यानेन वयस्यैः सहितो मुदा ।
प्रवृत्तः प्रेम-सम्भार-भारितो वल्लभामभि२ ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 88 से 93): वह जिनदत्त भी शत्रु समूह से अजेय चंपानगरी को पहुँचा । वह चंपानगरी ध्वजा समूह के द्वारा शत्रु समुदाय की तर्जना करती हुई इन्द्रपुरी के समान जान पड़ती थी, वह उस चम्पानगर के उद्यान में ठहरा । उसने वहीं सम्पूर्ण क्रियाकलापों को प्रारम्भ किया। विवाह के योग्य समस्त विधि-विधान की तैयारी कर शीघ्र ही मङ्गल कार्य आरम्भ किया, तत्काल सैकड़ो उत्सव प्रारम्भ हो गये, मंगल स्नान, वस्त्रालङ्कार-मण्डन मंगल-मालारोपण और ताम्बूल प्रदानादि क्रियाओं सहित सौभाग्य-शालिनी स्त्रियाँ गीत, नृत्य, वादित्र और संगीत आदि करने लगीं तथा तत, वितत, सुषिर और घन इन चार प्रकार के वादित्रों से दशों-दिशाएँ बधिर-सी हो गूंजने लगीं । कमलनयनी सैकड़ों सुंदर पुरस्त्रियाँ धूम-धाम से अपने-अपने कार्य में संलग्न, दीनों व अनाथों को मनोवाञ्छित दान देकर कृतकृत्यपने को करता हुआ चारों ओर मधुर वातावरण वाला जिनदत्त उसी समय विवाह योग्य पालकी में सवार हो, अपने मित्रों के साथ आनंद सहित प्रेम संभार से भरा हुआ प्रिया के सम्मुख गया ॥८८,८९, ९०, ९१,९२,९३॥कुलकं॥


यथाक्रमं कृताशेष-विवाहविधिमंगला ।
तत्रासौ वीक्षिता तेन पताकेव मनोर्भुवः१ ॥९४॥

अर्थ: यथाक्रम से जिसकी गृहस्थ धर्मानुसार समस्त विवाह-पाणिग्रहण संस्कारादि क्रियाएँ प्रारंभ हुई उसी समय कुमार ने उस साक्षात् कामदेव की ध्वजा स्वरूप कमनीय कान्ता का अवलोकन किया ॥९४॥


तद्दर्शनाम्भसा सिक्तास्तथास्य प्रेमपादपः ।
ववृधे शतशाखं स यथामानं मनोवनौ२ ॥९५॥

अर्थ: विमलमती के दर्शनरूपी जल से सींचा गया कामदेवरूपी वृक्ष उनके मनरूपी पृथ्वी में सैकड़ों शाखाओं और प्रतिशाखाओं से वृद्धिंगत होने के कारण उससे बाहर निकलने की कोशिश करने लगा ॥९५॥


चित्तभूरिति३ मिथ्यासी-रूढिरेषा सदा स्मरे ।
यत्तदालोकनात्तस्य सर्वाङ्गेभ्यः समुद्ययौ ॥९६॥

अर्थ: काम को लोग केवल मन से उत्पन्न होने वाला कहते हैं परंतु उस समय वह काम उस जिनदत्त के समस्त अंगों से उत्पन्न हो रहा था, इसलिए पूर्वोक्त वचन सर्वथा मिथ्या प्रतीत होने लगा ॥९६॥


यतो यतस्तदङ्गेषु चक्षुः क्षिप्तं समुत्सुकम् ।
ततस्ततः समाकृष्टं चापेनापि मनोभुवः ॥९७॥

अर्थ: ज्यों-ज्यो सुंदरता देखने के लिए अपने समुत्सुक चक्षु, उन्होंने उसके अंगों पर डाले त्यों-त्यों काम ने उन पर अपना बाण तानना शुरू किया ॥९७॥


कारयामास चैतस्याः पुरोधाः पाणिपीडनम् ।
सलज्जालिखदेषापि पादांगुष्ठेन भूतलम् ॥९८॥

अर्थ: जब जैन पुरोहित ने विमलमति का हाथ जिनदत्त के हाथ में ग्रहण कराया, तो वह भी लज्जा से नम्रीभूत हो अपने पैर के अंगूठे से पृथ्वी को खोदने लगी ॥९८॥


सालसे समदे मुग्धे स्निग्धे प्राकृतविभ्रमे ।
गाढोत्कण्ठे सलज्जे चान्तराले बलिते तदा ॥९९॥

भूमितन्मुखयोर्मध्यं चक्रतुस्तद्विलोचने ।
शङ्के सितासितानेक-नीलोत्पल-दलाकुलम् ॥१००॥युग्मम्॥

अर्थ (श्लोक 99 से 100): कभी तो वह लज्जा से भरे हुए गाढ़ उत्कंठा वाले अलसाए समद और स्वाभाविक विलास से शोभित अपने नेत्रों को जिनदत्त के मुख पर ले जाती है और कभी भूमि की तरफ नीचे की ओर दृष्टि गढ़ा टकटकी लगा देखती है जिससे कि उस समय पृथ्वी और जिनदत्त के मुख का मध्यभाग श्वेत और श्याम वर्ण वाले अनेक नील कमलों के दल से आकुलित सरीखा जान पड़ता था ॥९९,१००॥


सार्द्धं तया ततस्तत्र परीयाय हुताशनम् ।
संगमाद्विरहोद्भूत-सन्तापं वा बहिः स्थितम् ॥१०१॥

अर्थ: जब वे दोनों उठकर अग्नि की प्रदक्षिणा देने लगे, तो विरह से उत्पन्न हुए और इस समय के संगम से उत्पन्न संताप बाहर ही स्थित हो गया ॥१०१॥


जुह्वतस्तस्य तत्राभूल्लाजाशब्दोऽग्नियोगजः ।
जानेऽहं योग्यसम्बन्धात्-साधुकारं शिखी ददौ ॥१०२॥

अर्थ: अग्नि में होमे गये लाजों (लाई) के संयोग से जो शब्द हुआ, उससे योग्य वर और कन्या के संगम की अग्नि, प्रशंसा करते हुए के समान मालूम पड़ने लगी ॥१०२॥


धूम्रपानक्षणोद्भूतास्ते तयोर्वाष्पबिन्दवः ।
निर्गता वा मनोऽमान्तः-कणाः प्रेमरसोद्भवाः ॥१०३॥

अर्थ: हवन के धुएँ की तीव्रता से जो उनके शरीर में पसीना आ गया, वह उनके मन के भीतर नहीं समाने के कारण बाहर आया हुआ प्रेम-रस सरीखा दिखने लगा ॥१०३॥


तदासौ मौक्तिकोद्दाम-मालालंस्कृत-तोरणाम् ।
तयामा वेदिकां प्राप्य भद्रासन-मुपाविशत् ॥१०४॥

अर्थ: तब वह जिनदत्त मोतियों की बड़ी-बड़ी मालाओं से अलंकृत तोरणों वाली वेदिका को प्राप्तकर सुंदर आसन पर बैठ गया ॥१०४॥


यान्यक्षतानि नार्योऽर्य्यः ददिरे मस्तके तयोः ।
कुसुमानीव सौभाग्य-मञ्जर्य्यास्तानि रेजिरे ॥१०५॥

अर्थ: तब श्रेष्ठ-श्रेष्ठ नारियाँ उनके ऊपर जो अक्षत फेंकने लगीं, वे उनके सौभाग्यरूपी लता के बिखरे हुए पुष्पों के समान सुंदर दिखने लगे ॥१०५॥


गीतनृत्यादिकं तत्र प्रारब्धं प्रमदाजनैः ।
पश्यन्तौ यावदानन्द-वार्धिमग्नौ स्थितौ तदा ॥१०६॥

अर्थ: जब तक वहाँ नारियों द्वारा गीत-नृत्य आदि प्रारम्भ किये गये, तब तक उस नृत्य आदि को देखते हुए वे दोनों आनंद रूप सागर में निमग्न होते हुए बैठे रहे ॥१०६॥


निशाविलाससम्पर्को जायतामेतयोरिह ।
इतीव मन्यमानेन भानुनास्ताद्रिराश्रितः ॥१०७॥

अर्थ: यहाँ पर सूर्य इनके शारीरिक वियोग को और अधिक न देख सकने के कारण ही मानो अस्ताचल चला गया ॥१०७॥


निमिमील तदाम्भोज-लोचनानि सरोजिनी ।
दुःखभारात्प्रियस्यैव तां दशामुपजग्मुषः ॥१०८॥

अर्थ: यह देख, विचारी कमलिनी को महान् दुःख हुआ, अपने पति के इस बरताव से बहुत ही दुःखित हुई और उस दुख को अधिक होने से न सहनकर सकने के कारण ही उसने अपने कमलरूपी नेत्रों को बंद कर लिया ॥१०८॥


निशासम्भोगशृङ्गार-तत्परा हरिणीदृशः ।
आसन् गृहे गृहे दूती संलापव्याकुलास्तदा ॥१०९॥

अर्थ: सूर्य के चले जाने और रात्रि के आने से हर्षित हो, मृगनयनी कांताएँ शृंगार से सुसज्जित होने लगीं और प्रिय तक अपने मन के अभिप्राय को पहुँचाने के लिए दूतियों से आलाप-बातचीत करने में व्याकुल हो गईं ॥१०९॥


प्रससार नभोभूमौ सन्ध्यावल्लीव यारुणा ।
कालेभोत्खाततद्रक्त-कन्दाभो भास्करोऽभवत् ॥११०॥

अर्थ: आकाशरूपी पृथ्वी पर जो उस समय सूर्य की लालिमा छा गई, वह कालरूपी हस्ती से उखाड़े गये लाल कंद के समान मालूम होने लगी ॥११०॥


प्रकाशितं स्वयं विश्व-माक्रान्तं तिमिरारिणा ।
कथं नु शक्यते द्रष्टु-मिति भास्वाँस्तिरोधधे ॥१११॥

अर्थ: सूर्य स्वयं प्रकाशित विश्व को अंधकाररूपी शत्रु से व्याप्त देखने के लिए कैसे समर्थ हो सकता ? इसलिए वह अस्त हो गया ॥१११॥


प्रबोधितास्ततो दीपाः प्रतिवेश्म तमश्छिदः ।
सस्नेहाः सद्दृशोपेताः पात्रस्थाः सुजना इव ॥११२॥

अर्थ: तब लोगों ने नित्य कर्म करने के लिए, घर-घर में स्वजन के समान अन्धकार के नाशक, बत्ती तेल से सहित दीपक जलाये ॥११२॥


कौतुकादिव तं द्रष्टुं वधूवरयुगं तदा।
निशानारी समायाता तारामौक्तिकभूषणा ॥११३॥

अर्थ: नवीन वर और वधू को कौतुक से देखने के लिए ही मानो आई हुई नक्षत्र और तारारूपी भूषणों से भूषित रात्रिरूपी स्त्री सर्वत्र व्याप्त हो गई ॥११३॥


तमःस्तम्बेरमेणेदं मत्वाक्रान्तं जगञ्जवात्।
उदियाय नभोरण्ये चन्द्रसिंहोंशुकेसरः ॥११४॥

अर्थ: अंधकाररूपी हाथी से आक्रांत अपने राज्य स्थान जगत् को देखकर किरणरूपी केश छटा से शोभित चंद्रमारूपी सिंह शीघ्र ही आकाशरूपी वन में आकर प्रकट हो गया ॥११४॥


मन्दमन्दतमःस्तोमं व्योम सोमकरैरभात्।
चन्दनेन मदेनेव लिप्तं स्मरनृपाङ्गणम् ॥११५॥

अर्थ: चंद्रमा की शीतल किरणों रूपी चंदनधारा से उस समय कामदेवरूपी महाराज का आंगनरूप आकाश लिप्त सरीखा मालूम हो, शोभने लगा ॥११५॥


ततः क्षीरार्णवस्येव कल्लोलैः सकला दिशः।
क्षालिता इव भाश्चक्रैश्चक्रे कुमुद-बान्धवः ॥११६॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त दिशाएँ चंद्रमा की निर्मल किरणों से व्याप्त होने के कारण क्षीर समुद्र का दुग्ध से अभिषेक करने वाली सरीखीं जान पड़तीं थीं ॥११६॥


ददर्श त्यक्ताहारापि मुग्धा कापि रतोत्सुका ।
स्तनाभोगं लसच्चारु - चन्द्रांशुकृततद्भ्रमा ॥११७॥

अर्थ: कोई कामिनी उस समय हारादि छोड़कर, रति क्रीड़ा को उत्सुक हो रही दिखाई पड़ती थी, कोई अपने स्तन-मण्डल के मध्य भाग को चंदन से चर्चित कर सुन्दर चन्द्र किरणों में हार को मान भ्रमित सी हो रही थी अर्थात् क्या यह चन्द्रमा की चाँदनी है या हार है ॥११७॥


दूतीभिर्मन्मथालापाः सकम्पा रतकौतुकाः ।
मुग्धा निवेशिताः शय्योत्संगेऽधीशां हठादिव ॥११८॥

अर्थ: कोई भोली स्त्री दूतियों के द्वारा मन्मथोन्माद/कामवर्धक कथाएँ सुन, कामभोग के लिए आतुर हो गई । शरीर काँपने लगा, ऐसा लगता था मानो कोई मुग्धा बलात् पति के द्वारा प्रेम संयोग के लिए शय्या पर गोद में आसीन कर दी गई ॥११८॥


अमृतैरिव निर्धौते कर्पूरैरिव पूरिते ।
जाते तदा करैरिन्दो रम्ये भुवनमण्डपे ॥११९॥

उद्दण्डकामकोदण्ड-चण्डिमाक्रान्तविष्टपे ।
सङ्केतमन्दिरद्वार - निषीददभिसारके ॥१२०॥

मानिनी माननिर्णाश-विधिव्यासक्तवल्लभे ।
विचित्र-रत-संमर्द - कदर्धित-नवाङ्गने ॥१२१॥

स्वतः स्वरूपसम्पत्ति-वनितासक्तयोगिनि ।
दक्षपण्याङ्गनालोक - वञ्चितग्रामभोगिनि ॥१२२॥

केतकी-कुसुमोद्दाम - गन्ध-मुग्ध-मधुव्रते ।
वियोगिनी-मनःकुण्ड-प्रज्वलद्विरहानले ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 119 से 123): तभी भुवन-मण्डप में चंद्र किरणें अमृत से अभिसिंचित, कर्पूरादि से पूरित हुए के समान हो गईं । चारों ओर भूमण्डल पर उदण्ड/प्रचण्ड काम का राज्य छा गया । अभिसारिकाएँ अपने-अपने सांकेतिक भवनों के द्वार पर प्रतीक्षा सहित स्थित हो गईं । कामी लोग अपनी-अपनी रुष्ट कांताओं के मान निवारण में परिश्रम करने लगे । नवीन वधुएँ विचित्र रतिक्रीड़ा में संमर्दन से


इत्याद्यनेकचेष्टाभिः प्रवृद्धमदनोत्सवे ।
समये तत्र तौ नीतौ जनैर्मातृगृहं गतौ ॥१२४॥कुलकम्॥

अर्थ (श्लोक 119 से 124): कदर्थित/पीड़ित होने लगीं, स्वभाव से रूप सम्पत्ति से समन्वित माननीयों में आसक्त जन, क्रीड़ारत होने लगे किन्तु वेश्याएँ अपने चातुर्य से नगरवासियों को ठगकर भोग कराने लगीं । केतकी के पुष्प की प्रचण्ड गंध से भ्रमर मधुर-मधुर गुंजार करने लगे और विरहिणी स्त्रियों के मन में स्थित अग्नि, प्रचण्ड रूप से धधकने लगी । जब इस प्रकार समस्त लोक काम की आज्ञा के पालन करने में दत्तचित्त हो गया, तो इन दोनों नवीन वर-वधुओं को भी अधिक देर तक वियुक्त रखना, इनके संबंधियों ने उचित न समझा इसलिए शीघ्र ही ये दोनों केलि घर में पहुँचाये गए ॥११९, १२०, १२१,१२२,१२३,१२४॥कुलकं॥


निर्मले सुकुमारे च सनम्रे मुनिमानसे ।
यथा तथा स्थितौ तल्पे तौ तदा मुदिताशयौ ॥१२५॥

अर्थ: और वहाँ वे सुकुमार विनयशील वर-वधु मुनियों के मन के समान निर्मल कोमल-सेज पर स्थित हो, अपने चिरकालीन-वियोग से संतप्त-हृदय को शीतल करने का उपाय करने लगे ॥१२५॥


लज्जालोलं विलस-दतुल-प्रेमसम्भारमुग्धं ,
गाढोत्कण्ठं रतिरसवशं कौतुकोत्कम्पिचित्तम् ।
द्वंद्वं निन्ये वदननिहिता-धीरविस्तारिनेत्रां ,
रात्रिं ताम्यत्तरलहृदय-प्रोषितां तत्तदानीम् ॥१२६॥

अर्थ: लज्जा से चंचल अतुल प्रेम के भार से मुग्ध गाढ़ उत्कंठा वाले, रति-रस के वश हुए, कौतुक से कंपित चित्त वाले नवयुगल ने, मुख पर मुख को रख आनंद से निद्रा लेते हुए, समस्त रात्रि ही को बिताया ॥१२६॥


प्राचीकुंकुम-मण्डनं किमथवा रात्र्यङ्गना-विस्मृतं ,
रक्ताम्भोज-मथो मनोज-नृपते रक्तातपत्रं किमु ।
चक्रं ध्वान्त-विभेदकं द्युवनिता-मांगल्य-कुम्भः किमु ,
इत्थं शङ्कित-मम्बरेस्फुट-मभूद्-भानोस्तदा मण्डलम् ॥१२७॥

अर्थ: पूर्वदिशा के कुंकुम भूषण के समान, रात्रिरूपी अंगना के विस्मृत लालकमल के समान, कामरूपी महाराज के रक्त छत्र के समान, अंधकार नाशक चक्र के समान और आकाशरूपी स्त्री के मंगलकलश के समान मालूम होता हुआ सूर्य-मंडल आकाश में स्पष्ट रीति से दृष्टिगोचर हो गया ॥१२७॥

तृतीया सर्गः

स्थित्वा च कतिचित्तत्र दिनानि मुदितस्तया ।
समं विज्ञापयामास श्वशुरं गुणमन्दिरम् ॥१॥

यथा तातादयो माम मदागमनमञ्जसा ।
मृगयन्तोऽवतिष्ठन्ते ततः प्रेषय मां लघु ॥२॥

अनुज्ञातस्ततस्तेन सदुःखेन कथञ्चन ।
भणित्वेति यथा पुत्र ! विच्छेदस्तव दुःसहः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 1 से 3): अपनी प्यारी विमलमती के साथ नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते-करते जब कुछ दिन बीत गये, तो एक दिन जिनदत्त अवसर देखकर अपने ससुर से बोले ॥१॥ पूज्य ! मुझे यहाँ रहते अधिक दिन हो गए हैं । मेरे माता-पिता मेरे आने की आशा करते होंगे इसलिए आपसे प्रार्थना है, कि मुझे यहाँ से घर जाने की आज्ञा देकर कृतार्थ करें ॥२॥ जामाता की उक्त प्रार्थना सुन सेठ विमलचंद्र को यद्यपि बहुत दुख हुआ, तो भी जिनदत्त का अपने घर जाना उचित समझ, उन्होंने कहा-प्यारे पुत्र ! यद्यपि तुम्हारा वियोग असह्य है । उससे मुझे ही नहीं किंतु अन्य तुम्हारे संबंधितों को भी दुख होगा इसलिए तुम्हें यहाँ से जाने की आज्ञा देने को चित्त नहीं चाहता, तो भी यहाँ अधिक रहने से तुम्हारे माता-पिता के दुखी होने का डर है, इसलिए तुम्हें रोकना भी अनुचित है ॥३॥


दत्वा परिकरं सर्वं दासी-यानादि-संयुता ।
पुत्री समर्पिता तस्मै श्रीवत्सायेव गोमिनी ॥४॥

अर्थ: पुत्री को योग्य दास-दासी, वाहन सहित संपूर्ण परिकर देकर, विष्णु के समान दामाद जिनदत्त को अपनी लक्ष्मी के समान पुत्री को सौंप दिया । जैसे श्रीवत्स चिह्नधारी महाविष्णु तीर्थङ्करों का संयोग, ज्ञान समवसरण तथा मोक्षलक्ष्मी के साथ होता है, वैसे ही विष्णु के समान जिनदत्त का संयोग, लक्ष्मी के समान विमलमती के साथ करा दिया ॥४॥


ततस्तमनुयातुं ये, चेलुः १ श्रेष्ठ्यादयो जनाः ।
आगत्य ते स्थिताः सर्वे बाह्योद्यान-जिनालये ॥५॥

अर्थ: जिनदत्त जिस समय रवाना हुए, तो ग्राम के बाहर उद्यान के जिनालय तक इनके सास-ससुर आदि संबंधी लोग भी गए और वहाँ वे ठहर गए ॥५॥


तत्र पूजादिकं कृत्वा शिरस्याघ्राय देहजाम् २ ।
शिक्षयामास गम्भीरमिति तां विनतां पिता ॥६॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक-पूजन कर, जब धार्मिकजन शुभ कार्यों से निवृत्त हो गए और वहाँ से प्रयाण कराने का समय समीप आया, तो विमलमती के पिता सेठ विमलचंद्र अपनी पुत्री के सिर को चूमकर प्यार करके बोले ॥६॥


सुतनो३ ! मा कृथा जातु क्रौर्य-दौर्जन्यचापलम् ।
अन्यथा स्याः४ समस्तानां विषवल्लीव दुर्भगा ॥७॥

अर्थ: हे पुत्री विमलमती ! आज तुम अपने पिता के घर से अपने पति के घर जा रही हो, यहाँ जो कुछ भी तुम क्रूरता, दुर्जनता एवं चपलता आदि दोष करती थी, वे सब तेरे लड़कपन में संभाल लिए जाते थे परंतु अब तुम वधू बनकर जा रही हो, इसलिए इन्हें तुम सर्वथा छोड़ देना। यदि इस शिक्षा के अनुसार न चलकर तुमने विपरीत किया, तो प्यारी बेटी ! तुम अपने समस्त कुटुम्बियों के लिये विषबेल के समान दुखदायिनी गिनी जाओगी ॥७॥


पत्युश्छायेव५ भूयास्त्वं सर्वदानुगता सती ।
समानसुखदुःखा च दुर्वृत्ताचार-दूरगा ॥८॥

अर्थ: तेरे लिए इसके सिवा एक यह भी कर्त्तव्य है कि जिस प्रकार तेरा पति तुझे रखे, उसी अवस्था में संतोष रखना। सर्वदा छाया के समान अपने पति की अनुगामिनी होना। जो कुछ तेरा पति कहे उसे तूं अवश्य ही करना। पति के सुख में सुख, दुःख में दुःख मानना, अपने चित्त को कभी भी बुरी बातों की तरफ न ले जाना ॥८॥


धर्म-कार्य-रता नित्यं गुरुदेवनता सुते।
निज-वंश-पताकेव भूयाः किं बहुभाषितैः ॥९॥

अर्थ: हे सुते ! धर्म कार्यों में रत रहना। नित्य ही देव, शास्त्र, गुरु की भक्ति में तत्पर विनम्र रहना, अधिक क्या कहूँ ? तुम अपने वंश की कीर्ति-ध्वजा के समान यशस्विनी बनो ॥९॥


गाढ-मालिङ्ग्य तत्रैव बाष्प-पूर्ण-विलोचना।
रुदन्ती तां जगादेति मातापि प्रीतिपूर्वकम् ॥१०॥

अर्थ: जब इस प्रकार सेठ विमलचंद्र अपनी प्यारी पुत्री को शिक्षा दे चुके, तो उनकी पत्नी भी विमलमती को छाती से चिपकाकर और आँखों में प्रेमाश्रुओं से पूर होकर बोली ॥१०॥


विलास-हास-सञ्जल्प-तल्प-माल्यविभूषणम्।
गतागतं१ च सर्वेण माकार्षीरुद्भटं सुते ! ॥११॥

अर्थ: मेरी प्यारी पुत्री ! अब तुझे तेरे श्वसुर के घर भेज देती हूँ, आज से तेरा जीवन दूसरे ही ढंग का होगा। तू वहाँ जाकर अपने पति के सिवाय, हर एक से हास-विलास मत करना। किसी से अधिक बातचीत कर अपना लड़कपन प्रकट न करना। अन्य के साथ एक आसन पर मत बैठना। अधिक माल्य-विभूषण की तरफ अपना चित्त न लगाना और अन्य के साथ जहाँ कहीं गमनागमन भी मत करना ॥११॥


चित्तं पत्युरविज्ञाय मा कृथा मानमायतम्।
उत्कण्ठिता च माभूस्त्व-मस्मभ्यं२ शुभदर्शने ॥१२॥

अर्थ: जिस समय अपने पति का मन प्रफुल्लित देखना, उसी समय मान करना और वह अधिक देर न कर, अल्पकाल तक ही करना जिससे कि तेरे पति के मन में किसी प्रकार का क्लेश पैदा न हो । हम लोगों के वियोग में तू अधिक दुखित न होना और यहाँ आने की तरफ अधिक उत्कंठा न दिखलाना ॥१२॥


ज्येष्ठ-देवर१-तद्वामा-श्वश्रुषु विनता भवेः ।
नर्मादिकमसम्बद्धं येन केनापि मा कृथाः ॥१३॥

अर्थ: अपने ज्येष्ठ, देवर, सास-ससुर, देवरानी, जेठानी और ननद आदि में सर्वदा अपनी नम्रता दिखलाना, ऐसा कोई भी असम्बद्ध हास्यादिक न करना जिससे कि वे रुष्ट हो जाएँ और उन्हें दुःख प्राप्त हो ॥१३॥


श्वश्रूं मातरिति ब्रूहि तातेति श्वशुरं नता ।
प्राणनाथं प्रियेशेति त्वं सुतेति च देवरम् ॥१४॥

अर्थ: तुम अपनी सासु को माँ कहकर पुकारना, श्वसुर को तात कहना, पति को प्रियेश शब्द से संबोधन करना और देवर को पुत्र कहकर बोलना एवं उन्हें तुम उसी प्रकार समझना ॥१४॥


प्राभृतानि सुते तुभ्यं प्रहेष्यामि२ सहस्रशः ।
शिक्षयित्वेति तां माता विरराम३ सुदुःखिता ॥१५॥

अर्थ: हे पुत्री ! मैं हजार उपहार को तुम्हारे लिए भेजूँगी, इस प्रकार अत्यन्त दुख से माँ ने अपनी प्राणप्यारी पुत्री को शिक्षा दे चुप होते हुए विदा ली ॥१५॥


प्रणम्य जिनदत्तेन ततो व्यावार्त्तिता गृहम् ।
गतास्ते तां कुमारोऽपि लात्वाप स्वपुरं४ क्रमात् ॥१६॥

अर्थ: जिनदत्त ने सास-ससुर आदि को प्रणाम किया और घर लौट जाने के लिए साग्रह प्रार्थना कर अपने नगर की ओर प्रस्थान किया ॥१६॥


[जिनदत्त का अपने घर लौटना]


आयातं तं ततो ज्ञात्वा गत्वा तातो महोत्सवैः ।
पुरं प्रवेशयामास सकान्तमिव मन्मथम् ॥१७॥

अर्थ: जिनदत्त क्रम-क्रम से मार्ग में पड़ाव डालते हुए अपने जन्म स्थान वसंतपुर आ पहुँचे । इनके आगमन की सूचना पाकर इनके पिता सेठ जीवदेव इन्हें लेने के लिए गाँव के बाहर आए और बड़े ठाठ-बाट के साथ रति सहित कामदेव के समान सुशोभित होने वाले जिनदत्त को, वधू सहित नगर में प्रवेश कराया ॥१७॥


विशन्तं तं समाज्ञाय चुक्षुभे प्रमदाजनैः ।
उदितं यामिनीनाथं तरंगैरिव वारिधेः ॥१८॥

मण्डनादिकमुत्सृज्य प्रतिरथ्यं प्रधाविताः ।
काश्चिदन्याः पुनारूढाः प्रासादशिखरावलीः ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 18 से 19): विवाह कर वधू सहित जिनदत्त आए हैं, यह समाचार ज्यों ही नगर में फैला कि नगर की समस्त स्त्रियों में खलबली मच गई ॥१८॥ वे जिनदत्त और उसकी वधू को देखने के लिए लालायित हो अपने-अपने काम-काज छोड़ गलियों में दौड़ीं और मकानों की छतों पर चढ़ने लगीं ॥१९॥


तन्मुखाम्भोज-संसक्त-लोचना कुच-मण्डलम् ।
काचिच्च्युतांशुके दृष्टिं पातयामास पश्यताम् ॥२०॥

अर्थ: जो स्त्रियाँ कौतूहल से इस उत्सव को देख रही थीं उन्हें अपने तन-बदन की भी सुध-बुध न थी किसी का स्तन खुला था और उसे देखने वाले हास्यपूर्ण दृष्टि से देख रहे थे ॥२०॥


वेगतो धावमानान्या स्रस्तमेखलयास्खलत् ।
त्रुटितं हारमप्यन्या गणयामास नोत्सुका ॥२१॥

अर्थ: किसी की भागा-दौड़ी में करधनी टूटकर गिर गई । किसी का हार टूटकर बिखर गया किन्तु उस मिथुन के देखने की धुन में उन्हें इनका भान ही नहीं हुआ ॥२१॥


अन्या जघान तं धीरा कटाक्षैः क्षणमङ्गना ।
चित्रेन्दीवरमालाभि रर्चयन्तीव भक्तितः ॥२२॥

अर्थ: भक्ति से विचित्र नीलकमल की मालाओं के द्वारा पूजा करते हुए की तरह अन्य धीर स्त्रियाँ कटाक्षों के द्वारा क्षणभर में मानों प्रहार ही कर रहीं थीं ॥२२॥


रूपामृतं१ पिबत्यस्य नेत्राञ्जलिपुटैः परा ।
कौतुकं कामसन्ताप-पीडिताजनि मानसे ॥२३॥

अर्थ: कोई अन्य स्त्री उस जिनदत्त के सौंदर्यरूपी अमृत को नेत्ररूपी अञ्जली पुटों के द्वारा पीती है तथा मन में काम के संताप से पीड़ित होती हुई, आश्चर्य को प्राप्त हुई ॥२३॥


अन्योवोचदियं धन्या यस्या जातोऽयमीश्वरः ।
काचिदूचे स्फुटं काम-रतियुग्ममदः२ सखि ! ॥२४॥

अर्थ: और कोई अन्य स्त्री उन वर-वधू को धन्य-धन्य कह रही थी, तो कोई उन्हें काम और रति के जोड़े की उपमा दे रही थी ॥२४॥


समाशशतं सति श्रेष्ठं विलासं सहितामुना ।
भुङ्क्ष्वेति प्रणिगद्यान्या लाजाञ्जलिमवाकिरत् ॥२५॥

अर्थ: किसी अन्य स्त्री ने कहा कि हे कुमार ! इस विमलमती के साथ रहते हुए सैकड़ों वर्ष, योग्य भोगों का उपभोग करो । ऐसा कहकर लाई को अंजलि में भर आशीर्वाद के रूप में ऊपर बिखेर दिया ॥२५॥


मोटनं भञ्जनं जृम्भालस्यप्रेमजलोद्गमम् ।
तन्वन् नारीजनस्यैष प्राप स्वं सोत्सवं गृहम् ॥२६॥

अर्थ: इस जिनदत्त ने नारीजन को मोड़ने, तोड़ने, जंभाई, आलस्य प्रेमरूपी जल के उद्गम को विस्तृत करते हुए, उत्सव सहित अपने घर में प्रवेश किया ॥२६॥


तत्राध्यास्य चतुष्कं स गोत्रवृद्धाङ्गनाकृतम् ।
प्रतीच्छतिस्म मांग्ल्यं कृतपूर्वजिनोत्सवः ॥२७॥

अर्थ: वर-वधू के अपने घर आने पर गोत्र की वृद्धा स्त्रियों द्वारा पूरे गए चौक पर बैठकर जिनेन्द्र की पूजापूर्वक मांग्ल्य विधि को ग्रहण करते हुए सुख से रहने लगे ॥२७॥


ततो निवर्तिताशेष-विवाहान्तविधिः सुधीः ।
तारेश इव रोहिण्या समं रेमे तयानिशम् ॥२८॥

अर्थ: अनन्तर समस्त विवाह की अन्तिम विधि सम्पादित की गई, सम्पूर्ण विधि विधान के बाद कुमार जिस प्रकार रोहिणी के साथ चन्द्रमा शोभित होता है, उसी प्रकार शुभ्र ज्योत्सना के समान सुन्दरी विमलमती के साथ भोग करता हुआ शोभित हुआ ॥२८॥


भुञ्जानस्य सुखं तस्य पञ्चेन्द्रिय-समाश्रयम् ।
जग्मुर्धर्माविरोधेन मुहूर्त्तमिव वासराः ॥२९॥

अर्थ: पञ्चेन्द्रियों के नाना विधि भोगों को भोगता था किन्तु धर्म क्रियाओं का उल्लंघन नहीं करता था अर्थात् धर्मानुकूल गृहस्थ धर्म का सेवन करते हुए उसके दिन मुहूर्त्त के बराबर बीतने लगे।


विमुखो मुखमालोक्य याचकस्तस्य नो ययौ ।
स विवेश सतां चित्ते विनयेन महामनाः ॥३०॥

अर्थ: वह दानियों में सदा अग्रसर था, उसके द्वार से याचक कभी भी खाली नहीं जाते थे। अपने विनय गुण द्वारा महामना जिनदत्त ने सज्जनों के चित्त में प्रवेश पाया था अर्थात् उसकी नम्रता से सत्पुरुष भी उसे हृदय से चाहते थे ॥३०॥


हृदये पद-मासेदुरस्य पौराणिकी-कथाः ।
पररामाविलासाढ्या न जातु विजितात्मनः ॥३१॥

अर्थ: पौराणिक महापुरुषों की चरित्र कथाएँ, इसके हृदय में स्थान बनाये थीं अर्थात् सदा ही महापुरुषों की कथाओं को करता था, विषय भोगों की कथाओं से दूर रहता था। पर स्त्री की कथा वाञ्छा तो स्वप्न में भी नहीं थी। यह मन और इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखता था ॥३१॥


जिनार्चाध्ययनासक्तः प्रभाते मध्यमेऽहनि ।
संयतेभ्यः प्रदानेन स्वकाले भोगसेवया ॥३२॥

यावदास्ते सुखाम्भोधि-मध्यगो बुधवल्लभः ।
तावदस्यान्यदा जाता शिरोऽर्त्तिः सहसा मनाक् ॥३३॥युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 32 से 33): वह सुबह पञ्च परमेष्ठियों की पूजा और शास्त्रों के अध्ययन में लीन रहता हुआ, मध्याह्न में साधुओं को आहार दान देकर और अपने योग्य-काल में भोजन-पान आदि भोगों द्वारा परस्पर अव्याघात रूप से तीनों पुरुषार्थों का सेवन करते हुए, इसके सुख से दिन व्यतीत हो ही रहे थे कि एक दिन अचानक ही इनके सिर में पीड़ा होने लगी ॥३२,३३॥


विनोदाय ततस्तस्य वयस्येन व्यधीयत ।
प्रवृत्ताधीश-पादात-वारणाश्व-विमर्द्दनम् ॥३४॥

अर्थ: उस पीड़ा से जब इनका किसी कार्य में मन न लगने लगा तो इनके मित्रों ने इनके विनोदार्थ अधीश रणशूर पदाति, हस्ति एवं घोड़ों का परस्पर में युद्ध कराना प्रारंभ किया ॥३४॥


देवनं चतुरङ्गाणां रणं वा सजयाजयम् ।
तत्रैव सोऽपि संसक्तः कौतुकात्समजायत ॥३५॥

अर्थ: क्रीड़ा स्थल में ही कौतुहल से वह जिनदत्त भी चारों अंगों की क्रीड़ा में अथवा हार-जीत से सहित युद्ध में आसक्त हो गया ॥३५॥


यावत्तत्रैव सञ्जाता रतिस्तस्य ततः कृतम् ।
धूर्त्तैर्द्यूत-विशेषेषु क्रीडनं धन-लम्पटैः ॥३६॥

अर्थ: जब इस क्रीड़ा में जिनदत्त का चित्त लग गया और उससे उनकी कुछ प्रसन्नता देखी, तो कुछ धनलंपटी धूर्तों ने जुआ खेलना प्रारंभ कर दिया ॥३६॥


अत्यासक्त्या समारब्ध-मधिकं सन्ततं ततः।
हारिताश्च प्रगल्भेन द्रव्यैकादशकोटयः ॥३७॥

अर्थ: बुरी बातों में मन बहुत जल्दी लग जाता है और उनके उपदेशक भी जगह-जगह मिल जाया करते हैं, इसलिए जुआरियों का जुआ देखते-देखते इनका मन भी उसके खेलने में फँस गया, इनके धन की तो कुछ कमी थी ही नहीं जो हारते हुए दुख होता और ऐसे खिलाड़ी नहीं थे जो जीतकर न हारते, इसलिए धीरे-धीरे इन्होंने अपना समस्त धन स्वाहा करना शुरू कर दिया और जिनदत्त ने अपनी ग्यारह करोड़ मुद्राएँ, उसी जुए के खेलने में हारकर जुआरियों को दे डालीं ॥३७॥


कोषाध्यक्षेण तातस्य वारिता धनयाचकाः ।
सप्तकोट्यः समाकृष्टा वल्लभाकोशतस्ततः ॥३८॥

हारितास्तु निषिद्धास्ते याचकाः कोशपालिना ।
गत्वा तैः कथितं तस्य यथा स्वं न हि लभ्यते ॥३९॥

वचनेन ततस्तेषां तुहिनेनेव पंकजम् ।
म्लानौ वदनमेतस्य संहृतं द्यूतकर्म च ॥४०॥

येषा-मशेष-संसार - सौख्य-संपत्ति-शालिनी ।
स्वभुजोपार्जिता लक्ष्मी-र्धन्यास्ते मानशालिनः ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 38 से 41): जब कुमार जिनदत्त की आज्ञा से नौकरों पर नौकर आना शुरु हुए और धन पर धन खर्च होना प्रारंभ हुआ, तो इनके पिता के खजांची को यह बात सहन न हुई । उसे इस बात का पूरा पता लग गया कि इतना धन दुष्कर्म के सिवाय अन्य कार्य में इतने जल्दी खर्च नहीं हो सकता, इसलिए और अधिक धन देना उचित न समझा एवं जिनदत्त के आज्ञाकारियों को धन देने की स्पष्ट मनाई कर दी । जब पिता के खजाने से धन मिलना बंद हो गया और जुआ खेलने का शौक कुछ कम न हुआ, तो जिनदत्त ने अपनी स्त्री के खजाने से धन मंगाना शुरु किया ॥३८॥ और उनको भी हार गया । कोषपाल द्वारा रोके गए याचकों ने जाकर जिनदत्त को सर्व वृतान्त सुनाया कि हमें धन प्राप्त नहीं हुआ। कोषाध्यक्ष ने धन देने से मना कर दिया है ॥३९॥ उनके वचनों को सुनते ही कुमार पर तुषारापात हो गया। जिस प्रकार तुषारापात से कमल म्लान हो जाते हैं, उसी प्रकार इस अपमान से कुमार का मुखकमल म्लान हो गया, उसने द्यूत- क्रीड़ा बंद कर दी और इस प्रकार विचारने लगा ॥४०॥ वस्तुतः इस संसार में वे ही पुरुष धन्य हैं, वे ही धनवान हैं और वे ही सुखी हैं, जो स्वयं अपने बाहुबल से धनोपार्जन करते हैं। वास्तव में उन्हीं की लक्ष्मी सार्थक है और वे ही मानशाली हैं ॥४१॥


[कोषाध्यक्ष द्वारा धन नहीं देने पर जिनदत्त का जुआ से विरक्त हो अपमान का अनुभव करना]


परपुष्टा भवन्त्येव नूनं परिभवास्पदम् ।
सहन्ते हि पिकाः काक-चञ्च्वा घात-कदर्थनम् ॥४२॥

अर्थ: जो पर धन से पुष्ट हैं अर्थात् पराये धन से जीविका चलाते हैं, वे मेरे समान तिरस्कार के पात्र होते हैं। जैसे कोयल अपने बच्चों को काक के घोंसले में रख देती है, काकली उसे पालती है परन्तु जब यथार्थताः प्रकट होती है, तो काकों की चोचों का आघात उसे सहन करना पड़ता है ॥४२॥


प्रसादेन पितुः सर्वं पूर्यते मम वाञ्छितम् ।
तथापीदं मनः खेद-दायकं मानभञ्जकम् ॥४३॥

अर्थ: यद्यपि पिताजी के प्रसाद से मेरे सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं, मुझे किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है, सभी सुख साधन उपलब्ध हैं, तो भी यह जुआ मान-भङ्गकारक असह्य है, मन को दुःखित करने वाला है ॥४३॥


युज्यते नोपभोगाय पुंसा-मुन्नत-चेतसाम् ।
गोमिनी गुरुपत्नीव यार्जिता पूर्वपूरुषैः ॥४४॥

अर्थ: उन्नत चित्त वाले मनस्वियों के लिए पूर्व पुरुषों द्वारा संचित राज-वैभव, गुरु-पत्नी के समान भोगने योग्य नहीं है अर्थात् जिस प्रकार गुरु-पत्नी भोगने योग्य वस्तु नहीं है, उसी प्रकार परार्जित धन भी सत्पुरुषों द्वारा सेव्य नहीं है ॥४४॥


यत्सुतेभ्यः समीहन्ते सन्तः सर्व-प्रकारतः ।
सन्तान-पालनं तत्र हेतु-रर्थार्जनादिभिः ॥४५॥

अर्थ: सज्जन लोग जो पुत्र आदिक को अपने द्वारा तन-मन से उपार्जन किये गए धन से, सर्व प्रकार पोषण करना योग्य बतलाते हैं, उसमें संतान को किसी प्रकार पाल-पोसकर बढ़ाकर देना ही हेतु है ॥४५॥


उदयेनेव यो भानो-र्बन्धूनां मुखपङ्कजम् ।
विकाशि कुरुते नास्य चरितेनापि नुः किमु ॥४६॥

अर्थ: जिस प्रकार नवीन सूर्य के उदय से कमल खिल जाते हैं, उसी प्रकार जिस पुरुष के उत्पन्न होने से, उसके सम्यक्चारित्र से कुटुंबियों के मन प्रफुल्लित न हुए, उस मनुष्य का वह जीवन, वह चारित्र किस काम का ? उससे उसके कुटुंबियों को दुःख होने से कोई फल नहीं होता ॥४६॥


अलीक-व्यसनासक्त-चेतसा मयका पुनः ।
तथाकृतं यथा नाहं शक्तस्तात-मुखेक्षणे ॥४७॥

अर्थ: हाय ! मैंने द्यूत सरीखे निंद्य कर्म में अपना मन लगा, बड़ा ही अनर्थ किया है । इसके बराबर मुझे इस समय कोई भी बुरा कार्य नहीं दिख रहा है । इस कार्य के करने से मैं अपने पिता को किसी भी प्रकार अपना मुँह दिखलाने योग्य नहीं हूँ तथा पिता का मुख भी देखने लायक नहीं हूँ ॥४७॥


एके त एव जीवन्तु सतां मध्ये महौजसः ।
येषां जन्म न संजातं मानभङ्ग-मलीमसम् ॥४८॥

अर्थ: संसार में एक वे ही लोग तो धन्य हैं और वे ही जीवित समझने के योग्य हैं, जिन्होंने अपने जन्म में कभी भी मानभंग का दुख नहीं उठाया ॥४८॥


काले प्रदीयते यच्च विना प्रार्थनया न च ।
दीयते यच्च दुःखेन तददत्तसमं मतम् ॥४९॥

अर्थ: जो द्रव्य नियत समय पर बिना याचना के प्राप्त न होकर याचना से ही प्राप्त होता है और जो दुःखपूर्वक यथाकथंचित्/जिस किसी तरह/जैसे-तैसे मिलता है, वह सब धन अदत्त बिना दिए हुए अर्थात् चोरी के धन समान गिना जाता है ॥४९॥


उक्त्वा न दीयते येषा-मुक्त्वा बहु तथाल्पकम् ।
कालहानिः कृता दाने सन्ति ते प्रेषिता नराः ॥५०॥

अर्थ: जिन लोगों को धन देने का वचन देकर भी धन नहीं दिया जाता है तथा ज्यादा कहकर काल हानि करके कम दिया जाता है, वे लोग सेवक कहलाते हैं। जिस प्रकार कोई अपने नौकरों के मान-अपमान का ख्याल नहीं करता, उसी प्रकार मेरे भी मानापमान का कोई ध्यान नहीं रखा गया ॥५०॥


तावदेव नरो लोके सुराद्रि-शिखरोपमः ।
कस्यापि पुरतो यावन्न देहीति१ प्रजल्पति ॥५१॥

अर्थ: यह मनुष्य संसार में तब तक ही प्रशंसनीय है, जब तक सुमेरुपर्वत की शिखर के समान उच्च है और तब तक ही कीर्तिशाली है, जब तक कि यह किसी के सामने इस तरह के दीन वचन नहीं बोलता, किसी चीज की याचना नहीं करता ॥५१॥


विना धनेन नार्घन्ति२ विमलाः सकलाः क्रियाः ।
विहीना यौवनेनेव सभूषाः पण्ययोषितः३ ॥५२॥

कृतमेतेन तातादि-धनेन मम साम्प्रतम् ।
गत्वा क्वापि करोम्येष धनोपार्जनमुत्तमम् ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 52 से 53): बिना धन के, इस संसार में अच्छे से अच्छे काम भी शोभित नहीं होते । जिस प्रकार वृद्धा-वेश्या चाहे कितना भी गहना पहन ले और बढ़िया-बढ़िया वस्त्र ओढ़ ले परन्तु यौवन के बिना उसकी कोई शोभा नहीं होती । उसी प्रकार निर्धन-गृहस्थ चाहे कैसी भी बढ़िया क्रियाएँ करे, धन के बिना वह कभी लोक में प्रशंसित नहीं होता । इसलिए अब मुझे इस मेरे पिता द्वारा उपार्जन किये गए मध्यम श्रेणि के धन से कोई काम नहीं । मैं कहीं परदेश में जाकर अवश्य ही उत्तम धन पैदा करूँगा ॥५३॥


[धन की महिमा का विचार करते हुए धन कमाने की सोचना]


प्रियामेतां निधायाशु मन्दिरे पितुरुत्सुकां ।
उपायं तं विधास्यामि येन स्यात्कमलामला ॥५४॥

अर्थ: यह जो मेरे साथ अर्द्धांगिनी धर्मपत्नी है, उसे तो इसके पिता के घर छोड़ आऊँगा और मैं तन-मन लगाकर निर्मल लक्ष्मी के उपार्जन करने का उद्योग करूँगा ॥५४॥


विचिन्त्येति ततोऽलक्ष्य-वृत्तिरेष व्यवस्थितः ।
कुतोऽपि ज्ञातवृत्तान्तस्तमाहूय पिताब्रवीत् ॥५५॥

अर्थ: यद्यपि मनस्वी जिनदत्त इस प्रकार के सद्भावों से अपने मन की बात मन में ही छिपाकर रहने लगे, तो भी उनके इस वृतांत का पता उनके पिता को किसी प्रकार लग गया । उन्होंने इन्हें अपने पास बुलाया । पिता की आज्ञानुसार जब जिनदत्त इनके पास आए, तो वे इस प्रकार कहने लगे ॥५५॥


विषण्णोऽसि वृथा वत्स ! किमेवं कुरु वाञ्छितम् ।
धनैरेभिरहं पुत्र ! नाम्नैवैषामधीश्वरः ॥५६॥

निर्भर्त्सितो मया वत्स ! कोषाध्यक्षः सहस्रशः ।
यद्यन्यथा महाबुद्धे ! स्पृशामि तव मस्तकम् ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 56 से 57): हे पुत्र ! तुम क्यों व्यर्थ में दुखी होते हो, तुम्हें जो प्रिय हो, उसे अच्छी तरह पूरा करो । इस धन-धान्य आदि संपत्ति पर मेरा जो अधिकार तुम समझ रहे हो, वह नाम मात्र का है, इस समस्त वैभव के तुम ही अधिकारी हो ॥५६॥ प्यारे पुत्र ! यद्यपि तुमने कोई बात नहीं कही है, तो भी तुम्हारे साथ कोषाध्यक्ष ने जो बर्ताव किया है, उसको मैंने यथावत् सुन लिया है । उसे सुनकर मैंने सैकड़ों और हजारों धिक्कारें खजान्ची को दीं, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है । मैं तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर शपथ खाता हूँ, मैं जो कुछ भी तुमसे कह रहा हूँ, वह अक्षरशः सत्य है ॥५७॥


[पिता जीवदेव द्वारा पुत्र जिनदत्त को शिक्षा देना]


विनोदेनामुना किन्तु कुलकेतो ! न शोभते ।
कृतं हि प्रथमं पुंसां महापापनिबन्धनम् ॥५८॥

अर्थ: परन्तु हे महाबुद्धिमान ! यह विनोद तुम्हें शोभा नहीं देता, तुम कुल की पताका हो, जिन महापुरुषों ने द्यूतक्रीड़ा की है, उन्हें वह महापाप का कारण ही सिद्ध हुआ है, यथा युधिष्ठिर आदि ॥५८॥


कारयाशु जिनेन्द्राणां भवनानि महामते !
सुवर्णरूप्यरत्नैश्च प्रतिमाः पापनाशनाः ॥५९॥

अर्थ: इसलिए यदि तुम्हें इसका उपयोग करना भी अभीष्ट है, तो तुम विशाल जिनेन्द्र भगवान के मंदिर बनवाओ, उनमें पाप विनाशक स्वर्ण, चाँदी और रत्नों से निर्मित मूर्तियाँ स्थापित करो ।


गीतवादित्रनृत्यादि तत्रैव च दिवानिशम् ।
चतुर्विधाय संघाय देहिदानं यथाविधि ॥६०॥

अर्थ: रात-दिन जिनेन्द्र भगवान की गाजे-बाजे के साथ पूजा करो एवं चारों प्रकार के संघ के लिए यथा विधि दान दो ॥६०॥


सिद्धान्त-तर्क -साहित्य-शब्द-विद्यादि-पुस्तकैः ।
लेखयित्वा मुनीनां च दत्वा पुण्यं समर्जय ॥६१॥

अर्थ: मुनियों के लिए सिद्धांत, न्याय, साहित्य, व्याकरण एवं शब्दकोष आदि विद्याओं के शास्त्र लिखवाकर भेट में अर्पण करके पुण्य का समार्जन करो ॥६१॥


कूप-वापी-तडागानि प्रमदादि-वनानि च ।
पुत्र ! सर्वाणि चित्राणि-यथाकामं विधापय ॥६२॥

अर्थ: कलापूर्ण कुए, बावड़ी, तालाब आदि खुदवाओ और विचित्र बाग-बगीचे लगवाओ । इनके करने से तुम्हारी जगद् व्यापिनी कीर्ति होगी और तुम्हारा मन भी रंजित होगा ॥६२॥


विवेश मानसे तस्य न सा शिक्षा विलासिनी ।
यतेरिव परं तेन शुश्रुवेऽधो-विलोकिना ॥६३॥

अर्थ: पिता का यह उपदेश यद्यपि यथार्थ और हितकर था, तो भी जिस प्रकार मुनि के मन में विलासिनी स्त्री का प्रवेश नहीं होता उसी प्रकार वह, पुत्र जिनदत्त के मन में नहीं समाया । अपने विचारों की तरंगों में उस पर कुछ ध्यान न देकर, उन्होंने नीचे मुँहकर मात्र उस उपदेश को सुना ॥६३॥


चिन्तितं च पुनस्तेन नोपलम्भो भविष्यति ।
यथा तथा विधास्यामि किं मे बहुविकल्पनैः ॥६४॥

अर्थ: पुनः उसने कृत दृढ़ निश्चयानुसार यही विचार किया कि इस प्रकार मुझे यथोचित उपलब्धि नहीं होगी । अनेकों विकल्पों से क्या प्रयोजन ? मैं वहीं करूँगा जिसे कि सोचा है ॥६४॥


अनुमन्ये च तां तातभारतीमेवमस्त्विति ।
प्रणम्य तं जगामासौ प्रेयसीसदनं१ ततः ॥६५॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस पिता की वाणी को ऐसा ही हो ऐसा माना और उनको प्रणाम कर वह पत्नी के घर गया ॥६५॥


अभ्युत्थानादिकं कृत्वा तया ज्ञातं मनोगतम् ।
व्यासक्त-मानसं चक्रे सविलास-कथान्तरैः ॥६६॥

अर्थ: विमलमती पति की परिचर्या करने में बड़ी ही चतुर थी । उसे शास्त्रोक्त और लौकिक पत्नी के समस्त कर्त्तव्य मालूम थे इसलिए ज्यों ही वासस्थान आए हुए पति को देखा, तभी उठकर आसनादि प्रदान किया और मन के अभिप्राय को जानकर अशांत मन को विलास से सहित, अन्य पुराण-पुरुषों की कथाओं के द्वारा बहलाने का प्रयास किया ॥६६॥


[जिनदत्त का विमलमति पत्नी से विचार विमर्श]


क्षणान्तरं ततः स्थित्वा तयेति किल चिन्तितम् ।
नयामि किल वेश्म स्व-मेतं वैचित्त्यहानये ॥६७॥

अर्थ: इस प्रकार कुछ क्षण स्थित रहकर उस पतिव्रता ने विचार किया, इनके मन के विषाद को दूर करने के लिए कुछ समय के लिए, अपने पिता के घर ले जाना उचित होगा । क्योंकि वहाँ जाने से स्वयं इनका व्यथित चित्त शांत हो जायेगा ॥६७॥


ऊचे तयार्यपुत्राद्य मयामा भवतो मम ।
पित्रा सुप्रहिता लातुं तत्र किं क्रियतामिति ॥६८॥

अर्थ: प्यारे आर्यपुत्र ! आज मेरे पिता के घर से आप और मुझे दोनों को शीघ्र बुलाने का समाचार आया है । कहिए इसमें आपकी क्या सम्मति है ? जो उचित समझें वह करें ॥६८॥


प्रापयामि पितुर्गेह-मत एव मिषादिमाम् ।
विभाव्येति बभाणे मां, युक्तमेवं वरानने ॥६९॥

अर्थ: समयोचित वार्ता को सुनकर वह भी विचारने लगा, ठीक ही होगा इसी बहाने से इसे इसके पिता के घर छोड़कर, मैं स्वतंत्र अपने कार्य को सिद्ध कर सकूँगा । वह बोला हे सुंदर मुखी ! वस्तुतः तुम्हारा विचार युक्ति संगत है । हमें चम्पा नगरी चलना चाहिए ॥६९॥


आपृच्छ्येति ततस्तात-मनुज्ञातौ गतौ सुखम् ।
परां जनेन संप्राप्तौ चम्पां चारूरु-गोपुराम् ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर वह अपने पिता के समीप गया एवं ससुराल जाने के लिए पूछा । पिता जी ने भी उसके मन बहलाव के उद्देश्य से जाने की आज्ञा दे दी । पिता की अनुमति प्राप्त कर उसे परम-सुख हुआ । कुछ श्रेष्ठजनों के साथ प्रस्थान किया और शीघ्र ही विशाल सुन्दर गोपुरों से शोभित चम्पापुर में जा पहुँचे ॥७०॥


ज्ञातवृत्तस्ततो श्रेष्ठि विमलो मुदितो गृहम् ।
निन्ये स्वयं परं प्रीत्या तत्रास्थाद्दिन-पञ्चकम् ॥७१॥

अर्थ: सेठ विमलचन्द्र को जिनदत्त के मन अशांत होने का कारण पहले से ही मालूम हो चुका था इसलिए उन्होंने अपने जामाता का बड़ा ही सत्कार किया और स्वागतपूर्वक अपने घर ले जाकर उन्हें प्रेम से ठहराया । वे वहाँ अपनी प्रिया के साथ पाँच दिन तक ठहरे ॥७१॥


अन्येद्युर्गतवानेष क्रीडितुं प्रियया सह ।
प्रमदोद्यानमुद्दाम - काम - विश्राममन्दिरम् ॥७२॥

अर्थ: एक दिन वह अपनी प्राण प्यारी के साथ प्रमद नामक उद्यान में क्रीड़ार्थ गया । यह मनोहर विस्तृत एवं सुसज्जित बाग साक्षात् कामदेव के मंदिर के सदृश था ॥७२॥


मञ्जुगुञ्जद्दलिव्रात - बद्धतोरणमालिके ।
मन्दगन्धवहोद्भूत - कामिनीकुन्तलालके ॥७३॥

अर्थ: उसमें विशाल-विशाल काम मंदिर बने थे । सुंदर कर्ण प्रिय शब्द करने वाले भ्रमरों के समूह से वेष्टित अनेक तोरण शोभित हो रहे थे, सुगंधित पवन अपने वेग से कामिनियों के केशों को व घुँघरुओं को चंचल करता था ॥७३॥


सुगन्धकुसुमामोद - मत्तकोकिलकोमले ।
अनल्प-फल-सम्भार - नम्र-सर्व-महीरुहे ॥७४॥

अर्थ: सुगंधित पुष्पों के आमोद सुगन्ध से कोकिलाएँ मत्त हो कोमल गायन करती थीं एवं अनेक फलों के भार से सभी वृक्ष नम्र हो रहे थे ॥७४॥


चिरं चिक्रीड तत्रासौ सर्वेन्द्रियसुखावहे ।
क्रीडाद्रिदीर्घिका-वल्ली - विटपादिमनोहरे ॥७५॥विशेषकं॥

अर्थ: क्रीड़ापर्वत, वापिका, लता एवं वृक्ष आदि से मनोहर, सभी इन्द्रियों को सुख देने वाले उस उद्यान में जिनदत्त ने चिरकाल तक क्रीड़ा की ॥७५॥


भ्राम्यताथ ततस्तेन तत्रादर्शि महौषधिः ।
शिखायां धारिताऽदृश्यं या करोति नरं क्षणात् ॥७६॥

अर्थ: इसके बाद उस जिनदत्त ने वहाँ भ्रमण करते हुए, महान् औषधि देखी जो चोटी में धारण करने से मनुष्य को क्षण में अदृश्य करती है ॥७६॥


अस्ति यद्यपि सर्वाङ्ग-सौख्यं मम निकेतनम् ।
तथापि पितुरुत्सृज्य स्थातुमत्र न युज्यते ॥७७॥

अर्थ: यद्यपि मुझे यहाँ किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं है, सब प्रकार से सब तरह के सुख मिल रहे हैं, तो भी अपने घर को छोड़ ससुर के घर रहना सर्वथा अनुचित है ॥७७॥


अक्षमेयम् वियोगं च सोढुं यद्यपि मामकम् ।
दन्दह्यते तथाप्येष मानभङ्गो मनोऽनिशम् ॥७८॥

अर्थ: हाँ यह अवश्य है कि छाया के समान यह प्रिया मेरा वियोग सहन करने में अशक्य होगी, तो भी मानभङ्ग का कष्ट उससे भी अधिक है, यह अग्नि के समान मेरे हृदय को रात-दिन जला रहा है ॥७८॥


पद्मा न यावदद्यापि विहिता वशवर्तिनी ।
तावदेते विषायन्ते विषया मम सर्वथा ॥७९॥

अर्थ: जब तक लक्ष्मी मेरे अधीन न होगी, मैं धनाढ्य न होऊँगा तभी तक ये भोगे गए विषय, विष के समान ही भयंकर मालूम पड़ेंगे, इसलिए लक्ष्मी को वश में करने के लिए समस्त दुख सह लेना भी योग्य है ॥७९॥


तिष्ठन्तमत्र मां माम कीदृशं किल बुध्यते ।
इत्यादि बहु सम्भाव्य तेनादायि महौषधिः ॥८०॥

अर्थ: यहाँ रहते हुए ससुराल में मुझे मेरे पक्ष के संबंधी कैसा मानते हैं इत्यादि बहुत विचार कर उस जिनदत्त ने वह महान् औषधि ग्रहण कर ली ॥८०॥


शिखाग्रे तां ततो बद्ध्वा भूत्वादृश्यस्ततो नृणाम् ।
जगाम क्वापि साप्येवं विललाप तदुज्झिता ॥८१॥

अर्थ: तत्क्षण उसने उस महान् औषधि को शिखा में बांध लिया और उसी समय अदृश्य हो उपस्थित जनों के देखते-देखते ही कहीं अन्यत्र चला गया तथा परित्यक्ता विमलमती एकाकी विलाप करने लगी ॥८१॥


प्राणनाथमपश्यन्ती सा ददर्श दिशोऽखिलाः ।
तप्तासन्तमसेनेव चक्रवाकीव केवला ॥८२॥

अर्थ: जिनदत्त को न आए जब बहुत देर हो गई और आने की आशा सर्वथा जाती रही, तो विमलमती को बड़ा ही दुख हुआ और मानो अंधकार के द्वारा चकवी के समान वियोग से व्याकुल होती हुई सभी दिशाओं में आशा भरी दृष्टि से देखने लगी ।


त्वद्दृष्टिजीविता नाथ ! त्वत्पाद-कुलदेवता ।
स्वभावप्रेमसंसक्ता हा मुक्तास्मि कथञ्चन ॥८३॥

अर्थ: हाय ! मेरे जीवनाधार नाथ ! ऐ मेरे हृदय मंदिर के आराध्य देव ! हा ! स्वाभाविक प्रेम के भंडार आप कहाँ चले गए ? मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया ? जिससे रुष्ट हो मुझे आपने छोड़ दिया ॥८३॥


[जिनदत्त के वियोग में विमलमति का विलाप]


केलि-लीलां विहायाशु मुखचन्द्रं प्रदर्शय ।
मनःकुमुदमाम्लान-मार्यपुत्र ! विकासय ॥८४॥

अर्थ: नहीं ! नहीं ! आप ऐसे कठोर न थे, अवश्य ही इस समय आप मेरे साथ हँसी कर रहे हैं । प्राणनाथ ! कृपा कर अब आप शीघ्र ही आइए । बहुत हँसी हो चुकी अब और अधिक वह नहीं सही जाती, बिना विलम्ब के मुझे अपना मुखचंद्र दिखाकर प्रफुल्लित कीजिए ॥८४॥


मनो मे नवनीताभं तप्तं विरह-वह्निना ।
विलीनमिव हा पश्चात्-किमागत्य करिष्यसि ॥८५॥

अर्थ: मेरा मन मक्खन के समान कोमल है, वह इस समय आपकी विरहरूपी अग्नि से तपाया जा रहा है, यदि वह सर्वथा विलीन/विदीर्ण ही हो गया, तब फिर आपका आना ही किस काम का होगा, इसलिए हे प्राणनाथ ! शीघ्र आइए और इस संतप्त करने वाली विरहाग्नि को अपने संयोगरूपी जल से बुझाकर शीघ्र शांत कीजिए ॥८५॥


ता लतास्तरवस्ते ते क्रीडागास्ते विहङ्गमाः ।
न जानामि गताः क्वापि दृष्टिं बद्धैव वक्त्रभः ॥८६॥

सस्नेहस्तादृशी प्रीतिश्चाटुकाराश्च ते प्रभो ! ।
विश्रम्भः स च दाक्षिण्यं तदद्य सकलं गतम् ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 86 से 87): हे देव ! वे लताएँ, वे वृक्ष समूह, वे क्रीड़ा पर्वत सरोवर, वे चहकते पक्षी समूह आदि न जाने कहाँ चले गए ? मुझे कुछ भी दृष्टिगत नहीं हो रहा है । मैं तो केवल मात्र आपके मुखचंद्र की ओर ही दृष्टिबद्ध हूँ ॥८६॥ हे प्रभो ! आपको मेरे ऊपर बड़ा ही स्नेह था, बड़ी ही मुझ में प्रीति थी, मुझे बहुत ही अच्छा मानते थे । किसी कारण वश मेरे रुष्ट हो जाने पर, आप सैकड़ों चाटु वचन कहा करते थे, वह विश्वास और दयालुता आज सभी कहाँ चले गये ? ॥८७॥


आश्वासयति मामत्र को विना भवताधुना ।
विरहार्तां विभावर्यां भानुनेव सरोजिनीम् ॥८८॥

अर्थ: आपके बिना मुझे अपना कोई नहीं दिख रहा है । आप मुझको समय-समय पर धैर्य दिलाते थे, परन्तु अब आपके यहाँ न रहने से, मैं रात्रि में सूर्य के बिना कमलिनी के समान शोकग्रस्त हो गई हूँ ॥८८॥


यत्पुरा विहितं नूनं संयुक्तानां वियोजनम् ।
दुःसहोऽयं समायातो विपाकस्तस्य कर्मणः ॥८९॥

अर्थ: अवश्य ही उन्हें किसी ने हर लिया है और वह हरने वाला कोई नहीं, मेरा पूर्वकृत कर्म ही है क्योंकि मैंने पूर्वभव में संयोगी प्रेमियों का वियोग किया होगा, उसका ही यह कुफल है, जो मुझे प्रिय वियोगजन्य दुःख मिला है ॥८९॥


जन्मान्तरेऽपि संभूतिः स्त्रीत्वेन भविता यदि ।
तदाजननिरेवास्तु मा वियोगः प्रियैरमा ॥९०॥

अर्थ: हा ! स्त्री पर्याय बड़ी ही खराब है । इसमें महान् दुःख है । इसके समान निंद्य कोई पर्याय नहीं । इसमें मेरा अब कभी जन्म न हो और यदि किसी प्रकार हो भी जाये तो कुमारी ही रहूँ, जिससे प्रिय का वियोग न हो । संसार में प्रिय-वियोग के समान कोई पदार्थ दुःखद नहीं है, इसलिए इसका न होना ही अच्छा है ॥९०॥


दीयतां दर्शनं पत्युः समस्ता वनदेवताः ।
दुःखसागर-मग्नाया उद्धारः क्रियतां मम ॥९१॥

अर्थ: अयि वन देवताओं ! मुझ पर दया करो, मेरी दीन प्रार्थना की तरफ ध्यान दो । मुझे पति का दर्शन दें और मेरा उद्धार करें । मैं शोक सागर में डूबी जा रही हूँ । मेरी इस अवस्था पर क्या आपको करुणा नहीं आती ? मेरा इस समय सहायक कोई नहीं है । दीन-दुखिया, निःसहाय का सहायक बनना आपका कर्त्तव्य है ॥९१॥


विलापमिति कुर्वाणा सानीता पितुरन्तिकम् ।
सखीजनेन वाष्पाम्भः स्नापितस्तनमण्डला ॥९२॥

अर्थ: इस प्रकार विलाप करती हुई अश्रु जल से नहाए हुए स्तनमण्डल वाली वह विमलमती, सखी जनों के द्वारा पिता के पास लाई गई ॥९२॥


वार्त्तां निशम्य तां तातस्तामाश्वास्याब्रवीददः१ ।
धर्मदानरता पुत्रि ! तिष्ठात्रैव जिनालये ॥९३॥

अर्थ: उस वियोग-वार्ता को सुनकर पिता विमलमती को आश्वासन देते हुए बोले, हे पुत्री ! तुम धर्मदान में लीन रहते हुए यहाँ जिनमंदिर में रहो ॥९३॥


सार्द्धमार्याभिरार्याभिः सखीभिः स्वजनैर्वृता ।
तावत्तिष्ठसुते ! यावत् तदन्वेषण-मारभे ॥९४॥

अर्थ: श्रेष्ठ आर्यिकाओं की संगति करो । अपनी सखियों के साथ धर्म की चर्चा कर और पात्रदान आदि भी किया करो । हम लोग तेरे पति की तलाश में हैं, यदि वे कहीं मिल जाएँगे, तो अवश्य उनका तेरे साथ संयोग होगा ॥९४॥


स्थापयामास तत्रैतां सान्त्वयित्वा समुद्यताम् ।
दाने श्रुते जिनार्चायां वैयावृत्ये यथोचिते ॥९५॥

अर्थ: पिता विमलचंद्र का जब पुत्री विमलमती ने यह सांत्वना भरा उपदेश सुना और उसकी यथार्थता समझी, तो जिस किसी तरह धैर्य धारण किया और जिनपूजा, शास्त्र-पठन, सदुपदेश श्रवण, वैयावृत्यकरण आदि शुभ क्रियाओं में अपना चित्त लगाकर रहने लगी ॥९५॥


[पतिवियोग के बाद पिता द्वारा पुत्री को समझाकर अपने जिनालय में रखना]


गवेषितश्च यत्नेन पक्षद्वयजनैरयम् ।
सर्वतोऽपि च नालोकि ततस्तस्थे यथायथम् ॥९६॥

अर्थ: जिनदत्त के पिता और ससुर पक्ष के पुरुषों ने जब इनकी खोज करना प्रारंभ की और कहीं पता न पाया, तो वे भी विचारे मौन साधकर भाग्य के भरोसे रहने लगे ॥९६॥


अथासौ जिनदत्तोऽपि प्रापद्दधिपुरंपुरम् ।
दृष्टं प्रविशता तत्र तेनोद्यानं मनोहरम् ॥९७॥

अर्थ: जिनदत्त औषधि के प्रभाव से अदृश्य हो चलते-चलते दधिपुर नामक नगर में पहुँचे और वहाँ एक बाहर के विशाल उद्यान को देखा ॥९७॥


तस्य मध्ये विवेशासौ विश्रामाय ददर्श च ।
गुल्मवल्लीद्रुमांस्तत्र सर्वानप्यवकेशिनः ॥९८॥

अर्थ: उस जिनदत्त ने विश्राम के लिए उस उद्यान के मध्य में प्रवेश किया, वहाँ जाकर सभी वल्ली/बेल, लताओं, गुच्छों और वृक्षों को फूल-पत्रों से रहित रुण्ड देखा ॥९८॥


अहो वनमिदं केन हेतुनाभवदीदृशम् ।
क्रियमाणेऽपि सेकादौ यावदित्यमचिन्तयत् ॥९९॥

अर्थ: इस प्रकार की दशा देखकर वह विचारने लगा, अहो ! यह बगीचा सिंचाई आदि किए जाने पर इस प्रकार दुर्दशा को प्राप्त क्यों है ? ॥९९॥


तावत्तत्र समायातः परीतः पत्तिभिः पुरात् ।
जंपानस्थः समुद्राख्यः सार्थवाहो धनाधिपः ॥१००॥

अर्थ: वह इस प्रकार आश्चर्य से सोच रहा था कि उसी समय नगर से परिकर सहित एक धनाढ्य समुद्रदत्त नाम का व्यापारी वहाँ आ पहुँचा, यही इस उद्यान का मालिक था ॥१००॥


अयमाप्राकृताकारः कोऽपि पान्थ इति क्षणम्।
विचिन्त्यावाचि तेनासौ कुतो यूयं समागताः ॥१०१॥

अर्थ: अस्वाभाविक आकृति वाले अज्ञात पुरुष को उद्यान में देखकर, उसने विनय से पूछा हे भद्र ! आप कौन हैं और इस समय कहाँ से आ रहे हैं ? ॥१०१॥


भणितं च कुमारेण भ्राम्यन् भूमि-मितस्ततः।
क्षेमादिकं परीपृच्छ्य ज्ञात्वोत्तमगुणं च तम् ॥१०२॥

उक्तं तेन ततो भद्र दृष्टं वनमिदं त्वया।
अस्ति कश्चिदुपायो वा येनेदं फलवद्भवेत् ॥१०३॥युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 102 से 103): उसके प्रश्नानुसार कुमार ने उत्तर दिया, हे भाई ! पृथ्वी पर इधर-उधर विचरण करता हुआ मैं यहाँ आया हूँ । यह सुनकर उसे उत्तम कुलीन एवं गुणवाला ज्ञातकर कुशलक्षेम पूछी । तत्पश्चात् बोला हे भद्र ! आपने इस उद्यान को देखा क्या कोई उपाय है, जिससे कि यह फलवान हो सके ? ॥१०२,१०३॥


विज्ञाताशेषवृक्षायु - र्वेदोऽवादीदसावदः।
नन्दनाभं करोम्येष विलम्बेन विना वनम् ॥१०४॥

अर्थ: सार्थवाह का प्रश्न सुनकर कुमार ने वृक्ष वनस्पति विज्ञान द्वारा वृक्षों की आयु आदि का विज्ञान लगाया, यह वनस्पति विज्ञान में निष्णात था । अतः कहने लगा-मैं अतिशीघ्र इस वन को


हृष्टात्मना ततस्तेन सामग्री सकला कृता ।
दोहदादिकमादाय कुमारेणापि तत्कृतम् ॥१०५॥

अर्थ (श्लोक 104 से 105): नन्दन वन के समान रमणीक कर दूँगा ॥१०४॥ यह सुनकर उसे परमानन्द हुआ और कुमार के कथनानुसार समस्त साधन-सामग्री लाकर उपस्थित कर दी । कुमार ने अविलम्ब उस सामग्री को लेकर उपवन की काया पलट कर दी ॥१०५॥


पुलकैरिव रागस्य स्तवकैः क्वापि रेजिरे ।
अशोकाः १ कामिनी-पाद-ताडनेन समुद्गतैः ॥१०६॥

विभिदे क्वापि वाणेन वाणेनेव मनोभुवः ।
पुष्पपुंखभृता तत्र वियुक्तानां मनो भृशम् ॥१०७॥

कटाक्षैर्लक्षितः पूर्वं पुरन्ध्रीणां यदादरात् ।
उवाह तिलकस्तेन तिलकत्वं २ वनश्रियः ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 106 से 108): उसमें पहले जो अशोक-वृक्ष सूखे खड़े थे, वे अब कामिनी-स्त्रियों के पाद-ताड़न से उत्पन्न पुलकों के समान गुच्छों से शोभित जान पड़ने लगे ॥१०६॥ जो बाण-वृक्ष रुण्ड मात्र खड़े थे, वे कामदेव के बाण के समान पति, वियुक्त-स्त्रियों के मन को भेदने वाले पुष्प और पंखों से युक्त हो गये ॥१०७॥ जो तिलक-वृक्ष पहले नाम मात्र के ही तिलक थे, वे अब पुश्चली स्त्रियों के कटाक्ष बाणों से आहत हो पुष्पित होने के कारण, वास्तव में वे वन लक्ष्मी के तिलक हो गए थे ॥१०८॥


विचकास कुचाभोग-सङ्गात् कु-रबकः१ स्त्रियः ।
यथा तथा कृतः सोऽपि भृङ्गैः सु-रवकस्तदा२ ॥१०९॥

अर्थ: जो कु-रवक पहले वास्तव में कुत्सित रव करने वाले पुष्प न होने से भद्दे लगने वाले थे, वे ही अब स्त्रियों के स्तन संसर्ग से आहत हो पुष्पित होने के कारण गुंजारते हुए भ्रमरों के शब्दों से, सु-रवक-सुंदर रव/शब्द वाले हो गए ॥१०९॥


प्रमदामद्यगण्डूषो वकुलैर्यः पपे पुरा ।
प्रवृद्ध-कुसुमामोदै-रुद्गीर्ण इव शोभितः ॥११०॥

अर्थ: जो वकुल-वृक्ष पहले बिल्कुल शुष्क (नीरस) थे, वे ही अब प्रमदाओं द्वारा किए गए मद रस के कुल्लों से सींचें गए कुसुमों की सुगंधि से पहले पीए गए मदिरा रस को उगलते हुए के समान जान पड़ते थे ॥११०॥


कृतारार्तिकमाङ्गल्य-दीपकैरिव चम्पकैः ।
विशतो रतिनाथस्य तत्र पुष्पैर्विराजितम् ॥१११॥

अर्थ: जो चंपक-वृक्ष पहले रुंड-मुंड खड़े थे वे पुष्पों से युक्त होने के कारण प्रवेश करते हुए काम के स्वागतार्थ जलाए गए मंगलदीपों के समान शोभित होने लगे ॥१११॥


उत्कर्षो गुणसम्पर्के जातेनाशुचिजन्मना ।
यदाप्तं कुंकुमेनोच्चैः कामिनीमुखमण्डनम् ॥११२॥

अर्थ: जो कुंकुम-वृक्ष पहले अशुचिता से उत्पन्न होने के कारण अस्पृश्य थे, वे ही पुष्पों से सुगंधित हो जाने के कारण अति उत्कर्ष को प्राप्त, कामिनियों के मुखों के श्रृंगार हो गए ॥११२॥


चक्रे कण्टकिभिस्तत्र सरजस्कैः खलैरिव ।
सुगन्धगुणयोगेन केतकैर्मस्तके पदं ॥११३॥

अर्थ: वहाँ उद्यान में कांटों वाली पुष्प परागरूपी धूली सहित और सुगंध रूप-गुण के संयोग से केतकी ने दुर्जनों के समान शिर पर स्थान को धारण किया अर्थात् केतकी के पुष्प फूल गए ॥११३॥


सेकधूपनपूजादि-योग्यं यद्यस्य भूरुहः ।
विधाय तत्तदा तस्य तेनाकारि विदोच्चता ॥११४॥

अर्थ: इसी प्रकार अन्य बहुत से जो वृक्ष खराब हालात में थे, वे जिनदत्त द्वारा अपने-अपने योग्य सिंचन, धूप देना, सत्कार आदि कारणों के मिल जाने से प्रफुल्लित हो गए ॥११४॥


सविभ्रमा कृता तत्र जातपुष्पफलोद्भवा ।
समस्तापि कुमारेण वनस्पतिनितम्बिनी ॥११५॥

माकन्दकलिकास्वाद-कलकूजितकोकिलं ।
सुगन्धि-कुसुमामोद - सुख-लब्ध-मधुव्रतम् ॥११६॥

माधवीमण्डपोपान्त-क्रीडत्कामुकयुग्मकम् ।
नागवल्लीकृताश्लेष - सफलक्रमुकद्रुमम् ॥११७॥

नभोवतीर्णसंभ्रान्त - किन्नरीकलगीतिभिः ।
त्यक्तदूर्वाङ्कुरास्वाद - कुरङ्गक-कदम्बकम् ॥११८॥

लतान्तरचलच्चारु - सारिकाशुकजल्पनैः ।
उत्कर्णचकितानेक-सङ्केतस्थाभिसारिकम् ॥११९॥

तरुमूलसमासन्न - ध्यानासक्ततपोधनम् ।
तद्भक्तिभावितायात - खेचरामरमानवम् ॥१२०॥

नितान्तफलसम्भार - भज्यमानमहीरुहम् ।
रतान्तश्रम-संहार - कारिचारु-प्रभंजनम् ॥१२१॥

तथाविधं तदालोक्य चक्रे चैत्रोत्सवान्सौ ।
पूजयामास सद्वस्त्र-भूषणाद्यैश्च तं सदा ॥१२२॥ (कुलकं)

अर्थ (श्लोक 115 से 122): जिनदत्त द्वारा इस प्रकार जब, वह उद्यान फल और पुष्पों से शोभित कर दिया गया, तो वहाँ आ-आकर सुंदर पक्षीगण किलोलें करने लगे ॥११५॥ आम्र की कलियों के भक्षण करने से मत्त हुई कोकिलाएँ मधुर-मधुर शब्द करने लगीं। सुगंधित पुष्पों की सुगंधि से, भ्रमर सुखकारी मोदवर्धक गुंजार करने लगे ॥११६॥ माधवी लताओं के मंडप में कामी लोग क्रीड़ा करने लगे। नागवल्ली के आलिंगन करने से सुपारी के वृक्ष सफल जान पड़ने लगे ॥११७॥ आकाश से देखने के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए किन्नरियों के गीतों से मृगगण वशीभूत हो दूर्वा भक्षण छोड़ स्तब्ध होने लगे ॥११८॥ लताओं के मध्य सुंदर मैनाएँ चहकने लगीं, तोते भी उनके स्वर से होड़ लगाने लगे। इससे अनेक अभिसारिकाएँ संकेत स्थानों में स्थित सावधान हो कान खड़े कर सुनने लगीं ॥११९॥ वृक्षों के नीचे तपस्वियों को ध्यान में मग्न देख खेचर, भूचर और अमरगण एकत्रित होने लगे ॥१२०॥ अधिक फलों के भार से झुक-झुक कर वृक्षों की डालियाँ टूटने लगीं और रति के श्रम को हरण करने वाली सुंदर पवन बहने लगी ॥१२१॥ जब समस्त उद्यान इस प्रकार मनोहारी हो गया, तो सेठ समुद्रदत्त को अति आनंद हुआ। उसने उसकी खुशी में एक चैत्रोत्सव कराया और जिनदत्त को उसमें सद्वस्त्राभूषण आदि से महा-सत्कार युक्त किया ॥१२२॥


राजादि-जनविख्यातो नारीनेत्रालि-पङ्कजः ।
जिनदत्तोभवत्तत्र जिनधर्मपरायणः ॥१२३॥

अर्थ: वहाँ राजा आदि जनों में प्रसिद्धि को प्राप्त, नारियों के नेत्ररूपी भौरों के लिए कमल स्वरूप जिनदत्त जैनधर्म में लीन/परायण हुआ ॥१२३॥


ततो महात्मा वननायकेन पुत्रः स मेने मदनोपमानः ।
धृतः स्वगेहे गुणरत्नकोशः सर्वज्ञ-धर्मामृतपानपुष्टः ॥१२४॥

अर्थ: तत्पश्चात् सर्वज्ञ प्रभु जिनेन्द्र भगवान के धर्मामृत से पुष्ट, गुणरूपी रत्नों का भण्डार, धर्मशील उस कुमार को वन नायक ने पुत्रवत् अपने घर में स्थान दिया, उसने समझा मेरे घर में साक्षात् कामदेव अवतरित हुआ है, यहाँ वह नाना सुखों का अनुभव करने लगा तथा अपनी धर्मध्यान, साधना में तत्पर रहा परन्तु पराश्रित वृत्ति मनस्वियों को भला कैसे भाती ? ॥१२४॥


अथान्यदा चिन्तितवानितीदं स्थातुं न मे सद्मनि युज्यतेऽस्य ।
न यावदद्याप्यभिसारिकेव कृता भ्रमन्ती स्ववशे मया श्रीः ॥१२५॥

अर्थ: नहीं ! मुझे इस सेठ के घर में रहना बिल्कुल उचित नहीं है । मैं जिस उद्देश्य से परदेश भ्रमण कर रहा हूँ, वह अभी पूरा नहीं हुआ है । वेश्या के समान चंचल लक्ष्मीरूपी स्त्री अभी तक मेरे वश में नहीं हुई है और इसको वश करना, मेरा प्रधान कर्त्तव्य है ॥१२५॥


विना न दानेन समस्ति धर्मः सुपुष्कलेनापि धनेन कामः ।
विना धनं नो व्यवसायतोऽस्ति त्रिवर्गमूलं तदिदं स्वमेव ॥१२६॥

अर्थ: क्योंकि धन के बिना मनुष्य के धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ सिद्ध नहीं हो सकते । अतः न तो इसके बिना मनुष्य दान से धर्म ही उपार्जन कर सकते हैं, न इसके बिना अभीष्ट पदार्थों का संग्रहकर काम ही सिद्ध हो सकता है और न इसके बिना किसी तरह का व्यवसाय कर अर्थ ही उपार्जन कर सकते हैं, इसलिए सबसे पहले तीनों पुरुषार्थों के मूलभूत धन का पैदा करना ही कार्यकारी है ॥१२६॥


[सेठ समुद्रदत्त द्वारा जिनदत्त को अपने घर ले जाना]


अवोचि तेनेति ततः स तातः प्रयच्छ भाण्डं जलयात्रया नः ।
यामो यदादाय विचित्ररत्नं द्वीपं जवात्सिंहलशब्दपूर्वम् ॥१२७॥

अर्थ: जब इस प्रकार जिनदत्त के मन में धन पैदा करने का पूर्वभाव फिर उदय हो आया, तो उन्होंने सेठ समुद्रदत्त से बर्तन और अनेक रत्नों को मांगा और जहाज द्वारा समुद्र यात्रा करते हुए सिंहल द्वीप जाने का विचार प्रकट किया ॥१२७॥


निशम्य तदुदीरितं भणति सार्थवाहो मुदा ।
मयैव सह गम्यतां यदि समस्ति बुद्धिर्धने ॥
ततः प्रगुणिताखिलोचितविचित्रभाण्डैः समं ।
जनैर्बहुविधैरिमौ मुदितमानसौ प्रस्थितौ ॥१२८॥

अर्थ: समुद्रदत्त सेठ ने जब जिनदत्त के उक्त प्रकार से वचन सुने, तो उसने कहा महाभाग ! यदि आपकी धन उपार्जन करने की इच्छा है, तो मेरे साथ क्यों न चलिएगा । मैं भी सिंहल द्वीप में विचित्र-विचित्र बर्तनों को ले शीघ्र ही जाना चाहता हूँ जिसे सुनकर जिनदत्त ने स्वीकार कर लिया और दोनों जन बहुत से मनुष्यों के साथ सिंहलद्वीप की ओर रवाना हो गए ॥१२८॥

चतुर्थ सर्गः

अथ प्राप्तौ पयोराशे-रुपान्तं क्रमयोगतः ।
तावपास्तश्रमौ शीत-वेलावनसमीरौ ॥१॥

अर्थ: सेठ समुद्रदत्त और जिनदत्त व्यापार करने की तीव्र इच्छा से सिंहलद्वीप की तरफ रवाना हो क्रमशः समुद्र की तट भूमि पर पहुँचे । वहाँ शीतल किनारे व वन की वायु ने उनको श्रम रहित कर दिया ॥१॥


कृत्वा पूजादिकं तत्रा-रूढौ पोतं शुभे दिने ।
प्राप वेगात्तटं सोऽपि प्रेरितः शुभ-वायुना ॥२॥

अर्थ: और वहाँ समुद्र तट पर शुभ-मुहूर्त, शुभ-दिन में जिनेन्द्र भगवान की पूजा आदि कर उन्होंने जहाज द्वारा यात्रा करनी प्रारंभ कर दी । जिस दिन इन दोनों व्यापारियों ने समुद्र यात्रा प्रारंभ की, भाग्यवश उसी दिन से हवा उनके अनुकूल बहने लगी । जिससे कि ये अपने समस्त धन-धान्य के साथ सुरक्षित रीति से शीघ्र ही सिंहलद्वीप जा पहुँचे ॥२॥


ततोऽवतीर्य हृष्टौ तौ झगत्येव समागमत् ।
प्रविष्टौ च ततो द्वीपं पूर्वोदितममा जनैः ॥३॥

अर्थ: उसके बाद प्रसन्न होते हुए वे दोनों उतरकर शीघ्र ही मनुष्यों के साथ पूर्व कथित स्थान में सकुशल आ गए और उसके बाद द्वीप में प्रविष्ट हुए ॥३॥


आवासिता जनास्तत्र बहिरन्तर्यथायथम् ।
कुमारः श्रावकमन्यो वृद्धैकस्या गृहे स्थितः ॥४॥

अर्थ: वहाँ पहुँच कर इन्होंने अपने साथ के मनुष्यों को यथायोग्य स्थान पर भीतर और बाहर ठहरा दिया एवं श्रावकाचारी कुमार जिनदत्त सर्वज्ञोपदिष्ट धर्म के गाढ़ भक्त होने के कारण, एक श्राविका


विविक्ताहारपानादि-बुद्ध्या सार्थेशसम्मताः ।
क्रियादिकं ततः कर्तुं प्रवृत्ताः सकला जनाः ॥५॥

अर्थ (श्लोक 4 से 5): सम आचरण वाली वृद्धा के घर में ठहर गए ॥४॥ उसके बाद पवित्र आहार, पानादि की बुद्धि से व्यापारियों के स्वामी समुद्रदत्त सेठ से आदेश को प्राप्त सभी मनुष्य स्नान आदि क्रियाओं को करने में संलग्न हो गए ॥५॥


योऽथ राजा पुरस्तस्य मेघवाहन-संज्ञितः ।
विजया-कुक्षि-सम्भूता तत्सुता श्रीमतीत्यभूत् ॥६॥

प्राप्तापि यौवनं कामा-मोघास्त्रं सौम्यदर्शना ।
सेन्दुमूर्तिरिवांकेन रोगेणातिकदर्पिता ॥७॥

यथा यः सन्निधौ तस्याः कोऽपि स्वपिति याति सः ।
यमवेश्म ततस्तस्यां निर्विण्णाः जनकादयः ॥८॥

अर्थ (श्लोक 6 से 8): जिस नगर में जाकर ये लोग ठहरे थे और जहाँ इन्होंने अपने माल बर्तन-भांडे बेचना चाहे थे, वहाँ का राजा मेघवाहन था, इसकी विजया नाम की एक रानी थी और उससे श्रीमती नाम की एक पुत्री उत्पन्न हुई थी ॥६॥ राजपुत्री श्रीमति उस समय युवावस्था के प्रारंभ में पैर रख चुकी थी, इसका रूप बड़ा सुंदर और सौम्य था परन्तु जिस प्रकार चंद्रमा अल्प कलंक से दूषित होने के कारण निंदनीय गिना जाता है, उसी प्रकार यह भी एक रोग से आक्रांत होने के कारण लोगों को भयंकर मालूम पड़ती थी ॥७॥ और वह रोग यह था कि कोई मनुष्य इसके समीप सोता था, वह ही यमराज के घर का अतिथि बन जाता था, पुत्री की यह अवस्था देख घर के सब माता-पिता आदि इससे विरक्त हैरान/परेशान हो चुके थे ॥८॥


[जिनदत्त द्वारा मेघवाहन राजा की कन्या श्रीमति की व्याधि दूर करना]


प्रासादे सुन्दरे साध्वी सा बहिः स्थापिता ततः ।
अभ्यर्थितश्च भूपेन पौरलोकः सगौरवम् ॥९॥

अर्थ: एक सुन्दर उच्चमहल बनवाकर उसे अलग ही रख छोड़ा था, राजा द्वारा सभी पुरवासियों को सूचित कर दिया गया कि कोई भी इसे नीरोग कर मेरे गौरव का पात्र बने ॥९॥


केनापि पूर्वपापेन ममेयं देहजाजनि ।
आनयामि ततो यावत्-कुतोऽपि भिषजं जनाः ॥१०॥

अर्थ: हे पुरजनों ! मेरे पूर्व जन्म के पाप से एक पुत्री उत्पन्न हुई है और वह भयानक रोग से आक्रांत है, इसलिए जब तक कोई उपयुक्त वैद्य को बुलाता हूँ ॥१०॥


प्रतिसद्मतोऽतो यातु प्रत्यहं चैकमानवः ।
वस्तुमस्या गृहे चैवं सा मेने जनताखिला ॥११॥

अर्थ: तब तक प्रतिदिन प्रत्येक घर से एक मनुष्य श्रीमति राजकुमारी के महल में रहने के लिए भेजा जाये, यह सूचना सभी जनता ने मानी ॥११॥


अथान्येद्युः समागत्य नापितेनेति भाषिता ।
कुमार-सन्निधौ वृद्धा तवाद्याजनि वारकः ॥१२॥

अर्थ: इसी नियम के अनुसार जिस समय जिनदत्त वृद्धा के पास बैठे थे, उसी समय एक नाई आया और वृद्धा को लक्ष्य कर कहा वृध्दे ! राजाज्ञानुसार तुम्हारे पुत्र की आज बारी है। उसे यथासमय तुम राजपुत्री के घर भेज देना ॥१२॥


सा निशम्य वचस्तस्य रुरोद करुणं तथा ।
वयसां शल्यितं चेतो यथाऽङ्गणकणादिनाम् ॥१३॥

अर्थ: और वह वृद्धा उसके वचन को सुनकर करुणापूर्वक रोने लगी जैसे आंगन के कणों का भक्षण करने वाले पक्षियों का कील से बेधित चित्त हो ॥१३॥


हे धातर्भर्तृशून्याहं हताशा दुःखपूरिता ।
सन्दर्शनेन जीवामि सुतवक्त्रस्य केवलम् ॥१४॥

अर्थ: हे भगवन् ! मैं पति विहीन हूँ, मेरी आशाएँ निराशा में परिणत हो चुकी हैं, दुःख से पीड़ित हूँ, तो भी केवल पुत्र का मुख देखने मात्र से जीवित हूँ ॥१४॥


सहते न तदप्येष विधाता विदधे किमु ।
इत्यादि विलपन्ती सा तेनावाचि महात्मना ॥१५॥

अर्थ: इस समय कुटिल भाग्य ने उस पुत्र के साथ भी यह क्या स्वांग रचा है, आज वह भी काल कवलित हो जायेगा । इस प्रकार करुणाजनक रुदन सुनकर वह महामना कुमार इसका कारण पूछने लगा ॥१५॥


समग्र-दुःख-सम्भार - लीला-लुण्टन-लम्पटे ।
मातर्मय्यपि सत्येवं पुत्रे किमिति रोदिषि ॥१६॥

अर्थ: वह बोला-हे माता ! मैं तुम्हारे समस्त दुःखों को नष्ट करने में समर्थ हूँ, मेरे रहते हुए अपने पुत्र के लिए क्यों इस प्रकार विलाप करती हो ? ॥१६॥


अहं तत्र गमिष्यामि त्वं तिष्ठ सुखिताम्बिके१ ।
तयाभाणि युवां पुत्र वाम-दक्षिण-चक्षुषी ॥१७॥

अर्थ: हे माता ! उसे तुम मत भेजो । उसके भेजने की कोई आवश्यकता नहीं । मैं ही वहाँ चला जाऊँगा और राजाज्ञा का पालन करने वाली तुझे बनाऊँगा । जिनदत्त के ये परोपकार परिपूर्ण वचन जब उस बुढ़िया ने सुने, तब वह बोली-बेटा ! वह और तुम दोनों ही मेरे पुत्र हो । जिस प्रकार मनुष्य की दाईं और बाईं दोनों आँखें प्रिय होती हैं । उसी प्रकार मुझे तुम दोनों ही बराबर प्रिय हो ॥१७॥


तत्कस्य सह्यतां नाशः किञ्च कामाकृतिर्भवान् ।
कुलकेतुर्महासत्त्वो मत्प्राणैरपि जीवतु ॥१८॥

अर्थ: मैं तुममें से किसका नाश चाह सकती हूँ बल्कि तुममें ये विशेषताएँ हैं कि तुम मेरे पुत्र से अधिक कामदेव के समान सुंदर व महागुणी कुल के भूषण हो, इसलिए तुम्हें तो अपने प्राण गंवा कर भी मुझे जिलाना इष्ट है ॥१८॥


चिन्तितं च कुमारेण जातेनापि हितेन किम् ।
येनापत्कर्द्दमे मग्ना नोद्धृताः प्राणधारिणः ॥१९॥

अर्थ: संसार में उसी पुरुष का जन्म लेना सार्थक है । वही वास्तव में मनुष्य पर्याय का श्रेष्ठफल प्राप्त करता है, जो कि विपत्तियों से विपन्न लोगों का उद्धार कर उन्हें सुख से संपन्न कर देता है ॥१९॥


स्वफलैः प्रीणयन्त्येव२ पान्थसार्थान् द्रुमा अपि ।
यत्र तत्रोपकाराय यतनीयं न किं नृभिः३ ॥२०॥

अर्थ: मार्गचारी पथिकों को अपने मधुर-रसीले फल प्रदान कर वृक्षगण भी उन्हें संतुष्ट करते हैं तो क्या मनुष्यों के द्वारा मनुष्य का उपकार नहीं किया जाये ? अवश्य ही करना चाहिए ॥२०॥


प्राणनाशेऽपि कर्त्तव्यं परेभ्यः सुधिया हितम् ।
आशाः सुगन्धयत्येव दह्यमानोऽपि चन्दनः ॥२१॥

अर्थ: परोपकार की दीक्षा से दीक्षित हो यदि उसके पालने में प्राण तक भी चले जायें, तो कोई डर नहीं, उसे भंग न होने देना चाहिए । चंदन में यह एक आश्चर्यजनक गुण है, वह स्वयं जलकर भी दिशाओं को सुगंधित कर देता है और अपने परोपकारित्व का ज्वलंत उदाहरण लोगों को देकर भस्म हो जाता है ॥२१॥


स्ववाचा प्रतिपन्ना च जरतीयं मयाम्बिका ।
उपेक्षितुं न युक्तातः सदुःखा सुतजीविता ॥२२॥

अर्थ: जो मैं पहले वृद्धा को वचन दे चुका हूँ, उसके दुःख दूर करने की अटल प्रतिज्ञा कर चुका हूँ । उससे मुझे कभी विचलित न होना चाहिए । अवश्य ही इस दुःखिनी वृद्धा का दुख दूर कर देना, मेरा परम-कर्त्तव्य है ॥२२॥


इत्यालोच्योपरोधेन महता जननी तदा ।
भणितः तेन सावादीन्-महासत्त्वैवमस्त्विति ॥२३॥

अर्थ: इस प्रकार तर्कणा कर उसने स्वयं जाने का आग्रह किया, तब उस वृद्धा माँ ने बहुत कुछ रोकने की चेष्टा की किन्तु उसको दृढ़ निश्चयी देख उसे कहना पड़ा कि हे महाबलवान ! ऐसा ही हो ॥२३॥


ततः स्नातोऽनुलिप्तश्च सर्वाभरणभूषितः ।
पुष्प-ताम्बूल-सद्गन्ध - दिव्य-वस्त्रविराजितः ॥२४॥

वसुन्द-कृपाणाभ्यां भ्राजमान-भुजद्वयः ।
विद्याधर-कुमारो वा१ प्रतस्थे राज -वर्त्मना ॥२५॥ (युग्मं)

अर्थ (श्लोक 24 से 25): बुढ़िया माता की सम्मति पाकर जिनदत्त ने स्नान किया, सुगंधित द्रव्य से शरीर का लेप किया, समस्त आभूषण पहने और पुष्प, पान/ताम्बूल, दिव्यवस्त्र, गंध आदि से सन्नद्ध हो चलने की तैयारियाँ करने लगे । चलते समय साथ में इन्होंने शस्त्र लेना भी योग्य समझा/वसुनंद और कृपाण इन दो शस्त्रों को दोनों हाथ में ले राजपुत्री के महल की ओर चल दिए ॥२४,२५॥


कौतुकाक्षिप्तचेतोभि - र्दृशे सकलैर्जनैः ।
प्रासाद-शिखरारूढ-नारीभिश्च यथा स्मरः ॥२६॥

अर्थ: वीर वेश में सज-धज कर राजमार्ग से जाते हुए युवा जिनदत्त को संपूर्ण मनुष्यों के द्वारा और महलों के शिखरों पर आरोहित नारियों के द्वारा कामदेव के समान देखा गया ॥२६॥


राज्ञाप्यमुं समालोक्य - प्राकृताकारधारिणम् ।
पार्श्वस्थाः गदिताः कोऽयं क्व चायाति महाद्युतिः ॥२७॥

अर्थ: राजा ने भी अस्वाभाविक वेशभूषा को धारण करने वाले इस जिनदत्त को देखकर बगल में बैठे हुए मनुष्यों से कहा-यह महाकान्ति वाला कौन है और कहाँ से आया है ? ॥२७॥


कुमार्याः सदने वस्तु-मिति तैः समुदीरितम् ।
निशम्य स्वं शुशोचासौ धिगस्तु मम जीवितम् ॥२८॥

अर्थ: निकटस्थ जन समूह ने राजा से कहा, हे नृपतिवर ! यह आपकी राजकुमारी के सदन में जाने के लिए आया है यह सुनते ही स्वयं राजा विचारने लगा कि मेरे जीवन को धिक्कार हो ॥२८॥


तनुजाव्याजतः सेयं काल-रात्रिर्गृहे मम ।
अजनिष्ट जगच्छ्रेष्ट - नर-रत्न-विनाशिनी ॥२९॥

अर्थ: हाय ! मुझ सरीखे नीच-पापी-पुरुषों का जीना इस संसार में बड़ा ही निकृष्ट है । मैं राजा नहीं कषायी हूँ, मैंने अपनी पुत्री के छल से इस जगह कालरात्रि बनवा रखी है । हा ! इसमें आकर प्रतिदिन संसार के श्रेष्ठ-श्रेष्ठ पुरुष अपना जीवन सर्वस्व खो देते हैं ॥२९॥


अहो ! प्रकृतिचापल्य - मीदृशं मानुषायुषः ।
येनैषोपि महावीरो रात्रावेव विनंक्ष्यति ॥३०॥

अर्थ: अरे ! यह मनुष्य पर्याय बड़ी ही चंचल है । इसकी आयु बहुत ही कम है । देखो इस समय सबके मन को मोहने वाला यह युवा जो दिख रहा है, वह ही आज रात्रि में काल के गाल में पहुँचकर सर्वदा के लिए आंखों से ओझल हो जायेगा ॥३०॥


अहो श्लाघ्यं कथं राज्यं मादृशां पाप-कर्मणाम् ।
ईदृशामपराधेन विना यत्र विनाशनम् ॥३१॥

अर्थ: राज्य की लोग प्रशंसा करते हैं परन्तु मुझ सरीखे पापकर्मियों के लिए वह सर्वथा निदंनीय है। मैं बड़ा ही अन्यायी हूँ, अपराध होने पर दंड देना लोगों को उचित है परन्तु मैं बिना ही अपराध के प्रतिदिन एक मनुष्य को काल के गाल में पहुँचा देता हूँ ॥३१॥


रक्षात्मानं महाभाग निज-माहात्म्य-योगतः ।
त्वादृशो हि महासत्त्वो दुर्लभो भुवने यतः ॥३२॥

अर्थ: अयि महाभाग ! तू अपनी आकृति से कोई विशेष पुण्यशाली मालूम पड़ रहा है । तू अपने ही प्रभाव से अपनी रक्षा करना । तुझ सरीखे संसार में बहुत कम मनुष्य पाए जाते हैं ॥३२॥


इत्थं सम्भावितो राज्ञा दृष्टिगोचरमाप सः ।
कुमारीभवनं भव्यो भूतसंघातभीतिदम् ॥३३॥

अर्थ: राजा के इस प्रकार विचार करने पर, इतने में ही उस भव्य जिनदत्त ने प्राणी समूह को भय उत्पन्न करने वाले कुमारी के महल को देखा ॥३३॥


आरुरोहततस्तत्र प्रथमां भूमिमुन्नताम्।
आलुलोके च तत्रासौ दिक्कचतुष्कं शनैः शनैः ॥३४॥

अर्थ: उसी समय वह प्रासाद के उन्नत प्रथम भाग में प्रविष्ट हुआ और वहाँ पर उसने धीरे-धीरे चारों दिशाओं का निरीक्षण किया ॥३४॥


द्वितीयस्या-मसौ दृष्टा चारु-पल्यङ्क-सङ्गता।
सविकासविषादिभ्यां दृग्भ्यां द्वारावलोकिनी ॥३५॥

अर्थ: वे उसकी दूसरी मंजिल पर चढ़े और वहाँ सुंदर सेज पर बैठी हुई एक कुमारी को देखा। यह कुमारी उत्सुक खेद-खिन्न चित्तवाली थी। इसके नेत्र विस्तृत किन्तु विषाद युक्त थे और द्वार की तरफ किसी के आगमन की आशा कर देख रही थी ॥३५॥


तत्रालोक्य दिशः सर्वास्तदासन्ने व्यवस्थितः।
स तल्पेऽनल्पकल्याण-भाजनस्थामुवाच सः ॥३६॥

अर्थ: कुमार ने जब इसे देखा तो उन्होंने आकृति से इसे राजपुत्री समझा और इसलिए इसके पास की शय्या पर बैठकर बातचीत करने लगा ॥३६॥


सापि संभाषणत्तस्या१-मंस्तात्मानं मृगेक्षणा।
कृतकृत्यमिवात्मानं हृष्टः सोऽपि तदीक्षणात् ॥३७॥

अर्थ: उस मृगनयनी ने भी बातचीत से उस जिनदत्त को, अभिन्न आत्मीय जनरूप माना। वह जिनदत्त भी उसके देखने से हर्षित होता हुआ, अपने आपको कृतार्थ मानने लगा ॥३७॥


ताम्बूलादिकमादाय तया दत्तं विचक्षणः।
पृष्टः प्रारब्धवानेष कथां कर्णसुधास्पदाम् ॥३८॥

अर्थ: राजकुमारी ने जब इन्हें चतुर और मनोहर पाया, तो तांबूल आदि से इनका आदर-सत्कार किया और रात्रि बिताने की इच्छा से कथा पूछी, कुमार ने राजकुमारी के प्रश्नानुसार सुनने में मनोहारी कथा कहना प्रारंभ किया ॥३८॥


यावत्तस्याः समायाता निद्रा मुद्रितचेतसः।
हुङ्कारस्य विरामेण सुप्तां ज्ञात्वोत्थितश्च सः ॥३९॥

अर्थ: अधिक रात्रि हो जाने से कथा सुनते-सुनते जब राजपुत्री सो गई और हुँकार देना बंद कर दिया तो जिनदत्त अपने आसन से उठे ॥३९॥


चिन्तितं च किमत्राहो मरणे कारणं नृणाम्।
किमेषा पूतना प्रायः किं वा रक्षोविजृम्भितम् ॥४०॥

अन्यद्वास्तु यथाकाम-मप्रमत्तो भवाम्यहम्।
जागरूको न यो लोके तस्करैर्मुष्यते ध्रुवम् ॥४१॥ (युग्मं)

अर्थ (श्लोक 40 से 41): एवं न जाने क्या कारण है ? जो इसके समीप सोने से मनुष्य काल के गाल में फँस जाते हैं ? क्या यह पूतना या किसी राक्षस का काम है ? तथा और कोई भी कारण हो, अब मुझे शीघ्र सावधान हो जाना चाहिए । प्रमाद त्याग कर सजग रहना होगा, क्योंकि जो जागरूक नहीं रहते उन्हें चोर-डाकू निश्चित रूप से ठग लेते हैं ॥४०,४१॥


इत्यालोच्य समानीय मृतकं पृष्ठभूमितः ।
आरोप्य शयनीये च प्रच्छाद्य वरवाससा ॥४२॥

अर्थ: यह विचार कर महल के पीछे की भूमि पर गए और वहाँ से एक मुर्दे को उठाकर ले आए और अपनी शय्या पर ढककर सुला दिया ॥४२॥


प्रदीपच्छायया तस्थौ स्तम्भान्तरितविग्रहः ।
उत्खातधौतखड्गोऽसौ दत्तदृष्टिरितस्ततः ॥४३॥

अर्थ: तथा स्वयं दीपक की छाया में खम्भे से छिपकर हाथ में तलवार ले, सावधान हो ठहर गया । जिनदत्त इस प्रकार चारों तरफ दृष्टि दौड़ा-दौड़ाकर देख रहे थे ॥४३॥


यावत्तावन्मुखे तस्या जिह्वाद्वितयमुद्गतम् ।
कम्पमानं ज्वलद्वह्नि - शिखाभं भयदायकम् ॥४४॥

अर्थ: कि थोड़ी देर बाद राजपुत्री के मुख से एक साथ निकलतीं हुईं, दो जीभें दिखलाई दीं । ये जीभें जलती हुई अग्नि के समान जाज्वल्यमान थीं इधर-उधर लहरा रही थीं और देखने वाले को भय करने वाली थीं ॥४४॥


तदालोक्य स्मितं तेन मनाग्विदित-हेतुना ।
निर्जगाम ततो मन्दं वदनादुद्भटा फणा ॥४५॥

अर्थ: ज्यों हि इन दोनों को कुमार ने देखा त्यों हि अपनी शंका का समाधान होते देख वे मुस्कराए और उत्सुकतापूर्वक सावधानी से उसे देखने लगे, उन दोनों जीभों के बाद एक फण निकला ॥४५॥


क्रमेण च ततः काले कालदण्ड इवापरः ।
निश्चक्राम महाभोगो गुञ्जाक्षो भीष(क्ष)णः फणी ॥४६॥

अर्थ: उस समय दूसरे यम-दण्ड के समान क्रम से विशाल फणधारी गुमची के समान लाल नेत्र वाला भयंकर सर्प निकला ॥४६॥


तत्तल्पतः समुत्तीर्य समारुह्यापरे शनैः ।
दशतिस्म शिरोदेशे यावत्तत्र स्थितं शवम् ॥४७॥

अर्थ: समस्त शरीर निकल आने के बाद वह सर्प कुमारी की शय्या पर से उतरकर धीरे-धीरे पास की शय्या पर गया और वहाँ पड़े हुए मुर्दे को अपने तीक्ष्ण दाँतों से काटने लगा ॥४७॥


तावदागत्य वेगेन निहतोऽहिर्दयोज्झितः(तं) ।
तथा यथा पपातासा-वष्टखण्डो महीतले ॥४८॥

अर्थ: दया रहित सर्प के इस व्यापार से चकित हो जिनदत्त शीघ्र ही उसके पास आए और अपने हाथ की तलवार से उसको पटका/भगाया जिससे भूतल पर गिरते ही उसके आठ टुकड़े हो गये ॥४८॥


भूषाकरण्डिकामध्य-वर्तिनं तं विधाय सः ।
अपनीय शवं कोशस्-थापितासिः सुखस्थितः ॥४९॥

अर्थ: इसके बाद कुमार ने कुमारी की जो पेटी थी उसमें तो उन साँप के टुकड़ों को रख दिया । मुर्दे को दूर हटा अपनी तलवार म्यान में बंद कर ली और स्वयं सुखपूर्वक स्थित हो निश्चिंत हो गये ॥४९॥


कन्यकापि गते व्याधौ सुखिताभूत्कृशोदरी ।
सुष्वाप च समुद्भूत - निराकुलतनुस्तदा ॥५०॥

अर्थ: व्याधि विहीन कन्या भी सुख निद्रा में निमग्न हो गई । वह कृशोदरी आनन्द से सोती रही क्योंकि वेदना का शमन हो चुका था ॥५०॥


प्रबुद्धाथ ततः प्रातः पवनेन धुतांशुका ।
नीलाब्ज-रेणु-गर्भेण रत-क्लम-मुषा स्त्रियाम् ॥५१॥

अर्थ: अथानन्तर नीलकमलों की पराग से मिश्रित स्त्रियों की रतिक्रीड़ा के खेद को हरने वाली प्रातःकालीन वायु से कम्पित वस्त्र वाली वह बाला जाग गई ॥५१॥


उत्थिता चिन्तयामास किमिदं ननु कारणम् ।
सुखितानि ममाङ्गानि येनाभूदुदरं लघु ॥५२॥

अर्थ: उसी समय राजकुमारी की निद्रा भंग हुई, आज उसे तन्द्रा नहीं थी अपितु स्फूर्ति थी, वह विचारने लगी क्या कारण है कि मेरे समस्त अङ्गों में सुख का संचार हो रहा है, उदर भी हल्का हो, पतला हो गया ॥५२॥


उत्साहः कोऽपि सम्पन्नो गतो व्याधिर्दुरन्तकः ।
दुःखान्त-दायको नून - मयञ्चात्र महाद्भुतः ॥५३॥

अर्थ: मेरी दुःखदायक बीमारी चली गई, उत्साह भी आज अन्य दिनों से अधिक है और इस विषय में दुख के अन्त को देने वाला यह महान् आश्चर्यकारी कुमार ही है ॥५३॥


सत्येव नृत्वसामान्ये केचिदेवंविधा भुवि ।
परोपकारिणः सन्ति ग्रहाणां भानुमानिव ॥५४॥

अर्थ: अहा ! इस संसार में यद्यपि सकल-सूरत में सब मनुष्य प्रायः एक समान दिखते हैं परन्तु उनमें गुणी, परोपकारी विरले ही होते हैं, जिस प्रकार समस्त ग्रह एक से हैं परन्तु उनमें जो सूरज की महिमा है, वह किसी की नहीं है ॥५४॥


किंचास्य दर्शनादेव ममानन्दस्तथाजनि ।
यथामृतरसेनेव संसिक्ता सर्वतस्तनुः ॥५५॥

अर्थ: वस्तुतः इस विभूति रूप मानव को देखते ही मुझे इतना आनंद हुआ मानो अमृत रस से ही मेरा सम्पूर्ण शरीर अभिसिंचित कर दिया गया हो ॥५५॥


विचिन्त्येति पप्रच्छासौ प्राञ्जलिर्जनवल्लभम् ।
सस्मिता तं सलज्जा च प्रसन्नाधीरलोचना ॥५६॥

अर्थ: इसके बाद उस जनप्रिय जिनदत्त कुमार से राजकुमारी ने अपनी निरोगता से प्रसन्न हो, लज्जाभरी दृष्टि से हाथ जोड़कर पूछा ॥५६॥


नाथानुमानतो ज्ञातो-नुभावस्तव यद्यपि ।
किं वृत्तमद्य यामिन्यां तथापीदं निवेदय ॥५७॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! यद्यपि मैं यह समझती हूँ कि वह सब नीरोगता आदि आपकी कृपा का फल है, तो भी रात्रि में जो कुछ वृतांत हुआ, उसे सुनाकर मुझे कृतार्थ कीजिए ॥५७॥


तेनावाचि त्वमेवात्र विज्ञा सुतनु ! किं ब्रुवे ।
जानामि किन्तु वक्त्रात्ते श्रोतुं चेतः समुत्सुकम् ॥५८॥

अर्थ: उस जिनदत्त ने कहा- हे सुन्दरी ! इस विषय में क्या कहूँ ? तुम ही विशिष्ट ज्ञानवाली हो। तब राजकुमारी बोली- मैं जानती हूँ परन्तु तुम्हारे मुख से सुनने के लिए चित्त अति उत्सुक है ॥५८॥ हे मोहिते ! यदि ऐसा है तो स्वयं की आभूषणों की पेटी खोलकर देखो, राजकुमारी ने ज्यों ही


यद्येवं दृश्यतां मुग्धे स्वालङ्कारकरण्डिका ।
तामुद्घाटयते यावत् तावद्दृष्टो भुजङ्गमः ॥५९॥

अर्थ: पिटारी खोली, त्यों ही उसमें सर्प देखा ॥५९॥


सर्प सर्पेति जल्पन्ती सा ततोऽपसृता जवात् ।
मा भैषीरिति तेनोक्तं विशालाक्षि ! विचेतनः ॥६०॥

अर्थ: निरीक्षण करते ही ओह ! सर्प-सर्प, इस प्रकार चीखती हुई उससे शीघ्र ही दूर भागी । हँसकर कुमार ने कहा हे विशाल नयने ! डरो मत वह तो अचेतन है ॥६०॥


विश्रब्धायास्ततस्तस्या-स्तेनाकथि यथाविधिः ।
वृत्तान्तं स्तिमिताक्षी सा-श्रौषीद्विधुवती शिरः ॥६१॥

अर्थ: उसके बाद इस कन्या के विश्वास को प्राप्त होने पर उस जिनदत्त ने विधिपूर्वक वृत्तान्त को कहा, उस स्थिरलोचना ने शिर को हिलाते हुए सुना ॥६१॥


अन्तरेऽत्र समायातः तदुदन्त-बुभुत्सया ।
तदध्यक्षस्तथालोक्य समुवाच महीपतिम् ॥६२॥

अर्थ: जिनदत्त राजपुत्री को रात्रि का वृतांत सुना ही रहे थे कि इसी बीच में महल का अध्यक्ष वृतांत जानने के लिए आया और इनका समस्त समाचार जानकर उसने राजा से निवेदन कर दिया ॥६२॥


यथा वर्द्धस्व राजेन्द्र दृष्ट्या दोषविवर्जिता ।
अभूत्सुता महावीरः कुशली स च तिष्ठति ॥६३॥

अर्थ: हे राजेन्द्र ! आप वृद्धि को प्राप्त होवें, राजश्री बढ़े, देखो आपकी पुत्री रोग मुक्त हो गई और वह महाबलशाली कुमार कुशलतापूर्वक है ॥६३॥


इत्याकर्ण्य जगामासा दत्वास्मै प्रचुरं धनम् ।
आरुह्य हस्तिनं वेगाज्जनैः कतिपयैरसौ ॥६४॥

अर्थ: उस राजा ने इस प्रकार के समाचार सुनकर उस गृहरक्षक को अत्यधिक धन दिया और वह शीघ्रता से हाथी पर सवार हो कुछ लोगों के साथ पुत्री के पास गया ॥६४॥


अभ्युत्तस्थे कुमारेण दृष्टिगोचरमागतः ।
भूपस्तेनापि हृष्टेन सप्रसादं विलोकितः ॥६५॥

अर्थ: राजा को अपने पास आता देख उसके सत्कार के लिए जिनदत्त उठे और हर्षित राजा ने भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से प्रसन्नता के साथ देखा ॥६५॥


उपविष्टस्ततो राजा तां ददर्श स्व-देहजाम्१ ।
स्वर्भानुनेव२ निर्मुक्तां पार्वणेन्दु-तनुं यथा ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर संतुष्ट एवं प्रमुदित बैठे हुए राजा ने अपनी पुत्री को रोग रहित देखा मानो राहु के ग्रास से बचकर पूर्णिमा का चाँद ही उदित हुआ हो ॥६६॥


मुहुर्मुखं तनूजाया मुहुस्तस्य महामतेः ।
तृप्तिं जगाम नो पश्यंस्तदानीं नरनायकः ॥६७॥

अर्थ: वह विस्मय से स्फारित नेत्रों द्वारा कभी पुत्री को और कभी कुमार को बार-बार देखने लगा । उस महात्मा कुमार को बारम्बार निहार कर उसे तृप्ति ही नहीं हो रही थी ॥६७॥


पप्रच्छ च महाबुद्धे किमद्याजनि चेष्टितम् ।
रात्रावत्र कुमारेण दर्शितं पन्नगादिकम् ॥६८॥

अर्थ: विस्मय से आतुर राजा ने आश्वस्त हो, कुमार से निवेदन किया- हे महाबुद्धिमान् ! आज रात्रि को यहाँ क्या घटना हुई, किस प्रकार आप जयशील हुए, कन्या रोग-मुक्त किस प्रकार की इत्यादि प्रश्न पूछे ? उत्तर में विनम्र कुमार ने भी रात्रि में घटित घटना के साथ पेटी/करण्डी में स्थापित नागराज के शव को दिखाया एवं किस प्रकार तलवार के वार से उसे प्राण विहीन किया इत्यादि वृतान्त ज्ञात कराया ॥६८॥


कथितञ्च ततः सर्वं कुमार्या जनकाय तत् ।
अहो चित्रमसम्भाव्यं विधेर्विलसितं भुवि ॥६९॥

अर्थ: उस समय कुमारी, राजा से कहने लगी अहो ! संसार में भाग्य की लीला बड़ी विचित्र है, शुभरूप भाग्योदय होने पर असम्भव कार्य भी सुलभता से सम्भव हो जाते हैं ॥६९॥


उपकारः कृतोऽनेन सोऽयं मम महात्मना ।
कुलकीर्त्तिः प्रतापो मे राज्यं येनाशु दीपितम्१ ॥७०॥

अर्थ: इस महा पुण्यशाली सत्पुरुष ने मेरा महान् उपकार किया है, इसने मेरी कुलकीर्ति, प्रताप और राज्य की रक्षा की है । आज मेरा राज वैभव और जीवन इसके द्वारा प्रकाशित हुआ है ॥७०॥


ददाम्यस्मै सुतामेनां वल्लीमिव मनोभुवः२ ।
अतोऽपि गुणसम्भार-भूषितः को भविष्यति ॥७१॥

अर्थ: उपर्युक्त भावों से अभिव्याप्त राजा विचार करता है, यह मेरी कन्या कामदेव की लता के समान है, इसे इस कुमार को ही देना चाहिए । भला इससे बढ़कर इस पुत्री की शोभा बढ़ाने वाला और कौन गुणों का भण्डार नररत्न होगा ? ॥७१॥


कुमारस्य मुखे न्यस्ता संहृता तरला स्थिरा ।
अलक्षप्रसरा दृष्टि-र्यथास्याश्च विकासिनी ॥७२॥

अर्थ: इसके सिवा इस मेरी पुत्री की लालसा भी, इस युवा के साथ विवाह करने की मालूम पड़ रही है। देखो ! जिस प्रकार अन्य लोगों की दृष्टि इस कुमार के मुख पर पड़ रही है, उससे एक भिन्न प्रकार की विकसित और कुछ संकोच को प्राप्त इसकी दृष्टि भी इसके मुख की ओर है ॥७२॥


यथा गण्डस्थलोद्भूता मन्दाः स्वेदोदविन्दवः ।
म्लानरागाः समुच्छ्वासै-र्यथा वाधरपल्लवः ॥७३॥

वाग्वृत्तिः स्खलिता कम्प-रोमांचोऽसावधानता ।
सखीष्वस्यास्तथा व्यक्तं कुमारेऽजनि मानसम् ॥७४॥विशेषकं॥

अर्थ (श्लोक 73 से 74): कुछ-कुछ सूक्ष्म पसीने की बूँदें भी इसके गंडस्थल पर चमक रही हैं । गर्म-गर्म उच्छ्वासों से इसके अधरपल्लव भी म्लान हो रहे हैं । वाणी के भी बोलने में स्खलना खासी प्रतीत हो रही है । कंपन, रोमाञ्च भी इसके शरीर में उत्पन्न हो रहे हैं, यह अपनी असावधानता भी प्रकट कर रही है । इसके सिवा इसकी सखियों में भी इस बात की यथेष्ट चर्चा हो रही है इसलिए भी कुमार में इसके आसक्त होने की मानसिकता मालूम पड़ती है ।७३,७४।।


यथा चिन्तितमेवेदं सम्पन्नं मम साम्प्रतम् ।
समाकृष्टोऽथवा पुण्यै-रयमस्याः समागतः ॥७५॥

अर्थ: अस्तु ! चाहे जो कुछ हो जैसा मैंने अपने मन में विचारा था वैसा ही यह वर मेरी पुत्री के पुण्य से आकृष्ट हो यहाँ आ गया है ॥७५॥


तथा प्रत्युपकारोऽय-मेतेनास्य भविष्यति ।
कन्यरत्नमिदं चैतत्-सम्बन्धेनैव बन्धुरम् ॥७६॥

अर्थ: मैं समझता हूँ इसके उपकार का प्रत्युपकार अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकता, कन्यारत्न समर्पण करने से ही हो सकता है, फिर यह जोड़ी सुंदर भी है ॥७६॥


विधिरैवाथवा विश्व-वैचित्र्यं विस्मयावहम् ।
विदधाति नरस्तत्र केवलं याति साक्षिताम् ॥७७॥

अर्थ: चित्र-विचित्र पदार्थों के संयोग कराने वाले भाग्य ने ही संबंध रचा है, वह ही इस विवाह विधि को भी पूरी करेगा क्योंकि सबका कर्ता-धर्ता विधि (कर्म) ही है, मनुष्य तो केवल उसमें साक्षी के बतौर पड़ जाता है ॥७७॥


इत्यादि बहु सम्भाव्य कुमाराय कृशोदरी ।
वितीर्णा भूभुजा तस्मै सोऽप्यमस्तोपरोधतः ॥७८॥

अर्थ: राजा मेघवाहन ने इस प्रकार ऊहापोह कर अपना मंतव्य स्थिर कर लिया और अपनी पुत्री का शुभ-मुहूर्त में कुमार जिनदत्त के साथ विवाह कर गुणज्ञता का परिचय दिया ॥७८॥


विधाय विधिना तस्याः कुमारः पाणिपीडनम् ।
पंचेन्द्रियसुखं तस्थौ भुञ्जानः सहितस्तया ॥७९॥

अर्थ: शुभ-मुहूर्त, लग्न और दिन में नृपति ने अपनी कन्या का उस बुद्धिमान, गुणशाली, रूपयौवन सम्पन्न कुमार के साथ उल्लास पूर्वक पाणिग्रहण-संस्कार कराया । कुमार भी उस अनिंद्य सुन्दरी राजकुमारी को पाकर संतुष्ट होता हुआ, पाँचों इन्द्रियों के सुखों को भोगता हुआ ठहर गया ॥७९॥


छायेव सापि तस्याभू-दविभिन्ना मनस्विनः ।
चक्रे तेनापि विज्ञात-जैनधर्मक्रमादिति ॥८०॥

अर्थ: उस मनस्वी जिनदत्त की वह राजकुमारी भी छाया के समान अभिन्न रूप हो गई, जिनदत्त जैनधर्म के प्रबल पंडित थे । इन्होंने उसे भी सर्वज्ञप्रणीत धर्म से संस्कारित करना चाहा इसलिए मिथ्यात्व के त्यागपूर्वक वे उसे वास्तविक सद्धर्म का इस प्रकार उपदेश देने लगे ॥८०॥


मिथ्यात्वं त्यज तन्वंगि संसारार्णवपातकम् ।
भज भव्य-जनाभीष्टं सम्यक्त्वं मुक्ति-हेतुकं ॥८१॥

अर्थ: एक दिन कुमार समझाने लगा, हे कृशांगी ! तुम मिथ्यात्व का त्याग करो, यह मिथ्यात्व संसाररूपी सागर में डुबोने वाला है । सम्यग्दर्शन समस्त अभीष्टों की सिद्धि कराने वाला, मोक्ष का कारण है, तुम इसे धारण करो ॥८१॥


अदेवे देवताबुद्धि - रगुरौ गुरु-सम्मतिः ।
अतत्त्वे तत्त्वसंस्था च तथावादि जिनेश्वरैः ॥८२॥

अर्थ: अदेव/कुदेव में देव बुद्धि रखना अर्थात् रागी/द्वेषी देव को सच्चा देव मानना, आरम्भ, परिग्रही, विषय कषायी कुगुरु/अगुरु को सच्चा गुरु मानना, अतत्त्व में तत्त्व की श्रद्धा करना यह मिथ्यात्व है ऐसा जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहा गया ॥८२॥


सुभ्रु ! विभ्रान्त-चेतस्का देहिनो देवतादिषु ।
वासयन्ति हि सप्तापि नरकाणि निरन्तरम् ॥८३॥

अर्थ: संसार में जो प्राणी देवता आदि के विषय में इस प्रकार भ्रान्त चित्त हैं अर्थात् विपरीत मान्यता रखते हैं, वे निरन्तर सातों नरकों के पात्र होते हैं ॥८३॥


लोकद्वयेऽपि यानीह सन्ति दुःखानि सुन्दरि ।
जायते भाजनं जन्तुस्तेषां मिथ्यात्व-मोहितः ॥८४॥

अर्थ: हे सुन्दरी ! इहलोक और परलोक में जितने भी दुःख हैं, विपत्तियाँ हैं, वे सर्व संकट प्राणियों को मिथ्यात्व के उदय से होते हैं ॥८४॥


निःशेष-दोष-निर्मुक्तो मुक्तिकान्ता-स्वयम्बरः ।
लोकालोकोल्लसज्ज्ञानो देवोऽस्तीह जिनेश्वरः ॥८५॥

अर्थ: हे प्रिये ! सुनो जिनमें जन्म-मरणादि सम्पूर्ण दोष नहीं हैं, अपने केवलज्ञान द्वारा लोकालोक को युगपत् देखते-जानते हैं एवं मुक्तिरमा के स्वयंवर मण्डप-समवशरण में विराजमान हैं, वे ही यथार्थ-सच्चे देव हैं ॥८५॥


अन्ये ततो विशालाक्षि ! रागद्वेषादिकल्मषैः ।
दूषिता न भवन्त्याप्ताः कृतकृत्या विरागिनः ॥८६॥

अर्थ: हे दीर्घ नेत्रे ! उनसे भिन्न राग-द्वेष आदि मल से मलिन कदापि देव नहीं हो सकते क्योंकि जो विरागी कृतकृत्य और सर्वज्ञ हैं वह ही आप्त हो सकते हैं अन्य नहीं ॥८६॥


अतस्त्रिधा प्रतीहि त्वं देवानामधिदैवतम् ।
चराचरजगज्जन्तु-कारुण्यं स्वामिनं जिनम् ॥८७॥

अर्थ: इसलिए तू ! देवताओं में सर्वश्रेष्ठ वीतरागी जिनेन्द्र भगवान को ही मन, वचन और काय से सर्वथा श्रद्धानकर । वे ही चराचर समस्त जगत के ज्ञायक हैं, छोटे से लेकर बड़ों तक सब पर दया करने वाले हैं और सबके स्वामी हैं ॥८७॥


धर्मस्तद्वदनाम्भोज - निर्गतः सुगतिप्रदः ।
यस्य मूलं समस्तार्थ-साधिका करुणा मता ॥८८॥

अर्थ: उपर्युक्त गुण वाले जिनेन्द्र भगवान द्वारा जो धर्म उपदेश दिया गया है, वह ही सुगति प्रदान करने वाला है, उसी से जीवों के समस्त अभीष्टों की सिद्धि होती है। उस धर्म की प्रधान कारण/आधारशिला, दया है ॥८८॥


कृतं किमपि पूर्णेन्दु-वदने ! दयया समम् ।
विद्धं रसेन वा ताम्रं सर्वकल्याणकारकम् ॥८९॥

अर्थ: हे पूर्णचन्द्रमुखे ! क्या दया के समान कुछ भी कार्य करने योग्य है ? जैसे रस से व्याप्त ताँबा पूर्णरूप से स्वर्णरूप करने वाला होता है, उसी प्रकार दया से युक्त धर्म सभी प्राणियों का कल्याण करने वाला होता है ।


उद्देशाद्देवतादीनां कृतोऽपि प्राणिनां वधः ।
नरकाय गुडोन्मिश्रं विषं मारयते न किम् ॥९०॥

अर्थ: हे देवी ! सुनो, देवता आदि के उद्देश्य से किया हुआ प्राणियों का वध भी प्राणियों को नरक का कारण होता है । क्योंकि विष मिश्रित गुड़ क्या प्राणनाशक नहीं होता ? प्राणघातक ही होता है । उसी प्रकार धर्म के नाम पर की गई हिंसा भी दारूण नरक यातना देनी वाली होती है ॥९०॥


जायते येन येनेह हेतुनासुमतां हतिः ।
तत्तद्वर्जय बाले ! त्वं येन स्यान्निस्तुषो वृषः ॥९१॥

अत्र चामुत्र सौख्यानि भुञ्जते यानि देहिनः ।
कृपाकल्पलता तानि सूते सर्वाणि सेविता ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 91 से 92): हे बाले ! जिन-जिन कारणों से जीवों की हिंसा होती है, उन-उन कारणों को छोड़ो, जिससे अहिंसामयी सारभूत सद्धर्म की प्राप्ति हो ॥९१॥ संसार में प्राणियों को जो कुछ भी सुख मिलता है, वह सब दयारूपी कल्पलता के सेवन का फल है ॥९२॥


वितस्त्या१ मीयते जातु नभो भूरङ्गुलैरियम् ।
शक्याः सुमुखि ! संख्यातुं न गुणाः करुणाश्रयाः ॥९३॥

अर्थ: जिस प्रकार वितस्ती से आकाश व अङ्गुलियों से पृथ्वी को नहीं नापा जा सकता, उसी प्रकार इस दया के सहारे से होने वाले गुणों की गिनती नहीं हो सकती ॥९३॥


करभोरु ! परित्यज्य प्राणित्राणं न विद्यते ।
धर्मः शर्मकरः प्रोक्तो न च सोऽन्यैर्जिनेन्द्रतः ॥९४॥

अर्थ: प्राणियों के ऊपर दया करने से बढ़कर कोई दूसरा श्रेष्ठ धर्म नहीं है और यही बात जिनेन्द्र भगवान ने कही है, हम चाहे कितने भी अन्य धार्मिक अनुष्ठान करें और क्रिया पालें परन्तु दया रहित होने पर सब निष्फल हैं ॥९४॥


नानानुष्ठानयुक्तापि नादया शस्यते क्रिया ।
कामिनीव धृताशेष-भूषणा कुलटा किल ॥९५॥

अर्थ: जिस प्रकार नाना गुण और वस्त्राभूषणों से सुसज्जित भी कुलटा स्त्री, एक शीलगुण के अभाव से लोक में श्रेष्ठ नहीं गिनी जाती, उसी प्रकार समस्त धार्मिक क्रियाकलाप एक दया गुण के न होने से प्रशंसित नहीं होते ॥९५॥


भवभोगशरीराणा-मसारत्वं विबुद्ध्य२ ये ।
सन्त्यज्य तृणवल्लक्ष्मीं नैर्ग्रन्थ्यै३व्रतमाश्रिताः ॥९६॥

प्राणात्ययेऽपि नो येषां जीवहिंसा वचोऽनृतम् ।
चुरा४ रामारिरंसा५ वा जिघृक्षा६ हृदि जायते ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 96 से 97): जो महात्मा पुरुष इस संसार की वास्तविक दशा का परिज्ञान कर संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हो गए हैं, जिनको शरीररूप ढांचे में भी प्रीति नहीं रही है, जो तृण के समान अपनी समस्त लक्ष्मी को छोड़कर निर्ग्रन्थ-व्रत धारण कर जीवन बिता रहे हैं, जो अपने प्राणों के नष्ट होने पर भी


लाभालाभारिमित्रेषु लोष्ठकाञ्चनयोरपि ।
समभावाः सुखे दुःखे निस्पृहाः स्वतनावपि ॥९८॥

अनेकजन्मसंभूतं पापपङ्कं शरीरिभिः ।
यत्पादपद्मसत्तीर्थ सेवया क्षाल्यते क्षणात् ॥९९॥

भुञ्जते पाणिपात्रेण शेरते भुवि वासते ।
वनादौ विधिवद्धं सं-ध्यानेनाध्ययनेन च ॥१००॥

ये करालम्बनं सम्यक् संसारार्णव-मज्जताम् ।
जगतां जातरूपास्ते गुरवो गजगामिनि ॥१०१॥कुलकं॥

अर्थ (श्लोक 96 से 101): कभी अन्य जीवों की विराधना नहीं करते, जो मिथ्या वचनों का बोलना गर्ह्य समझते हैं, जिनके दूसरे की बिना दी हुई वस्तु ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा है, जो स्त्रियों के सहवास/भोग से विरक्त हो चुके हैं, जो मुनि अवस्था के योग्य पिच्छी, कमंडलु से अतिरिक्त परिग्रह रखने के त्यागी हैं । जो लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, स्वर्ण-पाषाण/लोष्ट-कांचन और सुख-दुःख में समान भाव रखने वाले हैं और जो अपने शरीर में भी इच्छा रहित हैं । जिनके पाद-पङ्कजरूपी तीर्थ के सेवन करने से प्राणियों के अनेक जन्मों में संचित पाप-पङ्क क्षणभर में धुल जाते हैं, जो पाणिपात्र में भोजन करते हैं, पृथ्वी पर सोते हैं, नियमपूर्वक समीचीन ध्यान से अध्ययनपूर्वक जंगल आदि एकान्त स्थानों में निवास करते हैं। हे गजगामिनी ! जो संसार-सागर में डूबते हुए जगत् के प्राणियों को सच्चे हस्तावलम्बन हैं, जन्मे हुए बालक के समान निर्विकार दिगम्बररूप को धारण करने वाले, वे सच्चे- गुरु होते हैं ॥९६, ९७,९७,९८,९९,१००,१०१॥


कामक्रोधमदोन्माद-मोहान्धा विषयाधिकाः ।
यान्तो नयन्ति भक्तांस्तु गुरुत्वेनाध एव हि ॥१०२॥

अर्थ: काम, क्रोध, मद, उन्माद, मोह से अंधे, विषयों में अति आसक्त कुगुरु, भक्तों को अत्यधिक पाप के भार से नीचे ले जाते हैं अर्थात् ऐसे कुगुरु, भक्तों को नरक आदि दुर्गंतियों में ले जाते हैं ॥१०२॥


देवधर्मगुरुन्नित्थं मन्यमाना मनस्विनि ।
लोकद्वयेऽपि सौख्यानां भाजनं भविता सदा ॥१०३॥

अर्थ: सुन्दरी ! इस प्रकार देव, धर्म और गुरुओं के स्वरूप का ज्ञान और श्रद्धान करने से ही तुझे लोक और परलोक दोनों में सुख की प्राप्ति होगी ॥१०३॥


निबन्धनमिदं सर्व-व्रतानां दर्शनं प्रिये ।
विनैतेन विमूलः स्यात्-समस्त-नियमद्रुमः ॥१०४॥

अर्थ: तत्त्व यही है इस प्रकार श्रद्धान करना ही, सबसे पहले इस जीव को कल्याणकारी है । इसके करने से ही समस्त नियम-यम सार्थक होते हैं और वृद्धि को पाते हैं, इसके बिना कोई भी कर्म सुकर्म नहीं होता ॥१०४॥


विशेषतस्तु नात्तव्यं मदिरामांसमाक्षिकम् ।
अनन्तजीवसंहार-कारि पापैकसाक्षिकम् ॥१०५॥

अर्थ: अरे प्यारी ! यह जो तुझे सुदेव, सुधर्म और सुगुरु का स्वरूप बतलाकर श्रद्धान बतलाया है इसको सुदृढ़ करने के लिए मदिरा, मांस और मधु नहीं खाना चाहिए, इनके खाने से अनंत जीवों का संहार होता है तथा जो पाप के प्रधान कारण हैं ॥१०५॥


जीवयोनिसमुत्स्थानं फलानांमपि पंचकम् ।
मुञ्च भुक्तिं निशायां च चरैतानि व्रतानि च ॥१०६॥

अर्थ: अगणित जीवों की उत्पत्ति के स्थानस्वरूप बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर, पाकर इन पाँच उदम्बरों क्षीरीफलों का खाना भी अनुचित है । सूर्य के प्रकाश के न होने से अनेक जीवों का नाशक, रात्रि भोजन करना भी सर्वथा अयोग्य है और अहिंसा आदि व्रतों का पालना भी आवश्यक है ॥१०६॥


जीव-घातानृतस्तेय - पुरुषान्तर-सेवनम् ।
परिग्रह-ममानं च त्यज राजीव-लोचने ॥१०७॥

अर्थ: हे कमल लोचने कृत, कारित और अनुमोदित संकल्पी, द्वीन्द्रियादि जीवों की हिंसा का त्याग करना अहिंसाणुव्रत है । स्थूल मिथ्या वचनों का न बोलना सत्याणुव्रत है । दूसरे की बिना दी हुई वस्तु का ग्रहण न करना अचौर्याणुव्रत है । पराई स्त्री या परपुरुष का न सेवना ब्रह्मचर्याणुव्रत है । धन-धान्य आदि परिग्रहका प्रमाण करना परिग्रहपरिमाणाणुव्रत है । इन पाँचों व्रतों को धारण करो ॥१०७॥


पात्रं सर्वश्रियां पात्र-दानं भोगोपभोगगाम् ।
संख्या-मसंख्य-दुर्भाव -भेदिनीं धेहि मानसे ॥१०८॥

अर्थ: समस्त कल्याणों को करने वाले पात्र को योग्य, स्वकीय धन, आहार, उपकरण का देना, दान है । भोग-उपभोग की वस्तुओं का प्रमाण-सीमा करना भोगोपभोग परिमाण व्रत है ॥१०८॥


सर्वसङ्गं परित्यज्य संस्मृत्य गुरु-पंचकम् ।
आराधना-विधानेन प्रान्ते प्राणोज्झन मतम् ॥१०९॥

अर्थ: समस्त परिग्रहों में ममता को छोड़कर अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधुओं के गुण स्मरणपूर्वक आराधना विधि से प्राण छोड़ना, सल्लेखना है ॥१०९॥


दिग्देश-नियमं दुष्टानर्थ-दण्डोज्झनं कुरु ।
सामायिकं हताघौघं प्रोषधं दुःखनाशकम् ॥११०॥

अर्थ: दिशाओं में जाने का नियम करना, दिग्व्रत है । दिग्व्रत की सीमा के अन्दर देशों में जाने का नियम करना, देशव्रत है और बिना प्रयोजन पापोत्पादक क्रियाओं जैसे-अपध्यान, पापोपदेश, प्रमादचर्या, हिंसाप्रदान, दुःश्रुति को नहीं करना, अनर्थदण्डव्रत है । तीनों संध्याओं में विधि अनुसार पञ्चगुरुओं का स्मरण वा अपनी आत्मा का ध्यान करना, सामायिक है और इन्द्रियों की उग्रता को रोकने व धार्मिक क्रियाओं को करने के लिए जो आठ प्रहर, बारह प्रहर आदि समय तक अन्न आदि का त्यागना है सो, प्रोषधव्रत है ॥११०॥


एतेषु गुण-शिक्षाद्या नियमा द्वादशव्रतम् ।
पंच त्रयश्च चत्वारो गृहस्थानां जिनोदिताः ॥१११॥

अर्थ: ५ अणुव्रत, ३ गुणव्रत और ४ शिक्षाव्रत ये व्रती गृहस्थ श्रावकों के बारहव्रत जिनेन्द्रदेव ने कहे हैं ॥१११॥


गुरुणां वचनादेतत् तवावादि मया प्रिये ।
पश्चात्ते दापयिष्यामि विशेषाद् गुरु-सन्निधौ ॥११२॥

अर्थ: इस प्रकार अहिंसादि १२ व्रतों का स्वरूप तुझे जिनवरों के कथनानुसार कहा है । अभी तो तुम इसी प्रकार इन्हें धारण करलो, पश्चात् तुम्हें मैं विशेष विधि के अनुसार गुरु के समक्ष इनमें दीक्षित करा दूँगा ॥११२॥


इत्यादि सा कुमारेण जिन-धर्मे विशुद्धधीः ।
ग्राहिता सापि जग्राह तं तथेति त्रिधा तदा ॥११३॥

अर्थ: अपने पति जिनदत्त की हृदयग्राहिणी युक्ति सिद्ध वाणी को, जब विशुद्ध-बुद्धि वाली राजपुत्री ने सुना समझा तो वह अति आनंदित हुई। उसने शीघ्र ही समस्त व्रत धारण कर लिए और जैनधर्म की गाढ़ श्रद्धावाली हो गई ॥११३॥


इत्थं तथा निखिलसौख्यनिधानधात्र्याधन्यः समं कुतुककोपकृतान्तरायम् ।
सौख्यं स निर्विशति यावदितः कृतार्थ-स्तावच्चचाल सकलो वणिजां समूहः ॥११४॥

अर्थ: और इस प्रकार जब तक जिनदत्त अपनी प्यारी पत्नी को अपने समान श्रेष्ठ जिनधर्म से संस्कारित कर, सांसारिक-सुख भोग रहे थे कि इतने में ही इनके साथ का व्यापारियों का समूह अपने देश लौटने की तैयारी करने लगा ॥११४॥


ज्ञात्वापि तेन भणितो नृपतिः सहेतु-र्लोकः प्रयाति सकलोऽपि मम स्वदेशम् ।
मां प्रेषयेति वचनेन नृपः सदुःख-स्तस्मै समर्प्य तनयां सपरिच्छदां ताम् ॥११५॥

अर्थ: जब यह समाचार इन्हें मालूम हुआ, तो जिनदत्त ने अपने ससुर राजा मेघवाहन से भी जाने का विचार प्रकट किया और उसने पुत्री तथा उसके परिवार सहित इन्हें देश जाने के लिए सम्मति प्रदान कर दी ॥११५॥


षट्त्रिंशदस्ति भुवि यस्य सुवर्णकोट्यो मूल्यं तदस्य किल कण्ठविभूषणं च ।
दत्वा नृपेण बहुधा वसनादिजात-मालिङ्ग्य साश्रुनयनेन ततो विमुक्तः ॥११६॥

अन्यैश्च राज्यपरिवारजनैः समग्रै-रन्तःपुरेण च कृतापचितिः कुमारः ।
आपृच्छ्य भूपतिपुरस्सरसर्वलोकं प्राप्तस्तं जलनिधेः स्वजनान्निवर्त्त्य ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 116 से 117): पृथ्वी पर जिसका छत्तीस करोड़ स्वर्णमुद्राएँ मूल्य है, वह कंठ का आभूषण हार और बहुत प्रकार के वस्त्र आदि देकर राजा ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से आलिंगन करके उसके बाद उसको जाने दिया ॥११६॥ तथा अन्य संपूर्ण राज्य परिवार जनों और अन्तःपुर के द्वारा किया गया है सत्कार जिसका, ऐसा कुमार राजा को आगे करके सभी लोगों को पूछकर समुद्र के किनारे पहुँचा और अपने परिवार के लोगों को वापस भेज दिया ॥११७॥


माङ्गल्यं सकलं विधाय विधिना कृत्वा जनं याचकं ।
पूर्णेच्छं शुभवासरे सह जनैस्तैः सार्थवाहादिभिः ॥
आरूढौ धनबद्धकेतुनिकरं पोतं सपुण्यो जवात्-।
मुक्तः सोऽपि चचाल वारिधिजले मन्दानिलप्रेरितः ॥११८॥

अर्थ: विधिपूर्वक संपूर्ण मांगलिक क्रियाओं को करके याचकजनों की इच्छाओं को पूरा कर, शुभ दिन में उन सार्थवाह आदि साथियों के साथ सघन बंधी हुई ध्वजाओं के समूह से व्याप्त पुण्य सहित वह जिनदत्त जहाज पर सवार हुआ । वह जहाज भी वेग से छूटा हुआ समुद्र के जल में मंद वायु से प्रेरित हुआ चल पड़ा ॥११८॥

पञ्चमः सर्गः

[राजा से जिनदत्त व श्रीमती की विदाई]


अथ ते यान्ति पश्यन्तो यान - पात्रेण वारिधिम् ।
क्वचिद्वेत्र - लताविद्धं द्वारं भूमि - भृतामिव ॥१॥

न्यायोपेत - नरेन्द्राभं क्वचित् समकरं क्वचित् ।
तिमिराजित - मत्यर्थं मुनीना - मिव मानसम् ॥२॥

अनेकान्त - मिवात्यन्त - बहु - भङ्गि - समाकुलम् ।
समुक्ताहार - मन्यत्र कान्तास्तन - तटोपमम् ॥३॥

अधः स्थित - महामूल्य- माणिक्यं शङ्खकादिकम् ।
दर्शयन्तं बहिर्भीत्या कृपणं वार्थिनां क्वचित् ॥४॥

निर्यापक - गिरा क्वापि समुत्कर्ण - जनं क्वचित् ।
कर्पूरादि-द्रुमस्पर्शि - सुगन्धायात - मारुतम् ॥५॥

अर्थ (श्लोक 1 से 5): नौका बढ़ रही है । सागर का जल उछल रहा है । कहीं-कहीं समुद्र, प्रचुर सेवाल समूह वेत्र-लताओं से विद्ध हुआ पर्वत के द्वार के समान प्रतीत होता था, तो कहीं समुद्र समरूप होकर न्यायी राजा की शोभा को धारण कर रहा था, कहीं अंधकार का भेदन कर मुनिराज के मानस समान स्वच्छ प्रतीत हो रहा था । कहीं नाना तरंगों के उत्थान/पतन से अनेक भङ्गों से युक्त अनेकान्त सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए के समान, कहीं रत्नहार मोतियों की माला से युक्त स्त्रियों के स्तनरूपी तट जैसा दिखलाई पड़ता । जल के मध्यस्थल भाग में असंख्य रत्न, महामूल्यवान माणिक्य, शङ्ख आदि भरे पड़े थे । वह उन्हें कृपण के समान कभी-कभी बाहर दिखला रहा था अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार कोई कंजूस व्यक्ति अपने अपरिमित धन को छिपा कर रखता है, उसी प्रकार सागर भी अमूल्य-रत्नों को अपनी क्रोड/गोद में छुपाये था, भयभीत सा यदा-कदा उन्हें दर्शा रहा हो ऐसा जान पड़ता था । कभी उत्सुक करने वाली भीषण ध्वनि सुनाई पड़ती । उधर वायु के मन्द-मन्द झोकों से कर्पूर आदि वृक्षों से स्पर्शित सुगन्ध आ रही थी अर्थात् शीतल सुरभित अगर-तगर, कपूर चन्दनादि वृक्षों का स्पर्श कर पवन आनन्दमय सुरभि बिखेर रही थी, इस तरह समुद्र की शोभा को देखते हुए वे सब जहाज द्वारा जा रहे हैं ॥१,२,३,४,५॥


एवं यावदभूत्तावत् सार्थवाहः स्मरातुरः ।
जिनदत्तप्रियारूपं समालोक्य समाकुलम् ॥६॥

अर्थ: ज्यों-ज्यों यान बढ़ता जाता, चारों ओर अनोखा दृश्य दिखलाई देता है, इस प्रकार का उन्मादक वातावरण कामियों को उत्तेजित करने लगा । उसी समय सार्थवाह की दृष्टि जिनदत्त की रमणी पर जा पड़ी । फिर क्या था ? नयनपात मात्र से वह उसके रूप लावण्य पर मुग्ध हो गया । तब कामवेग से उसे पाने को आतुर हो उठा ॥६॥


भोजनं शयनं पानं वचनं कार्यचिन्तनम् ।
तन्मुखाम्भोज-सक्तस्य सकलं ज्वलनायितम् ॥७॥

अर्थ: कामबाण से घायल सार्थवाह, श्रीमती के मुखकमल पर आसक्त हो सब सुध-बुध भूल गया । उसे भोजनपान, शयन, वार्तालाप करना, कुछ भी कार्य विचारना अग्निज्वाला की दाह के समान पीड़ाकारक हो गए ॥७॥


समीरयन्ति कामाग्निं वेलावनसमीरणाः ।
तस्य तां ध्यायमानस्य शून्यस्येव दिवानिशम् ॥८॥

अर्थ: वह रात-दिन उसी का ध्यान करने लगा । उसकी कामाग्नि को सागर की शीतल-तटीय वन की सुगंधी भरी हवाएँ और अधिक-अधिक दहकाने का काम कर रही थीं । उसे दिन-रात शून्य के समान दिखने लगा ॥८॥


दृष्टं सहस्रशो रूप-मबलानां मया भुवि ।
तदस्याश्चरणाङ्गुष्ठ-लावण्येनापि नो समम् ॥९॥

अर्थ: वह किंकर्त्तव्य विमूढ़-सा विचारने लगा, मैंने संसार में हजारों, एक से एक बढ़कर सुन्दरियों को देखा है किन्तु उन सबका रूप इस परम नयनाभिराम रमणी के पैर के अंगूठे की शोभा के समान भी नहीं है ॥९॥


धन्यः स एव संसारे सालसायतलोचना ।
बलित्वा१ वीक्षते विश्व-सुभगं यमियं स्वयंम् ॥१०॥

अर्थ: वस्तुतः संसार में वह पुरुष धन्य है, जो अलसाये नेत्रों वाली इस सुभग नारीरत्न का अवलोकन करता है ॥१०॥


ममेयं जगदानन्द-दायिनी वशवर्त्तिनी ।
केनोपायेन जायेत जीवितव्यफलं लघु ॥११॥

अर्थ: आगे विचारता है किस उपाय से यह जगत को आनंद देने वाली मेरे वश में हो सकती है ? इसके वश में होने पर मेरा जीवन शीघ्र ही फलवान्/सफल होगा ॥११॥


अथवा विद्यते यावत् कुमारो वीरसत्तमः ।
तावदस्याः सुखालोकं न कृतं मुखपङ्कजम् ॥१२॥

अर्थ: अथवा यह विचार ही व्यर्थ है क्योंकि यह कुमार महान् है, वीर और नरोत्तम है। इसके जीते जी यह मेरे वश में कदापि नहीं हो सकती । इस नारीरत्न के मुखकमल का सुखावलोकन भी नहीं हो सकता ॥१२॥


निक्षिप्य तं दुरालोकं क्रूरनक्राकुले जले।
निश्चितं मानयिष्यामि संसारसुखमेतया ॥१३॥

चिन्तयित्वेति तेनोक्तः कुमारादपरे जनाः।
कार्यं किमपि भाण्डादौ युष्माभिः पतितेन हि ॥१४॥

विभिद्येति समस्तांस्तान् क्षिप्तं किमपि वारिणि।
उदासीनेषु सर्वेषु कुमारोऽवततार सः ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 13 से 15): हाँ ! इसे बिना किसी के जाने चुपके से मगरमच्छों से भरे सागर के जल में गिराकर निश्चिंत हो, इसके साथ संसार के सारभूत सुख का अनुभव करूँगा और अपने को सुखी मानूंगा ॥१३॥ इस प्रकार सोचकर वह सेठ कृत निश्चय हुआ। उसी समय कुमार के अतिरिक्त अन्य जनों को बुलाया और आदेश दिया कि शीघ्र ही भाण्डादि को समुद्र में डालो, कुछ विशेष कार्य है ॥१४॥ सबने कुछ भी पानी में फेंकना शुरू किया। सबको खेद खिन्न और उदासीन देख कुमार सागर में क्या है ? ज्ञात करने के लिए उतरा ॥१५॥


ततश्छिन्ना वस्त्रा तै र्वेगतो गतवानसौ।
यथागाधजले पोतो वाहितश्च क्षणात्ततः ॥१६॥

अर्थ: कुमार ज्यों ही उतरकर जल में पहुँचे, त्यों ही दुष्ट समुद्रदत्त ने उसके पकड़ने की रस्सी काट दी और वे निरालंब हो समुद्र में ही रह गये एवं जहाज को भी शीघ्रातिशीघ्र खिचवाकर/चलवाकर, वहाँ से बहुत दूर ले गया॥१६॥


[समुद्रदत्त के द्वारा जिनदत्त को समुद्र में पटकना]


कुमार-पात-सञ्जात-शोक-शङ्कु-हता हृदि ।
अजस्राश्रुप्रवाहेण प्लावितस्तन-मण्डला ॥१७॥

सा किंकर्त्तव्यतामूढा यावत्तिष्ठति सुन्दरी ।
तावदभ्येत्य सावादि सार्थवाहेन दुःखिता ॥१८॥युग्मं॥

शशाङ्कमुखि ! मा कार्षीः शोकं सन्तापकारणम् ।
सर्वाः सर्वप्रकारेण तवाशाः पूरयाम्यहम् ॥१९॥

मयि तिष्ठति तन्वङ्गि-त्वदादेशविधायिनि ।
आयत्ते च समस्तार्थे किं वृथैव विषीदसि ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 17 से 20): कुमार उत्ताल तरंगों की गोद में जा छुपा, यह ज्ञात होते ही कुमारी का हृदय शोकरूपी अंकुश से छिन्न हो गया । मानो उसके उर को वज्र ने भेदन कर दिया । नयनों से अविरल अश्रुधारा बह चली । वह सुन्दरी श्रीमती जब तक क्या करना चाहिए ? इस विषय में विमूढ़-सी हो गई, तब तक सार्थवाह ने पास आकर उस दुखिया से कहा ॥१७,१८॥ हे चन्द्रमुखी ! संताप के कारण शोक मत करो, तुम्हारी जो भी कामनाएँ हैं, मैं उन सबको सभी प्रकार से पूर्ण करूँगा ॥१९॥ हे कृशांगी ! मेरे रहते हुए तुम्हें क्या कष्ट है ? मैं तुम्हारे आदेश का अनुयायी हूँ । सभी अर्थों का विधायक तुम्हारी आज्ञा की प्रतीक्षा करता हूँ, फिर क्यों व्यर्थ ही तुम दुखी होती हो ?॥२०॥


अम्बराणि विचित्राणि भूषणानि यथारुचि ।
गृहाण मद्गृहे सर्वं स्वामित्वं च शुभे कुरु ॥२१॥

अर्थ: नाना चित्र-विचित्र वस्त्र और अनेक प्रकार के आभूषण मेरे घर में भरे पड़े हैं, उन सबको ग्रहण करो और हे शुभे ! सबका स्वामित्व स्वीकार करो अर्थात् घर मालकिनी बनकर सब पर आज्ञा चलाओ, मेरी गृहिणी बनो ॥२१॥


भुङ्क्ष्व भोगान्मया साकं१ बाले ! वाञ्छातिरेकतः ।
सम्पन्नसर्वसामग्र्यं सफलीकुरु यौवनम् ॥२२॥

अर्थ: हे बाले ! मेरे लिए उत्कंठा से चाहो, मेरे साथ मनोवाञ्छित भोगों को भोगो, समस्त सामग्री से परिपूर्ण यौवन को सफल करो ॥२२॥


अत एव मया मुग्धे ! जिनदत्तः प्रपञ्चतः ।
पयोनिधौ परिक्षिप्तस्तत्सङ्गाहितचेतसा ॥२३॥

अर्थ: हे मुग्धे ! मैंने तेरी इसी यौवन की बहार लूटने के लिए और तुझे सभी प्रकार से सुखी बनाने के लिए ही छलपूर्वक जिनदत्त को समुद्र में गिरा दिया है ॥२३॥


अतः कान्ते गताशङ्का सविलासं समं मया ।
रतसौख्यं भजाजन्म सर्वबाधाविवर्जितम् ॥२४॥

अर्थ: हे सुन्दरी ! इसलिए शोक का त्यागकर शंका रहित मेरे साथ विलास सहित जन्म पर्यन्त निर्बाध रतिसुख को प्रीतिपूर्वक सेवन करो ॥२४॥


तन्निशम्य नराधीश-सुतया विधुतं२ शिरः ।
चिन्तितं च क्षतेऽनेन क्रीर्णः क्षारोऽतिदुःसहः ॥२५॥

अर्थ: पापी सेठ की इन बातों को सुनकर राजपुत्री श्रीमती ने अपने सिर को धुनते-पीटते हुए सोचा, हाय ! इस सेठ को अब तक पिता तुल्य समझती थी, पर वही पापी निकला । इसी कामांध सेठ ने अपने व्यभिचार के पोषणार्थ मेरे पति को समुद्र में गिरा दिया है और फिर अब पाप का प्रस्ताव कर घाव में नमक छिड़क रहा है ॥२५॥


[सेठ के छल को जानकर फिर श्रीमती का अति दुखी होना]


कृत्याकृत्यमविज्ञाय कामान्धेन कथं वृथा ।
नीलोत्पलदलैः कष्टं कुकूलं१ किल कल्पितम् ॥२६॥

अर्थ: कर्त्तव्य व अकर्त्तव्य के विवेक से शून्य कामान्ध के द्वारा व्यर्थ ही मुझे आपद् ग्रस्त किया है, सुन्दर नीलकमल के पत्तों द्वारा नियम से पृथ्वीतट के समान कष्ट कल्पित किया है अर्थात् जो कमल जिनदत्तरूपी चंद्रदर्शन से प्रफुल्लित होते थे क्या उसके छुप जाने पर प्रफुल्लित रह सकते हैं ? कभी नहीं ॥२६॥


जिनदत्तनिशानाथं कुर्वतो मे तिरोहितम् ।
केन वाहो२ पिशाचस्य मुखमेतस्य दृश्यते ॥२७॥

अर्थ: मेरे पतिदेवरूपी चंद्रमा को मेरे नयनों से दूर किया, आश्चर्य है मैं किस कारण से इस पिशाच के मुख को देख रही हूँ ॥२७॥


अथवा सर्वपापाना-महमेव निबन्धनम् ।
मद्रूपासक्तचित्तेन यदनेन स नाशितः ॥२८॥

अर्थ: पुनः वह विचार करती है इन समस्त दुष्कर्मों का हेतु निमित्त मैं ही हूँ क्योंकि मेरे इस रूप लावण्य पर आसक्त होकर ही इसने मेरे पतिदेव को समुद्र में गिराया है ॥२८॥


खण्डयित्वा द्विजैर्जिह्वां दत्वोत्फालं जलेऽथवा ।
असिपुत्रिकया३ हत्वा किमात्मानमहं म्रिये ॥२९॥

अर्थ: दाँतों के द्वारा जीभ को खण्ड-खण्ड करके, जल में कूदकर या फिर कटार के द्वारा क्या मैं अपने आपको मारकर मरूँ ? ॥२९॥


अथवा धिगिमं तेन धर्मज्ञेन निवारिता ।
आत्मघातं विलम्बे वा मा कदाचित्तदागमः ॥३०॥

अर्थ: अरे ! नहीं ! नहीं ! मेरे इस विचार को धिक्कार हो। धर्मज्ञ, मेरे पतिदेव ने आत्मघात को पाप बताकर उसको करने के लिए मना किया था। आत्मघात में विलंब अर्थात् आत्मघात नहीं करने पर उनका कभी आगमन/मिलाप हो सकता है ॥३०॥


शीलं पालयतां सम्यक् स्थिराणामिह वाञ्छितम् ।
भूयोऽपि सम्भवत्येव सीतादीनामिव ध्रुवम् ॥३१॥

अर्थ: इसलिए मैं धर्म-कर्म में दृढ़ हो शील पालन करती हूँ। जो शील का पालन करते हैं, उनको इसभव-परभव दोनों में सुख ही सुख मिलता है, उनकी सर्वत्र सब इच्छाएँ पूरीं होती हैं। सीता, अंजना आदि ने शीलव्रत में दृढ़ रहकर कैसा सुख पाया ? इसलिए मेरा शीलव्रत में दृढ़रहने का पक्का निश्चय है ॥३१॥


विदधामि तदेतस्य कामार्त्तस्याशु वञ्चनम् ।
भावि भद्रं प्रियप्राप्ता-वन्यथा स्यात्तपोवने ॥३२॥

अर्थ: पर यह कामार्त्त पापी इस तरह न मानेगा, इसका किसी न किसी तरह वंचन करके अपना काम निकालना चाहिए । समुद्र पार पहुँचकर पति का कुछ पता लगेगा तो ठीक है, नहीं तो फिर तपोवन ही शरण है ॥३२॥


सम्भाव्येति तयाभाणि-सूक्तमेतत्तवोदितम् ।
वज्रशृङ्खलतुल्यन्तु वाचा बन्धनमस्ति ते ॥३३॥

अर्थ: इस प्रकार विचार कर उस सुंदरी ने सेठ से कहा कि आपका कहा हुआ ठीक है, परन्तु तुम्हारा वचन वज्र श्रृंखला की भाँति बंधन स्वरूप ही है ॥३३॥


श्वशुरोऽयं तवेत्युक्तं त्वत्पुत्रेण पुरो मम ।
अतोऽस्ति ताततुल्याय रन्तुं मे जायते घृणा ॥३४॥

अर्थ: आप मेरे श्वसुर के समान हैं । आपके पुत्र तुल्य, जिनदत्त पतिदेव ने मेरे सामने आपको पिता कहा था, इस दृष्टि से आप मेरे भी पिता हो, पिता तुल्य आपके साथ रमण करने में मुझे घृणा होती है ॥३४॥


प्रतिपन्नं न मुञ्चन्ति प्राणत्यागेऽपि सन्नराः ।
यथा सागर एवायं मर्यादां विजहाति किम् ॥३५॥

स्वकुले विमले सम्यक् हेयाहेयौ विजानता ।
सम्पर्केण परस्त्रीणां कलङ्कः क्रियते कथम् ॥३६॥

अकर्त्तव्ये कथं चित्तमीदृशे भजतां मम ।
उत्साहं तादृशे जन्म स्मरन्त्याः स्वकुलेऽधुना ॥३७॥

सार्थवाहस्तदाकर्ण्य तामुवाच मनस्विनि ।
जानाम्येवं तथाप्युच्चैर्म-
मभिद्रवति स्मरः ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 35 से 38): [सती श्रीमति द्वारा सेठ समुद्रदत्त को शिक्षा देना] सत्पुरुष प्राणों के त्याग होने पर भी की हुई प्रतिज्ञाओं को नहीं छोड़ते, जैसे समुद्र अपनी मर्यादा को कभी नहीं छोड़ता है ॥३५॥ फिर आप निर्मल कुल में उत्पन्न हेय-उपादेय को अच्छी तरह जानने वाले होकर भी परस्त्रियों के संपर्क से अपने कुल को कलंकित क्यों करते हो ? ॥३६॥ मैं इस समय श्रेष्ठकुल में उत्पन्न होने को यादकर मेरा मन इस प्रकार के अकर्त्तव्य में सोत्साह अग्रसर नहीं होता ॥३७॥ समुद्रदत्त सेठ उस राजपुत्री के वचनों को सुनकर बोला-अयि मनस्विनि ! तू जो कुछ भी इस समय कह रही है, वह सब सच है, उसे मैं रत्ती-रत्ती भर जानता हूँ, तो भी क्या करूँ? मुझे काम अत्यधिक पीड़ित कर रहा है ॥३८॥


मामयं मोहयामास तथा कामो यथा शुभे।
लज्जायशोविवेकाद्याः स्पृश्यन्ते मनसा न मे ॥३९॥

अर्थ: हे शुभे ! इस समय यह कामज्वर का वेग इतनी तीव्रता प्राप्त कर चुका है कि इससे अभिभूत मेरे मन को लज्जा, यश, विवेक आदि स्पर्श भी नहीं कर सकते हैं ॥३९॥


कन्दर्प-सर्प-दष्टस्य मूर्च्छितो मे मुहुर्मुहुः।
समस्तोपाय-मुक्तस्य दीयतां सुरतामृतम् ॥४०॥

अर्थ: हे कल्याणि ! कामरूपी सर्प से डसा मैं बार-बार उस विष से मूर्च्छित हो रहा हूँ, सभी उपायों से रहित, मेरे लिए सुरतरूपी अमृत को प्रदान करो, तुम्हारा प्रेमरस ही मेरे जीवन का उपाय है ॥४०॥


एकान्तेन न चाकार्य-मेतत्तव तनूदरि।
श्रूयते हि पुराणेषु श्रुतौ चैव सहस्रशः ॥४१॥

अर्थ: तुमने जो इस परपुरुष सेवन को अकार्य बतलाया, वह कथंचित् ठीक है पर सर्वथा वह अकार्य ही नहीं है । ऐसे सैकड़ों और हजारों दृष्टांत श्रुति और पुराणों में मिलते हैं, जो एक पुरुष के सिवा अन्य कई पुरुषों से स्त्री के भोग करने पर भी वह सती ही बनी रही, उसका शीलव्रत दूषित नहीं हुआ ॥४१॥


द्रौपदी मुदिता भ्रातृ-पञ्चकं जगदुत्तमम्।
तातादिविदिता चक्रे कृतार्थं कामकेलिभिः ॥४२॥

अर्थ: देखो ! द्रौपदी ने अपने पिता, पुत्र तुल्य युधिष्ठिर, नकुल आदि अपने पति अर्जुन के सिवा शेष चारों पांडवों से भी यथेष्ट काम-क्रीड़ायें कीं, पर उसे कोई व्यभिचारिणी नहीं कहता । सब लोग सती साध्वी कहकर ही पुकारते हैं ॥४२॥


समस्तस्मृतिशास्त्रज्ञो नरामरनमस्कृतः ।
भारद्वाजत्तपो जातो नैव किं भ्रातृजायया ॥४३॥

अर्थ: समस्त स्मृति और पुराणों के वेत्ता, देवेंद्र, नरेंद्रों से वंदनीय भारद्वाज मुनि की कथा क्या तुझे नहीं मालूम है ? वे इतने भारी विद्वान् होने पर भी अपनी भावज के साथ संभोग करने में सन्नद्ध हुए थे ॥४३॥


स्त्रियं वा पुरुषं वापि स्वयमेव समागतम् ।
भजते यो न तस्यास्ति ब्रह्महत्या निशंसयं ॥४४॥

अर्थ: इसके सिवा यह शास्त्र का भी वचन है कि जो पुरुष व स्त्री स्वयं इच्छाकर आए हुए पुरुष एवं स्त्री के साथ संभोग नहीं करता, उसको अवश्य ही ब्रह्महत्या लगती है, इसमें कोई भी संदेह नहीं है ॥४४॥


तयावाचि महाबुद्धे वक्तुमेवं न युज्यते ।
शस्यते न हि केनापि स्नुषा-श्वशुर-सङ्गमः ॥४५॥

अर्थ: उस सेठ के वचनों को सुनकर उस श्रीमती ने कहा-हे महाबुद्धिमान ! इस प्रकार कहना ठीक नहीं है क्योंकि किसी के द्वारा भी पुत्रवधू और श्वसुर का समागम प्रशंसनीय नहीं है ॥४५॥


द्रौपद्याद्या महासत्यः पवित्रीकृतभूतलाः ।
विषयान्धेन केनापि तद्वृत्तं कृतमन्यथा ॥४६॥

अर्थ: द्रौपदि आदि महासतियों ने अपने शीलधर्म के प्रभाव से समस्त पृथ्वीतल को पवित्र किया । किसी विषयान्ध के द्वारा ही उनका चरित्र भी अन्य प्रकार से दूषित किया है ॥४६॥


भारद्वाजादिदृष्टान्तः प्रमाणं न हि जायते ।
भवादृशा दुराचाराः पुराप्यासन्न किं नराः ॥४७॥

अर्थ: भारद्वाज आदि का दृष्टांत निश्चितरूप से प्रमाण रूप नहीं हो सकते क्योंकि आप सरीखे दुराचारियों का इस पृथ्वी पर से कभी लोप नहीं हुआ । पहले भी वे विद्यमान थे ॥४७॥


स्वयमेवागतेत्यादि युक्तं यदि सुभाषितम् ।
पारदारिक-लोकस्य शिरश्छेदादिकं कृतम् ॥४८॥

अर्थ: और अपने आप स्वयं आए हुए पुरुष और स्त्री के न भोगने से ब्रह्महत्या के समान पाप होने का भय दिखलाने वाला शास्त्र -वाक्य सुनाया, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसके ठीक होने पर तो व्यभिचार कोई पाप ही नहीं ठहरता और जब पाप नहीं, तब उसी शास्त्र में व्यभिचारियों को शिरच्छेद आदि दिये जाने वाले दंडों का विधान भी अनुपयुक्त ठहरता है ॥४८॥


पीडितोऽपि न चाकृत्यं कुरुते जातु सात्त्विकः ।
यत्किंचिदेव किं सिंहः क्षुधाक्षीणोऽपि खादति ॥४९॥

अर्थ: जो सात्विक-प्रकृति वाले धर्मात्मा पुरुष होते हैं, वे एक की तो बात क्या हजारों कष्टों के आने पर भी कभी अयोग्य कृत्य में प्रवृत्त नहीं होते। जैसे कितने भी कष्ट आ पड़ें और कैसी भी भूख लग रही हो, पर सिंह कभी अपने आहार के अयोग्य विष्टा आदि नहीं खा सकता ॥४९॥


भिन्दंति हृदयं यस्य कटाक्षै-रभिसारिकाः ।
तमीर्ष्ययेव मुञ्चन्ति लोकद्वितय-सम्पदः ॥५०॥

अर्थ: जिन पुरुषों के कमजोर, दीन हृदय पुंश्चली/व्यभिचारिणी स्त्रियों के कटाक्ष बाणों से विद्ध हो खंड-खंड हो जाते हैं, अपने सुकृत्य को छोड़ उनकी आग में जलने लगते हैं, तो जिस प्रकार दूसरी स्त्री से सेवित पुरुष को पहली स्त्री ईर्ष्या की दृष्टि से देखकर निकलती है, उसी प्रकार उन पुरुषों को भी इहलोक और परलोक दोनों की सम्पत्तियाँ बुरी निगाह से देखने लगती हैं अर्थात् वे उनके पास तनिक भी नहीं ठहरतीं ॥५०॥


अन्यस्त्रीभ्रूधनुर्मुक्त - कटाक्ष - शरपङ्क्तिभिः ।
न शील-कवचं भिन्नं येषां तेभ्यो नमो नमः ॥५१॥

अर्थ: परस्त्रियों के अपने भ्रुकुटीरूपी धनुष पर चढ़ाकर फेंके गये कटाक्षरूपी बाणों से जिनका शीलरूपी कवच भिन्न नहीं होता, उनके लिए समस्त संसार मस्तक नमाता है । उन्हें दोनों लोकों की सम्पत्तियाँ स्वयं आ प्राप्त हो जाती हैं । उनको मेरा बारम्बार नमस्कार हो ॥५१॥


मालिन्यं स्वकुले येन जायते दूष्यते यशः ।
तत्कृत्यं क्रियते केन स्वस्य सौख्यसमीहया ॥५२॥

अर्थ: जिस कार्य के करने से अपने कुल में कलंक लगता है, निर्मल यश दूषित होता है, उस साक्षात् दुख देने वाले कुकर्म को ऐसा कौन बुद्धिमान पुरुष है जो सुख प्राप्त करने की इच्छा से करता है ? ॥५२॥


कलत्रसंग्रहः पुंसां सतां सन्तान-वृद्धये ।
तत्रैवान्ये समासज्य नरके निपतन्ति हि ॥५३॥

अर्थ: जो सज्जन पुरुष हैं, वे बहुत से विवाह अपनी संतान की बढ़वारी के लिए करते हैं परन्तु जो मूर्ख हैं, वे उन्हीं में कामाग्नि की शांति के लिए आसक्त हो, नाना पाप उपार्जन करके अंत में नरक में पड़ते हैं ॥५३॥


सन्तोऽन्यवनितां वीक्ष्य प्रयान्त्यानतमस्तकाः ।
वृषभास्तोयदोन्मुक्त - नीर-धाराहता इव ॥५४॥

अर्थ: बादलों से छोड़ी हुई जलधारा से पीड़ित बैलों के समान संत पुरुष अन्य स्त्रियों को देखकर शिर नीचा करके चले जाते हैं ॥५४॥


अकामिता सकामेऽपि कलत्रेऽन्यस्य यन्नृणाम् ।
महाव्रतमिदं नाम न परस्त्र्यादिधारणम् ॥५५॥

अर्थ: यदि स्त्रियाँ चाहती भी हों, तो उन्हें भी नहीं चाहना पुरुष के लिए उत्तम महान् व्रत है न कि पर स्त्री को धारण करना ॥५५॥


रामामम्बामिवान्यस्य कचारमिव१ काञ्चनम् ।
पश्यन्ति ये जगत्तेषा-मशेषं गाहते यशः ॥५६॥

अर्थ: जो महात्मा दूसरों की स्त्रियों को माँ, बहिन, बेटी के समान समझता है और परधन को कचरा/मिट्टी के ढेले के समान जानता है, उसी का संसार में निर्मल यश विस्तृत होता है ॥५६॥


पातालबद्धमूलोऽपि मेरुः स्खलति कर्हिचित् ।
प्राणात्ययेऽपि दुर्वृत्ते सतीनां न पुनर्मनः ॥५७॥

अर्थ: पाताल से बंधी हुई जिसकी जड़ है ऐसा मेरु भी विचलित हो जाये किन्तु सतियों का मन, प्राण त्याग होने पर भी दुराचरण में नहीं जाता ॥५७॥ [सतियों का मन मेरू के समान निश्चल होता है]


नान्यं जातु निषेवेऽहं परित्यज्य निजं पतिम् ।
चन्द्रमन्तरिते सूर्ये पश्यत्यपि न पद्मिनी ॥५८॥

अर्थ: इसलिए मैं अपने पति को छोड़कर अन्य को कभी भी सेवन नहीं कर सकती, क्योंकि सूर्य के छिप जाने पर कमलिनी चन्द्रमा को भी नहीं देखती ॥५८॥


शेष-शीर्षमणिर्मन्ये सिंहानां केसरच्छटा ।
केनापि स्पृश्यते क्वापि सतीनां न पुनस्तनुः ॥५९॥

अर्थ: शेषनाग के शिर की मणि चाहे कोई छू ले और सिंह के गर्दन के बाल चाहे कोई अपनी मुट्ठी में भरले, पर सतियों के पवित्र शरीर को कोई भी अपवित्र मनुष्य अपने शरीर से नहीं छू सकता ॥५९॥


अतः शुद्धं मनः सम्यक् स्वं विधेहि महामते ।
बोधयन्तीति सा तेन श्रेष्ठिना भणिता पुनः ॥६०॥

अर्थ: इसलिए हे महाबुद्धिमान ! तुम अपने मन को सर्वथा शुद्ध बनाओ, अब तक जो अशुद्ध भावों से गंदा हृदय हो रहा है, उससे उन भावों को निकाल कर पवित्र कर डालो । यह सुनकर सेठ ने फिर श्रीमती से कहा ॥६०॥


पाषाणहृदया जाने सत्यं त्वं बालपण्डिता ।
निर्दक्षिण्यतयास्माकं सन्तापायैव निर्मिता ॥६१॥

अर्थ: अरी मूर्ख ! तुझे मैं अच्छी तरह जान गया हूँ । तू बड़े कठोर हृदय की अधूरी पंडिता है । अरे ! तुझे ब्रह्मा ने वास्तव में मुझे संताप देने के लिए ही सुंदरी बनाया है ॥६१॥


बहिरुल्लासिलावण्यं प्रसन्नाननचन्द्रमाः ।
अन्तर्दुष्टासि दुर्बुद्धे विषवल्लीव किं वृथा ॥६२॥

अर्थ: तू ऊपर से भोली-भाली, लावण्य के चाकचिक्य से देदीप्यमान, मुख की कांति से पूर्णिमा के चांद को भी लजाने वाली है । पर भीतर से बड़ी ही दुष्ट विषवेल के समान है । हे दुर्बुद्धे ! तू जैसी ऊपर है वैसी ही भीतर भी क्यों नहीं हो जाती ॥६२॥


त्वं विधेहि यथाभीष्टं सङ्गरोऽयं पुनर्मम ।
त्वन्मुखालोकनादन्यत् करिष्यामि न किञ्चन ॥६३॥

अर्थ: इस समय मैं तुझसे, अन्य कुछ नहीं चाहता । केवल इतना ही कहता हूँ, कि तू मुझसे अपने संगम की कुछ दिनों के बाद की प्रतिज्ञा करले, जिससे फिलहाल आशा में ही दिन बिताऊँ और तेरे मुख की कांति को आशा भरे नेत्रों से पी-पीकर ही अपना जीवन कायम रखूं ॥६३॥


परमेवंविधप्रेमा - सक्तः सर्वजनप्रियः ।
भक्तश्च द्विजदेवानां प्राणान्प्रोज्झामि ते पुरः ॥६४॥

अर्थ: अन्यथा यदि तू ऐसा न करेगी तो, मैं तेरे सामने ही इसी समय तेरे प्रेम में आसक्त होने के कारण निराशा से प्राण छोड़ दूँगा और द्विज/आचार्य, उपाध्याय व साधुओं के तथा अणुव्रती, जिनदेवों के भक्त समस्त जनों के प्रिय मेरे इस तरह मर जाने से पाप तेरे मत्थे पड़ेगा ॥६४॥


निर्वन्धं तस्य तं ज्ञात्वा समुवाच नृपात्मजा ।
यद्याग्रहस्त्वेत्युच्चैः शृणु त्वं तन्मदीरितम् ॥६५॥

अर्थ: सेठ का इस तरह कठोर दुराग्रह देखकर, श्रीमती राजकुमारी सावधान निर्भय हो, इस प्रकार बोली, यदि आपका ऐसा दृढ़ संकल्प है तो ठीक है किन्तु मैं जो कुछ कहती हूँ उसे ध्यान से सुनिए ॥६५॥


तावत्प्रतीक्षतां मास-षट् कान्तस्य कारये ।
नाम्ना तस्यैव कृत्यानि यावत्पश्चात्त्वदीहितम् ॥६६॥

अर्थ: अच्छा ! यदि आपका अधिक आग्रह ही है और मनोरथ की सिद्धि बिना हुए अपने प्राण तक छोड़ने को तैयार हैं, तो कृपाकर छः महीने तक ठहर जाइए । मैं जब तक अपने पति देव के अनुसार ही कार्य करूँगी । तत्पश्चात् आपकी इच्छानुसार कार्य करूँगी ॥६६॥


यतोऽधुना परित्यज्य भवन्तं गतभर्तृका ।
विना वाच्यतया शक्ता नेतुं जन्म किमेकका ॥६७॥

अर्थ: क्योंकि इस समय पति से रहित, आपको छोड़कर निंदा के बिना, मैं अकेली जन्म को कैसे बिताने के लिए समर्थ हूँ ? ॥६७॥


युक्तायुक्तविचारज्ञो भवानेव हि भूतले ।
अतस्त्वद्वचनादेवं कर्त्तव्यं मम का क्षतिः ॥६८॥

अर्थ: आप समस्त युक्त-अयुक्त के विचारने में चतुर हैं, विवेकी, वृद्ध हैं, आप जो कुछ कहते हैं वह सब ठीक है, उसके करने से मेरी कुछ क्षति नहीं हो सकती ॥६८॥


एवं श्रुत्वाऽवदत् सोऽपि दीर्घ निःश्वस्य सुन्दरि ।
एवमस्तु परंभूयान्-विक्षेपः कालगोचरः ॥६९॥

अर्थ: सेठ समुद्रदत्त श्रीमती के इस प्रकार अपने अनुकूल वचन सुनकर, लंबी सांस खींचकर बोला- हे सुन्दरी ! मैं इसे स्वीकार करता हूँ, पर छः महीने बहुत होते हैं ॥६९॥


त्वदीयाननशीतांशु - त्वद्वचोऽमृतनिर्झरैः ।
मन्दमन्मथसन्तापस्तथापि स्थितिमादधे ॥७०॥

अर्थ: तुम्हारे मुखरूपी चंद्रमा को देखकर और वचनरूपी अमृत के झरनों से काम का संताप कम हुआ है, तो भी मैं तब तक किसी न किसी तरह अवश्य ही ठहरूँगा ॥७०॥


एवं कृते ततः प्राप्तं वासरैर्गणितैस्तटम् ।
यानपात्रं परिज्ञाय तया प्रोक्ता जना निजाः ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार उस सेठ और राजपुत्री श्रीमती में जब समझौता हो गया, तो वे उस समय किसी प्रकार शांत हो गए । इसके कुछ ही दिनों के बाद, दिन गिनते-गिनते, जहाज घाट पर आ गया । तब श्रीमति ने अपने आत्मीय जनों से कहा ॥७१॥


उदक्यास्म्यहमद्यैव तीरद्रुमतले ततः।
स्थास्यामीति च वक्तव्यं श्रेष्ठिनो यदि पृच्छति ॥७२॥

अथ ते सोत्सवाः सर्वे समुत्तीर्णा जनास्ततः।
आदाय प्राभृतं श्रेष्ठी जगाम च नृपान्तिकम् ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 72 से 73): मैं प्यासी हूँ, इसलिए किनारे के वृक्षों के नीचे आज ही बैठना चाहती हूँ और सेठ अगर पूछता है तो इस प्रकार कहना। यह सुनते ही सर्व जन सोत्साह/प्रमोद से वहाँ उतर पड़े, पड़ाव डाल दिया। उधर श्रेष्ठी भी भेंट लेकर राजा के पास जाने को उद्यत हुआ।


तस्यास्तु रक्षका दत्ताः श्रेष्ठिना यानलीलया।
व्याकुलास्तेऽभवन्सापि स्वं जग्राहाखिलं जनम् ॥७४॥

अर्थ: किन्तु सेठ ने उस श्रीमती को रक्षक दिए, वे जहाजों की क्रीड़ा से व्याकुल हुए, तब उसने (श्रीमति) भी अपने सभी लोगों को साथ में ले लिया ॥७४॥


समाहूतपरीवारा स्नानव्याजेन सा ततः।
विनिर्गता लघु प्राप सार्थं चम्पापुरागतम् ॥७५॥

अर्थ: इस अवसर को अच्छा समझ वह स्नान के बहाने अपने खास-खास भृत्यों को लेकर चम्पानगरी में आए हुए वणिकों के एक झुण्ड में जा पहुँची ॥७५॥


उक्तवृत्ता प्रधानेन तत्राग्राहि सुता मम।
भणित्वा भवतीत्येवं निःशङ्का गच्छ पुत्रिके ॥७६॥

अर्थ: इस प्रकार वह अपना समस्त पूर्व समाचार उनको सुनाकर आश्रयदान चाहने लगी। श्रीमती के वृतांत को सुनकर उन वैश्यों के प्रधान ने उसे आश्वासन दिया और पुत्री के समान उसे समझकर निःशंक हो अपने साथ चलने को कहा ॥७६॥


प्राप्ता च क्रमतश्चम्पो-द्यान-मानन्द-दायकम् ।
तत्रादर्शी तया जैनं सद्म पद्मानिकेतनम् ॥७७॥

प्रविशन्ती च तत्रासौ निषद्या-शब्द-पूर्वकम् ।
दृष्टा विमलमत्या च दासी-सेवक-संयुता ॥७८॥

ततः कृत-जिनाधीश-संस्तवा वन्दितार्यिका ।
आसनादिविधिं कृत्वा विश्रान्तावादि सादरम् ॥७९॥

कुतः साध्वि समायाता सुन्दराकारधारिणि ।
क्षेमं च ते समस्तानां तातादीनां तथा शुभे ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 77 से 80): क्रम-क्रम से चलकर वैश्यों का समुदाय और श्रीमती दोनों चम्पानगरी के बाहर उद्यान में पहुँचे और वहाँ पर श्रीमती ने लक्ष्मी/शोभा का स्थान जिनेन्द्र भगवान का मंदिर देखा ॥७७॥ वहाँ वह श्रीमती बड़े ही आनंद से निषीधिका शब्दपूर्वक प्रवेश करती हुई, दासियों व सेवकों सहित, विमलमति के द्वारा देखी गई ॥७८॥ उसके बाद श्री जिनेन्द्रदेव का संस्तव/स्तुति करने वाली और आर्यिका का आदर करने वाली, आसन आदि की विधि को करके विश्राम करती हुई श्रीमती से विमला ने आदर सहित कहा ॥७९॥ हे कुशला सती ! कहाँ से आई हो ? हे सुन्दर आकार को धारण करने वाली ! तुम्हारी और माता-पिता आदि की कुशलता तो है ॥८०॥


विस्मिताभिस्ततस्ताभि र्बहुधा प्रतिबोधिता ।
अवादीत्सखि विस्तीर्णा कथा मे दुःखदायिनी ॥८१॥

देहिनां स्नेहबद्धानां सन्तापोऽस्ति पदे पदे ।
पश्य स्नेहोज्झितं तन्वि कुंकुमं न हि तापयेत् ॥८२॥

वज्रशृङ्खलबद्धानां मुक्तिरस्ति कथञ्चन ।
स्नेहपाशपरीतानां बन्धनञ्च भवे भवे ॥८३॥

कथितानीह कर्माणि भवभ्रमणकारणम् ।
तेषां हेतुतया ख्यातो बन्ध एव शरीरिणाम् ॥८४॥

तस्यापि हेतवः सन्ति विषया विश्वमोहिनः ।
विमुक्तास्तैः परं सौख्यं भुञ्जते भोगनिस्पृहाः ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 81 से 85): जिसके उत्तर में विस्मय को प्राप्त उनके द्वारा बहुत कुछ समझाने पर दुख और शोक के साथ श्रीमती ने कहा-बहिन ! मेरी कथा बड़ी ही दुखदायिनी है ॥८१॥ स्नेह से बंधे हुए प्राणियों को स्थान-स्थान पर संताप हैं, हे कृशांगी ! देखो चिकनाई से रहित केशर, नियम से संतापित नहीं करती ॥८२॥ वज्र की सांकलों से बंधे हुए प्राणियों का छूटना किसी प्रकार हो सकता है और फिर वे नहीं बंध सकते परन्तु स्नेहरूपी जाल से जकड़े हुए प्राणियों का जन्म-जन्म में छूटना न होकर बंधना ही होता चला जाता है ॥८३॥ इस संसार में जीव को सर्वदा, चारों गतियों में भ्रमण कराने वाले उनके शुभ-अशुभ कर्म ही हैं, पर वे भी इसी स्नेह-बन्धन के कारण ही उत्पन्न होते हैं ॥८४॥ उस स्नेह के उत्पन्न करने में भी कारण, इन्द्रियों के विषय हैं । यदि विषय भोगने की इच्छा का सर्वथा नाश हो जाये, तो स्नेह और द्वेष ही न रहें, इसलिये जो भोगों से सर्वदा निस्पृह हैं, वे तो अनंत परम-मोक्ष के नित्य सुख को भोगते हैं ॥८५॥


अस्मादृशास्तु मुह्यन्ति केवलं विषयाशया ।
यथा मधुरया पूर्वं मधुदिग्धासिधारया ॥८६॥

अर्थ: तथा जो हम सरीखे विषय लोलुपी हैं, वे शहद में लपेटी तलवार/छुरी के समान प्रथम ही अच्छे लगने वाले इन्द्रिय विषयों को चाटते-चाटते, इस अनंत दुःखमय संसार में दुःख उठाते फिरते हैं ॥८६॥


वदन्तीमिति तां दुःख-भार-भङ्गुर-मानसाम् ।
एवमाश्वासयामास विमलादिमतिस्तदा ॥८७॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यंत शोक परिपूर्ण वचनों में अपने वृतांत की भूमिका को कहती हुई श्रीमती को विमलमति ने बीच में ही रोककर धैर्य बंधाने के लिए कहा ॥८७॥


यथा यैरर्जितं पूर्वं दुःखं वा यदि वा सुखम् ।
निरोद्धुं प्रसरस्तस्य शक्रैरपि न शक्यते ॥८८॥

अर्थ: प्यारी बहिन ! अधिक शोक करने की आवश्यकता नहीं है, जो जैसा जिसके भाग्य में सुख-दुःख होना होता है, वह अवश्य ही होकर रहता है, उसको यदि इन्द्र भी विपरीत करना चाहे तो नहीं कर सकता ॥८८॥


पूर्वकर्मानुसारेण स्नेहद्वेषौ च सुन्दरि ।
जायेते तौ च वर्द्धेते चिन्त्यमानौ दिवानिशम् ॥८९॥

अर्थ: हे सुन्दरी ! स्नेह और द्वेष ये दोनों भी पूर्वकर्म के अनुसार ही होते हैं और चिंता करने से रात-दिन उसी के कारण ही बढ़ते चले जाते हैं ॥८९॥


क्षणात्सुखं क्षणाद्दुःखं क्षणाद्दासः क्षणात्पतिः ।
अनिष्टाभीष्टयोः सङ्ग-वियोगौ च क्षणादपि ॥९०॥युगलं॥

अर्थ: इस कर्म के कारण यह जीव क्षणभर में सुखी, क्षणभर में दुःखी, क्षणभर में दास, क्षणभर में स्वामी और क्षण में इष्टजनों के वियोग, अनिष्टजनों के संयोग से संयुक्त हो जाता है ॥९०॥


[कर्मों का विचित्र फल]


रूपलावण्यसौभाग्य-भङ्गो यत्र मुहूर्त्तः ।
तत्रास्ति सखि किं क्वापि संसारे सुखसम्भवः ॥९१॥

अर्थ: हे सखि ! जिस संसार में रूप, लावण्य और सौभाग्य के भंग हो जाने में कुछ भी देरी नहीं लगती, उसमें सुख कैसे हो सकता है ? ॥९१॥


भावा हर्षविषादाद्या निमेषमपि चक्षुषः ।
विजित्य यत्र वर्त्तन्ते कुतस्तत्र भवेद्रतिः ॥९२॥

अर्थ: हर्ष-विषाद आदि परस्पर विरुद्ध भावों के उदय होने में जहाँ पलक झपकने के समान भी देरी नहीं लगती, वहाँ प्रेम की स्थिरता कहाँ रह सकती है ? ॥९२॥


इदं हीनतमं चात्र जन्म स्त्रीणां सुलोचने ।
तातादयोऽप्यहो यत्र परेभ्यः पालयन्ति ताः ॥९३॥

अर्थ: हे सुलोचने ! हम स्त्रियों का जन्म इस संसार में बड़ा ही निकृष्ट है, जो सबसे अधिक प्यार करने वाले माँ-बाप भी हमें दूसरों के लिए ही पाल-पोषकर बढ़ाते हैं ॥९३॥


अवाप्य च महानर्थ-कारि किं नवयौवनम् ।
मोहिता रतिसौख्येषु जायन्ते कान्तजीविताः ॥९४॥

अर्थ: महा अनर्थकारी यौवन के प्रारंभ होने पर कामजन्य सुखों में लिप्त हो, हम सर्वथा पति के जीवनाधार ही हो जाती हैं ॥९४॥


वियोगे सति कान्तस्य सर्वतो म्लानमूर्त्तयः ।
अन्तः शुष्यन्ति सन्तापै रम्भोजिन्यो हिमैरिव ॥९५॥

अर्थ: और पति के वियुक्त हो जाने पर, पाले के पड़ने से कमलिनी के समान मानसिक संतापों से दग्ध हो सूखने लगती हैं ॥९५॥


संजात-रस-भङ्गास्ता बहिर्वर्ण-मनोहराः ।
अलङ्कार-विनिर्मुक्ताः सुवृत्ता अपि शङ्किताः ॥९६॥

अर्थ: पति के वियोग हो जाने पर अंतरंग में सार-शून्य हुईं बाहर से ही केवल मनोहर लगने वाली, अलंकारों से सर्वथा रहित हम लोग के चरित्र को, चाहे वह निर्मल ही क्यों न हो, तो भी शंकालु लोग दूषित ही समझने लगते हैं ॥९६॥


जीवन्ति क्लेशतो नित्यं प्रसादादिगुणोज्झिताः ।
निरीक्षितापशब्दास्तु कृतयः कुकवेरिव ॥९७॥

अर्थ: जिस प्रकार कुकवियों की कविता ओज, प्रसाद आदि काव्य के गुणों से सर्वथा रहित होती हैं, कष्टपूर्वक बनायी जाती हैं और अपशब्दों से भरी रहतीं हैं, इसलिए उसकी कोई कदर नहीं करता, उसी प्रकार हम पति विरहिता होने से कष्टपूर्वक तो जीवन व्यतीत करती ही हैं, प्रसन्नता, हास्य आदि से सर्वथा शून्य रहतीं हैं और अपशब्दों से ही पुकारी जाती हैं । यहाँ श्लेष गर्भित उपमा अलंकार है ॥९७॥


इदमेव परं सर्वं सम्पदामास्पदं ध्रुवम् ।
शासने यज्जिनेन्द्राणां भक्तिरेव शुभानने ॥९८॥

अर्थ: अतः इस निंदनीय स्त्रीपर्याय का अंत करने के लिए, समस्त संसार की संपत्तियों को प्रदान करने वाले, जिनेन्द्र भगवान के शासन में ही मन को भक्ति में लगाना ठीक है । उसी के सेवन से हमारा कल्याण होगा ॥९८॥


साधारणे च सर्वेषां सुखदुःखे तनूभृताम् ।
अतश्चित्तसमाधानं कृत्वा भुङ्क्ष्व पुरार्जितम् ॥९९॥

अर्थ: सुख और दुःख जब इस संसार में समस्त जीवों को समान ही हैं, किसी को भी चिरस्थायी सुख नहीं, तब वह हमें कहाँ से मिल सकता है ? इसलिए पूर्व उपार्जित कर्म के फल को भोगने के लिए हमें सर्वदा तैयार रहना चाहिए । अपने मन को स्थिर रख सर्वदा कर्म के फलों को समता पूर्वक भोगना चाहिए ॥९९॥


इत्थं सम्बोधितावादीत् स्ववृत्तान्तमशेषतः ।
वयोवेषवचश्चेष्टाः सापि पप्रच्छ सादरम् ॥१००॥

अर्थ: इस प्रकार विस्तारपूर्वक विमलमति से समझाई गई, उस श्रीमती ने अपना और अपने पति का समस्त वृत्तांत उससे कह डाला । उसे सुनकर विमलमति ने जब उसके पति की रूप, चेष्टा आदि पूछी तो वे भी उसने कह दी ॥१००॥


अचिन्तयच्च किं कान्तो मम चैष भविष्यति ।
अथवा धिगिमं दुष्ट-संकल्पमशुभास्रवम् ॥१०१॥

अर्थ: जिसे सुनकर विमलमति के मन में एक अद्भुत तरंग उठी, उसने सोचा हो न हो, यह मेरे पति जिनदत्त ही तो नहीं हैं । इसकी बतलाई सब चेष्टायें उनसे मिलती-जुलती ही मालूम पड़ती हैं । अथवा इस अशुभ आस्रव रूप दुष्ट संकल्प को धिक्कार हो । मन में बिना निश्चय किए इस प्रकार के भाव करना सर्वथा अयोग्य है ॥१०१॥


सन्त्यनेके यतो रूप-चेष्टितैः सदृशा नराः ।
अन्यः कोऽपि तथाभूतो भविता(तो)यं महामनाः ॥१०२॥

अर्थ: दुनिया में एक तरह के अनेक मनुष्य होते हैं, बहुत से रूप और चेष्टाओं में समान होते हैं, पर रहते भिन्न-भिन्न हैं । यह भी इसका पति कोई मेरे पति से भिन्न ही होगा ॥१०२॥


तस्यै जगाद सा सर्वं निजवृत्तं विचक्षणा ।
भूत्वा समानदुःखा च सस्नेहं समुवाच ताम् ॥१०३॥

अर्थ: उस विमलमति ने अपने चरित्र को बुद्धिमति श्रीमती के लिए कहा और समान दुखवाली होकर विमलमति ने प्रेमपूर्वक उस श्रीमति से बोली ॥१०३॥


जिनधर्मरते नित्यं तपःस्वाध्यायतत्परे ।
कियन्तमपि तिष्ठावः कालं भगिनि सङ्गते ॥१०४॥

पश्चाज्ज्ञातयथावृत्ते सर्वदुःखविनाशनम् ।
करिष्यावो महामोह-मथनं निर्मलं तपः ॥१०५॥

अर्थ (श्लोक 104 से 105): हे भगिनि ! नित्य ही जिनधर्म में रत होकर तप, स्वाध्याय में तल्लीन हो यहीं कुछ काल तक हम लोग रहें । पश्चात् पतिदेव संबंधी निश्चित वृत्तांत को ज्ञातकर समस्त दुख विनाशक महामोहमल्ल का मंथन करने वाले, निर्मल सुतप को स्वीकार करेंगे ॥१०५॥


अत्रान्तरे समाज्ञाय वार्त्तां तां वत्सलः सताम् ।
समाजगाम तत्रैव श्रेष्ठी विमलसञ्ज्ञकः ॥१०६॥

अर्थ: इसी बीच में उन विमलमति और श्रीमति की वार्ता को जानकर सज्जन प्रेमी विमल नामक सेठ वहाँ उस जिनालय में आए ॥१०६॥


ततः स्तुत्वा जिनाधीशं निविष्टो निकटे तयोः ।
चक्रतुस्ते समुत्थाय प्रणामं तस्य सादरम् ॥१०७॥

अर्थ: उसके बाद सेठने जिनवर स्वामी की स्तुति कर उन दोनों के पास में जाकर बैठा । उन दोनों ने उठकर, उस विमलसेठ को आदरपूर्वक प्रणाम किया ॥१०७॥


अभिनन्द्य ततोऽप्राक्षीत्कुशलं नृपदेहजाम् ।
सलज्जा लोकयामास भगिन्या वदनं च सा ॥१०८॥

अर्थ: इसके बाद सेठ ने अभिवादन कर राजपुत्री की कुशलता पूछी और उस श्रीमती ने लज्जा सहित बहिन के मुख को देखा ॥१०८॥


ज्ञाताकूता च सा तातं बुद्धतद्वृत्तविस्तरम् ।
चकार मस्तकं धुत्वा चिन्तयामास सोऽप्यदः ॥१०९॥

अर्थ: उसके उत्तर में श्रीमती ने अपनी सखी विमलमति की तरफ नीची निगाहकर वृत्तांत कहने की इच्छा प्रकट की । जिससे विमलमति ने भी उसका समस्त वृत्तांत अपने पिता को कह सुनाया ॥१०९॥


क्वेदं त्रिभुवनानन्दि वयोस्याः शुभसूचकम् ।
सर्वस्वं स्मर-राजस्य दशा चेयं क्व दारुणा ॥११०॥

अर्थ: ओह ! कहाँ तो तीनों लोकों को आनंदित करने वाली शुभसूचक इसकी यह उम्र और कहाँ काम की सर्वस्व इसकी यह दारुण अवस्था ? ॥११०॥


तादिहैवं विनिक्षिप्य व्यसने विधिनाधुना ।
चक्रेऽमृते कथं तत्र कालकूट-विमिश्रणम् ॥१११॥

अर्थ: हे भगवन् ! यह क्या भाग्य की विडम्बना है, जो इस समय इस सुंदरी को इस प्रकार दारुण दशा में डाला है। मालूम होता है दुर्वार विधि ने अमृत में विष घोल दिया है, इस प्रकार क्यों किया, यह समझ में नहीं आता ॥१११॥


अथवा प्राक्कृतासात-प्रबन्धवशवर्त्तिनः ।
एवं हन्त प्रजायन्ते जन्तवो दुःखभाजनम् ॥११२॥

अर्थ: अथवा पूर्वोपार्जित असाता वेदनीयकर्म के उदय के वशवर्ती हो, इसे यह दुःख हुआ है । क्योंकि प्राणियों को निजार्जित कर्मानुसार दुःखों को सहन करना ही पड़ता है ॥११२॥


उवाच च सुते शोकं विमुच्य सकलं सुखम् ।
तिष्ठात्र धर्मसन्निष्ठा भगिन्या सहितानया ॥११३॥

अर्थ: इस प्रकार कुछ क्षण विचार कर सेठ उससे बोला, हे पुत्री ! चिन्ता मत करो, शोक छोड़ो, हर प्रकार सुख से इस अपनी बहिन विमलमति के साथ धर्म सेवन करते हुए रहो ॥११३॥


नूनं य एव नाथस्ते पतिरस्याः स एव हि ।
केनापि हेतुना चैते सफला वां मनोरथाः ॥११४॥

अर्थ: पुनः वह कहने लगे, निश्चय ही जो तुम्हारा पति है, वही मेरी पुत्री का भी होना चाहिए, किसी भी उपाय से आप लोगों का मनोरथ सिद्ध होवेगा ॥११४॥


युवयोस्तस्य चात्रापि सा कृतिः शुभदर्शने ।
यया भवन्ति निःशेष-कल्याणानि निरन्तरम् ॥११५॥

अर्थ: हे शुभ दर्शने ! तुम दोनों यहाँ वे ही शुभ क्रियाएँ अपने पतिदेव के प्रति करो जिनसे समस्त कल्याण निरन्तर प्राप्त होते हैं ॥११५॥


अतो यावत्कुतोप्येति तस्योदन्तो दयावति ।
तावत्प्रतीक्ष्यतां भद्रे सदनेऽत्रैव सौख्यतः ॥११६॥

अर्थ: अतः जब तक कहीं से भी, किसी भी प्रकार आपके पति का वृत्तान्त प्राप्त न होवे, तब तक आप यहीं इसी जिनालय में सुख से निवास करें ॥११६॥


इत्थमाश्वास्य ते श्रेष्ठी जगाम निजमन्दिरम् ।
प्रीते परस्परं तत्र तिष्ठतस्ते यथासुखम् ॥११७॥

अर्थ: इस प्रकार सांत्वना देकर सेठजी अपने घर चले गए। वे दोनों प्रीतिपूर्वक स्नेह से सुखपूर्वक वहाँ रहने लगीं ॥११७॥


जिनेन्द्र - पूजा - यति - दान - जैन - श्रुताध्याभ्यास - विमान - सक्ते ।
जितेन्द्रिये ते जनता विलोक्य चकार धर्मे बहुधा प्रयत्नम् ॥११८॥

मुक्तावलीप्रभृतिचित्रविधिप्रसक्ते सम्यक्त्व मौक्तिकशुभाभरणाभिरामे ।
तत्र स्थिते भुवमुपागतकीर्तिलक्ष्म्यौ यद्वत्प्रसन्नवदने मदनार्त्तिमुक्ते ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 118 से 119): उन दोनों को जिनवरपूजा, मुनिदान, जैनशास्त्रों के अध्ययन और अभ्यास से विशेष सम्यग्ज्ञान में आसक्त तथा जितेन्द्रिय, मुक्तावलि आदि अनेक व्रतोपवासों की विधि में लवलीन, सम्यक्त्वरूपी मोतियों के शुभ आभूषणों से सुन्दर प्रसन्नमुख वाली, काम की इच्छा रहित हो दिन बिताने लगीं एवं पृथ्वी पर अवतीर्ण हुई कीर्ति और लक्ष्मी के समान उन दोनों को देखकर, जनता जनार्दन ने भी बहुत प्रकार से धर्म में प्रयत्न किया ॥११८,११९॥

षष्ठः सर्गः

अथासौ जिनदत्तोऽपि निमज्य जवतो जले ।
गतपोतं प्रदेशं तमद्राक्षीदुत्थितस्ततः ॥१॥

अर्थ: जिस समय जिनदत्त ने गिरी हुई वस्तु को उठाने के लिए समुद्र में डुबकी लगाई और कार्य सिद्ध हो जाने पर ऊपर उछाल मारी, तो अपना आलम्बनभूत रस्सा कटा पाया और जहाज का निशान तक उस जगह न देखा ॥१॥


जायते महतां चित्तं कोमलं नवनीतवत् ।
सम्पत्तौ कठिनं चेदं विपत्तावश्मसन्निभं ॥२॥

अर्थ: यह देख वे सेठ की चालाकी समझ गए और मन में यह सोचकर कि सज्जनों का मन सम्पत्ति/सुख में तो मक्खन के समान कोमल होता है और विपत्ति/दुःख में पत्थर से भी अधिक कठोर हो जाता है ॥२॥


सम्भाव्येति पयोराशि-र्भुजाभ्यां भयवर्जितम् ।
तरीतुं प्रारम्भे तेन किमसाध्यं मनस्विनाम् ॥३॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर भय से रहित जिनदत्त ने दोनों हाथों से समुद्र को तैरना प्रारंभ किया । ठीक ही है मनस्वियों के लिए संसार में क्या कुछ दुर्लभ है ? कुछ भी नहीं । ॥३॥


प्राप्तं च तरता तेन पुरस्तात्फलकं तथा ।
मित्रमालम्बनं तेन गाढ़मालिङ्गितं च तत् ॥४॥

अर्थ: और उसने तैरते हुए सामने लकड़ी के पटिये को देखा, शीघ्र ही उछल कर उसे सच्चे मित्र के समान जोर से पकड़ लिया ॥४॥


पादाभ्यां क्वापि कट्याऽसौ पृष्ठ-वंशेन च क्वचित् ।
उदरेण गताशङ्कं तरतिस्म निराकुलम् ॥५॥

यावत्तावत्पुरो दृष्टं गगने प्राकृताकृति ।
पुरुषद्वितयं तेन तत्रैकेन प्रजल्पितम् ॥६॥युगलं॥

अर्थ (श्लोक 5 से 6): इस फलक का सहारा लेकर, कभी पैरों से, कभी भुजाओं से, कभी छाती के बल से, कभी कमर की ओर से, कभी पीठ के सहारे से तथा कभी पेट के सहारे से निर्भय होकर, निराकुलता से तैरने लगा । इस प्रकार गंभीर समुद्र में जिनदत्त तैरते चले जाते थे, कि मार्ग में सुन्दर आकार के धारक दो पुरुष आकाश में जाते हुए दिखे, उनमें से एक ने उन्हें लक्ष्यकर ताड़ना पूर्वक कहा ॥५,६॥


रे रे नृ-कीट१ ! किं कर्म विहितं भवताधुना ।
येनास्मद्रक्षितं वार्धिं२ पादाभ्यामवगाहसे ॥७॥

अर्थ: रे ! रे ! नर कीट तू कौन है ? तूने यह क्या कार्य प्रारम्भ किया है, हमारे द्वारा रक्षित समुद्र को तू पैरों से रौंद रहा है ॥७॥


शक्रोऽप्यत्र जलक्रीडां कर्तु-माशङ्कते मम ।
दुरात्मन्नद्य किं याति जीवन्नेव भवानितः ॥८॥

अर्थ: हे दुरात्मन् ! मेरे सामने यहाँ इन्द्र भी क्रीड़ा करने में भयभीत हो काँपता है, फिर भला तेरा क्या साहस ? क्या आज तू जीवित रह सकता है ? ॥८॥


विप्रलब्धोऽसि केनापि मन्दभाग्यतयाथवा ।
मन्नाम न श्रुतं क्वापि येनैवं विचरस्यहो ॥९॥

अर्थ: हे मन्दभाग्य ! क्या किसी के द्वारा तुम वंचित किए गए हो या उन्मत्त हुए हो ? क्या मेरा नाम नहीं सुना है, जो इस प्रकार निर्भीक घूम रहे हो ॥९॥


निशम्येति करं कृत्वा दक्षिणं क्षुरिकोपरि ।
वामं च फलके दत्वा प्रोवाचेति समत्सरम् ॥१०॥

अर्थ: इस प्रकार कठोर वचनों को सुनकर जिनदत्त श्रमित होते हुए भी चौकन्ना हो उठा । दाहिना हाथ छुरी पर जा पहुँचा, बाएँ हाथ से फलक को पकड़ा और बड़े अहंकार से ललकारा ॥१०॥


शरन्मेघ इव व्यर्थं कुरुषे गलगर्जितम् ।
दूरे एव किमाश्वेहि जुहोमि वडवानले ॥११॥

अर्थ: अरे ! क्या व्यर्थ ही शरत्कालीन मेघों के समान कोरे गाल बजा रहे हो ? दूर ही से क्यों गरजते हो ? आओ मेरे सामने अभी बड़वाग्नि में तुम्हारा होम करता हूँ ॥११॥


आकाश-गमनादेव मामंस्थास्त्वं१ महत्तमम् ।
आत्मानमत्र यद्यान्ति पक्षिणोऽपि भयाकुलाः ॥१२॥

अर्थ: मात्र आकाश में गमन करने से ही तुम अपने को महान् समझते हो, भयाकुल पक्षी भी आकाश में उड़ जाते हैं अर्थात् तुम पक्षी के समान क्यों इसका अभिमान करते हो ॥१२॥


शङ्कन्तां हन्त शक्राद्या भोगलालस-मानसाः ।
अहमस्मि पुनर्मल्लो मुञ्च शस्त्र-मशङ्कितः ॥१३॥

अर्थ: तुमसे इन्द्रादि भी भयभीत होते होंगे क्योंकि वे भोगों में लोलुप रहते हैं। मैं मल्ल हूँ, तुममें शक्ति है तो निशंक होकर शस्त्र चलाओ ॥१३॥


प्रमाद्यतोऽपि सिंहस्य लुप्यते केसरच्छटा ।
कुरङ्गैः क्वापि रे मूढ ! दृष्टं वेति श्रुतं त्वया ॥१४॥

अर्थ: सिंह चाहे कितने ही प्रमाद या असावधानी से सोता हो, उसकी गर्दन के बाल तुच्छ डरपोक हिरण नहीं उखाड़ सकते। तेरे द्वारा कहीं पर भी इस प्रकार देखा अथवा सुना गया है ॥१४॥


श्रुत्वेति तं महासत्त्व-शालिनं समुवाच सः।
कोपं मुञ्च महावीर ! मयैवं त्वं परीक्षितः ॥१५॥

अर्थ: अपने वाक्यों के उत्तर में इस प्रकार दूने क्रोध और तिरस्कार से भरे जिनदत्त के वाक्यों को सुनकर, उस गगनगामी पुरुष ने नम्र हो कहा-हे महावीर ! क्रोध को छोड़कर शांत होइए मैंने तुम्हारी परीक्षा की है ॥१५॥


प्रसीद शृणु मद्वाक्य-मप्रपञ्चं महामते ।
यथास्ति विजयार्द्धाद्रि-दक्षिणश्रेणिमण्डने ॥१६॥

अशोकश्रीः खगाधीशो रथनूपुरपत्तने ।
विजयाकुक्षिसम्भूता शृङ्गारादिमतिः सुता ॥१७॥युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 16 से 17): हे महासत्व के धारक निर्भय वीर पुरुष ! आप क्रोध छोड़कर प्रसन्न होइए और यथार्थ में मेरे वाक्यों को सुनिए। विजयार्द्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी में रथनूपुर नाम का एक विद्याधरों का नगर है। उसके स्वामी अशोकश्री के विजया महारानी के गर्भ से उत्पन्न शृङ्गारमति नाम की एक श्रेष्ठ सुंदर कन्या है ॥१६,१७॥


[जिनदत्त की आक्रोश भरी वाणी सुनकर दोनों विद्याधरों द्वारा क्षमा माँगना]


तस्य सा सुकुमाराङ्गी प्राप्त-यौवन-मण्डना ।
विद्याधरकुमारेषु वरं नेच्छति कञ्चन ॥१८॥

अर्थ: उस राजा की शृङ्गारमति नाम की कोमल अंगों वाली प्राप्त हुए यौवन के सौन्दर्य युक्त विद्याधर कुमारों में किसी भी वर को नहीं चाहती ॥१८॥


ज्योतिर्विदा समादिष्टं तदेवं यः पयोनिधौ ।
तरिष्यति भुजाभ्यां स वरीता तव देहजाम् ॥१९॥

अर्थ: इस प्रकार ज्योतिषी से पूछने पर मालूम हुआ है कि जो समुद्र में अपनी भुजाओं से तैरता हुआ मिलेगा, वही इसका पति होगा ॥१९॥


तदर्थं प्रेषितावावां विद्याभू-चक्रवर्त्तिना ।
वायुवेग-महावेगौ विद्याधर-कुमारकौ ॥२०॥

अर्थ: ज्योतिषी के वचनानुसार विद्याधरों के राजा अशोकश्री ने वायुवेग एवं महावेग नामक हम दोनों विद्याधर कुमारों को, यहाँ समुद्र में तैरने वाले पुरुष को देखने के लिए नियुक्त कर दिया है ॥२०॥


ततः प्राप्तोऽसि पुण्येन विश्वकल्याणभाजनम् ।
नररत्नं त्वमित्युक्त्वा तं चक्रे तटवर्त्तिनम् ॥२१॥

अर्थ: आज पुण्य से आप जैसे विश्वकल्याण के पात्र नरश्रेष्ठ को प्राप्त किया । आइए इस प्रकार मधुर, प्रिय वचनों से सम्बोधन कर उसे सागर तट पर आसीन किया ॥२१॥


संस्नातो मधुराम्भोभि-र्दिव्यवस्त्रविभूषितः ।
समारोप्य विमानेऽसौ ताभ्यां नीतस्तदन्तिकम् ॥२२॥

अर्थ: वहाँ पहुँचकर शीघ्र मीठे जल से स्नान कराया, सुंदर मनोहर वस्त्रों को पहनकर विद्याधर कुमारों के द्वारा विमान में बिठलाकर जिनदत्त को विद्याधर राजा के पास ले जाया गया ॥२२॥


रूपातिशयमालोक्य तस्यासौ दूरतो नृपः।
न ममौ हृदि हर्षेण रोमाञ्चाञ्चितविग्रहः॥२३॥

अर्थ: रथनूपुर नगर के अधिपति अशोकश्री ने जिस समय कुमार जिनदत्त के स्वरूप को देखा, उस समय हर्ष से रोमांचित शरीर वाला हो हृदय में फूला न समाया ॥२३॥


अचिन्तयच्च किं साक्षात् कन्दर्पोऽयमुपागतः।
नान्यथैवंविधा रूप-कान्ति-लावण्य-सम्पदः॥२४॥

अर्थ: राजा ने सोचा यह बड़ा ही सुंदर युवा है। कहीं यह साक्षात् कामदेव तो नहीं आ गया, अन्यथा इस प्रकार की रूप और लावण्य की महिमा अन्यत्र कहाँ हो सकती है ? ॥२४॥


अथवा सन्ति संसारे सौभाग्यकुलमन्दिरम्।
ते केऽपि पुरतो येषां मनोभूरपि१ लज्जते॥२५॥

अर्थ: अथवा संसार में एक से एक बढ़िया पुरुष रहते हैं, उनमें से कोई ही ऐसे भाग्यशाली होते हैं, जिनकी सुंदरता को देख कामदेव भी लज्जित हो जाता है ॥२५॥


यथा चिन्तित एवायं वरो विद्याभृदुत्तमः।
लब्धः पुण्येन कन्यायाः कुत्राप्यप्राकृताकृतिः॥२६॥

अर्थ: जैसा मैं कन्या के लिए गुणी, विद्वान्, सुंदर वर चाहता था, वैसा ही यह कन्या के पुण्य प्रभाव से मिल गया ॥२६॥


अथान्येद्युः शुभे लग्ने सुमुहूर्त्ते तिथौ शुभे ।
विवाहमङ्गलं राजा कन्यायास्तेन सन्दधे ॥२७॥

अर्थ: इस प्रकार शृङ्गारमति के पिता ने जिनदत्त को सब प्रकार से योग्य समझकर शुभदिन, शुभमुहूर्त्त, शुभतिथि एवं शुभलग्न में उससे कन्या का विवाह कर दिया ॥२७॥


विज्ञाप्य श्वसुरं तेन दत्तचित्र-विभूतिकः ।
प्रतस्थे स्वपुरं साकं कान्तया कान्तया१ तया ॥२८॥

अर्थ: जिनदत्त भी कुछ दिन वहाँ रहकर अपनी पत्नी के साथ श्वसुर से दिए गए उपहार को ले अपने नगर की ओर चल दिए ॥२८॥


चञ्चच्चारुध्वजव्रातं किङ्किणी२-क्वाणसुन्दरम् ।
प्रलम्बमौक्तिकोद्दाम-दामाढ्यं बहुभूमिकम् ॥२९॥
वरं विमानमारुढः पुरोद्यान-नदी-नगान् ।
प्रियायै दर्शयन्नेष यावद्याति विहायसा ॥३०॥युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 29 से 30): छोटी-छोटी घंटियों के शब्दों के करने से महामनोहर लगने वाले, शोभनीय, लहलहाती हुई सुंदर ध्वजाओं के समूह से मंडित, मोतियों की मालाओं से सुसज्जित, बहुत लंबे-चौड़े विमान में बैठकर मार्ग को तय करते हुए जिनदत्त और शृङ्गारमति आकाश से चले जा रहे थे । नोट-[यहाँ गगनगामी विमान का भव्य वर्णन आया है, जो जैन वैज्ञानिकों के अस्तित्व को सिद्ध करता है ।] ॥२९,३०॥


चम्पापुरीप्रवेशे हि जाता रात्रिस्ततः प्रिया ।
उक्ता तेन यथा तिष्ठ जाग्रती त्वं स्वपिम्यहम् ॥३१॥

अर्थ: कि इतने में जैसे ही चम्पापुरी में प्रवेश करते है तो रात्रि हो जाती है, रात्रि हो जाने से जिनदत्त ने अपनी प्यारी पत्नी शृङ्गारमति से कहा-प्रिये मैं पहले सो जाता हूँ और तुम जागती रहना ॥३१॥


[अशोक राजा की पुत्री शृंगारमति के साथ जिनदत्त का विवाह]


समुत्थाय शयित्वासौ तामवादीदिति प्रिये ।
स्वपिहि गताशङ्का तिष्ठाम्येष पुरस्तव ॥३२॥

अर्थ: इसके बाद थोड़ी देर सोकर उठा और फिर उसने कहा मैंने सो लिया है अब तुम शंका रहित हो सो जाओ । मैं यहाँ तेरे सामने ही बैठा हूँ ॥३२॥


एवमस्त्विति सञ्ज्ञाप्य१ सा सुष्वाप सुनिर्भरम् ।
प्रसुप्तां तां ततो ज्ञात्वा जिनदत्तस्तिरोधधे२ ॥३३॥

अर्थ: पति की आज्ञानुसार शृङ्गारमति अच्छी तरह गाढ़निद्रा में सो गई, उसके बाद उसको गहरी नींद में सोती हुई जानकर जिनदत्त कहीं तिरोहित हो छिप गए ॥३३॥


उन्मोटिताङ्गयष्टिः सा यावदुत्तिष्ठते ततः ।
अरण्यं वां विमानं तद्-अद्राक्षीद्दयितोज्झितम् ॥३४॥

अर्थ: कुछ समय बाद जब शृङ्गारमति अंगड़ाई लेकर उठती है, तब तक उसने जंगल और विमान को पति से रहित देखा ॥३४॥


ददर्श च दिशस्तेन विना सतिमिरा इव ।
व्योमासोमं महीं मोह-जननीं जातविभ्रमा ॥३५॥

अर्थ: तथा उसने भयातुर हो चारों ओर दिशाओं में नजर दौड़ाई, सर्वत्र काल के समान घोर अंधकार दिखाई दिया । आकाश में चंद्रमा भी नहीं था । पृथ्वी मोहको उत्पन्न करने वाली भ्रम पैदा कर रही थी अर्थात् झुरमुट में कुछ भी स्पष्ट प्रतिभाषित नहीं हो रहा था ॥३५॥


विललाप ततो यूथ-भ्रष्टेव हरिणी भृशम् ।
विषाद-तरलां दृष्टिं पातयन्ती समन्ततः ॥३६॥

अर्थ: शृङ्गारमति ने अपने समूह से बिछड़ी हुई हरिणी के समान विषाद से भींगी हुई दृष्टि को सब ओर फैलाते हुए अत्यधिक विलाप किया ॥३६॥


जीवितेश ! समुत्सृज्य मामत्र क्व गतोऽधुना ।
निमेष-मपि ते सोढुं वियोग-मह-मक्षमा ॥३७॥

अर्थ: हे प्राणाधार प्रियतम ! आप मुझ अबला को एकाकिनी इस शून्य प्रदेश में छोड़ कहाँ बिना कुछ कहे-सुने ही चले गए । मैं आपके वियोग को क्षण मात्र भी नहीं सह सकती ॥३७॥


नर्माशर्म्मकरं कान्त त्यज चित्तविदाहि मे ।
मालतीमुकुलम्लानिं धत्ते हि हिममारुतः ॥३८॥

अर्थ: यदि आप मुझ से इस प्रकार छिपकर हँसी कर रहे हैं, तो कृपाकर शीघ्र ही इस मर्मभेदी मेरी छाती को फाड़ने वाली दिल्लगी को संकुचित कर लीजिए । क्योंकि ठंडी वायु भी मालती के फूल को मुरझा देती है ॥३८॥


रागान्धया कयाथाशु किं हृतः खग-कन्यया ।
केनापि वारिणा नाथ नररत्नं कटाक्षितम् ॥३९॥

अर्थ: हे नाथ ! क्या किसी राग से अंधी विद्याधर कन्या ने आप नर-श्रेष्ठ को कामपाश से बांध लिया अथवा किसी शत्रु ने आपको हर लिया है ॥३९॥


स्वप्नेनापि न मेऽनिष्टं शिष्टं बान्धव-सूचितम् ।
क-मरिष्ट-मिदं जातं दत्तदुःखपरम्परम् ॥४०॥

अर्थ: हे प्रिय ! मैंने स्वप्न में भी यह नहीं सोचा । मेरे श्रेष्ठ बांधवों ने भी कभी इस प्रकार की सूचना नहीं पायी । न जाने किस अशुभ कर्म के उदय ने इस दुःख परम्परा में मुझे लाकर डाला है ॥४०॥


अथवास्ति न ते दोषः लेषोऽपि शुभदर्शन ।
ममैव पूर्वकर्म्माणि फलन्त्येवं सविस्तरम् ॥४१॥

अर्थ: अथवा हे शुभ दर्शन ! इसमें आपका तनिक भी दोष नहीं है, मेरा ही पूर्वजन्म कृत अशुभकर्म इस समय विस्तारपूर्वक अतिशयरूप में प्रतिफलित हुआ है ॥४१॥


राजहंसो मया कान्ता-सन्निधौ कुंकुमादिभिः ।
प्रायः पिञ्जरितः किन्तु क्रीडापद्मसरःस्थितः ॥४२॥

प्रातरेवाथ कान्तायाः सङ्गमाभिमुखो मया ।
रथाङ्ग-विहगश्चक्रे वियुक्तो युक्ति-हीनया ॥४३॥युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 42 से 43): नियम से मैंने पूर्वभव में सरोवर में निःशंक क्रीड़ा करते हुए राजहंसी-राजहंस में से राजहंस को कुंकुमादि से भिन्न रंग का कर वियुक्त किया होगा और सुबह रतिकाल में अपनी प्यारी के संगम का उत्सुक चक्रवाक किसी चक्रवाकी से वियुक्त कर दिया होगा ॥४२,४३॥


किं मया मदनातङ्गा-दन्य-जन्मनि विघ्निता ।
सपत्नी वनिता वान्त्या भर्तृ-सङ्गम-लालसा ॥४४॥

अर्थ: क्या मेरे द्वारा अन्य जन्म में काम की पीड़ा से पीड़ित पत्नी सहित पुरुष अथवा अन्य कामेच्छुक स्त्री को पति के मिलने की इच्छा में विघ्न डाला गया होगा ॥४४॥


तस्येदं फल-मायात-मलंघ्य-मति-दुःसहम् ।
किंततोऽहं विधास्यामि भग्नाशा निर्जने वने ॥४५॥

अर्थ: इन्हीं समस्त पापों का अवश्य ही भोग्यफल मुझे इस जन्म में प्राप्त हुआ है । हे नाथ ! मैं इस निर्जन जंगल में रहकर क्या करूँ ? ॥४५॥


वल्लभानाथ ! चेन्नाहं मुञ्च मां कुलमन्दिरे ।
एककां तत्र यान्तीं मा-मयशो हन्ति दुर्वचम् ॥४६॥

अर्थ: हे प्राण वल्लभ ! मुझे अनाथ मत छोड़िए, यदि मैं एकाकी अपने पिता के घर जाऊँ, तो अवश्य ही मेरे यश का नाश होगा तथा लोग दुर्वचनों से पीड़ित करेंगे ॥४६॥


यद्यहं सापराधापि दीयतां दर्शनं लघु ।
कारुण्यं क्व (त्र) ते कान्त मामेवं यद्युपेक्षसे ॥४७॥

अर्थ: हे नाथ ! यदि आप मुझे अपराधिनी समझ रहे हैं, तो भी एक बार शीघ्र दर्शन दीजिए, या आपको तनिक भी दया नहीं जो इस प्रकार मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ॥४७॥


आक्रन्दन्त्यास्ततस्तस्याः स्थितेन जिनसद्मनि ।
कुमार-प्रेयसी-युग्मे-नाश्रावि रुदित-ध्वनिः ॥४८॥

अर्थ: इस प्रकार वह अनेक प्रकार से विलाप करने लगी, उसकी रोने की आवाज जिनमंदिर में स्थित कुमार की दोनों पत्नियों ने सुनी ॥४८॥


निर्गताभ्यां ततस्ताभ्यां सजवाभ्यां विलोकिता ।
निकटे वनदेवीव तदुद्याने द्रुमान्तरे ॥४९॥

अर्थ: ज्यों हि उन्होंने स्वर से किसी दुःखिनी स्त्री की आवाज पहचानी, तो वे शीघ्र ही उसके पास जाने उद्यत हुईं । उन्होंने वहाँ जाकर उद्यान के निकट वनदेवी के समान शृङ्गारमति को देखा ॥४९॥


आश्वासिता च सा ताभ्यां बहुधा जिनमन्दिरम् ।
जगाम संहताशेष - विमानादिविधिस्ततः ॥५०॥

अर्थ: सुकुमारियों के बहुत प्रकार से समझाने पर शृङ्गारमति का दुःख बहुत कुछ कम हुआ और वह विधिपूर्वक विमान आदि को समेटकर, लेकर जिनमंदिर में चली गई ॥५०॥


प्रसन्न-वदना तत्र त्यक्तार्त्ता भक्ति-तत्परा ।
जिनाधीशं नमस्कृत्य तदन्ते समुपाविशत् ॥५१॥

अर्थ: वहाँ जिनमंदिर में आर्तध्यान से रहित भक्ति में तत्पर प्रसन्न मुखवाली शृङ्गारमति, जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार करके उन दोनों के पास बैठ गई ॥५१॥


उदाजहार पृष्टा च तयोः स्वचरितं पुनः ।
निशम्यान्योन्यमालोक्य स्मितं ताभ्यां सविस्मयम् ॥५२॥

अर्थ: उस शृङ्गारमति ने उन दोनों के लिए अपने चरित्र को कहा और उन दोनों के स्वकीय चरित्र को पूछा। उन दोनों से उनके चरित्र को सुनकर आश्चर्य सहित प्रसन्नतापूर्वक परस्पर एक-दूसरे को देखा ॥५२॥


चिन्तितश्च किमेतेन भवितव्यं प्रियेण नौ ।
यतोऽस्मद्वृत्त-संवादि वदत्येषा(ष) वचोऽखिलम् ॥५३॥

अर्थ: वे दोनों ही विचार में पड़ गई और सोचने लगीं कि क्या इसके पति ही हम दोनों के पति प्राणनाथ हैं ? क्योंकि जो कुछ यह कह रही है वह सब कुछ हमसे ही संबन्धित प्रतीत हो रहा है ॥५३॥


अथवा किमलीकेन विकल्पेनामुनाधुना ।
अयमेव यथाकामं फलताद्दैवपादपः ॥५४॥

अर्थ: अथवा हमें इस समय व्यर्थ ही असद् विकल्पों से क्या प्रयोजन ? यही हमारे पति हों तो हो सकता है, हमारा भाग्यरुपी वृक्ष इच्छानुसार फलीभूत होगा ॥५४॥


अवाचि च खगाधीश-देहजा मा शुच१ शुभे ।
समदुःखा यदावाभ्यां भवती च सधर्मिणी ॥५५॥

अर्थ: और उन दोनों ने कहा हे सखि ! विद्याधर पुत्री ! शोक मत कर, शोक करने से अभीष्ट की सिद्धि नहीं होती, देख हम दोनों भी तो तेरे ही समान पति से वियुक्त दुःखिनी हैं । अतः हम सहधर्मिणी हैं ।


एवं विधानि संसारे सरतां प्राणधारिणाम् ।
दुःखानि शतशः सन्ति तद्विषादेन किं सखि ॥५६॥

अर्थ: हे सखी ! संसार में भ्रमण करने वाले प्राणियों को इस प्रकार इष्ट वियोगादि से उत्पन्न सैकड़ों प्रकार के दुख होते हैं, अतः उसके विषय में खेद करने से क्या प्रयोजन है ? ॥५६॥


यथाविधिपरिज्ञात-स्ववृत्तान्ता कृता च सा ।
श्रुत्वा सन्धारितं चेतः स्वकीयं तयका२ तदा ॥५७॥

अर्थ: इस प्रकार शृङ्गारमति ने अपना जीवन परिचय बताकर एवं उनकी दुःखद कथा सुनकर, उसने अपने मन में धैर्य धारण किया ॥५७॥


दानपूजाश्रुताध्याय-सङ्गताः शुभसङ्गताः ।
एवं तिस्रोऽपि ताः सन्ति तत्र प्रीताः परस्परम् ॥५८॥

अर्थ: वे तीनों एक साथ मिल-जुलकर पात्रदान, अभिषेकपूर्वक जिनपूजा और शास्त्र स्वाध्याय आदि शुभ क्रियाओं को करती हुई समय बिताने लगीं ॥५८॥


अथ रूपं परावृत्य वामनीभूय तां पुरीम् ।
सवयस्यः कुमारोऽपि प्रविश्याजनि गायनः ॥५९॥

अर्थ: और मित्र सहित कुमार जिनदत्त भी अपनी विद्या से रूप बदलकर बौने के रूप को धारणकर चंपापुर नगरी में प्रवेश कर गायक हो गए ॥५९॥


गन्धर्वदत्तनामासौ चित्रकौतुककारकः ।
गीतैराख्यायकैः कान्तै र्जहार जनतामनः ॥६०॥

अर्थ: अनेक प्रकार के कौतूहलों को करने वाले इस जिनदत्त ने अपना गन्धर्वदत्त नाम रखा और गीतों तथा सुंदर कथानकों के द्वारा जनता के मन को हरण करने लगा ॥६०॥


दत्वा जीवनकं राज्ञा विधृतो निजसन्निधौ ।
गन्धर्वादिविनोदेन तत्रास्थाज्जनवल्लभः ॥६१॥

अर्थ: यहाँ तक कि ये इतने प्रसिद्ध हो गए कि, ये एक दिन राजदरबार में पहुँचे और अपने गायन कला से राजा को प्रसन्न कर दरबार के वेतनभोगी गवैया हो मनोरंजन से वहाँ रहते हुए/जनप्रिय हो गए ॥६१॥


अन्येद्युर्गदितं राज्ञः पुरस्तादिति केनचित् ।
यथा देवात्र तिष्ठन्ति स्त्रियस्तिस्रो जिनालये ॥६२॥

अर्थ: एक दिन की बात है कि राजसभा के समय आकर, एक पुरुष ने राजा से कहा-महाराज इसी


रूपलावण्यसौभाग्य-कान्तीनां परं पदम् ।
न हसन्ति न जल्पन्ति समं केनापि ताः प्रभो ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 62 से 63): नगरी के एक जिनालय में तीन परम सुंदर स्त्रियाँ रहती हैं ॥६२॥ हे राजन् ! रूप, सौंदर्य, सौभाग्य और कांति की श्रेष्ठस्थान, वे तीनों न तो किसी के भी साथ हँसती हैं, न बोलती हैं ॥६३॥


केनापि हेतुनेत्येवं श्रुत्वा भूमिभुजा मुहुः ।
आलोकितमुखोऽवादीद्-विहस्येति स वामनः ॥६४॥युगलं॥

अर्थ: किसी भी कारण से इस प्रकार सुनकर राजा ने बार-बार वामन वेशधारी जिनदत्त के मुख की ओर देखा उस बौने ने हँसकर इस प्रकार कहा ॥६४॥


अहो मानुषमात्रेऽपि शृङ्गार-मुख-मानसाः ।
किमेवं स्थापयध्वं भो हासयाम्येष ता अहम् ॥६५॥

अर्थ: अहो ! शृङ्गार व हास्यरस वाले मनुष्य मात्र को, मैं हँसाने में समर्थ हूँ फिर उनकी क्या बात है । हे महाराज ! जब मनुष्य मात्र शृङ्गार का प्रेमी होता है, तब उनकी तो बात ही क्या ? वे तो स्त्रियाँ हैं, वे अवश्य ही हँसेंगी/बोलेंगी ॥६५॥


विकासहाससम्पन्नान् द्रुमानपि नरेश्वर ।
विनोदेन करोम्येष मानुषेषु तु का कथा ॥६६॥

अर्थ: मैं अपने प्रयत्न से वृक्षों तक को विकास लता फल पत्र युक्त और फूलों से सहित हास्य से सुसंपन्न कर सकता हूँ । मनुष्य की तो फिर बात ही क्या है ? ॥६६॥


ततोऽसौ प्रेषितो राज्ञा स्वल्पलोकैः समं मुदा ।
जगाम सोऽपि सङ्कल्प-सङ्केतः स्वजनैः सह ॥६७॥

अर्थ: जिनदत्त की इस प्रकार अहंकार पूर्ण बात सुनकर राजा ने अपने कुछ लोगों को साथ में, उन्हें तीनों स्त्रियों को प्रसन्न करने के लिए भेजा और वे भी अपने पूर्व में किए गए सङ्कल्प-संकेत के अनुसार जिनालय की तरफ रवाना हुए ॥६७॥


जिनार्चां प्रणिपत्यान्ते स तासां समुपाविशत् ।
कृतगीतादिकः प्रोचे वयस्यैरिति सादरम् ॥६८॥

अर्थ: जिनमंदिर में पहुँचकर गन्धर्वदत्त/जिनदत्त ने पहले भगवान की पूजा, स्तुति, भक्ति, प्रणाम, गायन आदि कर उनके पास में बैठ गया, पश्चात् साथियों ने आदरपूर्वक इस प्रकार पूछा ॥६८॥


यथा कथानकं किञ्चित्कथ्यतां कौतुकावहम् ।
श्रूयतां सावधानैर्भोः कथयामि स्वचेष्टितम् ॥६९॥

अर्थ: अच्छा मित्रों ! यदि यही इच्छा है, तो तुम लोग सब सावधान हो जाओ । मैं एक अचरज वाली अपनी बढ़िया कथा कहता हूँ ॥६९॥


वसन्तादिपुरादेत्य चम्पोद्यानमुपेयुषा ।
यावत्कान्तापरित्याग स्तावत्तेन निवेदितम् ॥७०॥

अर्थ: इसके बाद उसने अपना ही समस्त वृतांत जो कुछ बीता था, वह वसंतपुर से लगाकर चंपापुरी के उद्यान में विमलमति के त्याग करने तक का कह डाला ॥७०॥


तदाकर्ण्यालपत् स्मित्वा विमलादिमतिस्तदा ।
किं ज्ञातमिति भोः ब्रूहि सुष्ठु रम्या कथा तव ॥७१॥

अर्थ: तब उसको सुनकर विमलमति मुस्कराकर बोली, अरे ! कहो इस


अत्रान्तरेसमुत्थाप्य नीतोऽसौ स्वजनैस्ततः ।
यथा राजकुले वेला वर्त्तते गम्यतामिति ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 71 से 72): प्रकार आपने कैसे जाना ? आपकी कथा बहुत सुंदर है ॥७१॥ अच्छा ! फिर आगे क्या हुआ ? सो कहो । इसे सुनकर जिनदत्त के साथियों ने अजी, राजमंदिर जाने का समय हो गया, कल फिर आकर कहना आदि कहकर उन्हें रोक दिया और साथ में ले अपने स्थान चले आए ॥७२॥


तथैवैत्य द्वितीयेऽह्नि स्ववार्त्ता तावदीरिता ।
आरभ्य गमनं द्वीपे यावत्पातः पयोनिधौ ॥७३॥

अर्थ: दूसरे दिन फिर आकर वामनरूपधारी जिनदत्त ने अपना चंपापुरी के उद्यान से आगे जाने का और द्वीप से लौटते समय समुद्र में गिरने तक वृतांत कह सुनाया ॥७३॥


ततस्तूष्णीं स्थिते तत्र स्मित्वा श्रीमतिरब्रवीत् ।
किं ततोऽजनि भो भद्र ! सरसेयं कथा तव ॥७४॥

अर्थ: जिसे सुनकर श्रीमती ने कहा-हाँ फिर उससे आगे की और कथा सुनाइए । फिर क्या हुआ ? आपकी कथा बड़ी ही मनोहारी है ॥७४॥


किं याति तव शृण्वत्याः परायत्ता वयं पुनः ।
वर्त्ततेऽवसरो यामो राजमन्दिरमुत्सुकाः ॥७५॥

अर्थ: अरे ! आप तो सुनने वाली हैं, सुनने में आपका क्या जाता है, पर मैं तो पराधीन हूँ, राजाज्ञानुसार चलना मेरा कर्त्तव्य है, राजमंदिर का समय है, उत्कंठित हर्षित होते हुए चले जाते हैं ॥७५॥


निगद्येति गतः सापि सार्द्धं विमलया तया ।
सुचिरंचिन्तयामास किमेतदिति विस्मिताः ॥७६॥

अर्थ: वह इस प्रकार कहकर चला गया, श्रीमति ने भी उस विमला के साथ बहुत समय तक विचार किया, यह क्या है ? इस प्रकार वे आश्चर्य चकित हो गईं ॥७६॥


अन्यस्मिंश्च समागत्य वासरे खगपत्तने ।
आरभ्य स्वागमं प्रोक्तं त्यक्ता यावन्नभश्चरी ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर उन सतियों के पास आया और संगीत ध्वनि में आगे का कथानक प्रारंभ किया अर्थात् समुद्र से पार हो विद्याधर नगरी में पहुँचना, विद्याधर राजा की कन्या के साथ विवाह कर लाना, इसी चंपा नगर के उद्यान में इस विद्याधरी को छोड़कर गायब होने तक का अपना पूरा वृत्तांत सुना दिया । बस इतना ही कहकर वह जाने को उद्यत ही हुआ कि ॥७७॥


स्मितधौताननावोचत् ततोऽसौ खगदेहजा ।
असमाप्य कथां मा गा ब्रूहि जातं ततः किमु ॥७८॥

अर्थ: मुस्कराती हुई वह विद्याधर की पुत्री अर्थात् इसी की तीसरी पत्नी बोल उठी, हे भद्र ! अधूरी कथा छोड़कर नहीं जाना, कहिए इसके आगे क्या हुआ ? ॥७८॥


प्रातरेत्य भणिष्यामि सञ्जल्प्येति ततो गतः ।
सम्पन्न-प्रियसङ्गाशा विस्मितास्ता अपि स्थिताः ॥७९॥

अर्थ: आप सुनना चाहती हैं तो ठीक है, मैं प्रातःकाल सुनाऊँगा। अभी तो समय हो गया है, इस प्रकार कहकर चला गया । अब इन्हें भी विश्वास सा हो गया कि अवश्य ही हमें पति देव का संगम हो सकेगा क्योंकि इन्हीं का चरित्र था यह, अतः पति मिलन की आशा में आश्चर्यचकित हो तीनों वहीं रहने लगीं ॥७९॥


नरेन्द्रोऽपि तदाकर्ण्य विस्मितः पारितोषिकम् ।
ददावस्मै जनः सर्वश्चित्रितश्च स्वचेष्टितैः ॥८०॥

अर्थ: राजा ने भी उस समाचार को सुनकर आश्चर्यचकित हो इस जिनदत्त के लिए पुरस्कार दिया और सभी जन अपनी चेष्टाओं से चित्रलिखित से जान पड़ते थे ॥८०॥


अथान्येद्युरभूत्तत्र महान्कोलाहलस्ततः ।
पृष्टः कोऽपि नरेन्द्रेण किमेतदिति सोऽब्रवीत् ॥८१॥

अर्थ: एक दिन की बात है कि नगर में बड़ा ही जोर-शोर से कोलाहल हुआ। लोगों की कलकलाहट सुनकर राजा ने पास बैठे हुए किसी आदमी से उसका कारण पूछा कि यह क्या है ? उत्तर में उसने कहा-॥८१॥


यथा राजगजो देव नाम्ना मलयसुन्दरः ।
आलानस्तम्भमुन्मूल्य निःशङ्कं विचरत्ययम् ॥८२॥

अर्थ: महाराज ! मलयसुंदर नाम का सरकारी हाथी अपने आलान-स्तंभ को तोड़कर मद से सहित हुआ इधर-उधर निःशंक घूम रहा है ॥८२॥


यः कोऽपि वशमायाति पशुरस्य नरश्च वा ।
विलम्बेन विना नाथ स याति यममन्दिरम् ॥८३॥

अर्थ: जो कोई भी पशु एवं मनुष्य उसके सामने आता, वह ही विचारा किसी विलम्ब के बिना ही यमराज के मंदिर का अतिथि हो जाता है ॥८३॥


प्राकारोद्यान-सद्देश्म-देवतायतनान्ययम् ।
भस्मीकरोति भूपाला-गणयन् भट-पेटकम् ॥८४॥

अर्थ: वह हाथी राजा के सैनिक समूह को भी नहीं गिनता हुआ किसी को भी नहीं छोड़ता, जो कुछ उसके सामने परकोटा, बगीचा, देवालय, हवेली आदि सामने आते हैंउन सबको नष्ट-भ्रष्ट कर भस्म कर देता है ॥८४॥


तन्निशम्य महासत्वाः प्रेषिता वीरपुङ्गवाः ।
राज्ञा तेऽपि न संशेकुर्दमने तस्य दन्तिनः ॥८५॥

अर्थ: उस समाचार को सुनकर राजा ने महाशक्तिशाली वीरश्रेष्ठों को भेजा, वे भी उस हाथी के दमन करने में समर्थ नहीं हुए ॥८५॥


एवं दिनत्रयं तत्र पीडयन्नखिलाः प्रजाः ।
बम्भ्रमीति करी यावत्पटहस्तावदाहतः ॥८६॥

अर्थ: इस प्रकार नगरी में तीन दिन तक सम्पूर्ण प्रजा को पीड़ा पहुँचाता हुआ हाथी किसी भी उपाय से शांत नहीं हुआ, तो अन्त में राजा ने नगर में नगाड़ा बजवाया ॥८६॥


यथा हस्तिनमेतं यः कुरुते वशवर्तिनम् ।
कन्या प्रदीयते तस्मै सामन्तश्च विधीयते ॥८७॥

अर्थ: जैसे ही जो मनुष्य इस हाथी को अपने वश में करता है, उसके लिए कन्या दी जाएगी और सामन्त बनाया जायेगा ॥८७॥


श्रुत्वेति वेगतः स्पृष्ट्वा पटहं वामनस्ततः ।
आजुहाव गजाधीशं सोऽप्यगादुत्करः पुरः ॥८८॥

अर्थ: वामन वेशधारी जिनदत्त ने इस प्रकार भेरी की ध्वनि को सुनकर वेग से हाथी को छूकर सामना किया, वह हाथी भी भयंकर रूप से सामने आ गया ॥८८॥


ताडयन्निविडं लोष्ठ मुद्गरैश्चतुरः क्वचित् ।
पृष्ठतः पार्श्वतो धावन्नग्रतो जठरादधः ॥८९॥

अर्थ: कुशल जिनदत्त ने कहीं पर पीछे से, बगल से, आगे से, पेट के नीचे से, दौड़ते हुए घने पत्थरों और मुद्गरों के द्वारा ताड़ित करते हुए ॥८९॥


स्वशिक्षा-लाघवं सम्यग्दर्शयन् वलनादिभिः ।
आरुढः श्रम-मानीय तं दत्त-करणस्ततः ॥९०॥

अर्थ: मन इन्द्रियों को लगाकर, श्रम/थकान को लाकर, अपनी शिक्षा के बल से लघुता को अच्छी तरह दिखलाते हुए शक्ति सामर्थ्य से चारों तरफ घुमाने आदि के द्वारा उस हाथी पर सवार हो गए ॥९०॥


साधुवादं समासाद्य जनेभ्यो नृपपुङ्गवम् ।
प्रणम्यालानमानीय करिणं स सुखं स्थितः ॥९१॥

अर्थ: हाथी द्वारा कृत उपद्रव को दूर करने के कारण मनुष्यों से धन्यवाद को प्राप्त करते हुए, श्रेष्ठ राजा को नमस्कार कर, हाथी बांधने वाले खम्भे से हाथी को बांधकर, वह बौना जिनदत्त सुखपूर्वक बैठ गया ॥९१॥

सप्तमः सर्गः

अथामात्यैः समं राज्ञा तदेति प्रविचारितम् ।
कुलं यस्य न जानीमो दीयतां देहजा कथम् ॥१॥

अर्थ: राजाज्ञानुसार जब जिनदत्त ने अपने कौशल से मत्त हाथी को वश कर लिया, तो राजा ने उसे अपनी पुत्री के प्रदानार्थ मंत्रियों से सलाह की, कि जिस पुरुष के कुल का पता हमें नहीं उसे प्रतिज्ञानुसार कन्या किस तरह दी जाये ? ॥१॥


तैरवाचि किमेतेन विकल्पेन महीपते ।
ब्रवीत्याकृतिरेवास्य कुलं कल्याणसूचकम् ॥२॥

अर्थ: उत्तर में मंत्रियों ने कहा-महाराज यह शंका करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस महापराक्रमशाली पुरुष की आकृति से ही इसके मातृ-पितृ कुल की शुद्धि मालूम पड़ रही है ॥२॥


विनोदेनामुना कोऽपि क्रीडत्येष महामनाः ।
पयोदपटलेनेव प्रच्छन्नो दिवसाधिपः ॥३॥

अर्थ: जिस प्रकार मेघ के आच्छादन से आच्छन्न सूर्य आकाश में भ्रमण किया करता है परन्तु उसका तेज नहीं छिपता, उसी प्रकार अवश्य ही यह कोई विशुद्ध वंशोद्भव पुण्यशाली पुरुष अपने रूप को बदलकर इधर-उधर विनोदार्थ घूम रहा है ॥३॥


शौर्य-सत्व-यशोरूप - विज्ञानैर्नाकिनामपि ।
चमत्कारं करोत्येषोऽ-चिन्त्यमस्य विचेष्टितम् ॥४॥

अर्थ: परन्तु इसकी चेष्टाएँ चिन्तन से परे हैं। यह महामना अपने पराक्रम, धैर्य, यश, रूप एवं विज्ञान से देवों को भी आश्चर्य उत्पन्न कर रहा है ॥४॥


विशुद्धोभयपक्षाय कन्यास्मै दीयतां ततः ।
किञ्चासाध्येष्वयं देव प्रतिच्छन्दस्तवापरः ॥५॥

अर्थ: जिसका कुल उच्च नहीं परन्तु दूषित है, उसमें ऐसे गुण नहीं हो सकते इसलिए निःशंक हो दोनों मातृ-पितृ कुल से शुद्ध इस पुण्यात्मा के लिए पुत्री दीजिए क्योंकि हम अधिक क्या कहें, इससे बढ़कर आपको अन्य और कौन वर कन्या के योग्य मिलेगा ? ॥५॥


प्रतीतिरस्ति चेन्नाथ पृच्छ्यतामयमेव हि ।
वचः श्रुत्वेति राज्ञासौ पृष्ट एवं समन्त्रिणा ॥६॥

विज्ञानाकृतिसत्त्वाढ्यै-र्गुणैर्ज्ञातो वरो मया ।
प्रच्छन्नः कोऽपि भद्र त्वं नूनं नरशिरोमणिः ॥७॥

प्रसीद वद सन्देहं हर स्वं प्रकटीकुरु ।
तथाप्यात्मानमित्येव मुक्तः स्मित्वा जजल्प सः ॥८॥

अर्थ (श्लोक 6 से 8): अथवा यदि इस पर भी आप राजी न हों तो इससे ही इसका कुल, जाति आदि पूछ लीजिए । मंत्रियों के इन वाक्यों से सम्मत हो जाने पर राजा ने जिनदत्त से पूछा ॥६॥ हे सज्जन शिरोमणि ! यद्यपि आकार, विज्ञान, पराक्रम और धैर्य आदि गुणों से तुम मुझे निश्चय से गुप्तरूप में श्रेष्ठकुल में उत्पन्न मालूम पड़ते हो ॥७॥ तथापि हे भद्र ! हम पर प्रसन्न होकर, हमारे संदेह को दूर कीजिए, अपने को असली रूप में प्रकट करो, राजा के इस प्रकार निवेदन करने पर भी अपने को उसी आकृति में रखकर मुस्कराकर जिनदत्त कहने लगे-॥८॥


वसन्तादिपुरावासि - जीवदेववणिक्पतेः ।
जिनदत्त इति ख्यातः सूनुरस्मि नरेश्वर ॥९॥

अर्थ: महाराज ! सच है आपको बिना बतलाए कैसे मालूम हो सकता है ? मैं बसंतपुर के सेठ वैश्यराज जीवदेव का पुत्र हूँ, मेरा नाम जिनदत्त है ॥९॥


त्वदीयश्रेष्ठिनः पुत्री विमलस्यैका परा प्रभो ।
सिंहलेशस्य विद्याभूश्-चक्रिणो दुहितापरा ॥१०॥

अर्थ: मैंने आपके ही नगर निवासी विमलसेठ की विमलमति नाम की पुत्री को ब्याहा है, दूसरी सिंहल द्वीप के राजा की पुत्री श्रीमती और तीसरी विद्याधरों के अधिपति अशोकश्री की पुत्री शृङ्गारमति के साथ विवाह किया है ॥१०॥


एतास्तिस्रोऽपि मद्-भार्यास्तिष्ठन्ति जिनवेश्मनि ।
मदीयसङ्गमोत्कण्ठा - कुलिताः कुलकेतवः ॥११॥

विपदां सम्पदां देव भाजनीभवता मया ।
अधुना प्राप्तविद्येन क्रीडेति बहुधा कृता ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): कुल की ध्वजा स्वरूप मुझसे मिलने की उत्कण्ठा से आकुलित ये तीनों ही मेरी पत्नियाँ जिनमंदिर में रहती हैं ॥११॥ देव ! मैंने इस जन्म में बहुत-सी तो विपत्ति झेली हैं और बहुत-सी संपत्तियों का भोग किया है एवं अनेक विद्याओं को प्राप्त कर इस जगह अनेक क्रीड़ाएँ की हैं ॥१२॥


तदाकूतं ततो ज्ञात्वा हूतास्ताः पृथिवीभुजा ।
तिस्रोऽपि नायिकास्ताश्च प्राप्ताः कञ्चुकिभिः समम् ॥१३॥

अर्थ: जिनदत्त का यह वृत्तांत सुन और उसके अभिप्राय को जानकर राजा ने उन जिनमंदिर वासिनी तीनों स्त्रियों को बुलाने के लिए भेजा, वे भी कञ्चुकियों के साथ-साथ राजसभा में आ उपस्थित हो गईं ॥१३॥


अत्रोपविश्यतां पुत्र्यः स्वामिना भणिता इति ।
प्रणम्योपाविशन्नन्ते विनीतास्ता यथाक्रमम् ॥१४॥

अर्थ: राजा ने इस प्रकार कहा हे पुत्रियों ! यहाँ पर बैठिए, विनयशील वे तीनों क्रमानुसार राजा को प्रणाम कर पास में बैठ गईं ॥१४॥


उक्तं ततो नरेन्द्रेण महासत्वो वदत्ययम् ।
एतास्तिस्रोऽपि मद्भार्याः सत्यमेवं मृषा किमु ॥१५॥

अर्थ: उसके बाद राजा ने कहा, यह महापराक्रमी कहता है कि ये तीनों ही मेरी पत्नियाँ हैं, इस प्रकार क्या सत्य है या झूठ है ? आप कहिए ॥१५॥


अन्योन्यं मुखमालोक्य ताभिरूचे पतिः प्रभो ।
न भवत्येव जानाति वार्त्तां तस्यैव केवलम् ॥१६॥

अर्थ: यह सुनकर वे तीनों एक-दूसरे का मुख देखने लगीं, कुछ क्षण विचार कर कहने लगीं, हे नरेश ! यह हमारे पति नहीं हैं, केवल हमारे पतिदेव की वार्ता को जानने वाले हैं ॥१६॥


अत्रान्तरेकुमारोऽपि पुलकाश्रितविग्रहः ।
आविर्भवत्स्मितं वक्त्रं पिदधातिस्म वाससा ॥१७॥

अर्थ: इसी बीच रोमाञ्चित/पुलकित शरीरवाले कुमार ने भी प्रकट हुई हँसी को छुपाने के लिए वस्त्र से मुख को ढक लिया ॥१७॥


भूयोप्युवाच भूपालः पुत्र्यः सम्यक् प्रविच्यताम् ।
ताभिरूचे न सादृश्य-मपि तस्याऽस्ति किं बहु ॥१८॥

अर्थ: इधर राजा ने यह अचम्भे की बात सुनकर फिर कहा-पुत्रियों ! देखो ! खूब सोच-समझकर बतलाओ । क्या वास्तव में ही यह तुम्हारा पति नहीं है ? राजा की यह बात सुनकर पुत्रियों ने फिर भी यही उत्तर देकर कहा-महाराज ! अन्य की तो क्या बात ? इनके और उनके तो सादृश्यता भी नहीं है ॥१८॥


कुमारेण ततस्त्यक्त्वा वामनत्वं कृताकृतिः ।
जिनदत्तस्य सञ्जातः श्यामवर्णेन केवलम् ॥१९॥

अर्थ: अब कुमार ने अपनी बौनेपन की आकृति को छोड़ दिया और यथार्थ जिनदत्त की आकृति को धारण कर लिया परन्तु शरीर का रंग काला ही रहने दिया ॥१९॥


विस्मिताभिस्ततस्ताभिः सलज्जाभिश्च भूपतिः ।
प्रोचे तात स एवायं परं वर्णेन नो समः ॥२०॥

अर्थ: अब तो वे तीनों स्त्रियाँ आश्चर्य में मग्न हो लज्जित हो गईं और राजा से बोलीं तात ! ये ही हमारे पति हैं, पर केवल रंग में ये काले हैं और वे पीले रंग जैसे थे ॥२०॥


ततः स्मित्वाभवत्सोऽपि तप्तजाम्बुनदच्छविः ।
तथा यथाभवांश्चित्र-लिखिता इव तास्तदा ॥२१॥

अर्थ: इस प्रकार सुनते ही, हँसकर कुमार ने जैसे ही तपाये हुए स्वर्ण की भाँति अपने शरीर की वास्तविक छवि को धारण कर लिया, यह विचित्र सहसा परिवर्तन देखकर वैसे ही ये तीनों चित्रलिखित-सी बैठी रह गईं ॥२१॥


उदश्रदुच्चरोमाञ्च-स्फुटकञ्चुक-जालिकाः ।
समुत्थाय ततो लग्नाः स्वामिपादद्वये मुदा ॥२२॥

अर्थ: उनका रोम-रोम उल्लसित हो उठा । शरीर में सर्वत्र रोमाञ्च हो जाने से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हर्षाङ्कुरों की चोली/साड़ी ही धारण की हो । वे शीघ्र उठीं और अपने पतिदेव के चरणों में आनंद से नम्रीभूत हो गईं ॥२२॥


यः पुरा ववृधे तीव्रस्तासां विरहपावकः ।
आनन्दाश्रुप्रवाहेण तेनासौ शमितो ध्रुवम् ॥२३॥

अर्थ: जो पूर्व विरह से तीव्र ताप बढ़ रहा था, उस पति-वियोग की अग्नि के संताप को, इस समय आनंद के अश्रु प्रवाह ने शांत कर दिया ॥२३॥


यदभावि तदा तासां सौख्यं किमपि मानसे ।
तत्र तस्यापि तत्सर्वं कविवाचामगोचरम् ॥२४॥

अर्थ: वहाँ तब उन तीनों के व उस जिनदत्त के भी मन में जो कुछ भी सुखानुभव हुआ, वह सब कवि के वचनों के अगोचर है ॥२४॥


सम्भाविताश्च तास्तेन सलज्जा निकटे स्थिताः ।
भूषणाम्बरताम्बूल-पुष्पै राज्ञा प्रपूजिताः ॥२५॥

अर्थ: और लज्जा सहित पास में बैठी हुईं पत्नियाँ, उस जिनदत्त के द्वारा सम्मानित हुईं व राजा ने भी आभूषण, वस्त्र, पान और पुष्पों के द्वारा उनको सम्मानित किया ॥२५॥


ज्ञातवार्त्तः स तत्रैत्य विमलो वणिजां पतिः।
नत्वेशं गाढमालिङ्ग्य च जिनदत्तमुपाविशत् ॥२६॥

अर्थ: विमलमति के पिता विमलसेठ को जब यह समाचार मालूम पड़ा कि उनके जमाई मिल गए हैं, तो वे शीघ्र ही राजसभा में आए और राजा को नमस्कार कर जिनदत्त के आलिंगनादि से परम हर्ष को प्राप्त होते हुए, उनके पास में बैठ गए ॥२६॥


क्षेमादिकं परीपृच्छ्य सम्प्राप्तावसरो नृपम्।
उवाचेति यथा देव कुमारः प्रेष्यतां गृहम् ॥२७॥

अर्थ: कुशलता आदि अच्छी तरह पूछकर, यथायोग्य अवसर देखकर, राजा से विमलसेठ ने जिनदत्त को अपने घर ले जाने के लिए सम्मति प्रदान करने को कहा ॥२७॥


राज्ञावादीदमेवास्य गेहं गुणमहोदधेः।
यद्यप्येवं तथापीश गाढमुत्कण्ठिता वयम् ॥२८॥

अर्थ: यह सुनकर राजा ने कहा इस गुणसागर का यही घर है। यद्यपि सेठ ने कहा, यह कथन आपका सत्य है, तो भी हे स्वामिन् ! हम अत्यन्त उत्कण्ठित हैं ॥२८॥


सम्भाषादौ कुमारस्य किञ्चौचित्यक्रमोऽस्ति नः।
इति तस्योपरोधेन विसृष्टोऽसौ महीभुजा ॥२९॥

अर्थ: दोनों के इस प्रकार वार्तालाप को सुन, कुमार ने कहा, इस समय इनका कहना उचित है, मैं भी जाना चाहता हूँ क्योंकि मेरा भी औचित्य इसी में है, यही क्रम भी ठीक है, इस प्रकार जिनदत्त का आग्रह देखकर नृपति ने भी जाने की अनुमति दे दी ॥२९॥


सकान्तं सोऽपि तं नीत्वा मन्दिरे मुदितो भृशम्।
सादरं विदधे तस्य तत्रौचित्यं यथाविधि ॥३०॥

अर्थ: वह विमलसेठ भी अपने दामाद को पुत्रियों के साथ अपने घर ले गया और आनंद से उनका आदरपूर्वक यथोचित सम्मान किया ॥३०॥


प्रारेभे च ततः कर्त्तु-मुत्सवः स तथा जनः ।
पौरः सर्वोऽपि चायातस्-तद्दर्शनसमुत्सुकः ॥३१॥

अर्थ: उस विमलसेठ ने और पुरवासियों ने उत्सव करना प्रारंभ किया और सब ही नगर निवासी उस जिनदत्त के दर्शन की उत्कण्ठा से वहाँ आए ॥३१॥


यथाकालं ततश्चक्रे सुखसम्भाषणादिकम् ।
श्रेष्ठिना सोऽपि वृत्तं स्व-मवादीदादितस्ततः ॥३२॥

अर्थ: आने-जाने वालों का तांता कुछ समय बाद शान्त हुआ, तो यथावसर सेठ ने कुमार से सुख संभाषण करना प्रारंभ किया । कुमार ने भी अपना समस्त वृत्तांत आदि से अंत तक क्रमशः सुनाया ॥३२॥


नितेम्बिन्योऽपि तास्तस्य साभिज्ञानं सुविस्मिताः ।
अश्रौषुर्वृत्तमात्मीयं न्यगदंश्च यथाक्रमम् ॥३३॥

अर्थ: तथा उस जिनदत्त के चरित्र को सुन आश्चर्य को प्राप्त उन स्त्रियों ने क्रमशः पहचान सहित अपने चरित्र को कहा ॥३३॥


विदधे च जिनाधीशायतनेषु संमुत्सवम् ।
जिनार्चास्नानपूजाद्यं दीनादीनां विहायितम् ॥३४॥

अर्थ: तदनन्तर कुमार आदि ने उत्सव सहित जिनभवनों में जिनेन्द्र भगवान के महाभिषेक पूजा आदि को करके सत्पात्रों एवं अनाथों को दान दिया ॥३४॥


अथान्येद्युः शुभे लग्ने सुमुहूर्त्ते शुभे तिथौ ।
विवाहमङ्गलं राज्ञा कन्यायास्तेन कारितम् ॥३५॥

अर्थ: चम्पानगरी के राजा ने सब प्रकार से संतुष्ट हो, जिनदत्त के साथ अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार; शुभमुहूर्त्त, शुभदिन, शुभलग्न, शुभतिथि एवं शुभविधि से अपनी कन्या का मांगलिक विवाह कर दिया ॥३५॥


राज्यालङ्कारपूर्वं च दत्त्वा देशादिकं बहु ।
महासामन्तमेतं स चकार नरनायकः ॥३६॥

अर्थ: एवं राजा ने उस जिनदत्त को बहुत से वस्त्र, आभूषण और देश आदि भेंट में देकर उत्तम सामन्त पद से विभूषित किया ॥३६॥


प्रेषिताश्च कुमारेण पुरुषास्तातसन्निधौ ।
समर्घ्य बहुभेदानि द्वीपरत्नानि वेगतः ॥३७॥

अर्थ: जब कुमार जिनदत्त, राजसम्मान से सम्मानित और यथेष्ट धनाढ्य हो गए, तो उन्होंने अपने पिता के पास नाना द्वीपों के रत्नों को देकर संदेशवाहक भेजे ॥३७॥


उपलभ्य च ताताद्यास्तदुदन्तं न मानसे ।
उल्लासेन ममुश्चन्द्र-विम्बादिव पयोधयः ॥३८॥

अर्थ: उनसे अपने इकलौते पुत्र के समाचार पाकर सेठ जीवदेव को अपार आनंद हुआ । जिस प्रकार चंद्रमा के उदय से समुद्र अपने अंग में नहीं समाता, उठकर आगे बढ़ जाता है, उसी प्रकार सेठ जीवदेव का हर्ष हृदय में न समा, रोमाञ्चों के छल से बाहर निकल पड़ा ॥३८॥


प्रेषिताश्च ततो लातुं तस्य तातेन चागताः।
तेऽपि प्रणम्य तं वाच-मूचुरेवं कृतादराः ॥३९॥

अर्थ: उन्होंने शीघ्र ही कुछ आदमियों को अपने पुत्र के पास लिवाने के लिए भेजा और उन्होंने भी पहुँचकर, उनको प्रणाम कर, आदर से जिनदत्त की सेवा में इस प्रकार निवेदन किया ॥३९॥


यथा विधीयतां नाथ ! विलम्बेन विनोद्यमः।
गमनाय किमत्रैवं स्थीयते स्वजनादृते ॥४०॥

अर्थ: हे नाथ ! अब बिना विलम्ब के शीघ्र यहाँ से चलिए, पिता के समीप जाने का उद्यम करना योग्य है । क्योंकि स्वजनों के बिना यहाँ रहना अच्छा नहीं है ॥४०॥


तातस्तवाभिनवचन्द्रसमानमूर्ति र्जातो वियोगभरतो भवतोऽतिदुःखात् ।
मातुश्च वाष्पजलविप्लुतकज्जलाङ्का गण्डस्थली मलिनतां विजहौ न जातु ॥४१॥

अर्थ: हे सर्वोत्तम ! आपके पिता आपके वियोग में सूख-सूख कर बिल्कुल कांतिहीन चन्द्रमा के समान हो गए हैं, उन्हें आपकी याद में खाना-पीना तक नहीं सुहाता । आपकी माता तो आपके पास में न होने से रात-दिन रोया करती हैं, उनकी गंडस्थली सदा आंसुओं के प्रवाह से भीगीं और आँखों में आँजे गए कज्जल के बहने से काली ही रहती हैं ॥४१॥


अन्योऽपि बान्धव-जनः सकलो वियोग-दुःखेन दुःस्थहृदयोऽनुदिनं तवास्ते ।
तिष्ठन्ति साम्प्रतममी भवदीयवक्त्र-सन्दर्शनैकरसिकाश्च तदेहि शीघ्रम् ॥४२॥

अर्थ: और भी अन्य जो आपके कुटुंबीजन हैं, वे भी सब आपकी विरहाग्नि से संतप्त हो दुःख पा रहे हैं एवं सबके सब आपके मुखचंद्र को देखने के लिए लालायित हो रहे हैं, इसलिए आपके पिता जी ने आपकी सेवा में हमें भेजा है, कृपाकर शीघ्र ही चलिए और अपने संयोग से सबको सुखी बनाइए ॥४२॥


श्रुत्वेति तस्यवचनं नितरां समुत्कः संस्पृच्छ्य भूप-वणिगीशपुरःसरं सः ।
लोकं चचाल दयितासहितो बलेना-नल्पेन कल्पित-मनोहर-दिव्ययानः ॥४३॥

अर्थ: अपने पिता के पास से बुलाने के लिए आए हुए आदमियों के संदेश को सुनकर जिनदत्त से भी न रहा गया । उनका हृदय भी अपने माता-पिता और कुटुंबियों से मिलने के लिए लालायित हो गया उन्होंने शीघ्र ही अपने श्वसुर, सेठ और राजा से अपने नगर की ओर जाने की सम्मति मांगी और उसके मिल जाने पर, अपनी समस्त स्त्रियों और परिवार के साथ, मनोहर दिव्य विमान में सवार हो, वे ठाठ-बाट से बहुत सैन्य बल के साथ चल दिए ॥४३॥


प्राप्तस्ततः क्षणतयेव पुरंप्रवृद्धा-नन्देन बान्धवजनेन समं समेत्य ।
तातेन कल्पितसमुत्सवमाकुलेन स्वानन्दपूर्ण हृदयेन गृहं स निन्ये ॥४४॥

अर्थ: महासामंत जिनदत्त उत्साह और सुख के साथ अपने नगर की ओर रवाना होकर शीघ्र अपने पिता के पास जा पहुँचे और पिता ने भी बड़े भारी उत्सव से चारों बहुओं के साथ हर्ष सहित इनका घर में प्रवेश कराया ॥४४॥

अष्टमः सर्गः

अथासौ सदनं प्राप्य प्रस्तुताखिलमङ्गलम् ।
ननाम मातरं सापि रुरोदाघ्राय मस्तकम् ॥१॥

अर्थ: उस समय होने वाले समस्त मांगलिक चिह्नों से भूषित गृह में प्रवेश कर जिनदत्त ने माता को प्रणाम किया और उसने भी अपने चिर वियुक्त पुत्र को देखकर रोते हुए मस्तक को सूंघा ॥१॥


समाश्वास्य ततस्तां स यथाज्येष्ठं कृतनतिः ।
भद्रासने निविष्टश्च भवनभाजनमाशिषाम् ॥२॥

अर्थ: माता की यह दशा देख जिनदत्त ने उसे अच्छी तरह समझाकर धैर्य बंधाया उसके बाद क्रम-क्रम से अपने वृद्धों को प्रणाम कर, उनकी आशीषें ग्रहण करके भद्रासन पर बैठ गए ॥२॥


अक्षतानि ददौ तत्र मस्तकेऽस्य जनीजनः ।
गीत-वादित्र-नृत्यादि-कृतानि च सहस्रशः ॥३॥

अर्थ: उसके बाद नगर की तथा कुटुम्ब की स्त्रियों ने उनके ऊपर अक्षत बिखेरे और हजारों गाजों-बाजों के साथ मंगल गीत गाए ॥३॥


श्वश्रूं प्रणम्य नारीणा-मन्यासामपि पादयोः ।
पपात क्रम इत्यस्य कान्तानां च चतुष्टयम् ॥४॥

अर्थ: इस प्रकार जिनदत्त के जब मंगलाचार और आदर सत्कार हो चुके, तो उनकी चारों पत्नियों ने क्रम से सास-श्वसुर को प्रणाम कर अन्य भी वृद्ध स्त्रियों के पैर छुए और उन्होंने भी उनका यथायोग्य सत्कार किया ॥४॥


निविष्टं च समासन्न-वनिता-जन-मध्यतः ।
स्वरूप-सम्पदा सर्व-भाविताहित-विस्मयम् ॥५॥

अर्थ: यथायोग्य विनयोपचार कर, वे चारों अन्य स्त्रियों से आवेष्टित हो यथायोग्य आसन पर आसीन हुईं, उनका रूप-लावण्य सबको आश्चर्य चकित कर रहा था अर्थात् सभी की दृष्टि इनके सौन्दर्यपान में लगी हुई थीं ॥५॥


सम्भाविताश्च सर्वेऽपि बान्धवाः स्निग्धबुद्धयः ।
सस्त्रीकास्तन्मुखाम्भोज-लीननेत्रालिमालिकाः ॥६॥

अर्थ: सर्व बान्धव जन, सस्नेह बुद्धि से उसके गुण, बल, पौरुष से नाना प्रकार सम्भावित कल्पनाओं में मुग्ध थे । जिनदत्त को उसकी अनुपम सुंदर स्त्रियों सहित देख सभी जन उसके मुख के निहारने में निर्निमेष पलक थे, ऐसा प्रतीत होता था मानों मुखरूपी कमल पर ये नेत्ररूपी भ्रमरों की पंक्तिमालाएँ क्रीड़ा कर रही हों ॥६॥


गत्वा ततो जिनेन्द्राणां सर्वेष्वायतनेष्वसौ ।
भक्त्या पूजादिकं कृत्वा चकारोत्सवमादृतः ॥७॥

अर्थ: जब समस्त घर का उत्सव समाप्त हो गया, तो जिनदत्त ने अपनी पत्नियों के साथ नगर के समस्त जिन आयतनों/मंदिरों में जाकर भक्ति से अभिषेक-पूजादि करके महान् उत्सव मनाया । जिनभक्ति के पश्चात् गुरु वंदना को गए ॥७॥


प्रणनाम गुरूणां च पाद-पद्मानि भक्तितः ।
कृतकृत्य-मिवात्मानं मेने संभाषितश्च तैः ॥८॥

अर्थ: जिनालय में स्थित श्री एकदेश वीतरागी-मुनिवृन्दों के पादपद्मों में भक्ति से नमस्कार किया । उनके साथ धार्मिक-संभाषण कर अपने को कृतकृत्य माना ॥८॥


आगत्य च ततोऽदायि दीनानाथार्थिनां धनम् ।
यथाकामं कुमारेण मारेणेव समूर्त्तिना ॥९॥

अर्थ: और वहाँ से आकर मूर्तिमान कामदेव सदृश स्वरूप वाले कुमार जिनदत्त ने इच्छानुसार दीन-अनाथ याचकों को धन दिया ॥९॥


तथास्य चरितं श्रुत्वा पूजितोऽसौ विशेषतः ।
चन्द्रशेखर-राजेन जनैरन्यैश्च सादरम् ॥१०॥

अर्थ: वसंतपुर के नृपति चंद्रशेखर ने जब इनकी लोगों के मुख से प्रशंसा सुनी, तो उसने भी इनका खूब आदर-सत्कार किया और अन्य जनों ने भी यथायोग्य उनका सम्मान किया ॥१०॥


इत्थ-मानन्द-मुत्पाद्य तातादीना-मुवाच सः ।
यथाक्षणं स्ववृत्तान्त-मशेषं प्रश्नपूर्वकम् ॥११॥

अर्थ: इस प्रकार माता-पिता आदि के आनंद को उत्पन्न कर उसने समय के अनुसार पूँछने पर अपने सम्पूर्ण चरित्र को कहा ॥११॥


यान्ति तत्र दिनान्यस्य सुरस्येव सुरालये ।
पञ्चेन्द्रियं सुखं सम्यक् भुञ्जानस्य निरन्तरम् ॥१२॥

अर्थ: वहाँ पर निरन्तर पञ्च इन्द्रियों के सुख को अच्छी तरह भोगने वाले इस जिनदत्त के दिन देवलोक में देव के समान व्यतीत होने लगे ॥१२॥


उद्यान-दीर्घिकाशाल-शोभितानि पदे पदे ।
अकारयच्च चित्राणि मन्दिराणि जिनेशिनाम् ॥१३॥

अर्थ: और उस जिनदत्त ने स्थान-स्थान पर बगीचा, वापिका और कोट से सुशोभित जिनेन्द्र भगवान के चित्र-विचित्र रचना से युक्त मन्दिरों को बनवाया ॥१३॥


सारं श्रावकधर्म्मस्य विततार यथाविधि ।
चतुर्विधस्य-सङ्घस्य दानमेष चतुर्विधम् ॥१४॥

अर्थ: जिनदत्त ने श्रावक धर्म के सारभूत, चारों प्रकार के दान को विधिपूर्वक चार प्रकार के संघ में दिया ॥१४॥


सप्रार्चनः प्रयातिस्म पर्वणां च चतुष्टये ।
इष्टं जनं समादा वन्दितुं जिनपुङ्गवान् ॥१५॥

अर्थ: तथा वह दो अष्टमी और दो चतुर्दशी इन चार पर्वों में इष्टजनों के साथ जिन-श्रेष्ठों/जिनवरों की उत्कृष्ट पूजा सहित वंदना के लिए जाता था ॥१५॥


पञ्चकल्याणभूभागान् मेरुं कुलशिलोच्चयान् ।
एति चानम्य भक्त्यासौ चारणर्षियतीश्वरान् ॥१६॥

अर्थ: अत्यंत प्रगाढ़ भक्ति से पञ्च कल्याणक-भूमियों की वंदना, मेरु, कुलपर्वत आदि पर जाकर चारण ऋषीश्वरादि की वंदना करने जाता था ॥१६॥


तथातिशयसम्पन्नं दृष्ट्वा जनपदोऽप्यसौ ।
तं बभूव समस्तोऽपि जिनधर्मपरायणः ॥१७॥

अर्थ: जिनदत्त के इस तरह धार्मिक कृत्यों के करने से अन्य समस्त नगर निवासियों पर बड़ा ही प्रभाव पड़ता था, वे इनके धनाढ्य होने पर भी, प्रबल धार्मिकभाव को देखकर खूब ही धर्म-ध्यान करने में दृढ़ हो जाते थे ॥१७॥


गजाश्व-रथ-धेनूना-मन्यासा-मपि सम्पदाम् ।
जाता संख्या गृहे नास्य वीचीनामिव सागरे ॥१८॥

अर्थ: धर्म के प्रभाव से, जिनदत्त के हाथी, घोड़ा, रथ, गाय, सोना, चाँदी आदि सब प्रकार की संपत्ति यथेष्ट हो गई थी । जिस प्रकार समुद्र में तरंगों का पता नहीं लगता कि कितनी आईं और कितनी गईं ? उसी प्रकार जिनदत्त के संपत्तियों की गिनती न थी ॥१८॥


ऋतवोऽपि वसन्ताद्याः सकान्तस्य यथोचितम् ।
भुञ्जानस्य प्रयान्त्यस्य सुखं शारीरमानसम् ॥१९॥

अर्थ: अपने प्रियतमाओं के साथ भोगविलास करने वाले उस जिनदत्त की वसन्तादि ऋतुएँ भी अनुकूल हो गईं । उसका शारीरिक और मानसिक सभी प्रकार के सुखानुभव पूर्वक समय व्यतीत होने लगा ॥१९॥


सुदत्तजयदत्ताख्यौ विमलादिमतिः सुतौ ।
वसन्तलेखया सार्धं सुप्रभं श्रीमती तथा ॥२०॥

सुकेतुं जयकेतुं च केतुं गरुडपूर्वकम् ।
खगाधीशतनूजा च विजयादिमतिं सुताम् ॥२१॥

सुमित्रं जयमित्रं च वसुमित्रं नृपात्मजा ।
प्राप पुत्रान्त्तुरीयाञ्च पुत्रीं नाम्ना प्रभावतीम् ॥२२॥

अर्थ (श्लोक 20 से 22): इनके पहली स्त्री विमलमति से सुदत्त और जयदत्त पुत्र, श्रीमती से बसंतलेखा पुत्री और सुप्रभ पुत्र, विद्याधर राजपुत्री श्रृंगारमती से विजयमती सुपुत्री व सुकेतु, जयकेतु एवं गरुड़केतु तीन पुत्र तथा चंपानगरी के महाराजा की पुत्री विलासमती से सुमित्र, जयमित्र, वसुमित्र तीन पुत्र एवं प्रभावती नाम की पुत्री उत्पन्न हुई, इस तरह कुल मिलाकर इनके नौ पुत्र तथा तीन पुत्रियाँ थीं ॥२०,२१,२२॥


कारितश्च समस्तानां जन्म-नाम-परीणयः ।
तथा महोत्सवस्तेन यथा लोकः सुविस्मितः ॥२३॥

अर्थ: एवं उसने सबके यथायोग्य रीति से अपनी अवस्थानुसार ठाट-बाट से जन्मोत्सव, नामकरण और विवाह आदि उत्सव कराये थे ॥२३॥


एवं वर्द्धयतस्तस्य त्रिवर्गोद्दामपादपम् ।
कालः कोऽपि जगामास्य मग्नस्य सुखसागरे॥२४॥

अर्थ: इस तरह धर्म, अर्थ और काम तीनों को समान रीति से पालते हुए जिनदत्त का समय बीत रहा था ॥२४॥


अन्यदासौ पुरस्कृत्य सर्वर्तुकुसुमादिकम् ।
विज्ञप्तो वनपालेन सभामध्यव्यवस्थितः ॥२५॥

अर्थ: एक दिन जिनदत्त राजसभा के मध्य में बैठे हुए थे । उसी समय वनपाल ने सभी ऋतुओं के फल-फूल आदि को भेंटकर सूचना दी ॥२५॥


शृङ्गार-तिलकोद्याने प्रातरद्य समागतः ।
दधत्समाधिगुप्ताख्यां चतुर्ज्ञानी मुनीश्वरः ॥२६॥

अर्थ: हे श्रेष्ठिन् ! बड़े ही आनंद और उत्सव की बात है कि आज प्रातःकाल मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय इन चारों ज्ञान के धारक समाधिगुप्त नाम के मुनि महाराज, हमारे शृङ्गारतिलक नाम के बगीचे में पधारे हैं ॥२६॥


ऋतवस्तस्य भक्त्यैव यौगपद्या-दुपागताः ।
पुष्पाभरण-मग्राहि दृष्ट्वैव वनश्रिया ॥२७॥

अर्थ: और उनके प्रभाव से उनकी सेवा करने के लिए ही मानों वहाँ छहों ऋतुएँ आ उपस्थित हुईं, जिससे कि असमय में ही समस्त वृक्ष फल-फूलों से लद गए ॥२७॥


सरस्योऽप्यभवँस्तत्र विकचाम्भोज-लोचनाः ।
जडाशयोऽपि को नाम नोल्लासि मुनिदर्शनात् ॥२८॥

अर्थ: हे कुमार ! वहाँ पर मुनिवर के दर्शन से तालाब भी विकसित कमलरूपी नेत्रों को धारण करने वाले हो गए हैं, तो फिर मूर्ख बुद्धि कौन ऐसा है जो मुनि के दर्शन से आनंदित न हो ? अर्थात् सभी आनंदित थे ॥२८॥


मञ्जुगुञ्जदलिव्रातो भ्राम्यँस्तत्र विराजते ।
निर्गच्छन्निव तद्भीत्या पापपुञ्जो रुदन् वनात् ॥२९॥

अर्थ: शब्द कर गुञ्जारते हुए भ्रमर, पुष्पों की सुगंधि के लोभ में इधर-उधर घूम रहे हैं, सो वे मुनिराज के भय से रोकर-भागते हुए पाप सरीखे मालूम पड़ते थे । पाप को काले रंग की उपमा दी जाती है, भ्रमर काले होते हैं। अतः उनको श्रीगुणभद्र देव ने पाप की उपमा दी है ॥२९॥


आश्रित्य सहकाराणां शाखाः प्रत्यग्रमञ्जरीः ।
भव्याँस्तत्राह्वयन्तीव कोकिलाः कलनिस्वनाः ॥३०॥

अर्थ: आम्रवृक्षों के ऊपर नवीन मञ्जरी के आ जाने से उसके भक्षण करने से मत्त हुई कोकिलायें जो मधुर शब्द करती हैं, वे मुनिदर्शन के लिये भव्यों को बुलाते हुए के समान मालूम पड़ती थीं ॥३०॥


तत्रावकेशिनोऽप्याशु फलपुष्पचिता विभो ।
वर्त्तते सर्वसामान्यं तादृशानां हि चेष्टितम् ॥३१॥

अर्थ: जो वृक्ष लताएँ बन्ध्या थीं, जिनपर कभी आज तक फल-फूल न आये थे, वे भी आज मुनि-पति के माहात्म्य से फल-पुष्पों से व्याप्त दीख रहीं हैं, क्योंकि महापुरुषों की चेष्टाएँ सबका हित करने वाली होती हैं ॥३१॥


मन्दगन्धवहोद्भूता नृत्यन्ति कुसुमाञ्जलिम् ।
प्रक्षिप्येव लतास्तत्र तदानन्देऽङ्गोचिताम् ॥३२॥

अर्थ: जिस प्रकार बड़े भारी आनंद में आकर स्त्रियाँ अपने हाव-भाव, अङ्गचालन आदि पूर्वक नृत्य करती हैं, उसी प्रकार उस उद्यान की लताएँ भी मंद सुगंध पवन से प्रेरित हो, मुनि दर्शन के आनंद से भरे हुए के समान अपनी कुसुमाञ्जलि को बिखेर कर नृत्य उत्सव करती हुईं-सी मालूम पड़ती थीं ॥३२॥


वाति प्रभञ्जनस्तत्र मानिनीमानभञ्जनः ।
तादृशस्य प्रभोः सङ्गे तथा किं नोपजायते ॥३३॥

अर्थ: हे नाथ ! स्त्रियों का मान भञ्जन करने वाली वायु बह रही है इस प्रकार के एकदेश वीतरागी मुनिराज का सम्पर्क प्राप्तकर पवन, नारी जनों के मान कषाय को नष्ट करने वाली क्यों न होगी ? हो ही गई ॥३३॥


आसते यतयस्तत्र विविधर्द्धि-विराजिताः ।
धर्माः समूर्त्तयो मन्ये भव्यपुण्याय ते तथा ॥३४॥

अर्थ: वहाँ अनेक ऋद्धिधारी ऋषिराज विराजमान हैं । ऐसा प्रतीत होता है मानो धर्म ही साक्षात् मूर्त्तिमान होकर आया हो, ऐसे वे, भव्यजीवों के पुण्य के लिए ही इस प्रकार यहाँ पधारे हैं ॥३४॥


अपायुंस्तत्क्षणादेव सर्वपापानि पश्यताम् ।
सक्ताः संयमिनः शश्वत् स्वाध्यायध्यानकर्मणि ॥३५॥

अर्थ: निरंतर ध्यान, स्वाध्याय में संलग्न उन संयमियों का दर्शन, दर्शन करने वाले भव्यजीवों के पाप समूह को तत्काल नष्ट करता था ॥३५॥


निशम्य तं प्रदायास्मै प्रसादं मुदितस्ततः ।
ननाम तां दिशं गत्वा भक्त्या सप्तपदानि सः ॥३६॥

अर्थ: इस प्रकार वनपाल के मुख से, चार ज्ञान के धारक समाधिगुप्त मुनि महाराज के आगमन का वृत्तांत सुनकर, जिनदत्त को अपार हर्ष हुआ और अपने आसन से उठकर जिस दिशा में मुनि महाराज विराजमान थे, उसी दिशा में सात कदम जाकर उन्हें भक्ति भाव से परोक्ष नमस्कार किया तथा उस वनपाल के लिए पुरस्कार दिया ॥३६॥


सकान्तो मिलिताशेष-बन्धुलोकपरिच्छदः ।
तत्कालोचितयानेन वन्दनायै चचाल सः ॥३७॥

अर्थ: इसके बाद जिनदत्त अपने भाई-बंधुओं व पत्नियों के साथ-साथ, उस समय के योग्य वाहन में सवार हो शृङ्गारतिलक बगीचे की ओर मुनिदर्शन के लिए चले ॥३७॥


उत्तीर्य दूरतो यानाद् विवेशासौ वनान्तरम् ।
कूजद्विहङ्गमारव - विहितस्वागत-क्रियम् ॥३८॥

अर्थ: जिस समय उद्यान, थोड़ी दूर रह गया तो जिनदत्त और उनके साथी विनय से नम्र हो अपनी-अपनी सवारियों से उतरे और वहाँ से पैदल ही उद्यान में प्रवेश किया । उस समय पक्षीगण मनोरम स्वर में कूज रहे थे मानों उनका स्वागत गीत ही गा रहे हों ॥३८॥


प्रदेशं स ततः प्राप यत्रास्ते यतिनायकः ।
आसीनोऽशोकवृक्षस्य मूलेऽमलशिलातले ॥३९॥

अर्थ: तत्पश्चात् शीघ्र ही वह उस प्रदेश में पहुँचा, जहाँ मुनिनायक अशोक वृक्ष के नीचे स्वच्छ-निर्मल प्रासुक शिला तल पर विराजमान थे ॥३९॥


त्रिःपरीत्य ततः स्तुत्वा तमन्यांश्च यतीश्वरान् ।
विनीतात्मा यथास्थानं निविष्टोऽसौ कृताञ्जलिः ॥४०॥

अर्थ: उनके समीप पहुँचकर जिनदत्त ने तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, भक्ति भाव से स्तुति पढ़ी और यथाक्रम से अन्य सभी मुनिराजों को नमस्कार कर वह विनीतात्मा जिनदत्त, दोनों हाथ जोड़कर यथास्थान बैठ गया ॥४०॥


पुण्यांकुरैरिवाशेषां कुर्वन् विच्छुरितां सभाम् ।
धर्मवृद्धिं बभाणासौ यतीशो दशनांशुभिः ॥४१॥

अर्थ: जिनदत्त और उनके साथियों को आया देख उनके नमस्कारादि कर चुकने के बाद, मुनि महाराज ने भी पुण्याङ्कुर के समान अपनी दाँतों की किरणों से सभा को व्याप्त करते हुए धर्मवृद्धि का आशीर्वाद दिया ॥४१॥


ततोऽवादीदयं भक्ति-नम्रमूर्त्तिर्मुनीश्वरम् ।
मादृशां मुग्धबुद्धीनां दुर्लभं तव दर्शनम् ॥४२॥

अर्थ: इस प्रकार जब समस्त परस्पर का कर्त्तव्य हो चुका, तो जिनदत्त ने भक्ति-भाव से नम्र होकर कहा-हे प्रभु ! मेरे जैसे मुग्ध-मन्द बुद्धि वालों को आपका दर्शन अति दुर्लभ है ॥४२॥


तावदेव जगन्नाथ मोहान्धतमसावृतम् ।
विचरन्ति न ते यावद्भानोरिव वचोंऽशवः ॥४३॥

अर्थ: तो भी हे जगत् के नायक ! जीव तब तक ही मोहरूपी अंधकार से व्याप्त हैं, जब तक कि आपके वचनरूपी सूर्य की किरणें उन्हें प्राप्त नहीं होतीं ॥४३॥


भवान्धकूपसम्पाति विश्वमाशु भवत्यदः ।
भवादृशा न चेत्सन्ति रत्नदीपास्तमश्छिदः ॥४४॥

अर्थ: यदि आप सरीखे सर्वथा मूढ़ता के नाशक देदीप्यमान रत्नदीपक इस मोहपूर्ण संसार में नहीं हों, तो इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि समस्त ही प्राणी जन्म-मरण रूप अंधे कुंए में गिरकर अपने प्राण गँवा बैठे ॥४४॥


विषयाशाहुताशेन दह्यमाने जगद्वने ।
उदभूद्भव्यपुण्येन सुधामेघो भवानिह ॥४५॥

अर्थ: इन्द्रिय विषयों के भोगने की लालसारूप अग्नि से निरंतर जलने वाले, इस संसार में आप सरीखे धर्मरूपी अमृत बरसाने वाले मुनि-मेघों का भव्यों के पुण्य प्रताप से ही उदय होता है ॥४५॥


त्वत्पादपद्मसङ्गेऽपि यस्तत्त्वं नावबुध्यते ।
मन्दभाग्यः समुद्रेऽपि शंखकानां स भाजनम् ॥४६॥

अर्थ: जो मनुष्य आपके पवित्र चरण कमलों की एक बार संगति पाकर भी संसार के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझता, वह मंदभाग्य/मूढ़ रत्नों के खजानेरूप समुद्र के पास जाकर भी रत्नों को ग्रहण न कर शंख, सीप आदि को ही ग्रहण करता है ॥४६॥


सूर्याचन्द्रमसौ यत्र करप्रसरवर्जितौ ।
ज्ञानाख्यं तव तत्रापि, चक्षुः प्रतिहतं न हि ॥४७॥

अर्थ: हे देव ! जिस जगह सूर्य और चंद्रमा की तीक्ष्ण किरणें प्रविष्ट हो अंधकार दूर कर पदार्थ को दिखा नहीं सकतीं, वहाँ पर भी आपका ज्ञान-चक्षु अपने प्रभाव से पदार्थों को देखता है ॥४७॥


अतः प्रसादतो नाथ ! भवतां भवभेदिनाम् ।
शुश्रूषति मनः किञ्चिज्जन्मान्तरगतं मम ॥४८॥

अर्थ: इसलिए हे नाथ ! संसार समुद्र के पार कराने वाली आपकी कृपा से, मैं अपने कुछ पूर्वभवों का वृत्तांत सुनना चाहता हूँ ॥४८॥


कर्मणा केन योगीन्द्र ! प्राप्तं सौख्यं परं ततः ।
परम्परामनर्थानां ततश्च सकलाः श्रियः ॥४९॥

अर्थ: हे योगीन्द्र ! मैंने किस कर्म के द्वारा तो अपार संपत्ति पा, सुख भोगा, और किस कर्म द्वारा विपत्तियां झेलीं और उसके बाद सम्पूर्ण लक्ष्मी को प्राप्त किया ॥४९॥


संयोगश्च जगद्वन्द्य ! कथमासां चतसृणाम् ।
अत्यन्तदूरजातानां नायिकानां ममाभवत् ॥५०॥

अर्थ: और हे जगत् वन्द्य ! इन चारों अनिंद्य सुन्दरियों का संयोग किस कारण से मिला है ? यद्यपि ये अत्यंत दूर देश में उत्पन्न हुई हैं ? फिर भी मुझे वह दूरी अधिक न होकर मैं स्वयं वहाँ पहुँच गया और अनायास ही संयोग हो गया । इसका क्या कारण है ? ॥५०॥


निशम्येति वचस्तस्य प्रोवाच यतिसत्तमः ।
सावधानो महाभव्य वर्ण्यमानं मया शृणु ॥५१॥

अर्थ: इस प्रकार जिनदत्त द्वारा अपने भवान्तर पूछे जाने पर, वे मुनियों के शिरोमणि आचार्य इस प्रकार बोले, हे भद्र ! यदि तुम्हें सुनना है, तो सावधान हो जाओ । मैं जो पूर्वभव का वृतान्त वर्णन करूँ, उसे एकाग्र होकर सुनो ॥५१॥


सुखाभासाभिरामाणि दुःखान्येव हि भुञ्जताम् ।
कर्मजालनिबद्धानां यानि जन्मानि देहिनाम् ॥५२॥

अर्थ: यह कर्मबद्ध जीव


अनादिकालतोऽनादि-संसारे परिवर्तनाम् ।
जानात्येव जिनस्तानि संख्यातुं न पुनः क्षमः ॥५३॥

अतोऽनन्तरमेवाहं भवं तव वदाम्यहो ।
यत्तत्रैव चिराद्भद्र ! भवतो हितसम्भवः ॥५४॥

अस्त्यत्र भरतक्षेत्रे देशोऽवन्तिः स्वशोभया ।
सस्पृहा मर्त्यलोकस्य कृतायेन सुरा अपि ॥५५॥

पतन्ति यत्र शालीनां केदारेषु मधुव्रताः ।
मलिनोभयपक्षा हि के१दारेषु पराङ्मुखाः ॥५६॥

अर्थ (श्लोक 52 से 56): इन्द्रियजन्य सुखों को सुख मानता है किन्तु वे सुखाभास हैं, निश्चय से वे दुःख ही हैं । कर्म जाल में बद्ध प्राणियों को जो कुछ सुख-दुःख हैं, वे सब दुखरूप ही हैं । वे क्षण भर को सुख जैसे प्रतीत होते हैं परन्तु विपाक में दुःख कारक ही हैं ॥५२॥ इस परिवर्तनशील अनादि संसार में अनादिकाल से जीव ने कितने दुख भोगें हैं ? उन्हें सर्वज्ञ अरहंत भगवान ही जान सकते हैं किन्तु वे भी उनकी संख्या गिनाने के लिए सक्षम नहीं हैं ॥५३॥ अतः मैं तुम्हारे अनन्तर पूर्वभव को ही कहता हूँ, हे भद्र ! उससे ही तुम्हारा हित संभव है ॥५४॥ इसी जम्बूद्वीप की दक्षिण दिशा में जो यह भरतक्षेत्र है, उसमें अपनी शोभा से स्वर्ग को भी लजाने वाला अवन्ति नामक देश है । वहाँ आने के लिए देव भी लालायित रहते हैं ॥५५॥ वहाँ पर भ्रमर, शाली धान्यों की क्यारियों में उनकी सुगंधि से मत्त हो-हो कर पड़ते हैं सो ठीक ही है, जिन लोगों के दोनों पक्ष मातृ-पितृ कुल मलिन/दूषित काले हैं । वे कौन लोग परस्त्रियों से पराङ्मुख होते हैं ? अर्थात् नहीं होते ॥५६॥


चक्राङ्किता विराजन्ते राजहंस निषेविताः ।
मार्गेषु यत्र पद्माढ्या चक्रिणो वा जलाशयाः ॥५७॥

अर्थ: उस देश में जगह-जगह तालाब हैं और वे चक्रवर्ती सरीखे मालूम पड़ते हैं क्योंकि जिस प्रकार चक्री; चक्र-अस्त्र विशेष से शोभित, श्रेष्ठ राजरूपी हंसों से सेवित और लक्ष्मी से सहित होता है, उसी प्रकार वे तालाब भी चकवा-चकवी से सहित, राजहंसों से सेवित और कमलों से सुशोभित होते हैं ॥५७॥


सरसा सदलङ्कारा व्यक्तवर्णव्यवस्थितिः ।
प्रसादौजोयुता यत्र कथेव जनता कवेः ॥५८॥

अर्थ: वहाँ की प्रजा श्रेष्ठकवि की कविता के समान गुणवाली है जिस प्रकार कवि की कविता रस से सरस/रसवती होती है, उसी प्रकार प्रजा भी सरस आनंद भोगने वाली थी । जिस प्रकार कविता शब्दालङ्कार प्रभृति काव्य के अलङ्कारों से भूषित होती है, उसी प्रकार वहाँ की प्रजा भी श्रेष्ठ-२ अलङ्कार/आभूषणों से विभूषित थी । कविता जिस प्रकार वर्णों की स्पष्टता से व्यक्त होती है, उसी प्रकार वहाँ की प्रजा भी क्षत्रिय आदि वर्णों की व्यक्त स्थिति से सहित और जिस प्रकार कविता प्रसाद, ओज आदि काव्य के गुणों से युक्त रहती है, उसी प्रकार वहाँ की प्रजा भी प्रसन्नता, तेजस्विता आदि गुणों से सर्वदा युक्त रहती थी ॥५८॥


तत्रास्त्युज्जयिनी नाम नगरी नरसत्तम ! ।
यथेयं राजते हार-लतयेव वराङ्गना ॥५९॥

अर्थ: हे नरोत्तम ! इस अवन्ति देश में उज्जयिनी नाम की सुंदर नगरी है । यह हार सहित सुन्दर सती स्त्री की भाँति शोभित होती है ॥५९॥


प्राकार-शिखरानद्ध पद्मरागांशुभिर्निशि ।
पतितैः खातिकानीरे रथाङ्गा विरहव्यथाम् ॥६०॥

यत्र मुक्तेव जायन्ते सङ्गमाभिमुखा मुदा ।
उदयं दिननाथस्य मन्यमाना इवाभितः ॥६१॥युग्मम्॥

अर्थ (श्लोक 60 से 61): उसके चारों ओर एक परकोटा और एक खाई है जो कि परकोटे के शिखर में लगे हुए पद्मराग मणिएँ, जो अपनी किरणों की कान्ति से चकवा-चकवियों की विरहव्यथा को सर्वदा हरण किया करते हैं और सूर्य के उदय-अनुदय की उन चकवा-चकवियों को कुछ भी चिंता नहीं करने देते ॥६०,६१॥


यत्र प्रासाद-संलग्न-नीलांशु-शवलः शशी ।
मुदे स्वच्छन्दनारीणां जायते निशि सर्वदा ॥६२॥

अर्थ: उस नगरी के प्रासादों में लगी हुई नीलमणियों की कान्ति से मलिन हुआ चंद्रमा सर्वदा ही स्वच्छन्द चारिणी स्त्रियों के हर्ष को करता था ॥६२॥


समग्रवसुधासार-सम्पदां जन्मभूमिका ।
आवासाय कृता धात्रा या नृणां पुण्यशालिनाम् ॥६३॥

अर्थ: एवं वह नगरी ब्रह्मा/भाग्य द्वारा पुण्यात्मा लोगों के लिए समस्त संपत्तियों की जन्मभूमि सरीखी बनाई गई मालूम पड़ती थी ॥६३॥


तत्र विक्रमधर्माख्यो भूपोऽभूद्भवनान्तरम् ।
जगाहे लीलया यस्य यशः पूर्णेन्दुसुन्दरम् ॥६४॥

अर्थ: उस उज्जयिनी नगरी का एक छत्राधिपति विक्रमधर्म नाम का राजा था, इसका पूर्णिमा के चांद के समान यश, लीला मात्र


शोभायै केवलं यस्य चतुरङ्गमभूद्बलम् ।
प्रतापेनैव यत्सेवां कारिता सकलारयः ॥६५॥

पद्मश्रीरभवत्तस्य पद्मेव मधुविद्विषः ।
प्रिया प्रकर्षमापन्ना रूपादिगुणगोचरम् ॥६६॥

अथासीद्धनदेवाख्यः श्रीमानत्रैव वाणिजः ।
समुद्र इव नीराणां गुणानामधिवासभूः ॥६७॥

यशोमतिरिति ख्याता कुल-शील-समुज्ज्वला ।
बभूव वल्लभा तस्य कुशला गृहकर्मणि ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 64 से 68): से समस्त लोक में व्याप्त हो गया ॥६४॥ जिसके प्रताप से ही, शत्रु लोगों के वशीभूत हो जाने से, चतुरङ्ग सेना, केवल शोभा के लिए ही थी ॥६५॥ उस विक्रमधर्म राजा के पद्मश्री नाम की, स्त्रियों के सर्व गुणों से विभूषित परम सुंदरी पट्टरानी थी ॥६६॥ इसी उज्जयिनी नगरी में एक धनदेव नाम का वणिक रहता था, वह जलनिधि समुद्र के समान गम्भीर और अनेक गुणों का निधान/स्थान था ॥६७॥ उसके कुल एवं शील से पवित्र, परम रूपवती, गृहस्थी के समस्त कार्यों में सुचतुर यशोमती नाम की स्त्री थी ॥६८॥


यथाकालं तया सार्द्धं भुञ्जानस्य निरन्तरम् ।
सुखं सुतार्थिनो जातो भवादस्य तनूरुहः ॥६९॥

अर्थ: ये सेठ-सेठानी, अपने पूर्व पुण्य के प्रभाव से, मनमाने सांसारिक सुख भोगते थे, कुछ काल के


यथाकामं ततस्तातो बन्धुलोकसमन्वितः ।
चकार शिवदेवाख्यां भवतो भव्यबान्धव ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 69 से 70): बीतने पर उन दोनों के तुम पुत्र हुए ॥६९॥ और हे भव्यबान्धव ! तुम्हारे पिता ने अपने भाई-बन्धुओं के साथ उत्सव कर तुम्हारा शिवदेव नाम रखा ॥७०॥


पूर्वपापोदयात्तत्र वर्द्धसे त्वं यथा यथा ।
क्षीयतेऽर्थः कुटुम्बेन सार्द्धं गेहे तथा तथा ॥७१॥

अर्थ: तुमने उससे पहले जन्म में घोर पाप किए थे, इसलिए शिवदेव के भव में वे उदय में आए और उसी के कारण ज्यों-ज्यों तुम बढ़ने लगे, त्यों-त्यों तुम्हारे कुटुम्बियों की घटवारी के संग साथ तुम्हारे पिता का धन भी घटने लगा ॥७१॥


अपरेद्युः पतितयाशु व्योमतो विद्युता व्रजन् ।
हट्टमार्गे हतस्तातो यथाभूद्भस्मसात्तथा ॥७२॥

अर्थ: आखिर एक दिन ऐसा पाप का उदय आया कि बाजार की सड़क पर आकाश से टूटकर बिजली गिरी उससे जलकर भस्मीभूत, तुम्हारे पिता परलोक सिधार गए ॥७२॥


ततः शोकाकुलेनास्य बन्धुलोकेन निर्मितम् ।
मृतकर्म्म रुरोदारं माता च करुणं तव ॥७३॥

अर्थ: तुम्हारे पिता की मृत्यु होने पर, दुःखित हो कुटुंबियों ने उनकी दाह-क्रिया कर दी और समय बीतने पर उन्हें भुला भी दिया परन्तु तुम्हारी माता को बड़ा ही कष्ट पहुँचा वह बिलख-बिलख कर रोने लगी ॥७३॥


हा नाथ ! क्व गतस्त्यक्त्वा बालं बालेन्दुसुन्दरम् ।
कथमेषा भविष्यामि हताशा भवतोज्झिता ॥७४॥

अर्थ: हे नाथ ! मुझ अभागिनी के प्राणाधार/पतिदेव तुम मुझे छोड़ कहाँ गए ? यदि तुम्हें मेरी कुछ भी चिंता न थी, तो इस नन्हें बाल चंद्र के समान सुंदर अपने इकलौते पुत्र की ही कुछ चिंता तो की होती । हा ! अब मैं आपके बिना इस संसार में कैसे जिऊँगी, किस तरह इस नन्हें बालक को पाल-पोषकर बड़ा कर सकूँगी ? हा ! मेरी समस्त ही आशाएँ मिट्टी में मिल गईं ॥७४॥


गतं क्षयं क्षणात्कान्त भवतैव समं धनम् ।
दिनं दिनाधिपेनेव कथं पुत्रो भविष्यति ॥७५॥

अर्थ: हे नाथ ! आपके साथ-साथ ही धन भी नष्ट हो गया, यह सूर्य के समान पुत्र दिन-दिन किस प्रकार पलेगा अर्थात् कौन सहायी होगा ? ॥७५॥


इत्यादिकं विलप्यासौ संलग्ना गृहकर्मणि ।
ववृधे च भवांस्तत्र दीनमूर्तिः सुदुःखितः ॥७६॥

अर्थ: इस प्रकार नाना विलापों को कर तुम्हारी माता किसी प्रकार कुटुंबियों के समझाने-बुझाने से शांत हुई और कोई उपाय न देखकर, गृहकर्मों को करती हुई तुम्हें पाल-पोषकर बढ़ाने लगी और तुम भी बहुत ही दुःख से दीनतापूर्वक दिन-दिन बढ़ने लगे ॥७६॥


तमालोक्य जनः सर्वो ब्रवीतीति तथा सुतः ।
समस्तातेन नो जातु रविणेव शनैश्चरः ॥७७॥

अर्थ: तथा पुत्र को इस प्रकार दीन-हीन देखकर लोग कहते हैं, यह कहाँ से ऐसा हुआ है ? क्या कभी रवि से शनिश्चर होता है अर्थात् सूर्य समान पिता से यह शनिश्चर पुत्र हुआ है ? ॥७७॥


क्रमाच्च यौवनं प्राप्तः कृतदारपरिग्रहः ।
ग्रामान्तरे प्रयात्येव वणिज्यायै दिने दिने ॥७८॥

अर्थ: इस प्रकार क्रमशः यौवन को प्राप्त, विवाहित हो, आजीविका के लिए प्रतिदिन ग्रामान्तर को जाने लगा ॥७८॥


ततः किञ्चित्समानीय कुरुते स दिनत्रयम् ।
स प्रातश्चलितोऽन्येद्यु-र्लात्वा परिकरं निजम् ॥७९॥

अर्थ: अतः अपने परिवार को कुछ लाकर देता, उससे तीन दिन काम चलता, किसी एक दिन वह अपने परिवार को लेकर प्रातःकाल ही बनजी/व्यापार करने निकला ॥७९॥


अन्तरेऽत्र ततस्तेन मूलेऽ१श्वत्थमहीरुहः(हे) ।
त्रिकाल-योग-सम्पन्नः सर्व-सत्व-हितोद्यतः ॥८०॥

महारामाधिवासोऽपि निःकामो मानवर्जितः ।
भाजनं सर्व-मानानां सद्धेषो द्वेष-शून्य-धीः ॥८१॥

उद्यतो बन्ध-विध्वंसे गुप्ति-त्रितय-संयुतः ।
नितान्तं शान्त-रूपोऽपि सदा समितिभासुरः ॥८२॥

मुरजादि-विधिव्रात - कृशतायात-विग्रहः ।
पञ्चेन्द्रिय-मनोदुष्ट - सम्यग्विहित-निग्रहः ॥८३॥

मासोपवास-मास्थाय निरुद्ध-सकलेन्द्रियः ।
पर्यङ्कासन-संस्थानो ध्यायन् सहज-मात्मनः ॥८४॥

दृष्टोऽदृष्टसमस्तार्थो मुनीन्द्रो विमलाभिधः ।
प्रणनाम ततस्तस्य पादौ (पादयोः) मुदितमानसः ॥८५॥कुलकं॥

अर्थ (श्लोक 80 से 85): एक दिन की बात है कि तुम खूब सबेरे ही वणिजी के लिए दूसरे गाँव को जा रहे थे कि रास्ते में पवित्र पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानारूढ़ एक मुनिराज तुम्हें दिखाई पड़े । वे मुनि सामान्य मुनि न थे, वे तीनों काल में योग धारण करते हुए सर्व प्राणियों के हितैषी । वे महान् उद्यान निवासी होकर भी अपनी आत्मारूपी वाटिका में निवास करते हुए निष्काम, मान रहित होते हुए भी सबके द्वारा माननीय/सम्मान भाजन, द्वेष विहीन अर्थात् द्वेष बुद्धि से रहित होकर विषयों में द्वेष सहित तथा कर्मों के आस्रव और बंध के विध्वंस करने में लीन मनोगुप्ति, वचोगुप्ति और कायगुप्ति के धारक नितान्त शांत रूप होकर सदा समितियों से प्रकाशमान मुरजबंध आदि व्रत समूह से कृशकाय होते हुए भी पाँच इन्द्रिय व मन की दुष्टता का निग्रह करने वाले, महीने दो-दो महीने के उपवास कर संपूर्ण इन्द्रियों को रोक पर्यङ्कासन मांड अपने आत्मा के सहज, शुद्ध स्वरूप के चिंतन में लवलीन हो जाने वाले तथा प्रत्यक्ष-परोक्ष समस्त पदार्थों के ज्ञाता। उनका पवित्र नाम विमल मुनीन्द्र था। उन्हें देखकर तुम्हारे हृदय में स्वाभाविक भक्ति का निर्झर फूट पड़ा। तुमने हर्षित हो अपने बनिजी की बकुचिये को उतार कर एक ओर रख दिया और मुनि के पैरों में पड़कर नमस्कार किया ॥८०,८१,८२,८३, ८४,८५॥


अचिन्तयत् संसारे द्वावेव सुखिनौ जनौ।
पद्मातपत्रमाधत्ते यस्य यश्च जितेन्द्रियः ॥८६॥

अर्थ: तथा उसने विचार किया कि संसार में दो ही पुरुष सुखी हैं, एक तो वे, जो कि लक्ष्मीवान, एक छत्र पृथ्वी का राज्य करते हैं और दूसरे वे जो कि जितेन्द्रिय तपस्वी हैं ॥८६॥


चक्रिणोऽपि न तत्सौख्यं यदेतस्य तपस्यतः।
रागरोषवशश्चक्री यतिस्ताभ्यां विवर्जितः ॥८७॥

अर्थ: अथवा तपस्वी के साथ चक्रवर्ती का साम्य मिलाना योग्य नहीं है, तपस्वी की अपेक्षा चक्रवर्ती को किंचित मात्र भी सुख नहीं है क्योंकि पहिला तो रागद्वेष से रहित आत्मसुख भोजी है और दूसरा रागद्वेष के सर्वदा अधीन विनाशीक इन्द्रिय सुख का अनुभव करने वाला है ॥८७॥


चिन्तयित्वेति सन्नम्य भूयो भूयोऽपि भक्तितः ।
सञ्गाम यथाभीष्टं करोत्येवं च नित्यशः ॥८८॥

अर्थ: इस प्रकार भक्तिभाव से नम्रीभूत हो तुम हर रोज प्रातःकाल आने की मन में इच्छा कर अपनी कार्य सिद्धि के लिए चले गए और प्रतिदिन उसी प्रकार आने-जाने लगे ॥८८॥


जातेऽन्यदा यतेस्तस्य पारणादिवसे१ सति ।
चिन्तितं मानसे तेन तद्गुणग्रामवासिना ॥८९॥

कस्याद्य मन्दिरं पाद-पांसुभिः पुण्यभागिनः ।
करिष्यत्यद्य कल्याण-भाजनं यतिनायकः ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 89 से 90): कुछ दिन के बाद मुनिराज के योग समाप्त होने का दिन आया और उपवासों का अन्त होने से पारणा का दिन हुआ, तो उससे पहले ही तुमने अपने मन में गुणों के ज्ञाता होने से यह विचार किया कि ॥८९॥ अहा ! ये अद्वितीय तपस्वी यतिदेव आज अपने पैरों की धूलि से किस पुण्यात्मा के घर को पवित्र करेंगे । किस मनुष्य के भाग्य का सितारा इतना देदीप्यमान होगा, जिसको ये कल्याण का भाजन बनाएँगे ? ॥९०॥


उत्तमोत्तम-भोगानां भाजनं जायतां जनः ।
कथं न तत्र यत्रामी विद्यन्ते पात्रसत्तमाः ॥९१॥

अर्थ: जिस मनुष्य के यहाँ ऐसे-ऐसे उत्तम पात्र अपना आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उसको किसी भी ऐहिक और पारलौकिक सुख की सामग्री की कमी नहीं रहती । वह अवश्य ही उत्तम से उत्तम भोगों का पात्र बन जाता है ॥९१॥


अत्यल्पेनापि दत्तेन पात्रस्यैवंविधस्य हि।
तन्नास्ति प्राप्यते यन्न वाञ्छितं परजन्मनि ॥९२॥

अर्थ: इन मुनि सरीखे उत्कृष्ट पात्रों को थोड़े-थोड़ा भी यदि निर्दोष भक्ति द्वारा दान दिया जाये, तो संसार में ऐसा कोई पदार्थ ही नहीं है, जो इच्छा करने मात्र से इस जन्म की तो बात क्या परजन्म में भी प्राप्त न हो जाये ॥९२॥


दर्शनेनैव पापानि नश्यन्त्यस्य रवेरिव।
तमांसि कथ्यते किं वा यदि दानादिसङ्गमः ॥९३॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य के उदय होने मात्र से अंधकार विलीन हो जाता है, उसी प्रकार ऐसे तपस्वी महात्माओं के दर्शन मात्र से पापों का समुदाय समूल नष्ट हो जाता है । फिर यदि दान आदि की सहायता से इनका संगम प्राप्त कर लिया जाये तो फिर कहना ही क्या है ? ॥९३॥


मादृशां मन्दभाग्यानां विलीयन्ते मनोरथाः।
असम्पूर्णा मनस्येव, तरङ्गा इव वारिधेः ॥९४॥

अर्थ: जिस प्रकार समुद्र में लहरें उठती हैं और फिर उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार मुझ मंद भाग्य की इच्छाएँ मन में उठती हैं और बिना पूर्ण हुए ही विलीन हो जाती हैं ॥९४॥


आक्रामन्ति विपुण्यस्य पादपद्मैर्न मन्दिरम्।
यतयो जायते कस्य प्राङ्गणे वा सुरद्रुमः ॥९५॥

अर्थ: जिस मनुष्य का पुण्य नष्ट हो गया अथवा है ही नहीं, उसके घर को तपस्वी मुनिराज अपने चरणकमलों से पवित्र नहीं करते सो ठीक ही है, बिना उत्कृष्ट पुण्य के कल्पवृक्ष को कब किसके घर होते हुए देखा व सुना है ? ॥९५॥


परित्यज्य न पुण्यानि हेतुमस्य वितर्कये ।
कञ्चनापि यतीशस्य लाभे चिन्तामणेरिव ॥९६॥

अर्थ: जिस प्रकार चिंतामणि रत्न पापियों को प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार इन सरीखे मुनियों का दान देने का समागम भी बिना उत्कृष्ट पुण्य के प्राप्त नहीं होता ।


तथापि सावधानोऽस्मि मा कदाचित्तदागमः ।
व्यवसायवशात्पुंसां जायते विपुलं फलम् ॥९७॥

अर्थ: यद्यपि ऊपर विचारी गई बातें सब ठीक हैं तथापि कौन कह सकता है कि उस पुण्य का उदय मेरे कब हो जाये ? इसलिए मुझे उनके आगमन की प्रतीक्षा में सावधान रहना चाहिए क्योंकि परिश्रम करते रहने से ही मनुष्यों को विपुल फल की प्राप्ति होती है ॥९७॥


विभाव्येति प्रसन्नात्मा धौतवस्त्रोत्तरीयकः ।
मार्गमन्वेषयंस्तस्य तस्थौ द्वारेस्वसद्मनः ॥९८॥

अर्थ: इस प्रकार नाना तर्क-वितर्कों को करता हुआ वह शिवदेव वैश्य धुले हुए स्वच्छ निर्मल धोती-दुपट्टे को पहिनकर अपने घर के दरवाजे पर खड़ा हो गया और उन मुनिराज के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा ॥९८॥


अथासौ प्रेरितस्तस्य पुण्यैरिव यथा मुनिः ।
तेनैवाप क्रमात् क्रामन्नुच्चनीचगृहावलीः ॥९९॥

अर्थ: मुनिराज पारणा के लिए उज्जैन नगर में पधारे और अनेक ऊँचे-नीचे अमीर-गरीब, महल, मकानों को क्रमशः लांघते हुए उस वैश्य के पुण्य द्वारा प्रेरित किये हुए के समान उसी की तरफ आने लगे ॥९९॥


वीक्षितश्च ततस्तेन दुर्गतेनेव सन्निधिः ।
पुण्यपुञ्ज इव स्वस्याभिमुखो वा स्ववेश्मनः ॥१००॥

अर्थ: मुनिराज को अपनी तरफ आते हुए देखकर शिवदेव ने अपना बड़ा ही भाग्य समझा, जिस प्रकार दरिद्र को निधि की प्राप्ति होने से अपार हर्ष होता है, उसी प्रकार असीम हर्ष हुआ और देहधारी पुण्य के पुञ्ज के समान उन्हें अपने घर आते देखा ॥१००॥


अग्रेभूय स्वतस्तेन प्रत्यग्राहि प्रयत्नतः ।
उच्चस्थानस्थितस्यास्य चक्रे चरणधोवनम् ॥१०१॥

अर्थ: घर के पास मुनिराज के आते ही शिवदेव ने प्रयत्नपूर्वक उनका पड़गाहन किया और ऊँचे आसन पर विराजमान कर उनके चरणों का अभिषेक/प्रक्षालन किया ॥१०१॥


तत्रवन्द्योदकं कृत्वा पूजामष्टविधामसौ ।
यावद्भोजयते भुक्तिं धर्ममूर्त्तिमुनीश्वरम् ॥१०२॥

अर्थ: उस चरण जल की वंदना करके अष्ट प्रकार की पूजा कर नवधा भक्ति से आहार देता है ॥१०२॥


सूरदेवयशोदेव - नन्ददत्तवणिक्सुताः ।
पद्मावती जयश्रीश्च सुलेखा मदनावली ॥१०३॥

लात्वा लेहनकं तावत् सर्वाभरणभूषिताः ।
मत्वा सुवासिनीत्यस्य मातुराप्ता गृहं क्षणात् ॥१०४॥युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 103 से 104): इसी बीच में सूरदेव, यशोदेव और नन्ददत्त वैश्यों की पद्मावती, जयश्री, सुलेखा और मदनावली नाम की पुत्रियाँ सम्पूर्ण आभरणों से भूषित होती हुईं साथ में सुरभित हलुआ को लेकर इसकी माता के घर आईं ॥१०३,१०४॥


निविष्टास्तास्ततः सर्वास्तत्रासावपि साधवे ।
तन्मध्यात्प्रददौ किञ्चित् तद् वाक्यात् तुतुषुश्च ताः ॥१०५॥

अर्थ: तथा इसके बाद वे वहाँ सभी बैठ गईं । शिवदेव ने उनके लाए हुए हलुए में से उन मुनिराज को कुछ अंश दे दिया और उसके इस व्यवहार से वे वैश्य पुत्रियाँ बहुत ही संतुष्ट हुईं ॥१०५॥


अचिन्तयँश्च ता धन्य-तम एषः महामतिः ।
यस्यैवं दुर्गतस्यापि धर्मकार्यमहोद्यमः ॥१०६॥

अर्थ: उन्होंने सोचा कि यह बुद्धिमान अति धन्य है, इसके यद्यपि धन नहीं है, वणिजी से अपना पेट भरता है तथापि धार्मिक कार्यों के करने का उत्साह इसका बहुत ही प्रशंसनीय है ॥१०६॥


नरनाथादयोऽप्यस्य पादपद्मावलोकनम् ।
वाञ्छन्तोऽपि लभन्ते न मुनेर्दानं किमुच्यते ॥१०७॥

अर्थ: जिन महात्मा के चरण कमलों के दर्शन को बड़े-बड़े राजे-महाराजे तरसते हैं परन्तु पा नहीं सकते उनके दर्शन की तो क्या बात ? इसने उन्हें दान भी दे दिया है ॥१०७॥


अयि लक्ष्मि ! किमन्धासि येनैवं गुणशालिने ।
सस्पृहा नररत्नाय सात्त्विकाय न जायसे ॥१०८॥

अर्थ: अयि लक्ष्मी ! क्या तू सचमुच ही अंधी है, जो इस गुणशाली ! सात्विक पुरुष को नहीं अपनाती ? इस पर कृपा नहीं करती ॥१०८॥


जन्मना वा धनेनाऽपि विवेकेनापि किं नृणाम् ।
यदिदृशे महापात्रे न किञ्चिदुपचर्यते ॥१०९॥

अर्थ: संसार में मनुष्यों के पास यदि अत्यन्त धन भी हो और विवेक भी हो तो क्या प्रयोजन ? यदि इस प्रकार के महापात्र के लिए कुछ भी उपचार नहीं करे ॥१०९॥


एतस्य यानि पुण्यानि तानि नान्यस्य निश्चितम् ।
यदेतद्गृहमायातो दुर्लभो जगतां पतिः ॥११०॥

अर्थ: इसके बराबर अवश्य ही अन्य किसी का भी पुण्य नहीं है नहीं तो क्या भला ! ये सर्व साधारण को दुर्लभ त्रिलोकीनाथ इसके घर स्वयं आते ॥११०॥


श्रद्दधे च तदा ताभिस्तद्दानं भक्तिपूर्वकम् ।
मुहुर्मुनिं मुहुस्तं च पश्यन्तीभिः सविस्मयम् ॥१११॥

अर्थ: इस प्रकार मन में सोच-विचार कर उन वणिक पुत्रियों ने उस पात्रदान की खूब ही अनुमोदना की और बार-बार उस शिवदेव को तथा मुनिराज को भक्ति भरे नेत्रों से देखा ॥१११॥


त्वयापि पारितः साधु र्भक्तितो मनसा परम् ।
आशङ्का विहिता मातुस्तद्दानासहना हि सा ॥११२॥

अर्थ: तुम शिवदेव ने तो भक्ति रस से पूर्णमन हो, मुनि को आहार दान दे पारणा कराई परन्तु माता कदाचित् आकर कुछ विघ्न न कर दे इस भय से तुमने आशंका की ॥११२॥


भुक्त्वा सोऽपि जगामातो यथाभीष्टं मुनीश्वरः ।
अनुव्रज्य प्रणम्यायाद् वाणिजोऽपि निजालयम् ॥११३॥

अर्थ: आहार ले मुनिराज तो वन की तरफ विहार कर गए और वह वणिक थोड़ी दूर उनके पीछे जाकर नमस्कार कर अपने घर लौट आया ॥११३॥


यत्त्वया विहितं भद्र सिद्ध्यत्येतन्न कस्यचित् ।
भाजनं सर्वकल्याण-सम्पदां नियतं भवान् ॥११४॥

अर्थ: भद्र ! जो तुमने किया वह किसी से नहीं हो सकता, तुम निश्चय ही समस्त सम्पत्तियों के घर हो


प्रशस्येति गतास्तास्तं स्वसद्म मुदितास्तराम् ।
बुभुजे प्रत्यहं कृत्वातिथीनां संप्रतीक्षणं ? ॥११५॥

अर्थ: इस प्रकार वे वैश्य पुत्रियाँ उस शिवदेव की प्रशंसा कर अत्यधिक प्रसन्न होती हुईं ? अपने घर को चली गईं और प्रतिदिन अतिथियों का द्वाराप्रेक्षण करके भोजन करने लगीं ॥११५॥


यतीश-गुण-भावितः सहज-सौम्यतासङ्गतो
वसन्निति विहायिते रसिकचित्तवृत्तिस्तदा ।
जगाम मृतिगोचरं सुचिरकालतो वाणिजो
निरन्तरमिमास्तथा समनुभूय सौख्यं मृताः ॥११६॥

अर्थ: तब मुनिराज के गुणों में भावों से सहित सहज सौम्यता को प्राप्त दान में रसिक मनोवृत्तिपूर्वक बहुत समय पर्यन्त वैश्य ने इस प्रकार निवास करते हुए मृत्यु को प्राप्त किया और इन वैश्य पुत्रियों ने भी निरंतर सुख का अनुभव करके मरण को प्राप्त किया ॥११६॥

नवम सर्गः

अथासौ शिवदेवोऽभूद्-भवांस्तद्दान-पुण्यतः ।
श्रेष्ठिनो जीवदेवस्य जिनदत्ताभिधः सुतः ॥१॥

अर्थ: इसके बाद वह शिवदेव मरकर दान के पुण्य प्रभाव से तुम जीवदेव सेठ के पुत्र जिनदत्त हुए हो ॥१॥


प्राप्तस्त्वं तत एवासि सौख्यं सर्वाङ्ग-गोचरम् ।
अथवा लभ्यते किं न पात्र-दानेन देहिभिः ॥२॥

अर्थ: तुझे जो कुछ भी सुख प्राप्त हुए हैं, वे सब उसी दान के माहात्म्य से हुए हैं क्योंकि पात्रदान से सब ही सुख प्राप्त होते हैं ॥२॥


तासां यथानुरागेण सर्वदैवासि भावितः ।
तेनान्यसु न ते स्त्रीषु साभिलाषमभून्मनः ॥३॥

अर्थ: उन वैश्य पुत्रियों के अनुराग से तुम सदा ही भाए गए हो, उस कारण से अन्य स्त्रियों में तुम्हारा मन अभिलाषा युक्त नहीं हुआ ॥३॥


जननीशङ्कया यच्च संक्लिष्टं हृदयं तदा ।
विपाकात्तस्य चावापि मध्येऽनर्थपरम्परा ॥४॥

अर्थ: दान देते समय जो हृदय में माता के आ जाने की शंका से संक्लिष्टता आ गई थी, उससे जो भक्ति में न्यूनता हो जाने से, पुण्य में न्यूनता हो गई थी, उसी के फल से बीच में अनर्थों की परम्परा तुम्हें प्राप्त हुई ॥४॥


तद्विरामे च सम्पन्नं सम्पदां पदमुत्तमम् ।
कन्याचतुष्टयं तच्च स्वपरीणामयोगतः ॥५॥

चम्पायां सिंहलद्वीपे रथन्नूपुरपत्तने ।
चम्पायामेव सञ्जातं नारीरत्नचतुष्टयम् ॥६॥

अर्थ (श्लोक 5 से 6): उस पाप कर्म के अंत होने पर उत्कृष्ट संपत्ति के साथ-साथ अपने परिणाम के अनुसार पूर्वभव की चारों कन्याएँ । प्रथम चंपानगरी में, दूसरी सिंहलद्वीप में, तीसरी रथनुपुर नगर में और चौथी फिर चंपापुर नगर में ही ये क्रमशः चारों नारी रत्न प्राप्त हुए ॥५,६॥


विमलातिमतिः पूर्वा श्रीमती गदिता परा ।
शृङ्गारादिमतिश्चान्या विलासादिमतिस्तथा ॥७॥

अर्थ: प्रथम का नाम विमलमती, द्वितीय का नाम श्रीमती, तीसरी का नाम शृङ्गारमती और चौथी का नाम विलासमती विख्यात हुआ ॥७॥


परिणीतास्त्वया सर्वास्तत्र तत्र नरान्तरम् ।
अनिच्छन्त्यः क्रमाद्भद्र ! भवत्सङ्गम-लालसाः ॥८॥

अर्थ: हे भद्र ! ये चारों ही अन्य पुरुषों से विरक्त, तुम्हारे ही संगम की लालसा रखने वाली थी, उनको क्रम से उस-उस नगर में जाकर तुमने वरण किया ॥८॥


माहात्म्यात्तस्य दानस्य सार्ध-माभिर्निरन्तरम् ।
सारं संसारवासस्य भुज्यते भवता सुखम् ॥९॥

अर्थ: यह सब उस आहार दान का ही माहात्म्य है कि तुम इन चारों प्रिय पत्नियों के साथ निरन्तर संसार वास के सारभूत सुखों को भोग रहे हो ॥९॥


निगद्येति यतौ तत्र विरते स्मृतवानसौ ।
निजजन्म समं ताभि-र्मुमूच्छं च ततो द्रुतम् ॥१०॥

अर्थ: इस प्रकार जिनदत्त के पूर्वभवों का समस्त वृत्तांत जब मुनिराज कह चुके, तो जिनदत्त तथा स्त्रियों को अपने पूर्वभव का समस्त वृत्तांत याद हो आया और उससे उन्हें मूर्छा आ गई ॥१०॥


अचिरादुपचारं स समासाद्य ततो जवात् ।
अङ्गनाभिः समं पृष्ट उत्थितो विस्मितैर्जनैः ॥११॥

अर्थ: शीघ्र ही उचित उपचार करने पर वेग से अपनी पत्नियों के साथ वह उठ बैठा । उपस्थित जन विस्मित हुए और अचेत होने का कारण पूछने लगे ॥११॥


उदीर्य च तथा वृत्तं जनेभ्यो भव्यबान्धवः ।
इदं विचिन्तयामास संविग्नो हृदये तदा ॥१२॥

अर्थ: जिनदत्त ने भी अपना सकल वृत्तान्त सुनाया, सबकी शंका निवारण की तथा संसार से उद्विग्न मन होकर इस प्रकार चिन्तवन करने लगे ॥१२॥


अद्यैव साधुनाऽनेन चक्षुरुद्घाटितं मम ।
विषयाशाविमुग्धस्य दर्शयित्वा भवान्तरम् ॥१३॥

अर्थ: ये मुनिराज मेरे परम उपकारी हैं । मैं इन्द्रिय विषयों की लालसा में मत्त हो उन्हीं को तृप्त करने में लगा हुआ था । इन्होंने पहले जन्म का समस्त वृतांत बतलाकर सचेत कर दिया ॥१३॥


न मया विहितं किञ्चित्तदा दौर्गत्य-योगतः ।
अज्ञत्वाच्च तथापीत्थं सम्पद्दामस्मि भाजनम् ॥१४॥

अर्थ: यद्यपि मैंने उस समय दरिद्र तथा अज्ञानी होने के कारण कुछ विशेष धर्माचरण न किया, तो भी मैं इस समय सब तरह से संपत्तियों की कृपा का पात्र हुआ हूँ ॥१४॥


अत्यल्पमप्यहो न्यस्तं विधिना पात्रसत्तमे ।
शतशाखं फलत्याशु वटबीजमिव ध्रुवम् ॥१५॥

अर्थ: अहा ! देखो ! मैंने बहुत ही थोड़ा-सा दान पहले भव में सत्पात्र के लिए दिया था, वह ही जिस प्रकार छोटा वट का बीज बड़ा हो जाता है और अनेक शाखा-प्रशाखाओं में फैलता है, उसी प्रकार नाना संपत्तियों के द्वारा अब यह फल रहा है ॥१५॥


तावतैव यदि प्राप्तः सम्पदं जगदुत्तमाम् ।
स्वर्मोक्षसुखसम्पत्तिः सुलभैव ततो ध्रुवम् ॥१६॥

अर्थ: यदि उस अत्यल्प दान का ही इतना माहात्म्य है और संसार की उत्तम संपत्तियों का कारण हुआ है, तो स्वर्ग व मोक्ष की संपत्तियाँ अवश्य ही सुलभ रीति से प्राप्त हो जाएगीँ । इसमें कोई संदेह नहीं है॥१६॥


परं चेतयते जन्तु-र्नात्मानं मूढमानसः ।
प्रमाद-मद-मात्सर्य - मोहाज्ञानैर्निरन्तरम् ॥१७॥

अर्थ: लेकिन प्रमाद, मद, मात्सर्य, मोह और अज्ञान आदि दुर्भावों के वशीभूत हुए मूढ़ मनुष्य अपने आत्मस्वरूप को नहीं विचारते ॥१७॥


न माता न पिता नैव सुहृदः स्निग्ध-बुद्धयः ।
तथा प्रेमकरा नृणां निस्पृहा यतयो यथा ॥१८॥

अर्थ: वे यह नहीं सोचते कि संसार में न तो उतना माता ही हित कर सकती है तथा न पिता, भाई बंधु और मित्र ही कर सकते हैं । जितना कि निरीह साधु प्रेम, वात्सल्य द्वारा परहित कर सकते हैं ॥१८॥


जिनशासनमुद्दिश्य दीयते किमपीह यत् ।
क्रियते कृतकृत्यत्वं तेनैवास्ति विसंशयम् ॥१९॥

अर्थ: इसलोक में जिनशासन का उद्देश्य करके जो कुछ भी दिया जाता है, उसके द्वारा ही कृतकृत्यपना प्राप्त किया जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥१९॥


अधुनाविकला सर्वा सामग्री मम वर्त्तते ।
परित्यज्य बहिर्भावं विदधामि ततो हितम् ॥२०॥

अर्थ: इस समय मुझे प्रायः सब ही सामग्री प्राप्त है, इसलिए बाहिरी हित को छोड़कर मुझे भीतरी सच्चा हित करना चाहिए ॥२०॥


तथा ह्ययं महामोह-हुताश-शमनाम्बुदः ।
अस्माकमेव पुण्येन समायान्मुनिपुङ्गवः ॥२१॥

अर्थ: मेरे पुण्य के प्रताप से ही महामोहरूपी तीव्र अग्नि को शांत करने के लिए मेघ के समान ये मुनिराज मुझे प्राप्त हुए हैं ॥२१॥


जर्जरीकुरुतेऽद्यापि न शरीरमिदं जरा ।
आक्रमन्ती महावेगाद् वात्येव च कुटीरकम् ॥२२॥

अर्थ: जब तक भारी वेग से आँधी के समान दिन पर दिन बीतने के कारण शीघ्र ही समीप आने वाली वृद्धावस्था मेरी इस शरीररूपी झोपड़ी को गिराये नहीं देती है, तब तक उससे पहले ही मुझे अपना हित कर लेना चाहिए ॥२२॥


विवेकोऽपि स्थिरीभूतो मनागस्य महामुनेः ।
वचसैव हृदि व्यक्ता विज्ञाता च भवस्थितिः ॥२३॥

अर्थ: इन महामुनि के उपदेश से मेरे हृदय में भेद-विज्ञानरूप विवेक प्रकट हुआ है, जो मैंने अपनी पूर्वजन्म की दशा जान ली है, उससे मैं चित्त में


पादमूले मुनेरस्य विदधामि ततस्तपः ।
विचिन्त्येति ततो नत्वा समुवाच यतीश्वरम् ॥२४॥

यथा प्रसादतो नाथ भवतः स्वभवो मया ।
सम्यगध्यक्षतां नीतो नरामरनमस्कृतः ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 23 से 25): स्थिर हो चुका हूँ ॥२३॥ इसलिए इन ही मुनिराज के चरण तल में मुझे दीक्षा लेकर तप धारण करना चाहिए, इस प्रकार हृदय में दृढ़रीति से सोच-समझकर जिनदत्त ने मुनिराज से निवेदन किया कि ॥२४॥ मनुष्यों और देवों के द्वारा नमस्कृत हे नाथ ! आपके प्रसाद से मैंने अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत स्पष्ट जान लिया है ॥२५॥


न कल्पपादपः सूते न च कामदुधा न च ।
चिन्तामणिरचिन्त्यं यत् फलं त्वत्पादसेवनम् ॥२६॥

अर्थ: आपके चरणों की सेवा से मेरा बड़ा ही हित हुआ है, वह कल्पवृक्षों से नहीं प्राप्त हो सकता, जो फल अभीष्ट पदार्थ देने वाली कामधेनु गाय, प्रसव नहीं कर सकती और जो चिंता करने मात्र से प्रदान करने वाला चिंतामणि रत्न नहीं दे सकता, वह हितदायी फल आपके चरण कमलों के सेवन करने से प्राप्त हुआ है ॥२६॥


तावदन्धो जनः सर्वः सर्वतो बोधशून्यकः ।
त्वत्पादपद्मपर्यन्तं यावदेति न भक्तितः ॥२७॥

अर्थ: जब तक मनुष्य आपके चरणों का सहारा ले उनकी आज्ञानुसार प्रवृत्त नहीं होता, तब तक वह नेत्रों से देखता हुआ भी वास्तव में अंधा है ॥२७॥


भावि भूतं भवद्वस्तु तदस्तीह न भूतले ।
ज्ञाने तव न यत्स्वामिन् करस्थामलकायते ॥२८॥

अर्थ: हे जिन स्वामिन् ! संसार में न तो कोई पदार्थ ऐसा पैदा ही हुआ है, न हो रहा है और न पैदा ही होगा, जो आपके ज्ञान में हाथ की हथेली पर रखे हुए आँवले के समान स्पष्ट और प्रत्यक्ष न दीखता हो ॥२८॥


भ्राम्यतां नाथ ! जीवाना-मस्मिन्संसारकानने ।
सम्यग्मार्गोपदेष्टान्यो, भवतोऽस्ति न कश्चन ॥२९॥

अर्थ: हे मुनिनाथ ! संसाररूपी गहन वन में मार्ग न सूझने से नाना दुःख भोगते हुए इन प्राणियों को सीधा और सच्चा मार्ग दिखाने वाले आप ही हैं और अन्य कोई नहीं ॥२९॥


शरणं च त्वमेवासि सदा दुर्गतिपाततः ।
त्रस्यतामस्तु ते नाथ प्रसादो मम दीक्षया ॥३०॥

अर्थ: हे मुनिनाथ ! दुर्गति में गिरते हुए, सदा दुखी रहने वाले, जीवों के आप ही सही शरण हैं, मेरे लिए दीक्षा प्रदान कर आप प्रसन्न होवें ॥३०॥


स निशम्य वचस्तस्य प्रोवाचेति यतीश्वरः ।
भव्यचूडामणे ! सूक्त-मुक्तं किन्तु परं शृणु ॥३१॥

अर्थ: जिनदत्त की उपर्युक्त विनती को सुनकर मुनिराज बोले हे भव्य ! तुमने जो कहा है वह ठीक है, पर कुछ वक्तव्य है उसे भी सुनो ॥३१॥


त्वादृशां सुकुमाराणां तपो नामैव सुन्दरम् ।
न जातु सहते जाती-कुसुमं हिमवर्षणम् ॥३२॥

अर्थ: तुम्हारे जैसे सुकुमारों के लिए तप, नाम से ही सुंदर है उत्तम जाति का फूल बर्फ की वर्षा को कभी भी सहन नहीं करता ॥३२॥


बालुकाकवलैर्भोक्तुं पातुं ज्वाला हविर्भुजः ।
बद्धुं गन्धवहो दोर्भ्यां तरीतुं मकरालयः ॥३३॥

मेरुस्तोलयितुं खड्ग-धारायां खलु लीलया ।
शक्यं सच्चरितुं जातु प्राप्तुं पारं विहायसः ॥३४॥

न तु नैर्ग्रन्थीदीक्षायाः सन्मुखं क्षणमप्यहो ।
भवितुं भावि यत्तत्र कष्टमेव समन्ततः ॥३५॥

क्षुधादि च तथा ह्यङ्ग-नाग्न्यमङ्गोपताप कम् ।
धर्त्तव्यं विधुतोद्दाम-मनोमल्लविजृम्भितम् ॥३६॥विशेषकम्॥

अर्थ (श्लोक 33 से 36): बालू का ग्रास बनाकर खाना, अग्नि की ज्वाला को पीना, हवा को गांठ में बांधना, समुद्र को हाथों से तैरकर पार करना, मेरुपर्वत को तौलना, तलवार की नोक पर चलना और आकाश के पार पहुँचना अर्थात् जिस प्रकार बालू खाना आदि कार्य कठिन है, उसी प्रकार जिनदीक्षा का धारण कर निर्वाह करना भी कठिन ही नहीं असंभव सरीखा है बल्कि यहाँ तक कहिए कि उपर्युक्त बालू खाना आदि तो किसी प्रकार किए भी जा सकते हैं परन्तु जिनदीक्षा का पालन करना नहीं हो सकता क्योंकि उसमें सब तरह से शरीर को असह्य कष्ट भोगने पड़ते हैं । जैन तप धारण करने से भूख-प्यास की बाधा सहनी होगी, जन्म भर सब समय सर्वथा वस्त्र रहित नग्न रहना पड़ेगा, मनरूपी मल्ल का उत्कट वेग रोकना होगा ॥३३,३४,३५,३६॥


मनसापि न यः शक्यः पुंसां चिन्तयितुं स च ।
महाव्रतमहाभारो धर्त्तव्यो जीवितावधि ॥३७॥

अर्थ: और जो पुरुषों के मन से भी चिंतन करने के लिए समर्थ नहीं है, वह महाव्रतों का महाभार जीवन पर्यन्त धारण करना पड़ता है ॥३७॥


स्वच्छन्दं स्पन्दनं नैव शृङ्खलाभिरिवाभितः ।
यकाभिस्ताश्च संसेव्या सदा समितयो ध्रुवम् ॥३८॥

अर्थ: जिस प्रकार चारों तरफ सांकलों से बंधा हुआ मनुष्य, अपने हाथ पैर किसी तरफ किसी तरह नहीं हिला डुला सकता, उसी प्रकार समितियों के वशीभूत हुआ जैनमुनि स्वच्छंद मन, वचन, काय की प्रवृत्ति नहीं कर सकता ॥३८॥


एकैकशोऽपि यैर्विश्व-माक्रान्तं करणानि च ।
जेयानि तानि सर्वाणि मनसा सह सर्वदा ॥३९॥

अर्थ: जिन एक-एक इन्द्रियों ने भी अपनी प्रबलता से, संसार के लोगों को वशकर पराधीन बना दिया है, उन मन सहित छहों इन्द्रियों को अपने वश में करना होगा ॥३९॥


यथाकालं च कर्त्तव्यं षडावश्यक-मञ्जसा ।
प्रमादेन विना भद्र ! श्रद्धा-संशुद्ध-चेतसा ॥४०॥

अर्थ: हे भद्र ! जैनदीक्षा से दीक्षित होकर अनियम से चलना नहीं होता । शास्त्रोक्त षडावश्यक अपने-अपने समय पर करने पड़ते हैं, प्रमाद को तिलाञ्जलि दे देनी होती है । श्रद्धा से मन सर्वथा शुद्ध रखना होता है ॥४०॥


नितान्तं सुकुमारस्य महामाल्योचितस्य च ।
कार्यं केशकलापस्य लुञ्चनं सुधिया तथा ॥४१॥

अर्थ: फूलों की माला के समान सुकोमल केशों को, हाथ की मुष्ठियों द्वारा उखाड़ना पड़ता है । जिसका सहना अत्यन्त क्लेशकारी कार्य है ॥४१॥


रोम-वल्कल-पत्राद्या-वरणान्यपि यत्र नो ।
(आ)अचेलक्यं तदत्यन्त-क्लेशकारि सहेत कः ॥४२॥

अर्थ: उस अवस्था में कपड़े की तो क्या बात ? रोम, बल्कल और पत्तों तक का आवरण निषिद्ध है, जिसका कि सहना अत्यन्त क्लेशकारी है ॥४२॥


आजन्म मल-जह्लादि-लिप्तदेहतया स्थितिः।
सशर्करा धरा शय्या मुख-वासादि -वर्जनम् ॥४३॥

अर्थ: दीक्षा लेने के बाद जन्म भर स्नान नहीं होता, जिससे कि धूलि आदि मलों से मलिन देह सर्वदा रखनी पड़ती है, दंतधावन भी नहीं करना होता और कंकड़-पत्थरमयी भूमि पर, एक करवट से सोना पड़ता है ॥४३॥


वल्भनं पाणिपात्रेण काले कार्यं यथाविधि ।
स्थितेन सर्वदा सकृत् कायस्य स्थितिहेतवे ॥४४॥

अर्थ: शरीर की स्थिरता के लिए, सदा दिन में एक बार खड़े होकर, शास्त्रोक्त विधि अनुसार नवधाभक्तिपूर्वक सूर्योदय व अस्त के ३ मुहूर्त बाद व पहले, योग्य समय में करपात्र से आहार ग्रहण करना होता है ॥४४॥


इति मूलगुणा यत्र समासेन प्रदर्शिताः ।
त्रिकालयोगसेवाद्या नियमाश्चोत्तरे पराः ॥४५॥

अर्थ: इस प्रकार जिन बातों का उल्लेख किया गया है वे तो मूलगुण हैं, इनके सिवा त्रिकाल योग धारण, बारह तप, बाईस परीषह आदि उत्तर गुण बहुत से हैं ॥४५॥


दुःसहाः सर्वतः सन्ति प्रसूताश्च परीषहाः ।
ध्यानाध्ययनकर्माणि कर्त्तव्यानि निरन्तरम् ॥४६॥

अर्थ: जैसे कि भूख-प्यास की बाधा आदि बाईस परीषह सहने पड़ते हैं, ध्यान-अध्ययन का अभ्यास करना होता है और शास्त्र का पठन-पाठन आदि अनेक नियम साधने होते हैं ॥४६॥


तत्रात्मानं कथं क्षेप्तुं सर्वदा सुखलालितम्।
शक्नुवन्ति महाबुद्धे ! कोमलाङ्गा भवादृशाः ॥४७॥

अर्थ: हे प्रबुद्धवर ! हमेशा सुख-सुविधाओं में पले हुए, तुम्हारे जैसे कोमल शरीरधारी, अपने आपको उस तप में तपाने के लिए कैसे समर्थ हो सकते हैं ? अर्थात् नहीं हो सकते ॥४७॥


पूजा श्रीमज्जिनेन्द्राणां दानं सर्वाङ्गि-तर्पकम्।
विवेकश्चेदृशो भद्र ! तपोऽन्यत्ते किमुच्यते ॥४८॥

अर्थ: तुम्हारे सरीखों के लिए तो श्री वीतराग जिनदेव की पूजा, सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त करने वाला दान आदि शुभ कर्म करते हुए गृहस्थ धर्म पालना ही यथेष्ट है, वह ही तप तुम्हारे लिए पर्याप्त है और क्या बताया जाये ? ॥४८॥


स्वर्गापवर्गसौख्यस्य पारम्पर्येण कारणम्।
गार्हस्थ्यमेव यद्युक्तं पालितुं प्रियदर्शनम् ॥४९॥

अर्थ: गृहस्थ धर्म भी परम्परा से स्वर्ग व मोक्ष का कारण है, इसलिए तुम गृहस्थ धर्म को, सम्यग्दर्शन की प्रीतिपूर्वक पालन करो ॥४९॥


अतो गृहस्थ-भावस्थो ज्ञात-तत्त्वो भवानिह।
दान-पूजा-रतः शील-सम्पन्नस्तनुताद्धितम् ॥५०॥

अर्थ: इसलिए तुम तत्त्वों के भले प्रकार ज्ञाता होकर दान-पूजा में रत होते हुए श्रावकों के व्रत निरतिचार पालते रहो और उसी से अपना यथाशक्ति हित करो। (यहाँ सर्वप्रथम गृहस्थधर्म को पालने का उपदेश दिया, फिर इसमें परिपक्वता होने पर, मुनिधर्म का पालन करना चाहिए। अमृतचन्द्र स्वामी ने जो पहले मुनिधर्म के उपदेश की बात कही है और जो आचार्य गृहस्थ धर्म का प्रथम उपदेश देता है वह दुर्गति, निग्रह प्रायश्चित का भागी है, यह उनकी ही धारणा है, आगम परम्परा में तीर्थङ्कर भगवान भी समवशरण में सर्वप्रथम श्रावकधर्म का ही उपदेश देते हैं । पद्मपुराण में द्युति नाम के आचार्य देव ने भरत, राम आदि को गृहस्थधर्म का उपदेश दिया । पुराणों में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं । उन्होंने स्वयं, श्रावकधर्म का उपदेश पहले, फिर मुनिधर्म का उपदेश बाद में दिया है) ॥५०॥


विरते प्रतिपद्येति यतीशे स जगादिति ।
स्मित्त्वोचितं न नो नाथ ! गुरूणां दातुमुत्तरम् ॥५१॥

अर्थ: सम्यक्प्रकार से मुनिधर्म का ज्ञान कराया और उसकी कठिनाइयों का उपदेश दिया । इस प्रकार समझाकर जब यतिराज ने विराम लिया, तब जिनदत्त मुस्कुराता हुआ बोला हे नाथ ! गुरुजनों को उत्तर देना उचित नहीं है ॥५१॥


जानन्ति च य एवात्र युक्तायुक्तं यथाभवत् ।
प्रसादो जल्पयत्येष तेषामेव तथापि माम् ॥५२॥

अर्थ: तथा यहाँ जो उचित-अनुचित जैसे होता है वैसा ही आप जानते हैं, मुझे भी उनका यह प्रसाद ही बुलवा रहा है ॥५२॥


तपसो दुष्करत्वं यत् पूर्वमुक्तं महामुने ।
तत्तथैव समस्तं हि को न वेत्तीति बुद्धिमान् ॥५३॥

अर्थ: हे महामुने ! आपने उपर्युक्त प्रकार तप को अति दुष्कर वर्णित किया है, वह उसी प्रकार कठिन है । समस्त बुद्धिमानों में कौन इसे नहीं जानता ? ॥५३॥


परं विचार्यते चारु-चारित्रेयं भवस्थितिः ।
यथा यथा कृतं कष्टं प्रतिभाति तथा तथा ॥५४॥

अर्थ: जिसको संसार, सुखदायी समझता है वह भवस्थिति ज्यों-ज्यों विचारी जाती है, त्यों-त्यों मुझे, कष्टदायी प्रतीत होती है ॥५४॥


निशात-शस्त्र-संघात - घातखण्डितविग्रहाः ।
परस्पर-परीवाद - शरणाहित-निग्रहाः ॥५५॥

महावात-महाशीत - महातप-कदर्थिताः ।
स्वकाय-कर्त्तनग्रास - फलवद्भोजनार्थिनः ॥५६॥

दन्तौष्ठकण्ठहृत्पार्श्व - मुखतालुककुक्षिशः ।
वैतरण्याहता तर्षा-वसा-पूयास्र-वारिणः ॥५७॥

धौतासि-पत्रसंकाश - पत्रकृत्ते वनान्तरे ।
श्व-काक-कङ्क-गृध्राहि-श्वापदानां नगान्तरे ॥५८॥

क्वचिद्यन्त्रैः क्वचित्कुम्भी-पाकैरायसकण्टकैः ।
क्वचित् कूट-शाल्मल्या - रोहावतरणैरपि ॥५९॥

शारीरं मानसं वाचं सहन्ते शरणोज्झिताः ।
यावदायुर्न्न किं दुःखं नरके नारका भृशम् ॥६०॥कुलकं॥

अर्थ (श्लोक 55 से 60): देखिए ! जिनेन्द्र भगवान ने जो कुल गतियाँ बतलाईं हैं वे नरक, मनुष्य, तिर्यंच और देव के भेद से चार प्रकार की हैं। नरक में जो जीव रहते हैं, उनके कष्टों का क्या पूछना ? वहाँ तीखे-तीखे शस्त्र-अस्त्रों से उनके शरीर निर्दयतापूर्वक काटे जाते हैं, एक दूसरे से सदा झगड़ा ठाना करते हैं और अपना-अपना बैर निकालते हैं। परस्पर के कलह से शरण रहित होते हैं। यहाँ जिस तरह की दुर्गंध पवन बहती है, जैसा शीत पड़ता है और जैसी उष्णता सताती है, उससे सबका दिल दहल सकता है, उस जगह के लोग सदा भूखे ही रहते हैं, एक-दूसरे के शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर निगल जाने की इच्छा करने वाले उनके दाँत, ओंठ, कंठ, छाती, बगलें, मुँह, तालु और काँखे आदि समस्त अवयव वैतरणी के क्षारमय दुर्गंध घिनावने जल से व्याप्त हो जाते हैं, जिससे कि वे गल-गल कर गिरने लगते हैं। तलवार की धार के समान पैने वृक्ष के पत्ते उनके शरीर पर पड़ते हैं, कुत्ते, कौए, गीदढ़, सियार, साँप आदि हिंसक जहरीले जंतुओं के आकार में परिणत नारकी परस्पर एक-दूसरे अपने-अपने बैरी को निगल जाने की चेष्टा करते हैं और शक्ति भर दुख पहुँचाते हैं। वहाँ कोई नारकी तो कोल्हू में डालकर पीसे जाते हैं, कोई कुंभीपाक में पकाये जाते हैं, कोई लोहे के भालों से छेदे जाते हैं और कोई कूट शाल्मली वृक्ष पर चढ़ाए-उतारे जाते हैं । इस प्रकार नाना तरह से वहाँ के जीवों को असह्य शारीरिक, मानसिक और वाचनिक दुःख उठाने पड़ते हैं परन्तु जब तक उनकी आयु रहती है, तब तक उन्हें बलात्कार सहने ही पड़ते हैं ॥६०॥


सर्वदैव परायत्त - वृत्तयः प्रतिकारतः ।
विनारण्यभुवो लोक-मध्यजास्तु समन्ततः ॥६१॥

हेयादेयविकल्पेन विकलाः सर्वदा त्रिधा ।
सहन्ते दुःखसम्भारं तिर्यञ्चोऽपि दिवानिशम् ॥६२॥युग्मं॥

अर्थ (श्लोक 61 से 62): पशु पर्याय की क्या कथा ? सदैव पराधीन वृत्ति रहती है । दुःख के प्रतिकार करने की योग्यता ही नहीं है । इस मध्यलोक में उत्पन्न होकर भी चारों ओर से वन में असहाय हो दुःख ही सहते । कर्त्तव्याकर्त्तव्य विचारहीन होकर मानसिक, दैहिक और भौतिक तापों के भयंकर दुःख समूह को सहन किया करते हैं । रात-दिन विपत्तियों का ही शिकार बने रहते ॥६१,६२॥


प्राप्यते पुण्ययोगेन मानुषत्वं कथञ्चन ।
भ्राम्यता भूरिदुःखासु चिरकालं कुयोनिषु ॥६३॥

अर्थ: तीसरी मनुष्य गति है, पहले तो उसका मिलना ही इस जीव को महा कठिन है, यदि नाना कुयोनियों में बहुत समय तक भ्रमण कर इस जीव को किसी प्रकार उसकी प्राप्ति भी हो जाती है ॥६३॥


नृत्वेऽप्यनार्यखण्डेषु जन्म यत्र जिनोदितः ।
स्वप्नेऽपि दुर्लभो धर्मो देहिनामघमोहिनाम् ॥६४॥

अर्थ: तो फिर प्रायः अनार्यखंडों में जन्म हो जाता है, जहाँ पर कि जिनेन्द्र भगवान के उपदिष्ट धर्म के सुनने का सौभाग्य स्वप्न में भी दुर्लभ है ॥६४॥


आर्यखण्डेऽपि सम्प्राप्ते दैवादेतन्न लभ्यते ।
सुजातिः सुकुलं सर्व-शरीरपरिपूर्णता ॥६५॥

अर्थ: यदि आर्यखंड में भी जन्म हो जाये, तो वहाँ भी सुजाति, सुकुल में जन्म होना और सम्पूर्ण शरीर का निरोगपना व सम्पूर्ण होना कठिन है ॥६५॥


कुलजात्यादिसम्पत्तौ गर्भादेव विपत्तयः ।
शतशः सन्ति योगीन्द्र ! लंघितास्ताः कथञ्चन ॥६६॥

अर्थ: हे योगीन्द्र ! किसी प्रकार सुकुल, सुजाति आदि की प्राप्ति होने पर भी गर्भवास से ही सैकड़ों विपत्तियाँ आ जाती हैं, किसी तरह उन्हें पार कर जन्म हुआ ॥६६॥


तत्रापि मुग्ध-बुद्धीनां बाल्यं यौवन-मङ्गिनाम् ।
कामग्रह-गृहीतानां वार्द्धक्यं विकलात्मनाम् ॥६७॥

अर्थ: उसमें तो लड़कपन तो मूर्खता, खेल-कूद, बेवकूफी में ही निकल जाता है, युवावस्था कामरूपी पिशाच के फंदे में पड़कर समाप्त हो जाती है और बुढ़ापे में कुछ सुध-बुध नहीं रहती । समस्त इन्द्रियाँ शिथिल हो जाने से धर्म-कर्म भी कुछ सध नहीं सकता । इसी का पं. दौलतराम जी ने छहढाला में इस प्रकार वर्णन किया है “बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय तरुणी रत रह्यो । अर्धमृतक सम बूढ़ापनो, कैसे रूप लखै आपनो ॥६७॥”


अनिष्टाभीष्टसंयोग-वियोगौ धनहीनता ।
आजन्म रोगभूयस्त्वं परकिङ्करता सदा ॥६८॥

अर्थ: इसके सिवा अनिष्ट संयोग, इष्ट वियोग, दरिद्रता, रोगीपना आदि आपत्तियों से पद-पद पर दुःख ही उठाना पड़ता है । इस तरह मनुष्यों को सर्वदा दुःख ही दुःख बना रहता है ॥६८॥


इत्येवं दुःखखिन्नानां नराणां सुखसंकथा ।
मस्तकोपान्तविश्रान्त-यमाहीनां सुदुर्लभा ॥६९॥विशेषकं॥

देवानामपि दुःखानि मानसानि पदे पदे ।
पश्यतामन्यदेवानां विभूतिर्भुवनोत्तमाः ॥७०॥

पातने यानि दुःखानि क्रन्दतां शरणोज्झितम् ।
तैश्च नारकदेशीयाः द्युसदोऽपि भवन्ति ते ॥७१॥युग्मं॥

अतोऽनादौ न कालेऽभूद् भ्राम्यतां भवकानने ।
सावस्था जायते यस्यां सुखं निर्दुःखमङ्गिनाम् ॥७२॥

न चास्ति किञ्चनाप्यत्र यन्न सोढं सहस्रशः ।
दुःखमेतेन जीवेन तन्नाथाजानता हितम् ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 69 से 73): इत्यादि प्रकार से दुखों से खिन्न, पैर से मस्तक पर्यन्त थके हुए, मृत्युरूपी सांप से सताये गए, मनुष्यों के विषय में सुख की कथा/कल्पना करना अत्यन्त दुर्लभ है ॥६९॥ सर्वजन प्रसिद्ध देवगति में भी, देवों के अन्य देवों की विभूति देखने से पद-पद पर मानसिक दुःख होते हैं ॥७०॥ चौथी देवगति है, वहाँ यद्यपि शारीरिक दुःख नहीं हैं तो भी जो मानसिक दुःख हैं वह अवर्णनीय हैं । स्वर्ग में देव अपने से अधिक सम्पदा वाले अन्य देवों को देखकर जला करते हैं । जिस समय उनकी आयु छह महीने की शेष रह जाती है, उस समय उन्हें अवधिज्ञान से मालूम हो जाने से नरक के समान मानसिक दुःख भोगना पड़ता है ॥७१॥ इसलिए इस संसार में न तो ऐसी कोई अवस्था है और न कोई समय है, जहाँ पर कि प्राणियों को दुख रहित सुख-सुख होता हो ॥७२॥ इसलोक में कोई न तो ऐसी जगह है, जहाँ पर यह जीव अनंतों बार न पैदा हुआ हो और न कोई ऐसा दुःख है, जो हजारों बार न भोगा गया हो ॥७३॥


इदानीञ्च प्रसादेन भवतां भुवनार्चित ! ।
प्राप्ते विवेकमाणिक्य-दीपके किं प्रमाद्यते ॥७४॥

अर्थ: इसलिए हे जगतपूज्य ! अब मेरे ऊपर कृपाकर प्रसन्न होइए क्योंकि विवेकरूपी मणिमय दीपक के प्राप्त हो जाने पर प्रमाद करना ठीक नहीं है ॥७४॥


कल्याणकारिणी स्वामिन् चेदियं गृहमेधिता ।
जायते जगतीवन्द्य वृथैवार्य श्रमस्तव ॥७५॥

अर्थ: नाथ ! आपने जो गृहस्थों के धर्म को ही मेरे लिए उपादेय और पालनीय बतलाया है एवं उसी से अभीष्ट सिद्धि हो जाने का जो धैर्य दिया है, सो यदि सच है, तो आपका यह जो तप है वह व्यर्थ ही समझा जायेगा ॥७५॥


ततोऽस्तु निर्विकल्पं मे दीक्षणं क्षणभङ्गुरे ।
एतदेव यतः सारं संसारे साधुसत्तम ॥७६॥

अर्थ: इसलिए हे साधु श्रेष्ठ ! क्षणभंगुररूप संसार में सारभूत जिनेन्द्र भगवान द्वारा उपदिष्ट जैनतप की दीक्षा देकर मुझे कृतार्थ कीजिए ॥७६॥


संविग्नस्य निशम्येति वचस्तस्य महामुनिः ।
यथाभीष्टं महाबुद्धे ! क्रियतामिति सोऽब्रवीत् ॥७७॥

अर्थ: मुनिराज ने सचमुच ही अतरंग से विरक्त हुए, जिनदत्त से जब ये वाक्य सुने तो कहा-हे भव्य ! तुम्हारा कहना ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा है । उसी के अनुसार कार्य करो ॥७७॥


अत्रान्तरे ब्रवीत्येष स्वमित्रं मतिकुण्डलम् ।
पुत्रेभ्यो दीयतां भद्र ! यथायोग्यं पदं लघु ॥७८॥

अर्थ: मुनिराज की आज्ञा पाकर जिनदत्त ने अपने मित्र मतिकुण्डल से यथायोग्य अपने पुत्रों को पद देने को कहा ॥७८॥


तेनाहूता समस्तास्ते प्रणम्योपाविशन्पुरः ।
योगिनं पितरं सर्वे ज्येष्ठमूचे पिता ततः ॥७९॥

अर्थ: तदनुसार मति कुण्डलमित्र द्वारा समस्त पुत्र बुलाये गए और वे योगीराज व पिता को प्रणाम कर, पिता जिनदत्त के पास बैठ गए, ज्येष्ठपुत्र को लक्ष्यकर उन्होंने कहा ॥७९॥


जानात्येव भवान् वत्स पूर्वक्रममुदारधीः ।
तपस्यति यथा तातो न्यस्य स्वं सर्वमात्मजे ॥८०॥

अर्थ: प्रिय पुत्र ! तुम्हारी बुद्धि उदार है, तुमको यह मालूम भी है कि पुत्र के समर्थ हो जाने पर पिता, कुटुम्ब के पालन-पोषण का अपना समस्त भार, उस पर रखकर, वन में जाकर तप तपता है ॥८०॥


अतोऽहं त्वयि विन्यस्याधिपत्यमिदमादृतम् ।
विदधामि तपः पुत्र ! विधेया स्वगृहस्थता ॥८१॥

अर्थ: यह पूर्व से चला आया क्रम है, कि पिता के दायित्व को पुत्र वहन करता है, इसलिए तुम अब सब तरह से समर्थ हो गए हो, तुम्हें अपना सब भार सुपुर्द कर, मैं तप तपना चाहता हूँ, आशा है तुम इसे स्वीकार करोगे और अपनी गृहस्थी का कामकाज सब तरह ठीक-ठीक चलाओगे ॥८१॥


आत्मवत्पालयेरेतान् सर्वदैवानुजन्मनः ।
प्रकृतींश्च समस्तांस्त्वं विरक्ता जातु मा कृथाः ॥८२॥

अर्थ: ये जो तुम्हारे छोटे भाई हैं, उन्हें अपने ही समान मानकर आराम से रखना । जो समस्त नौकर-चाकर और कुटुम्बीजन हैं, उन्हे राजी-खुशी रखना उन्हें अपने से विरक्त न होने देना ॥८२॥


परित्यज्य समस्तानि कार्याणि च विशेषतः।
कर्म धर्म्यं स्वयं भद्र कुर्याः स्वार्थहितः सदा ॥८३॥

अर्थ: संसार के चाहे और काम रह जायें, पर धार्मिक-कार्यों में कभी भी आलस न करना, उनको नियत समय से शास्त्रानुसार करते ही रहना ॥८३॥


ततस्तातमुवाचाऽसौ वक्तुमेवं न युज्यते।
यतो भुक्ता त्वया सम्पन्-मातेव मम सर्वथा ॥८४॥

अर्थ: पिता की यह आज्ञा सुन, पुत्र ने निवेदन किया कि, हे पूज्य आपने जो कुछ मुझे आज्ञा दी है वह उचित नहीं है क्योंकि जो सम्पत्ति तुमने भोगी है, वह मुझे माता के समान अग्राह्य है ॥८४॥


शास्ति तातः सुतं श्रेयः श्रुतिरेषा कृतान्यथा।
त्वया मोहतमश्छन्नं मार्गं दर्शयता मम ॥८५॥

अर्थ: पिता-पुत्र को अच्छी हितकर सीख देता है ऐसी किंवदंती है पर आज मुझे वह आपने मोहरूपी अंधकार से वेष्टित मार्ग बतलाकर विपरीत कर डाली ॥८५॥


सन्ति पुत्रास्तवाऽन्येऽपि कस्मैचिद्दीयतां ततः।
अहं च साधयिष्यामि त्वत्समीपे निजं हितम् ॥८६॥

अर्थ: आपके अन्य भी बहुत से पुत्र हैं, कृपाकर उनमें से किसी को यह पद दीजिए और मैं आपके समीप रहकर अपना हित सिद्ध करूँगा ॥८६॥


इत्यादिकं वदन्शेष-मित्र-तातादिभिर्बहु।
बोधितः प्रतिजग्राह जनकस्य पदं तदा ॥८७॥

अर्थ: ज्येष्ठपुत्र का यह निवेदन सुन, अन्य बंधु-बांधवों ने उसे बहुत


देशकोशादिकं तस्मै राज्यालंकृतिभिः समम्।
अभिषेकं विधायाशु ददौ तत्र महोत्सवे ॥८८॥

अन्येषां च तनूजानां यथायोग्यं प्रदाय सः।
सर्वाः सम्भावयामास प्रकृतीः कृत्यकोविदः ॥८९॥

कान्तास्ततो विगतरागविशुद्धबुद्धिः प्रोवाच चारुचरिताहितचित्तवृत्तिः।
रागेण रोषवशतो रतिकैतवेन मानेन मुग्धमनसा मदनेन यच्च ॥९०॥

प्रोक्ताश्चिरं तदखिलं क्षमये त्रिधाऽहं श्रुत्वेति ताश्चरणमूलगताः समूचुः।
क्षान्तं समस्तमपि नाथ ! सदास्माकाभिः क्षम्यं त्वयाऽपि सकलं च दुरीहितं नः ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 87 से 91): समझाया और तब कहीं पिता का पद उसने लेना स्वीकार किया ॥८७॥ इसके बाद उसका अभिषेक किया गया है और देश, कोष/खजाना, राज्य, अलंकार आदि समस्त संपत्ति विधि के अनुसार प्रदान की गई ॥८८॥ उस जिनदत्त ने अन्य पुत्रों को यथायोग्य पद देकर और करने योग्य कार्य में चतुर पंडित उसने सम्पूर्ण प्रजा को संतुष्ट किया ॥८९॥ जिनदत्त ने अपनी स्त्रियों को भी उस समय कुछ कहना उचित समझा और वैराग्य युक्त चित्त वाले उसने राग-द्वेष की भावना से रहित होकर कहा-पत्नियों ! जब से विवाह हुआ है, तब से लेकर आज तक जो मैंने तुम्हारे साथ राग से, द्वेष से, क्रोध से, मान से, मुग्ध मन से और अन्य किसी कारण से कुछ कहा हो या दुष्ट व्यवहार किया हो उसे क्षमा करो। मैंने तुम्हारे समस्त अपराध क्षमा कर दिये हैं। अपने पति जिनदत्त के उपर्युक्त वचन सुनकर उसकी स्त्रियों ने भी पैरों में पड़ हाथ जोड़कर कहा नाथ ! हम लोगों ने वह सब क्षमा कर दिया, आप भी हमारा सब अपराध क्षमा कर देने की कृपा करें ॥९०,९१॥


संपृच्छ्य सर्वमिति लोकमलोलचित्तो यत्रैव चन्दनतरुस्तत एव सर्पः ।
शिश्राय साधुपदवीं सुहृदा समेतः संवेगशुद्धहृदयैरपरैश्च भद्रैः ॥९२॥

अर्थ: दृढ़चित्त कुमार ने सम्पूर्ण बन्धु-बान्धवों से क्षमा कराकर आज्ञा ली । सच ही है जहाँ चंदन का वृक्ष होता है, विषधर सर्प भी वहीं रहता है । अतएव उसने अन्य सभी संवेगधारी भव्यजनों के साथ शुद्धभाव से जिनदीक्षा धारण की ॥९२॥


शमदमयमसक्ता, गेहवासे विरक्ताः सितसिचयपदेन१प्रावृता वा स्वपुण्यैः ।
जिनपतिपदमूले, ता बभूवुर्विरक्ता२स्तदनु विशदचित्तास्तस्य कान्ताः समस्ताः ॥९३॥

अर्थ: पति जिनदत्त को दीक्षित देख उसकी स्त्रियाँ भी गृहवास से विरक्त हो गईं, उनका चित्त विषय-वासना से शांत होकर इन्द्रियों के निग्रह करने में आसक्त हो गया और तदनुसार जिनेन्द्र भगवान के चरण कमलों में अनुरक्त हो, वैराग्ययुक्त आर्यिका हो गईं ॥९३॥


श्रुतं समस्तं विधिनाङ्गपूर्व-प्रकीर्णकाख्यं समधीत्य सम्यक् ।
गुरोः समीपे तपसां निवासः, स धर्मदानेन ननन्द पृथ्वीम् ॥९४॥

अर्थ: मुनि जिनदत्त निरतिचार तप तपने लगे, उन्होंने गुरु के समीप अङ्गपूर्व प्रकीर्णक शास्त्र अच्छी तरह पढ़े और फिर पृथ्वी पर भ्रमण कर धर्मोपदेशरूपी मेघवर्षा से संसार के तप्त प्राणियों को तृप्त करने लगे ॥९४॥


कुर्वाणो भववारिराशितरणं तीव्रं तपः कारणं ।
सम्यक् सिद्धिसुखस्य संयमनिधि-र्धात्रीं विहत्यागमत् ।
सम्मेदं मुदिताशयो मुनिजनैः सार्द्धं विबुध्यात्मनः ।
प्राप्तं प्रान्तमशेषदोषशमनीं कृत्वा च सल्लेखनाम् ॥९५॥

तत्राराध्य चतुर्विधां स विधिना सारां तदाराधनां ।
त्यक्त्वा तीव्रतमैस्तपोभिरधिकं नीत्वा तनुत्वं तनुम् ।
कल्पेऽनल्पसुखालये समभवत् सम्यक्त्वरत्नाश्रितो ।
देवो दिव्यविलासिनीजनमनो - माणिक्यचौरोऽष्टमो ॥९६॥युगलं॥

अर्थ (श्लोक 95 से 96): संसाररूपी समुद्र से पार कर देने में प्रधान कारण तीव्र तप को निरतिचार पालते हुए, मुनि जिनदत्त बहुत से मुनियों के साथ सम्मेदाचल पर पधारे और वहाँ अपना अंतिम समय समझकर समस्त दोषों को नष्ट करने वाली सल्लेखना धारण की । उस समय उन्होंने सारभूत चार आराधनाओं की आराधना की और कठिन-कठिन तपों से कृश हुए शरीर को छोड़कर, सम्यग्दर्शनरूपी रत्न से सुशोभित वह जिनदत्त का जीव बड़े भारी सुख के खजानेरूप आठवें स्वर्ग में देवाङ्गनाओं के मनरूपी मणि को चुराने वाला देव हुआ ॥९५,९६॥


अन्ये विशुद्धमतयो यतयः समस्ताः स्वर्गे गताः परिणते-रुचिते निजायाः ।
प्रान्ते समाधिमधिगम्य मुदाप्सरोभिः सङ्कल्पिताखिलसुखावहकान्तचेष्टाः ॥९७॥

अर्थ: विशुद्ध बुद्धि वाले जिनदत्त के अन्य साथी समस्त मुनि अपने योग्य परिणामों के अनुसार अंतिम समय में समाधि को प्राप्त कर स्वर्ग में गए । वहाँ आनंदपूर्वक प्रसन्न अप्सराओं के साथ संकल्प मात्र से पूर्ण सुख को प्राप्त सुंदर चेष्टाओं वाले हुए ॥९७॥


कृत्वा सारतरं तपो बहुविधं शान्ताश्चिरं चार्यिकाः ।
कल्पं तास्तमवापुरेत्य सकला दत्तो जिनादिर्गतः ।
यत्रासौ सुखसागरान्तरगतो विज्ञाय सर्वेऽपि ते ।
न्योन्यं तत्र जिनादिवन्दनपराः प्रीताः स्थितिं तन्वते ॥९८॥

अर्थ: जिनदत्त की स्त्रियाँ जिन्होंने आर्यिका के देशव्रत/अणुव्रत-ग्यारह प्रतिमारूप समग्र आचरण को धारण किए थे, वे सारभूत नाना प्रकार के तप का आचरण कर, उसी आठवें स्वर्ग में देव हो गईं, जहाँ पर कि जिनदत्त का जीव पहले से उत्पन्न हो चुका था, वे वहाँ अवधिज्ञान के बल से एक-दूसरे के अपने पहले भव का संबंध जानकर बहुत ही आनंदित हुए और वे सभी जिनधर्म का यह सब प्रभाव देखकर उसी के आचरण में चित्त लगाने लगे, ये वहाँ अन्य तपों का अभाव होने से केवल जिनपूजा आदि को भक्ति से पूर्ण मन हो प्रतिदिन करने लगे ॥९८॥


अत्र प्रमाणं प्रथितं समस्त-ग्रन्थस्य पिण्डीकृत वृत्त-राशेः ।
ज्ञेयं सहस्रं सहितं नवत्या निस्संशयं विद्वद्भिरमुख्यसारं ॥९९॥

अर्थ: एकत्रित अनुष्टुप् छन्द समूह की अपेक्षा इस समस्त शास्त्र का प्रमाण विद्वानों के द्वारा एक हजार नब्बे प्रसिद्ध/संशय रहित जानना चाहिए।