तृतीया सर्गः
स्थित्वा च कतिचित्तत्र दिनानि मुदितस्तया ।
समं विज्ञापयामास श्वशुरं गुणमन्दिरम् ॥१॥
यथा तातादयो माम मदागमनमञ्जसा ।
मृगयन्तोऽवतिष्ठन्ते ततः प्रेषय मां लघु ॥२॥
अनुज्ञातस्ततस्तेन सदुःखेन कथञ्चन ।
भणित्वेति यथा पुत्र ! विच्छेदस्तव दुःसहः ॥३॥
अर्थ (श्लोक 1 से 3): अपनी प्यारी विमलमती के साथ नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते-करते जब कुछ दिन बीत गये, तो एक दिन जिनदत्त अवसर देखकर अपने ससुर से बोले ॥१॥ पूज्य ! मुझे यहाँ रहते अधिक दिन हो गए हैं । मेरे माता-पिता मेरे आने की आशा करते होंगे इसलिए आपसे प्रार्थना है, कि मुझे यहाँ से घर जाने की आज्ञा देकर कृतार्थ करें ॥२॥ जामाता की उक्त प्रार्थना सुन सेठ विमलचंद्र को यद्यपि बहुत दुख हुआ, तो भी जिनदत्त का अपने घर जाना उचित समझ, उन्होंने कहा-प्यारे पुत्र ! यद्यपि तुम्हारा वियोग असह्य है । उससे मुझे ही नहीं किंतु अन्य तुम्हारे संबंधितों को भी दुख होगा इसलिए तुम्हें यहाँ से जाने की आज्ञा देने को चित्त नहीं चाहता, तो भी यहाँ अधिक रहने से तुम्हारे माता-पिता के दुखी होने का डर है, इसलिए तुम्हें रोकना भी अनुचित है ॥३॥
दत्वा परिकरं सर्वं दासी-यानादि-संयुता ।
पुत्री समर्पिता तस्मै श्रीवत्सायेव गोमिनी ॥४॥
अर्थ: पुत्री को योग्य दास-दासी, वाहन सहित संपूर्ण परिकर देकर, विष्णु के समान दामाद जिनदत्त को अपनी लक्ष्मी के समान पुत्री को सौंप दिया । जैसे श्रीवत्स चिह्नधारी महाविष्णु तीर्थङ्करों का संयोग, ज्ञान समवसरण तथा मोक्षलक्ष्मी के साथ होता है, वैसे ही विष्णु के समान जिनदत्त का संयोग, लक्ष्मी के समान विमलमती के साथ करा दिया ॥४॥
ततस्तमनुयातुं ये, चेलुः १ श्रेष्ठ्यादयो जनाः ।
आगत्य ते स्थिताः सर्वे बाह्योद्यान-जिनालये ॥५॥
अर्थ: जिनदत्त जिस समय रवाना हुए, तो ग्राम के बाहर उद्यान के जिनालय तक इनके सास-ससुर आदि संबंधी लोग भी गए और वहाँ वे ठहर गए ॥५॥
तत्र पूजादिकं कृत्वा शिरस्याघ्राय देहजाम् २ ।
शिक्षयामास गम्भीरमिति तां विनतां पिता ॥६॥
अर्थ: जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक-पूजन कर, जब धार्मिकजन शुभ कार्यों से निवृत्त हो गए और वहाँ से प्रयाण कराने का समय समीप आया, तो विमलमती के पिता सेठ विमलचंद्र अपनी पुत्री के सिर को चूमकर प्यार करके बोले ॥६॥
सुतनो३ ! मा कृथा जातु क्रौर्य-दौर्जन्यचापलम् ।
अन्यथा स्याः४ समस्तानां विषवल्लीव दुर्भगा ॥७॥
अर्थ: हे पुत्री विमलमती ! आज तुम अपने पिता के घर से अपने पति के घर जा रही हो, यहाँ जो कुछ भी तुम क्रूरता, दुर्जनता एवं चपलता आदि दोष करती थी, वे सब तेरे लड़कपन में संभाल लिए जाते थे परंतु अब तुम वधू बनकर जा रही हो, इसलिए इन्हें तुम सर्वथा छोड़ देना। यदि इस शिक्षा के अनुसार न चलकर तुमने विपरीत किया, तो प्यारी बेटी ! तुम अपने समस्त कुटुम्बियों के लिये विषबेल के समान दुखदायिनी गिनी जाओगी ॥७॥
पत्युश्छायेव५ भूयास्त्वं सर्वदानुगता सती ।
समानसुखदुःखा च दुर्वृत्ताचार-दूरगा ॥८॥
अर्थ: तेरे लिए इसके सिवा एक यह भी कर्त्तव्य है कि जिस प्रकार तेरा पति तुझे रखे, उसी अवस्था में संतोष रखना। सर्वदा छाया के समान अपने पति की अनुगामिनी होना। जो कुछ तेरा पति कहे उसे तूं अवश्य ही करना। पति के सुख में सुख, दुःख में दुःख मानना, अपने चित्त को कभी भी बुरी बातों की तरफ न ले जाना ॥८॥
धर्म-कार्य-रता नित्यं गुरुदेवनता सुते।
निज-वंश-पताकेव भूयाः किं बहुभाषितैः ॥९॥
अर्थ: हे सुते ! धर्म कार्यों में रत रहना। नित्य ही देव, शास्त्र, गुरु की भक्ति में तत्पर विनम्र रहना, अधिक क्या कहूँ ? तुम अपने वंश की कीर्ति-ध्वजा के समान यशस्विनी बनो ॥९॥
गाढ-मालिङ्ग्य तत्रैव बाष्प-पूर्ण-विलोचना।
रुदन्ती तां जगादेति मातापि प्रीतिपूर्वकम् ॥१०॥
अर्थ: जब इस प्रकार सेठ विमलचंद्र अपनी प्यारी पुत्री को शिक्षा दे चुके, तो उनकी पत्नी भी विमलमती को छाती से चिपकाकर और आँखों में प्रेमाश्रुओं से पूर होकर बोली ॥१०॥
विलास-हास-सञ्जल्प-तल्प-माल्यविभूषणम्।
गतागतं१ च सर्वेण माकार्षीरुद्भटं सुते ! ॥११॥
अर्थ: मेरी प्यारी पुत्री ! अब तुझे तेरे श्वसुर के घर भेज देती हूँ, आज से तेरा जीवन दूसरे ही ढंग का होगा। तू वहाँ जाकर अपने पति के सिवाय, हर एक से हास-विलास मत करना। किसी से अधिक बातचीत कर अपना लड़कपन प्रकट न करना। अन्य के साथ एक आसन पर मत बैठना। अधिक माल्य-विभूषण की तरफ अपना चित्त न लगाना और अन्य के साथ जहाँ कहीं गमनागमन भी मत करना ॥११॥
चित्तं पत्युरविज्ञाय मा कृथा मानमायतम्।
उत्कण्ठिता च माभूस्त्व-मस्मभ्यं२ शुभदर्शने ॥१२॥
अर्थ: जिस समय अपने पति का मन प्रफुल्लित देखना, उसी समय मान करना और वह अधिक देर न कर, अल्पकाल तक ही करना जिससे कि तेरे पति के मन में किसी प्रकार का क्लेश पैदा न हो । हम लोगों के वियोग में तू अधिक दुखित न होना और यहाँ आने की तरफ अधिक उत्कंठा न दिखलाना ॥१२॥
ज्येष्ठ-देवर१-तद्वामा-श्वश्रुषु विनता भवेः ।
नर्मादिकमसम्बद्धं येन केनापि मा कृथाः ॥१३॥
अर्थ: अपने ज्येष्ठ, देवर, सास-ससुर, देवरानी, जेठानी और ननद आदि में सर्वदा अपनी नम्रता दिखलाना, ऐसा कोई भी असम्बद्ध हास्यादिक न करना जिससे कि वे रुष्ट हो जाएँ और उन्हें दुःख प्राप्त हो ॥१३॥
श्वश्रूं मातरिति ब्रूहि तातेति श्वशुरं नता ।
प्राणनाथं प्रियेशेति त्वं सुतेति च देवरम् ॥१४॥
अर्थ: तुम अपनी सासु को माँ कहकर पुकारना, श्वसुर को तात कहना, पति को प्रियेश शब्द से संबोधन करना और देवर को पुत्र कहकर बोलना एवं उन्हें तुम उसी प्रकार समझना ॥१४॥
प्राभृतानि सुते तुभ्यं प्रहेष्यामि२ सहस्रशः ।
शिक्षयित्वेति तां माता विरराम३ सुदुःखिता ॥१५॥
अर्थ: हे पुत्री ! मैं हजार उपहार को तुम्हारे लिए भेजूँगी, इस प्रकार अत्यन्त दुख से माँ ने अपनी प्राणप्यारी पुत्री को शिक्षा दे चुप होते हुए विदा ली ॥१५॥
प्रणम्य जिनदत्तेन ततो व्यावार्त्तिता गृहम् ।
गतास्ते तां कुमारोऽपि लात्वाप स्वपुरं४ क्रमात् ॥१६॥
अर्थ: जिनदत्त ने सास-ससुर आदि को प्रणाम किया और घर लौट जाने के लिए साग्रह प्रार्थना कर अपने नगर की ओर प्रस्थान किया ॥१६॥
[जिनदत्त का अपने घर लौटना]
आयातं तं ततो ज्ञात्वा गत्वा तातो महोत्सवैः ।
पुरं प्रवेशयामास सकान्तमिव मन्मथम् ॥१७॥
अर्थ: जिनदत्त क्रम-क्रम से मार्ग में पड़ाव डालते हुए अपने जन्म स्थान वसंतपुर आ पहुँचे । इनके आगमन की सूचना पाकर इनके पिता सेठ जीवदेव इन्हें लेने के लिए गाँव के बाहर आए और बड़े ठाठ-बाट के साथ रति सहित कामदेव के समान सुशोभित होने वाले जिनदत्त को, वधू सहित नगर में प्रवेश कराया ॥१७॥
विशन्तं तं समाज्ञाय चुक्षुभे प्रमदाजनैः ।
उदितं यामिनीनाथं तरंगैरिव वारिधेः ॥१८॥
मण्डनादिकमुत्सृज्य प्रतिरथ्यं प्रधाविताः ।
काश्चिदन्याः पुनारूढाः प्रासादशिखरावलीः ॥१९॥
अर्थ (श्लोक 18 से 19): विवाह कर वधू सहित जिनदत्त आए हैं, यह समाचार ज्यों ही नगर में फैला कि नगर की समस्त स्त्रियों में खलबली मच गई ॥१८॥ वे जिनदत्त और उसकी वधू को देखने के लिए लालायित हो अपने-अपने काम-काज छोड़ गलियों में दौड़ीं और मकानों की छतों पर चढ़ने लगीं ॥१९॥
तन्मुखाम्भोज-संसक्त-लोचना कुच-मण्डलम् ।
काचिच्च्युतांशुके दृष्टिं पातयामास पश्यताम् ॥२०॥
अर्थ: जो स्त्रियाँ कौतूहल से इस उत्सव को देख रही थीं उन्हें अपने तन-बदन की भी सुध-बुध न थी किसी का स्तन खुला था और उसे देखने वाले हास्यपूर्ण दृष्टि से देख रहे थे ॥२०॥
वेगतो धावमानान्या स्रस्तमेखलयास्खलत् ।
त्रुटितं हारमप्यन्या गणयामास नोत्सुका ॥२१॥
अर्थ: किसी की भागा-दौड़ी में करधनी टूटकर गिर गई । किसी का हार टूटकर बिखर गया किन्तु उस मिथुन के देखने की धुन में उन्हें इनका भान ही नहीं हुआ ॥२१॥
अन्या जघान तं धीरा कटाक्षैः क्षणमङ्गना ।
चित्रेन्दीवरमालाभि रर्चयन्तीव भक्तितः ॥२२॥
अर्थ: भक्ति से विचित्र नीलकमल की मालाओं के द्वारा पूजा करते हुए की तरह अन्य धीर स्त्रियाँ कटाक्षों के द्वारा क्षणभर में मानों प्रहार ही कर रहीं थीं ॥२२॥
रूपामृतं१ पिबत्यस्य नेत्राञ्जलिपुटैः परा ।
कौतुकं कामसन्ताप-पीडिताजनि मानसे ॥२३॥
अर्थ: कोई अन्य स्त्री उस जिनदत्त के सौंदर्यरूपी अमृत को नेत्ररूपी अञ्जली पुटों के द्वारा पीती है तथा मन में काम के संताप से पीड़ित होती हुई, आश्चर्य को प्राप्त हुई ॥२३॥
अन्योवोचदियं धन्या यस्या जातोऽयमीश्वरः ।
काचिदूचे स्फुटं काम-रतियुग्ममदः२ सखि ! ॥२४॥
अर्थ: और कोई अन्य स्त्री उन वर-वधू को धन्य-धन्य कह रही थी, तो कोई उन्हें काम और रति के जोड़े की उपमा दे रही थी ॥२४॥
समाशशतं सति श्रेष्ठं विलासं सहितामुना ।
भुङ्क्ष्वेति प्रणिगद्यान्या लाजाञ्जलिमवाकिरत् ॥२५॥
अर्थ: किसी अन्य स्त्री ने कहा कि हे कुमार ! इस विमलमती के साथ रहते हुए सैकड़ों वर्ष, योग्य भोगों का उपभोग करो । ऐसा कहकर लाई को अंजलि में भर आशीर्वाद के रूप में ऊपर बिखेर दिया ॥२५॥
मोटनं भञ्जनं जृम्भालस्यप्रेमजलोद्गमम् ।
तन्वन् नारीजनस्यैष प्राप स्वं सोत्सवं गृहम् ॥२६॥
अर्थ: इस जिनदत्त ने नारीजन को मोड़ने, तोड़ने, जंभाई, आलस्य प्रेमरूपी जल के उद्गम को विस्तृत करते हुए, उत्सव सहित अपने घर में प्रवेश किया ॥२६॥
तत्राध्यास्य चतुष्कं स गोत्रवृद्धाङ्गनाकृतम् ।
प्रतीच्छतिस्म मांग्ल्यं कृतपूर्वजिनोत्सवः ॥२७॥
अर्थ: वर-वधू के अपने घर आने पर गोत्र की वृद्धा स्त्रियों द्वारा पूरे गए चौक पर बैठकर जिनेन्द्र की पूजापूर्वक मांग्ल्य विधि को ग्रहण करते हुए सुख से रहने लगे ॥२७॥
ततो निवर्तिताशेष-विवाहान्तविधिः सुधीः ।
तारेश इव रोहिण्या समं रेमे तयानिशम् ॥२८॥
अर्थ: अनन्तर समस्त विवाह की अन्तिम विधि सम्पादित की गई, सम्पूर्ण विधि विधान के बाद कुमार जिस प्रकार रोहिणी के साथ चन्द्रमा शोभित होता है, उसी प्रकार शुभ्र ज्योत्सना के समान सुन्दरी विमलमती के साथ भोग करता हुआ शोभित हुआ ॥२८॥
भुञ्जानस्य सुखं तस्य पञ्चेन्द्रिय-समाश्रयम् ।
जग्मुर्धर्माविरोधेन मुहूर्त्तमिव वासराः ॥२९॥
अर्थ: पञ्चेन्द्रियों के नाना विधि भोगों को भोगता था किन्तु धर्म क्रियाओं का उल्लंघन नहीं करता था अर्थात् धर्मानुकूल गृहस्थ धर्म का सेवन करते हुए उसके दिन मुहूर्त्त के बराबर बीतने लगे।
विमुखो मुखमालोक्य याचकस्तस्य नो ययौ ।
स विवेश सतां चित्ते विनयेन महामनाः ॥३०॥
अर्थ: वह दानियों में सदा अग्रसर था, उसके द्वार से याचक कभी भी खाली नहीं जाते थे। अपने विनय गुण द्वारा महामना जिनदत्त ने सज्जनों के चित्त में प्रवेश पाया था अर्थात् उसकी नम्रता से सत्पुरुष भी उसे हृदय से चाहते थे ॥३०॥
हृदये पद-मासेदुरस्य पौराणिकी-कथाः ।
पररामाविलासाढ्या न जातु विजितात्मनः ॥३१॥
अर्थ: पौराणिक महापुरुषों की चरित्र कथाएँ, इसके हृदय में स्थान बनाये थीं अर्थात् सदा ही महापुरुषों की कथाओं को करता था, विषय भोगों की कथाओं से दूर रहता था। पर स्त्री की कथा वाञ्छा तो स्वप्न में भी नहीं थी। यह मन और इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखता था ॥३१॥
जिनार्चाध्ययनासक्तः प्रभाते मध्यमेऽहनि ।
संयतेभ्यः प्रदानेन स्वकाले भोगसेवया ॥३२॥
यावदास्ते सुखाम्भोधि-मध्यगो बुधवल्लभः ।
तावदस्यान्यदा जाता शिरोऽर्त्तिः सहसा मनाक् ॥३३॥युग्मं॥
अर्थ (श्लोक 32 से 33): वह सुबह पञ्च परमेष्ठियों की पूजा और शास्त्रों के अध्ययन में लीन रहता हुआ, मध्याह्न में साधुओं को आहार दान देकर और अपने योग्य-काल में भोजन-पान आदि भोगों द्वारा परस्पर अव्याघात रूप से तीनों पुरुषार्थों का सेवन करते हुए, इसके सुख से दिन व्यतीत हो ही रहे थे कि एक दिन अचानक ही इनके सिर में पीड़ा होने लगी ॥३२,३३॥
विनोदाय ततस्तस्य वयस्येन व्यधीयत ।
प्रवृत्ताधीश-पादात-वारणाश्व-विमर्द्दनम् ॥३४॥
अर्थ: उस पीड़ा से जब इनका किसी कार्य में मन न लगने लगा तो इनके मित्रों ने इनके विनोदार्थ अधीश रणशूर पदाति, हस्ति एवं घोड़ों का परस्पर में युद्ध कराना प्रारंभ किया ॥३४॥
देवनं चतुरङ्गाणां रणं वा सजयाजयम् ।
तत्रैव सोऽपि संसक्तः कौतुकात्समजायत ॥३५॥
अर्थ: क्रीड़ा स्थल में ही कौतुहल से वह जिनदत्त भी चारों अंगों की क्रीड़ा में अथवा हार-जीत से सहित युद्ध में आसक्त हो गया ॥३५॥
यावत्तत्रैव सञ्जाता रतिस्तस्य ततः कृतम् ।
धूर्त्तैर्द्यूत-विशेषेषु क्रीडनं धन-लम्पटैः ॥३६॥
अर्थ: जब इस क्रीड़ा में जिनदत्त का चित्त लग गया और उससे उनकी कुछ प्रसन्नता देखी, तो कुछ धनलंपटी धूर्तों ने जुआ खेलना प्रारंभ कर दिया ॥३६॥
अत्यासक्त्या समारब्ध-मधिकं सन्ततं ततः।
हारिताश्च प्रगल्भेन द्रव्यैकादशकोटयः ॥३७॥
अर्थ: बुरी बातों में मन बहुत जल्दी लग जाता है और उनके उपदेशक भी जगह-जगह मिल जाया करते हैं, इसलिए जुआरियों का जुआ देखते-देखते इनका मन भी उसके खेलने में फँस गया, इनके धन की तो कुछ कमी थी ही नहीं जो हारते हुए दुख होता और ऐसे खिलाड़ी नहीं थे जो जीतकर न हारते, इसलिए धीरे-धीरे इन्होंने अपना समस्त धन स्वाहा करना शुरू कर दिया और जिनदत्त ने अपनी ग्यारह करोड़ मुद्राएँ, उसी जुए के खेलने में हारकर जुआरियों को दे डालीं ॥३७॥
कोषाध्यक्षेण तातस्य वारिता धनयाचकाः ।
सप्तकोट्यः समाकृष्टा वल्लभाकोशतस्ततः ॥३८॥
हारितास्तु निषिद्धास्ते याचकाः कोशपालिना ।
गत्वा तैः कथितं तस्य यथा स्वं न हि लभ्यते ॥३९॥
वचनेन ततस्तेषां तुहिनेनेव पंकजम् ।
म्लानौ वदनमेतस्य संहृतं द्यूतकर्म च ॥४०॥
येषा-मशेष-संसार - सौख्य-संपत्ति-शालिनी ।
स्वभुजोपार्जिता लक्ष्मी-र्धन्यास्ते मानशालिनः ॥४१॥
अर्थ (श्लोक 38 से 41): जब कुमार जिनदत्त की आज्ञा से नौकरों पर नौकर आना शुरु हुए और धन पर धन खर्च होना प्रारंभ हुआ, तो इनके पिता के खजांची को यह बात सहन न हुई । उसे इस बात का पूरा पता लग गया कि इतना धन दुष्कर्म के सिवाय अन्य कार्य में इतने जल्दी खर्च नहीं हो सकता, इसलिए और अधिक धन देना उचित न समझा एवं जिनदत्त के आज्ञाकारियों को धन देने की स्पष्ट मनाई कर दी । जब पिता के खजाने से धन मिलना बंद हो गया और जुआ खेलने का शौक कुछ कम न हुआ, तो जिनदत्त ने अपनी स्त्री के खजाने से धन मंगाना शुरु किया ॥३८॥ और उनको भी हार गया । कोषपाल द्वारा रोके गए याचकों ने जाकर जिनदत्त को सर्व वृतान्त सुनाया कि हमें धन प्राप्त नहीं हुआ। कोषाध्यक्ष ने धन देने से मना कर दिया है ॥३९॥ उनके वचनों को सुनते ही कुमार पर तुषारापात हो गया। जिस प्रकार तुषारापात से कमल म्लान हो जाते हैं, उसी प्रकार इस अपमान से कुमार का मुखकमल म्लान हो गया, उसने द्यूत- क्रीड़ा बंद कर दी और इस प्रकार विचारने लगा ॥४०॥ वस्तुतः इस संसार में वे ही पुरुष धन्य हैं, वे ही धनवान हैं और वे ही सुखी हैं, जो स्वयं अपने बाहुबल से धनोपार्जन करते हैं। वास्तव में उन्हीं की लक्ष्मी सार्थक है और वे ही मानशाली हैं ॥४१॥
[कोषाध्यक्ष द्वारा धन नहीं देने पर जिनदत्त का जुआ से विरक्त हो अपमान का अनुभव करना]
परपुष्टा भवन्त्येव नूनं परिभवास्पदम् ।
सहन्ते हि पिकाः काक-चञ्च्वा घात-कदर्थनम् ॥४२॥
अर्थ: जो पर धन से पुष्ट हैं अर्थात् पराये धन से जीविका चलाते हैं, वे मेरे समान तिरस्कार के पात्र होते हैं। जैसे कोयल अपने बच्चों को काक के घोंसले में रख देती है, काकली उसे पालती है परन्तु जब यथार्थताः प्रकट होती है, तो काकों की चोचों का आघात उसे सहन करना पड़ता है ॥४२॥
प्रसादेन पितुः सर्वं पूर्यते मम वाञ्छितम् ।
तथापीदं मनः खेद-दायकं मानभञ्जकम् ॥४३॥
अर्थ: यद्यपि पिताजी के प्रसाद से मेरे सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं, मुझे किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है, सभी सुख साधन उपलब्ध हैं, तो भी यह जुआ मान-भङ्गकारक असह्य है, मन को दुःखित करने वाला है ॥४३॥
युज्यते नोपभोगाय पुंसा-मुन्नत-चेतसाम् ।
गोमिनी गुरुपत्नीव यार्जिता पूर्वपूरुषैः ॥४४॥
अर्थ: उन्नत चित्त वाले मनस्वियों के लिए पूर्व पुरुषों द्वारा संचित राज-वैभव, गुरु-पत्नी के समान भोगने योग्य नहीं है अर्थात् जिस प्रकार गुरु-पत्नी भोगने योग्य वस्तु नहीं है, उसी प्रकार परार्जित धन भी सत्पुरुषों द्वारा सेव्य नहीं है ॥४४॥
यत्सुतेभ्यः समीहन्ते सन्तः सर्व-प्रकारतः ।
सन्तान-पालनं तत्र हेतु-रर्थार्जनादिभिः ॥४५॥
अर्थ: सज्जन लोग जो पुत्र आदिक को अपने द्वारा तन-मन से उपार्जन किये गए धन से, सर्व प्रकार पोषण करना योग्य बतलाते हैं, उसमें संतान को किसी प्रकार पाल-पोसकर बढ़ाकर देना ही हेतु है ॥४५॥
उदयेनेव यो भानो-र्बन्धूनां मुखपङ्कजम् ।
विकाशि कुरुते नास्य चरितेनापि नुः किमु ॥४६॥
अर्थ: जिस प्रकार नवीन सूर्य के उदय से कमल खिल जाते हैं, उसी प्रकार जिस पुरुष के उत्पन्न होने से, उसके सम्यक्चारित्र से कुटुंबियों के मन प्रफुल्लित न हुए, उस मनुष्य का वह जीवन, वह चारित्र किस काम का ? उससे उसके कुटुंबियों को दुःख होने से कोई फल नहीं होता ॥४६॥
अलीक-व्यसनासक्त-चेतसा मयका पुनः ।
तथाकृतं यथा नाहं शक्तस्तात-मुखेक्षणे ॥४७॥
अर्थ: हाय ! मैंने द्यूत सरीखे निंद्य कर्म में अपना मन लगा, बड़ा ही अनर्थ किया है । इसके बराबर मुझे इस समय कोई भी बुरा कार्य नहीं दिख रहा है । इस कार्य के करने से मैं अपने पिता को किसी भी प्रकार अपना मुँह दिखलाने योग्य नहीं हूँ तथा पिता का मुख भी देखने लायक नहीं हूँ ॥४७॥
एके त एव जीवन्तु सतां मध्ये महौजसः ।
येषां जन्म न संजातं मानभङ्ग-मलीमसम् ॥४८॥
अर्थ: संसार में एक वे ही लोग तो धन्य हैं और वे ही जीवित समझने के योग्य हैं, जिन्होंने अपने जन्म में कभी भी मानभंग का दुख नहीं उठाया ॥४८॥
काले प्रदीयते यच्च विना प्रार्थनया न च ।
दीयते यच्च दुःखेन तददत्तसमं मतम् ॥४९॥
अर्थ: जो द्रव्य नियत समय पर बिना याचना के प्राप्त न होकर याचना से ही प्राप्त होता है और जो दुःखपूर्वक यथाकथंचित्/जिस किसी तरह/जैसे-तैसे मिलता है, वह सब धन अदत्त बिना दिए हुए अर्थात् चोरी के धन समान गिना जाता है ॥४९॥
उक्त्वा न दीयते येषा-मुक्त्वा बहु तथाल्पकम् ।
कालहानिः कृता दाने सन्ति ते प्रेषिता नराः ॥५०॥
अर्थ: जिन लोगों को धन देने का वचन देकर भी धन नहीं दिया जाता है तथा ज्यादा कहकर काल हानि करके कम दिया जाता है, वे लोग सेवक कहलाते हैं। जिस प्रकार कोई अपने नौकरों के मान-अपमान का ख्याल नहीं करता, उसी प्रकार मेरे भी मानापमान का कोई ध्यान नहीं रखा गया ॥५०॥
तावदेव नरो लोके सुराद्रि-शिखरोपमः ।
कस्यापि पुरतो यावन्न देहीति१ प्रजल्पति ॥५१॥
अर्थ: यह मनुष्य संसार में तब तक ही प्रशंसनीय है, जब तक सुमेरुपर्वत की शिखर के समान उच्च है और तब तक ही कीर्तिशाली है, जब तक कि यह किसी के सामने इस तरह के दीन वचन नहीं बोलता, किसी चीज की याचना नहीं करता ॥५१॥
विना धनेन नार्घन्ति२ विमलाः सकलाः क्रियाः ।
विहीना यौवनेनेव सभूषाः पण्ययोषितः३ ॥५२॥
कृतमेतेन तातादि-धनेन मम साम्प्रतम् ।
गत्वा क्वापि करोम्येष धनोपार्जनमुत्तमम् ॥५३॥
अर्थ (श्लोक 52 से 53): बिना धन के, इस संसार में अच्छे से अच्छे काम भी शोभित नहीं होते । जिस प्रकार वृद्धा-वेश्या चाहे कितना भी गहना पहन ले और बढ़िया-बढ़िया वस्त्र ओढ़ ले परन्तु यौवन के बिना उसकी कोई शोभा नहीं होती । उसी प्रकार निर्धन-गृहस्थ चाहे कैसी भी बढ़िया क्रियाएँ करे, धन के बिना वह कभी लोक में प्रशंसित नहीं होता । इसलिए अब मुझे इस मेरे पिता द्वारा उपार्जन किये गए मध्यम श्रेणि के धन से कोई काम नहीं । मैं कहीं परदेश में जाकर अवश्य ही उत्तम धन पैदा करूँगा ॥५३॥
[धन की महिमा का विचार करते हुए धन कमाने की सोचना]
प्रियामेतां निधायाशु मन्दिरे पितुरुत्सुकां ।
उपायं तं विधास्यामि येन स्यात्कमलामला ॥५४॥
अर्थ: यह जो मेरे साथ अर्द्धांगिनी धर्मपत्नी है, उसे तो इसके पिता के घर छोड़ आऊँगा और मैं तन-मन लगाकर निर्मल लक्ष्मी के उपार्जन करने का उद्योग करूँगा ॥५४॥
विचिन्त्येति ततोऽलक्ष्य-वृत्तिरेष व्यवस्थितः ।
कुतोऽपि ज्ञातवृत्तान्तस्तमाहूय पिताब्रवीत् ॥५५॥
अर्थ: यद्यपि मनस्वी जिनदत्त इस प्रकार के सद्भावों से अपने मन की बात मन में ही छिपाकर रहने लगे, तो भी उनके इस वृतांत का पता उनके पिता को किसी प्रकार लग गया । उन्होंने इन्हें अपने पास बुलाया । पिता की आज्ञानुसार जब जिनदत्त इनके पास आए, तो वे इस प्रकार कहने लगे ॥५५॥
विषण्णोऽसि वृथा वत्स ! किमेवं कुरु वाञ्छितम् ।
धनैरेभिरहं पुत्र ! नाम्नैवैषामधीश्वरः ॥५६॥
निर्भर्त्सितो मया वत्स ! कोषाध्यक्षः सहस्रशः ।
यद्यन्यथा महाबुद्धे ! स्पृशामि तव मस्तकम् ॥५७॥
अर्थ (श्लोक 56 से 57): हे पुत्र ! तुम क्यों व्यर्थ में दुखी होते हो, तुम्हें जो प्रिय हो, उसे अच्छी तरह पूरा करो । इस धन-धान्य आदि संपत्ति पर मेरा जो अधिकार तुम समझ रहे हो, वह नाम मात्र का है, इस समस्त वैभव के तुम ही अधिकारी हो ॥५६॥ प्यारे पुत्र ! यद्यपि तुमने कोई बात नहीं कही है, तो भी तुम्हारे साथ कोषाध्यक्ष ने जो बर्ताव किया है, उसको मैंने यथावत् सुन लिया है । उसे सुनकर मैंने सैकड़ों और हजारों धिक्कारें खजान्ची को दीं, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है । मैं तुम्हारे सिर पर हाथ रखकर शपथ खाता हूँ, मैं जो कुछ भी तुमसे कह रहा हूँ, वह अक्षरशः सत्य है ॥५७॥
[पिता जीवदेव द्वारा पुत्र जिनदत्त को शिक्षा देना]
विनोदेनामुना किन्तु कुलकेतो ! न शोभते ।
कृतं हि प्रथमं पुंसां महापापनिबन्धनम् ॥५८॥
अर्थ: परन्तु हे महाबुद्धिमान ! यह विनोद तुम्हें शोभा नहीं देता, तुम कुल की पताका हो, जिन महापुरुषों ने द्यूतक्रीड़ा की है, उन्हें वह महापाप का कारण ही सिद्ध हुआ है, यथा युधिष्ठिर आदि ॥५८॥
कारयाशु जिनेन्द्राणां भवनानि महामते !
सुवर्णरूप्यरत्नैश्च प्रतिमाः पापनाशनाः ॥५९॥
अर्थ: इसलिए यदि तुम्हें इसका उपयोग करना भी अभीष्ट है, तो तुम विशाल जिनेन्द्र भगवान के मंदिर बनवाओ, उनमें पाप विनाशक स्वर्ण, चाँदी और रत्नों से निर्मित मूर्तियाँ स्थापित करो ।
गीतवादित्रनृत्यादि तत्रैव च दिवानिशम् ।
चतुर्विधाय संघाय देहिदानं यथाविधि ॥६०॥
अर्थ: रात-दिन जिनेन्द्र भगवान की गाजे-बाजे के साथ पूजा करो एवं चारों प्रकार के संघ के लिए यथा विधि दान दो ॥६०॥
सिद्धान्त-तर्क -साहित्य-शब्द-विद्यादि-पुस्तकैः ।
लेखयित्वा मुनीनां च दत्वा पुण्यं समर्जय ॥६१॥
अर्थ: मुनियों के लिए सिद्धांत, न्याय, साहित्य, व्याकरण एवं शब्दकोष आदि विद्याओं के शास्त्र लिखवाकर भेट में अर्पण करके पुण्य का समार्जन करो ॥६१॥
कूप-वापी-तडागानि प्रमदादि-वनानि च ।
पुत्र ! सर्वाणि चित्राणि-यथाकामं विधापय ॥६२॥
अर्थ: कलापूर्ण कुए, बावड़ी, तालाब आदि खुदवाओ और विचित्र बाग-बगीचे लगवाओ । इनके करने से तुम्हारी जगद् व्यापिनी कीर्ति होगी और तुम्हारा मन भी रंजित होगा ॥६२॥
विवेश मानसे तस्य न सा शिक्षा विलासिनी ।
यतेरिव परं तेन शुश्रुवेऽधो-विलोकिना ॥६३॥
अर्थ: पिता का यह उपदेश यद्यपि यथार्थ और हितकर था, तो भी जिस प्रकार मुनि के मन में विलासिनी स्त्री का प्रवेश नहीं होता उसी प्रकार वह, पुत्र जिनदत्त के मन में नहीं समाया । अपने विचारों की तरंगों में उस पर कुछ ध्यान न देकर, उन्होंने नीचे मुँहकर मात्र उस उपदेश को सुना ॥६३॥
चिन्तितं च पुनस्तेन नोपलम्भो भविष्यति ।
यथा तथा विधास्यामि किं मे बहुविकल्पनैः ॥६४॥
अर्थ: पुनः उसने कृत दृढ़ निश्चयानुसार यही विचार किया कि इस प्रकार मुझे यथोचित उपलब्धि नहीं होगी । अनेकों विकल्पों से क्या प्रयोजन ? मैं वहीं करूँगा जिसे कि सोचा है ॥६४॥
अनुमन्ये च तां तातभारतीमेवमस्त्विति ।
प्रणम्य तं जगामासौ प्रेयसीसदनं१ ततः ॥६५॥
अर्थ: तत्पश्चात् उस पिता की वाणी को ऐसा ही हो ऐसा माना और उनको प्रणाम कर वह पत्नी के घर गया ॥६५॥
अभ्युत्थानादिकं कृत्वा तया ज्ञातं मनोगतम् ।
व्यासक्त-मानसं चक्रे सविलास-कथान्तरैः ॥६६॥
अर्थ: विमलमती पति की परिचर्या करने में बड़ी ही चतुर थी । उसे शास्त्रोक्त और लौकिक पत्नी के समस्त कर्त्तव्य मालूम थे इसलिए ज्यों ही वासस्थान आए हुए पति को देखा, तभी उठकर आसनादि प्रदान किया और मन के अभिप्राय को जानकर अशांत मन को विलास से सहित, अन्य पुराण-पुरुषों की कथाओं के द्वारा बहलाने का प्रयास किया ॥६६॥
[जिनदत्त का विमलमति पत्नी से विचार विमर्श]
क्षणान्तरं ततः स्थित्वा तयेति किल चिन्तितम् ।
नयामि किल वेश्म स्व-मेतं वैचित्त्यहानये ॥६७॥
अर्थ: इस प्रकार कुछ क्षण स्थित रहकर उस पतिव्रता ने विचार किया, इनके मन के विषाद को दूर करने के लिए कुछ समय के लिए, अपने पिता के घर ले जाना उचित होगा । क्योंकि वहाँ जाने से स्वयं इनका व्यथित चित्त शांत हो जायेगा ॥६७॥
ऊचे तयार्यपुत्राद्य मयामा भवतो मम ।
पित्रा सुप्रहिता लातुं तत्र किं क्रियतामिति ॥६८॥
अर्थ: प्यारे आर्यपुत्र ! आज मेरे पिता के घर से आप और मुझे दोनों को शीघ्र बुलाने का समाचार आया है । कहिए इसमें आपकी क्या सम्मति है ? जो उचित समझें वह करें ॥६८॥
प्रापयामि पितुर्गेह-मत एव मिषादिमाम् ।
विभाव्येति बभाणे मां, युक्तमेवं वरानने ॥६९॥
अर्थ: समयोचित वार्ता को सुनकर वह भी विचारने लगा, ठीक ही होगा इसी बहाने से इसे इसके पिता के घर छोड़कर, मैं स्वतंत्र अपने कार्य को सिद्ध कर सकूँगा । वह बोला हे सुंदर मुखी ! वस्तुतः तुम्हारा विचार युक्ति संगत है । हमें चम्पा नगरी चलना चाहिए ॥६९॥
आपृच्छ्येति ततस्तात-मनुज्ञातौ गतौ सुखम् ।
परां जनेन संप्राप्तौ चम्पां चारूरु-गोपुराम् ॥७०॥
अर्थ: तदनन्तर वह अपने पिता के समीप गया एवं ससुराल जाने के लिए पूछा । पिता जी ने भी उसके मन बहलाव के उद्देश्य से जाने की आज्ञा दे दी । पिता की अनुमति प्राप्त कर उसे परम-सुख हुआ । कुछ श्रेष्ठजनों के साथ प्रस्थान किया और शीघ्र ही विशाल सुन्दर गोपुरों से शोभित चम्पापुर में जा पहुँचे ॥७०॥
ज्ञातवृत्तस्ततो श्रेष्ठि विमलो मुदितो गृहम् ।
निन्ये स्वयं परं प्रीत्या तत्रास्थाद्दिन-पञ्चकम् ॥७१॥
अर्थ: सेठ विमलचन्द्र को जिनदत्त के मन अशांत होने का कारण पहले से ही मालूम हो चुका था इसलिए उन्होंने अपने जामाता का बड़ा ही सत्कार किया और स्वागतपूर्वक अपने घर ले जाकर उन्हें प्रेम से ठहराया । वे वहाँ अपनी प्रिया के साथ पाँच दिन तक ठहरे ॥७१॥
अन्येद्युर्गतवानेष क्रीडितुं प्रियया सह ।
प्रमदोद्यानमुद्दाम - काम - विश्राममन्दिरम् ॥७२॥
अर्थ: एक दिन वह अपनी प्राण प्यारी के साथ प्रमद नामक उद्यान में क्रीड़ार्थ गया । यह मनोहर विस्तृत एवं सुसज्जित बाग साक्षात् कामदेव के मंदिर के सदृश था ॥७२॥
मञ्जुगुञ्जद्दलिव्रात - बद्धतोरणमालिके ।
मन्दगन्धवहोद्भूत - कामिनीकुन्तलालके ॥७३॥
अर्थ: उसमें विशाल-विशाल काम मंदिर बने थे । सुंदर कर्ण प्रिय शब्द करने वाले भ्रमरों के समूह से वेष्टित अनेक तोरण शोभित हो रहे थे, सुगंधित पवन अपने वेग से कामिनियों के केशों को व घुँघरुओं को चंचल करता था ॥७३॥
सुगन्धकुसुमामोद - मत्तकोकिलकोमले ।
अनल्प-फल-सम्भार - नम्र-सर्व-महीरुहे ॥७४॥
अर्थ: सुगंधित पुष्पों के आमोद सुगन्ध से कोकिलाएँ मत्त हो कोमल गायन करती थीं एवं अनेक फलों के भार से सभी वृक्ष नम्र हो रहे थे ॥७४॥
चिरं चिक्रीड तत्रासौ सर्वेन्द्रियसुखावहे ।
क्रीडाद्रिदीर्घिका-वल्ली - विटपादिमनोहरे ॥७५॥विशेषकं॥
अर्थ: क्रीड़ापर्वत, वापिका, लता एवं वृक्ष आदि से मनोहर, सभी इन्द्रियों को सुख देने वाले उस उद्यान में जिनदत्त ने चिरकाल तक क्रीड़ा की ॥७५॥
भ्राम्यताथ ततस्तेन तत्रादर्शि महौषधिः ।
शिखायां धारिताऽदृश्यं या करोति नरं क्षणात् ॥७६॥
अर्थ: इसके बाद उस जिनदत्त ने वहाँ भ्रमण करते हुए, महान् औषधि देखी जो चोटी में धारण करने से मनुष्य को क्षण में अदृश्य करती है ॥७६॥
अस्ति यद्यपि सर्वाङ्ग-सौख्यं मम निकेतनम् ।
तथापि पितुरुत्सृज्य स्थातुमत्र न युज्यते ॥७७॥
अर्थ: यद्यपि मुझे यहाँ किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं है, सब प्रकार से सब तरह के सुख मिल रहे हैं, तो भी अपने घर को छोड़ ससुर के घर रहना सर्वथा अनुचित है ॥७७॥
अक्षमेयम् वियोगं च सोढुं यद्यपि मामकम् ।
दन्दह्यते तथाप्येष मानभङ्गो मनोऽनिशम् ॥७८॥
अर्थ: हाँ यह अवश्य है कि छाया के समान यह प्रिया मेरा वियोग सहन करने में अशक्य होगी, तो भी मानभङ्ग का कष्ट उससे भी अधिक है, यह अग्नि के समान मेरे हृदय को रात-दिन जला रहा है ॥७८॥
पद्मा न यावदद्यापि विहिता वशवर्तिनी ।
तावदेते विषायन्ते विषया मम सर्वथा ॥७९॥
अर्थ: जब तक लक्ष्मी मेरे अधीन न होगी, मैं धनाढ्य न होऊँगा तभी तक ये भोगे गए विषय, विष के समान ही भयंकर मालूम पड़ेंगे, इसलिए लक्ष्मी को वश में करने के लिए समस्त दुख सह लेना भी योग्य है ॥७९॥
तिष्ठन्तमत्र मां माम कीदृशं किल बुध्यते ।
इत्यादि बहु सम्भाव्य तेनादायि महौषधिः ॥८०॥
अर्थ: यहाँ रहते हुए ससुराल में मुझे मेरे पक्ष के संबंधी कैसा मानते हैं इत्यादि बहुत विचार कर उस जिनदत्त ने वह महान् औषधि ग्रहण कर ली ॥८०॥
शिखाग्रे तां ततो बद्ध्वा भूत्वादृश्यस्ततो नृणाम् ।
जगाम क्वापि साप्येवं विललाप तदुज्झिता ॥८१॥
अर्थ: तत्क्षण उसने उस महान् औषधि को शिखा में बांध लिया और उसी समय अदृश्य हो उपस्थित जनों के देखते-देखते ही कहीं अन्यत्र चला गया तथा परित्यक्ता विमलमती एकाकी विलाप करने लगी ॥८१॥
प्राणनाथमपश्यन्ती सा ददर्श दिशोऽखिलाः ।
तप्तासन्तमसेनेव चक्रवाकीव केवला ॥८२॥
अर्थ: जिनदत्त को न आए जब बहुत देर हो गई और आने की आशा सर्वथा जाती रही, तो विमलमती को बड़ा ही दुख हुआ और मानो अंधकार के द्वारा चकवी के समान वियोग से व्याकुल होती हुई सभी दिशाओं में आशा भरी दृष्टि से देखने लगी ।
त्वद्दृष्टिजीविता नाथ ! त्वत्पाद-कुलदेवता ।
स्वभावप्रेमसंसक्ता हा मुक्तास्मि कथञ्चन ॥८३॥
अर्थ: हाय ! मेरे जीवनाधार नाथ ! ऐ मेरे हृदय मंदिर के आराध्य देव ! हा ! स्वाभाविक प्रेम के भंडार आप कहाँ चले गए ? मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया ? जिससे रुष्ट हो मुझे आपने छोड़ दिया ॥८३॥
[जिनदत्त के वियोग में विमलमति का विलाप]
केलि-लीलां विहायाशु मुखचन्द्रं प्रदर्शय ।
मनःकुमुदमाम्लान-मार्यपुत्र ! विकासय ॥८४॥
अर्थ: नहीं ! नहीं ! आप ऐसे कठोर न थे, अवश्य ही इस समय आप मेरे साथ हँसी कर रहे हैं । प्राणनाथ ! कृपा कर अब आप शीघ्र ही आइए । बहुत हँसी हो चुकी अब और अधिक वह नहीं सही जाती, बिना विलम्ब के मुझे अपना मुखचंद्र दिखाकर प्रफुल्लित कीजिए ॥८४॥
मनो मे नवनीताभं तप्तं विरह-वह्निना ।
विलीनमिव हा पश्चात्-किमागत्य करिष्यसि ॥८५॥
अर्थ: मेरा मन मक्खन के समान कोमल है, वह इस समय आपकी विरहरूपी अग्नि से तपाया जा रहा है, यदि वह सर्वथा विलीन/विदीर्ण ही हो गया, तब फिर आपका आना ही किस काम का होगा, इसलिए हे प्राणनाथ ! शीघ्र आइए और इस संतप्त करने वाली विरहाग्नि को अपने संयोगरूपी जल से बुझाकर शीघ्र शांत कीजिए ॥८५॥
ता लतास्तरवस्ते ते क्रीडागास्ते विहङ्गमाः ।
न जानामि गताः क्वापि दृष्टिं बद्धैव वक्त्रभः ॥८६॥
सस्नेहस्तादृशी प्रीतिश्चाटुकाराश्च ते प्रभो ! ।
विश्रम्भः स च दाक्षिण्यं तदद्य सकलं गतम् ॥८७॥
अर्थ (श्लोक 86 से 87): हे देव ! वे लताएँ, वे वृक्ष समूह, वे क्रीड़ा पर्वत सरोवर, वे चहकते पक्षी समूह आदि न जाने कहाँ चले गए ? मुझे कुछ भी दृष्टिगत नहीं हो रहा है । मैं तो केवल मात्र आपके मुखचंद्र की ओर ही दृष्टिबद्ध हूँ ॥८६॥ हे प्रभो ! आपको मेरे ऊपर बड़ा ही स्नेह था, बड़ी ही मुझ में प्रीति थी, मुझे बहुत ही अच्छा मानते थे । किसी कारण वश मेरे रुष्ट हो जाने पर, आप सैकड़ों चाटु वचन कहा करते थे, वह विश्वास और दयालुता आज सभी कहाँ चले गये ? ॥८७॥
आश्वासयति मामत्र को विना भवताधुना ।
विरहार्तां विभावर्यां भानुनेव सरोजिनीम् ॥८८॥
अर्थ: आपके बिना मुझे अपना कोई नहीं दिख रहा है । आप मुझको समय-समय पर धैर्य दिलाते थे, परन्तु अब आपके यहाँ न रहने से, मैं रात्रि में सूर्य के बिना कमलिनी के समान शोकग्रस्त हो गई हूँ ॥८८॥
यत्पुरा विहितं नूनं संयुक्तानां वियोजनम् ।
दुःसहोऽयं समायातो विपाकस्तस्य कर्मणः ॥८९॥
अर्थ: अवश्य ही उन्हें किसी ने हर लिया है और वह हरने वाला कोई नहीं, मेरा पूर्वकृत कर्म ही है क्योंकि मैंने पूर्वभव में संयोगी प्रेमियों का वियोग किया होगा, उसका ही यह कुफल है, जो मुझे प्रिय वियोगजन्य दुःख मिला है ॥८९॥
जन्मान्तरेऽपि संभूतिः स्त्रीत्वेन भविता यदि ।
तदाजननिरेवास्तु मा वियोगः प्रियैरमा ॥९०॥
अर्थ: हा ! स्त्री पर्याय बड़ी ही खराब है । इसमें महान् दुःख है । इसके समान निंद्य कोई पर्याय नहीं । इसमें मेरा अब कभी जन्म न हो और यदि किसी प्रकार हो भी जाये तो कुमारी ही रहूँ, जिससे प्रिय का वियोग न हो । संसार में प्रिय-वियोग के समान कोई पदार्थ दुःखद नहीं है, इसलिए इसका न होना ही अच्छा है ॥९०॥
दीयतां दर्शनं पत्युः समस्ता वनदेवताः ।
दुःखसागर-मग्नाया उद्धारः क्रियतां मम ॥९१॥
अर्थ: अयि वन देवताओं ! मुझ पर दया करो, मेरी दीन प्रार्थना की तरफ ध्यान दो । मुझे पति का दर्शन दें और मेरा उद्धार करें । मैं शोक सागर में डूबी जा रही हूँ । मेरी इस अवस्था पर क्या आपको करुणा नहीं आती ? मेरा इस समय सहायक कोई नहीं है । दीन-दुखिया, निःसहाय का सहायक बनना आपका कर्त्तव्य है ॥९१॥
विलापमिति कुर्वाणा सानीता पितुरन्तिकम् ।
सखीजनेन वाष्पाम्भः स्नापितस्तनमण्डला ॥९२॥
अर्थ: इस प्रकार विलाप करती हुई अश्रु जल से नहाए हुए स्तनमण्डल वाली वह विमलमती, सखी जनों के द्वारा पिता के पास लाई गई ॥९२॥
वार्त्तां निशम्य तां तातस्तामाश्वास्याब्रवीददः१ ।
धर्मदानरता पुत्रि ! तिष्ठात्रैव जिनालये ॥९३॥
अर्थ: उस वियोग-वार्ता को सुनकर पिता विमलमती को आश्वासन देते हुए बोले, हे पुत्री ! तुम धर्मदान में लीन रहते हुए यहाँ जिनमंदिर में रहो ॥९३॥
सार्द्धमार्याभिरार्याभिः सखीभिः स्वजनैर्वृता ।
तावत्तिष्ठसुते ! यावत् तदन्वेषण-मारभे ॥९४॥
अर्थ: श्रेष्ठ आर्यिकाओं की संगति करो । अपनी सखियों के साथ धर्म की चर्चा कर और पात्रदान आदि भी किया करो । हम लोग तेरे पति की तलाश में हैं, यदि वे कहीं मिल जाएँगे, तो अवश्य उनका तेरे साथ संयोग होगा ॥९४॥
स्थापयामास तत्रैतां सान्त्वयित्वा समुद्यताम् ।
दाने श्रुते जिनार्चायां वैयावृत्ये यथोचिते ॥९५॥
अर्थ: पिता विमलचंद्र का जब पुत्री विमलमती ने यह सांत्वना भरा उपदेश सुना और उसकी यथार्थता समझी, तो जिस किसी तरह धैर्य धारण किया और जिनपूजा, शास्त्र-पठन, सदुपदेश श्रवण, वैयावृत्यकरण आदि शुभ क्रियाओं में अपना चित्त लगाकर रहने लगी ॥९५॥
[पतिवियोग के बाद पिता द्वारा पुत्री को समझाकर अपने जिनालय में रखना]
गवेषितश्च यत्नेन पक्षद्वयजनैरयम् ।
सर्वतोऽपि च नालोकि ततस्तस्थे यथायथम् ॥९६॥
अर्थ: जिनदत्त के पिता और ससुर पक्ष के पुरुषों ने जब इनकी खोज करना प्रारंभ की और कहीं पता न पाया, तो वे भी विचारे मौन साधकर भाग्य के भरोसे रहने लगे ॥९६॥
अथासौ जिनदत्तोऽपि प्रापद्दधिपुरंपुरम् ।
दृष्टं प्रविशता तत्र तेनोद्यानं मनोहरम् ॥९७॥
अर्थ: जिनदत्त औषधि के प्रभाव से अदृश्य हो चलते-चलते दधिपुर नामक नगर में पहुँचे और वहाँ एक बाहर के विशाल उद्यान को देखा ॥९७॥
तस्य मध्ये विवेशासौ विश्रामाय ददर्श च ।
गुल्मवल्लीद्रुमांस्तत्र सर्वानप्यवकेशिनः ॥९८॥
अर्थ: उस जिनदत्त ने विश्राम के लिए उस उद्यान के मध्य में प्रवेश किया, वहाँ जाकर सभी वल्ली/बेल, लताओं, गुच्छों और वृक्षों को फूल-पत्रों से रहित रुण्ड देखा ॥९८॥
अहो वनमिदं केन हेतुनाभवदीदृशम् ।
क्रियमाणेऽपि सेकादौ यावदित्यमचिन्तयत् ॥९९॥
अर्थ: इस प्रकार की दशा देखकर वह विचारने लगा, अहो ! यह बगीचा सिंचाई आदि किए जाने पर इस प्रकार दुर्दशा को प्राप्त क्यों है ? ॥९९॥
तावत्तत्र समायातः परीतः पत्तिभिः पुरात् ।
जंपानस्थः समुद्राख्यः सार्थवाहो धनाधिपः ॥१००॥
अर्थ: वह इस प्रकार आश्चर्य से सोच रहा था कि उसी समय नगर से परिकर सहित एक धनाढ्य समुद्रदत्त नाम का व्यापारी वहाँ आ पहुँचा, यही इस उद्यान का मालिक था ॥१००॥
अयमाप्राकृताकारः कोऽपि पान्थ इति क्षणम्।
विचिन्त्यावाचि तेनासौ कुतो यूयं समागताः ॥१०१॥
अर्थ: अस्वाभाविक आकृति वाले अज्ञात पुरुष को उद्यान में देखकर, उसने विनय से पूछा हे भद्र ! आप कौन हैं और इस समय कहाँ से आ रहे हैं ? ॥१०१॥
भणितं च कुमारेण भ्राम्यन् भूमि-मितस्ततः।
क्षेमादिकं परीपृच्छ्य ज्ञात्वोत्तमगुणं च तम् ॥१०२॥
उक्तं तेन ततो भद्र दृष्टं वनमिदं त्वया।
अस्ति कश्चिदुपायो वा येनेदं फलवद्भवेत् ॥१०३॥युग्मं॥
अर्थ (श्लोक 102 से 103): उसके प्रश्नानुसार कुमार ने उत्तर दिया, हे भाई ! पृथ्वी पर इधर-उधर विचरण करता हुआ मैं यहाँ आया हूँ । यह सुनकर उसे उत्तम कुलीन एवं गुणवाला ज्ञातकर कुशलक्षेम पूछी । तत्पश्चात् बोला हे भद्र ! आपने इस उद्यान को देखा क्या कोई उपाय है, जिससे कि यह फलवान हो सके ? ॥१०२,१०३॥
विज्ञाताशेषवृक्षायु - र्वेदोऽवादीदसावदः।
नन्दनाभं करोम्येष विलम्बेन विना वनम् ॥१०४॥
अर्थ: सार्थवाह का प्रश्न सुनकर कुमार ने वृक्ष वनस्पति विज्ञान द्वारा वृक्षों की आयु आदि का विज्ञान लगाया, यह वनस्पति विज्ञान में निष्णात था । अतः कहने लगा-मैं अतिशीघ्र इस वन को
हृष्टात्मना ततस्तेन सामग्री सकला कृता ।
दोहदादिकमादाय कुमारेणापि तत्कृतम् ॥१०५॥
अर्थ (श्लोक 104 से 105): नन्दन वन के समान रमणीक कर दूँगा ॥१०४॥ यह सुनकर उसे परमानन्द हुआ और कुमार के कथनानुसार समस्त साधन-सामग्री लाकर उपस्थित कर दी । कुमार ने अविलम्ब उस सामग्री को लेकर उपवन की काया पलट कर दी ॥१०५॥
पुलकैरिव रागस्य स्तवकैः क्वापि रेजिरे ।
अशोकाः १ कामिनी-पाद-ताडनेन समुद्गतैः ॥१०६॥
विभिदे क्वापि वाणेन वाणेनेव मनोभुवः ।
पुष्पपुंखभृता तत्र वियुक्तानां मनो भृशम् ॥१०७॥
कटाक्षैर्लक्षितः पूर्वं पुरन्ध्रीणां यदादरात् ।
उवाह तिलकस्तेन तिलकत्वं २ वनश्रियः ॥१०८॥
अर्थ (श्लोक 106 से 108): उसमें पहले जो अशोक-वृक्ष सूखे खड़े थे, वे अब कामिनी-स्त्रियों के पाद-ताड़न से उत्पन्न पुलकों के समान गुच्छों से शोभित जान पड़ने लगे ॥१०६॥ जो बाण-वृक्ष रुण्ड मात्र खड़े थे, वे कामदेव के बाण के समान पति, वियुक्त-स्त्रियों के मन को भेदने वाले पुष्प और पंखों से युक्त हो गये ॥१०७॥ जो तिलक-वृक्ष पहले नाम मात्र के ही तिलक थे, वे अब पुश्चली स्त्रियों के कटाक्ष बाणों से आहत हो पुष्पित होने के कारण, वास्तव में वे वन लक्ष्मी के तिलक हो गए थे ॥१०८॥
विचकास कुचाभोग-सङ्गात् कु-रबकः१ स्त्रियः ।
यथा तथा कृतः सोऽपि भृङ्गैः सु-रवकस्तदा२ ॥१०९॥
अर्थ: जो कु-रवक पहले वास्तव में कुत्सित रव करने वाले पुष्प न होने से भद्दे लगने वाले थे, वे ही अब स्त्रियों के स्तन संसर्ग से आहत हो पुष्पित होने के कारण गुंजारते हुए भ्रमरों के शब्दों से, सु-रवक-सुंदर रव/शब्द वाले हो गए ॥१०९॥
प्रमदामद्यगण्डूषो वकुलैर्यः पपे पुरा ।
प्रवृद्ध-कुसुमामोदै-रुद्गीर्ण इव शोभितः ॥११०॥
अर्थ: जो वकुल-वृक्ष पहले बिल्कुल शुष्क (नीरस) थे, वे ही अब प्रमदाओं द्वारा किए गए मद रस के कुल्लों से सींचें गए कुसुमों की सुगंधि से पहले पीए गए मदिरा रस को उगलते हुए के समान जान पड़ते थे ॥११०॥
कृतारार्तिकमाङ्गल्य-दीपकैरिव चम्पकैः ।
विशतो रतिनाथस्य तत्र पुष्पैर्विराजितम् ॥१११॥
अर्थ: जो चंपक-वृक्ष पहले रुंड-मुंड खड़े थे वे पुष्पों से युक्त होने के कारण प्रवेश करते हुए काम के स्वागतार्थ जलाए गए मंगलदीपों के समान शोभित होने लगे ॥१११॥
उत्कर्षो गुणसम्पर्के जातेनाशुचिजन्मना ।
यदाप्तं कुंकुमेनोच्चैः कामिनीमुखमण्डनम् ॥११२॥
अर्थ: जो कुंकुम-वृक्ष पहले अशुचिता से उत्पन्न होने के कारण अस्पृश्य थे, वे ही पुष्पों से सुगंधित हो जाने के कारण अति उत्कर्ष को प्राप्त, कामिनियों के मुखों के श्रृंगार हो गए ॥११२॥
चक्रे कण्टकिभिस्तत्र सरजस्कैः खलैरिव ।
सुगन्धगुणयोगेन केतकैर्मस्तके पदं ॥११३॥
अर्थ: वहाँ उद्यान में कांटों वाली पुष्प परागरूपी धूली सहित और सुगंध रूप-गुण के संयोग से केतकी ने दुर्जनों के समान शिर पर स्थान को धारण किया अर्थात् केतकी के पुष्प फूल गए ॥११३॥
सेकधूपनपूजादि-योग्यं यद्यस्य भूरुहः ।
विधाय तत्तदा तस्य तेनाकारि विदोच्चता ॥११४॥
अर्थ: इसी प्रकार अन्य बहुत से जो वृक्ष खराब हालात में थे, वे जिनदत्त द्वारा अपने-अपने योग्य सिंचन, धूप देना, सत्कार आदि कारणों के मिल जाने से प्रफुल्लित हो गए ॥११४॥
सविभ्रमा कृता तत्र जातपुष्पफलोद्भवा ।
समस्तापि कुमारेण वनस्पतिनितम्बिनी ॥११५॥
माकन्दकलिकास्वाद-कलकूजितकोकिलं ।
सुगन्धि-कुसुमामोद - सुख-लब्ध-मधुव्रतम् ॥११६॥
माधवीमण्डपोपान्त-क्रीडत्कामुकयुग्मकम् ।
नागवल्लीकृताश्लेष - सफलक्रमुकद्रुमम् ॥११७॥
नभोवतीर्णसंभ्रान्त - किन्नरीकलगीतिभिः ।
त्यक्तदूर्वाङ्कुरास्वाद - कुरङ्गक-कदम्बकम् ॥११८॥
लतान्तरचलच्चारु - सारिकाशुकजल्पनैः ।
उत्कर्णचकितानेक-सङ्केतस्थाभिसारिकम् ॥११९॥
तरुमूलसमासन्न - ध्यानासक्ततपोधनम् ।
तद्भक्तिभावितायात - खेचरामरमानवम् ॥१२०॥
नितान्तफलसम्भार - भज्यमानमहीरुहम् ।
रतान्तश्रम-संहार - कारिचारु-प्रभंजनम् ॥१२१॥
तथाविधं तदालोक्य चक्रे चैत्रोत्सवान्सौ ।
पूजयामास सद्वस्त्र-भूषणाद्यैश्च तं सदा ॥१२२॥ (कुलकं)
अर्थ (श्लोक 115 से 122): जिनदत्त द्वारा इस प्रकार जब, वह उद्यान फल और पुष्पों से शोभित कर दिया गया, तो वहाँ आ-आकर सुंदर पक्षीगण किलोलें करने लगे ॥११५॥ आम्र की कलियों के भक्षण करने से मत्त हुई कोकिलाएँ मधुर-मधुर शब्द करने लगीं। सुगंधित पुष्पों की सुगंधि से, भ्रमर सुखकारी मोदवर्धक गुंजार करने लगे ॥११६॥ माधवी लताओं के मंडप में कामी लोग क्रीड़ा करने लगे। नागवल्ली के आलिंगन करने से सुपारी के वृक्ष सफल जान पड़ने लगे ॥११७॥ आकाश से देखने के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए किन्नरियों के गीतों से मृगगण वशीभूत हो दूर्वा भक्षण छोड़ स्तब्ध होने लगे ॥११८॥ लताओं के मध्य सुंदर मैनाएँ चहकने लगीं, तोते भी उनके स्वर से होड़ लगाने लगे। इससे अनेक अभिसारिकाएँ संकेत स्थानों में स्थित सावधान हो कान खड़े कर सुनने लगीं ॥११९॥ वृक्षों के नीचे तपस्वियों को ध्यान में मग्न देख खेचर, भूचर और अमरगण एकत्रित होने लगे ॥१२०॥ अधिक फलों के भार से झुक-झुक कर वृक्षों की डालियाँ टूटने लगीं और रति के श्रम को हरण करने वाली सुंदर पवन बहने लगी ॥१२१॥ जब समस्त उद्यान इस प्रकार मनोहारी हो गया, तो सेठ समुद्रदत्त को अति आनंद हुआ। उसने उसकी खुशी में एक चैत्रोत्सव कराया और जिनदत्त को उसमें सद्वस्त्राभूषण आदि से महा-सत्कार युक्त किया ॥१२२॥
राजादि-जनविख्यातो नारीनेत्रालि-पङ्कजः ।
जिनदत्तोभवत्तत्र जिनधर्मपरायणः ॥१२३॥
अर्थ: वहाँ राजा आदि जनों में प्रसिद्धि को प्राप्त, नारियों के नेत्ररूपी भौरों के लिए कमल स्वरूप जिनदत्त जैनधर्म में लीन/परायण हुआ ॥१२३॥
ततो महात्मा वननायकेन पुत्रः स मेने मदनोपमानः ।
धृतः स्वगेहे गुणरत्नकोशः सर्वज्ञ-धर्मामृतपानपुष्टः ॥१२४॥
अर्थ: तत्पश्चात् सर्वज्ञ प्रभु जिनेन्द्र भगवान के धर्मामृत से पुष्ट, गुणरूपी रत्नों का भण्डार, धर्मशील उस कुमार को वन नायक ने पुत्रवत् अपने घर में स्थान दिया, उसने समझा मेरे घर में साक्षात् कामदेव अवतरित हुआ है, यहाँ वह नाना सुखों का अनुभव करने लगा तथा अपनी धर्मध्यान, साधना में तत्पर रहा परन्तु पराश्रित वृत्ति मनस्वियों को भला कैसे भाती ? ॥१२४॥
अथान्यदा चिन्तितवानितीदं स्थातुं न मे सद्मनि युज्यतेऽस्य ।
न यावदद्याप्यभिसारिकेव कृता भ्रमन्ती स्ववशे मया श्रीः ॥१२५॥
अर्थ: नहीं ! मुझे इस सेठ के घर में रहना बिल्कुल उचित नहीं है । मैं जिस उद्देश्य से परदेश भ्रमण कर रहा हूँ, वह अभी पूरा नहीं हुआ है । वेश्या के समान चंचल लक्ष्मीरूपी स्त्री अभी तक मेरे वश में नहीं हुई है और इसको वश करना, मेरा प्रधान कर्त्तव्य है ॥१२५॥
विना न दानेन समस्ति धर्मः सुपुष्कलेनापि धनेन कामः ।
विना धनं नो व्यवसायतोऽस्ति त्रिवर्गमूलं तदिदं स्वमेव ॥१२६॥
अर्थ: क्योंकि धन के बिना मनुष्य के धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ सिद्ध नहीं हो सकते । अतः न तो इसके बिना मनुष्य दान से धर्म ही उपार्जन कर सकते हैं, न इसके बिना अभीष्ट पदार्थों का संग्रहकर काम ही सिद्ध हो सकता है और न इसके बिना किसी तरह का व्यवसाय कर अर्थ ही उपार्जन कर सकते हैं, इसलिए सबसे पहले तीनों पुरुषार्थों के मूलभूत धन का पैदा करना ही कार्यकारी है ॥१२६॥
[सेठ समुद्रदत्त द्वारा जिनदत्त को अपने घर ले जाना]
अवोचि तेनेति ततः स तातः प्रयच्छ भाण्डं जलयात्रया नः ।
यामो यदादाय विचित्ररत्नं द्वीपं जवात्सिंहलशब्दपूर्वम् ॥१२७॥
अर्थ: जब इस प्रकार जिनदत्त के मन में धन पैदा करने का पूर्वभाव फिर उदय हो आया, तो उन्होंने सेठ समुद्रदत्त से बर्तन और अनेक रत्नों को मांगा और जहाज द्वारा समुद्र यात्रा करते हुए सिंहल द्वीप जाने का विचार प्रकट किया ॥१२७॥
निशम्य तदुदीरितं भणति सार्थवाहो मुदा ।
मयैव सह गम्यतां यदि समस्ति बुद्धिर्धने ॥
ततः प्रगुणिताखिलोचितविचित्रभाण्डैः समं ।
जनैर्बहुविधैरिमौ मुदितमानसौ प्रस्थितौ ॥१२८॥
अर्थ: समुद्रदत्त सेठ ने जब जिनदत्त के उक्त प्रकार से वचन सुने, तो उसने कहा महाभाग ! यदि आपकी धन उपार्जन करने की इच्छा है, तो मेरे साथ क्यों न चलिएगा । मैं भी सिंहल द्वीप में विचित्र-विचित्र बर्तनों को ले शीघ्र ही जाना चाहता हूँ जिसे सुनकर जिनदत्त ने स्वीकार कर लिया और दोनों जन बहुत से मनुष्यों के साथ सिंहलद्वीप की ओर रवाना हो गए ॥१२८॥