धर्म चक्रपति जिन तीर्थंकर वीतराग जिनवर स्वामी।
अष्टादश दोषों से विरहित परम पूज्य अंतर्यामी॥१॥
मोह मल्ल को जीता तुमने केवल ज्ञान लब्धि पायी।
विमल कीर्ति की विजय पताका तीन लोक में लहरायी॥२॥
निज स्वभाव का अवलंबन ले मोह नाश सर्वज्ञ हुए।
इन्द्रिय विषय कषाय जीत कर निज स्वभाव मर्मज्ञ हुए॥३॥
भेद ज्ञान विज्ञान प्राप्त कर आत्म ध्यान तल्लीन हुए।
निर्विकल्प परमात्म परम पद पाया परम प्रवीण हुए॥४॥
दर्शन ज्ञान वीर्य सुख मंडित गुण अनंत के पावन धाम।
सर्व ज्ञेय ज्ञाता होकर भी करते निजानंद विश्राम॥५॥
महाभाग्य से जिनकुल जिनश्रुत जिन दर्शन मैंने पाया।
मिथ्यातम के नाश हेतु प्रभु चरण शरण में मैं आया॥६॥
तृष्णा रूपी अग्नि ज्वाल भव भव संतापित करती है।
विषय भोग वासना हृदय में पाप भाव ही भरती है॥७॥
इस संसार महा दुख सागर से प्रभु मुझको पार करो।
केवल यही विनय है मेरी अब मेरा उद्धार करो॥८॥
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ३०४