जिज्ञासु- जिनवाणी जग मैय्या, जनम दुःख मेंट दो।
जिनवाणी जग मैय्या… ।। 1 ।।
जिनवाणी- निज की शरणा ले के, जनम दुःख मेंट लो।
निज की शरणा ले के… ।। 2 ।।
जिज्ञासु - कुन्दकुन्द से पुत्र तुम्हारे, गणधर जैसे भैय्या।
समवशरण सा महल तुम्हारा, तीर्थंकर से सैंया ।।
जनम दुःख मेंट दो…।। 3।।
जिनवाणी-कुन्दकुन्द,गणधर,तीर्थंकर,निज महिमा दर्शावें।
निज आतम ही समवशरण, सुखदाता सीख सुनावें ।।
जनम दुःख मेंट लो… ।। 4।।
जिज्ञासु - बहुत दिनों से भटक रहा हूँ, ज्ञान बिना हे मैय्या।
निर्मल ज्ञान प्रदान सु कर दे, तू ही सच्ची मैय्या ।।
जनम दुःख मेंट दो…।। 5।।
जिनवाणी- ज्ञान स्वभावी हो के चेतन, काहे को भटकाते ।
द्रव्यदृष्टि अपना कर, खुद ही निज प्रभुता प्रकटावे ।।
जनम दुःख मेंट लो…।। 6।।
जिज्ञासु- गुणस्थानों का अनुभव हमको, हो जावे जग मैय्या।
चढ़ें उन्हीं पर क्रम से हम फिर, होवें कर्म खिपैया ।।
जनम दुःख मेंट दो…।। 7।।
जिनवाणी-अनन्त गुणमय चेतन तुम तो, गुणस्थानों से पार।
गुणस्थान संसार अवस्था तू सिद्धत्व आधार ।।
जनम दुःख मेंट लो…।। 8 ।।
जिज्ञासु-मेंट हमारा जनम-मरण दुःख, इतनी विनती मैय्या ।।
तुमको शीश त्रिलोक नवावें, तू है सच्ची मैय्या।।
जनम दुःख मेंट दो…।। 9।।
जिनवाणी- जनम-मरण पर्यायों के सब, स्वांगों से तू न्यारा।
निज में झुको लीन हो निज में, प्रगटे पद अविकारा।।
जनम दुःख मेंट लो… ।। 10 ।।
जिज्ञासु - वस्तु एक अनेक रूप है, अनुभव सबका न्यारा।
हर विवाद का हल हो सकता, स्याद्वाद के द्वारा।।
जनम दुःख मेंट दो…।। 11 ।।
जिनवाणी- स्याद्वाद से निर्णय कर, निज रूप लखो जीव राजा।
सम्यक् रत्नत्रय प्रकटाकर, पावो सिद्ध समाजा।।
जनम दुःख मेंट लो… ।। 12 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह