जिन दर्शन पाठ (कवि राजमल पवैया) | Jin Darshan Path (Rajmal Pavaiya)

जिन दर्शन पाठ

धर्म चक्रपति जिन तीर्थंकर वीतराग जिनवर स्वामी ।
अष्टादश दोषों से विरहित परम पूज्य अंतर्यामी ।।१।।

मोह मल्ल को जीता तुमने केवल ज्ञान लब्धि पायी ।
विमल कीर्ति की विजय पताका तीन लोक में लहरायी ।।२।।

निज स्वभाव का अवलंबन ले मोह नाश सर्वज्ञ हुए ।
इन्द्रिय विषय कषाय जीत कर निज स्वभाव मर्मज्ञ हुए ।।३।।

भेद ज्ञान विज्ञान प्राप्त कर आत्म ध्यान तल्लीन हुए ।
निर्विकल्प परमात्म परम पद पाया परम प्रवीण हुए ।।४।।

दर्शन ज्ञान वीर्य सुख मंडित गुण अनंत के पावन धाम ।
सर्व ज्ञेय ज्ञाता होकर भी करते निजानंद विश्राम ।।५।।

महाभाग्य से जिनकुल जिनश्रुत जिन दर्शन मैंने पाया ।
मिथ्यातम के नाश हेतु प्रभु चरण शरण में मैं आया ।।६।।

तृष्णा रूपी अग्नि ज्वाल भव भव संतापित करती है ।
विषय भोग वासना हृदय में पाप भाव ही भरती है ।।७।।

इस संसार महा दुख सागर से प्रभु मुझको पार करो ।
केवल यही विनय है मेरी अब मेरा उद्धार करो ।।८।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ३०४

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