आज के मुनिराज जो भी मंदिर बनवा रहे है सभी में प्रतिमाओ के कान कंधे को स्पर्श करते हुए बनवा रहे है । तथा कई जगह पहले से ही कान touch वाली प्रतिमाए है । वीतरागी प्रतिमा के कान, कंधे से touch करते हुए अगर है तो क्या वो समचतुरस्त्र संस्थान वाली प्रतिमा है ???
उपरोक्त प्रतिष्ठा प्रदीप - पं. नाथूलाल जी के अंशों को पढ़कर यह तो ज्ञात हो ही सकता है कि प्रतिमा बनते समय इन बातों का ध्यान देना आवश्यक ही नही अनिवार्य है।
कान से प्रतिमा और धड़ को जोड़कर बनाने की प्रक्रिया में एक शिल्पकला सम्बन्धी रहस्य ही मात्र है, अन्य कुछ विशेष जानने में नही आया।
वह मात्र इतना है कि/-
• प्रतिमा का मुख बड़ा होता है और गर्दन छोटी अतः प्रतिमा का मुख कमजोर गर्दन के कारण खण्डित होकर गिर ना जाये इसलिए कानों को धड़ से जोड़कर उसका सहारा दिया जाता है।
जी बिल्कुल, बात तो एकदम सही प्रतीत होती है लेकिन इसमें यह भी विचार किया जा सकता है कि वीतरागता एवं समचतुरसता के पक्ष को एक समय के लिए न देखते हुए मूर्ति की सुरक्षा हेतु यदि इस तरह शिल्प किया गया है तो महान दोष नही आएगा।
Badhiya!! @Sanyam_Shastri

