तर्ज:- आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तान की
आओ भव्यो, तुम्हें दिखाएँ, झलक जैन सिद्धान्त की,
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।
ध्याओ शुद्धात्म..! ध्याओ शुद्धात्म..!!
ध्याओ शुद्धात्म..! ध्याओ शुद्धात्म..!!
जग छह द्रव्यों का मेला है, गुण-पर्याय अनन्त धरे,
सबकी अपनी-अपनी सत्ता, सब निजकार्य स्वतन्त्र करें,
स्वयं, स्वयं-को, स्व-के-द्वारा, स्व-के-लिए प्रदान करें,
स्व-में-से ले, स्व-पर ही धर, स्व-का ही निर्माण करें।
अद्भुत षट-कारकी प्रणाली, देखो जिन-सिद्धान्त की…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
छह द्रव्यों में एक द्रव्य ही ‘पुद्गल’ रूपी गुण वाला,
चार द्रव्य इस पर नहिं रीझें, किन्तु जीव हो मतवाला।
इसके आगे-पीछे नाचे, पीकर मोह सुरा प्याला!
राग-द्वेष अज्ञान में पड़कर, निज अस्तित्व भुला डाला!!
भेदज्ञान बिन खबर पड़े ना, बन्ध-मुक्ति सिद्धान्त की…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
मोती-की-माला के जैसी गुंथी हुई सब पर्यायें,
आगे-पीछे एक न प्रगटे, समय न एक चूक पाये,
तीन लोक के ‘सर्व द्रव्य की’, ‘सर्व काल की’ पर्यायें,
‘एक समय में’ ‘जाने तो अरिहन्त’, ‘न किन्तु बदल पायें’।
‘होता सब क्रमबद्ध स्वतः’ - यह स्वीकृति विधि चित शान्ति की…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
एक वस्तु में धर्म विरोधी, केवल जिनमत सह पाता,
बद्ध-अबद्ध अनाकुल-आकुल, मूर्त-अमूर्त, मूढ़-ज्ञाता।
एक कथन को सात नयों से, सिर्फ यही तो कह पाता,
‘वीतरागता बिना; मुक्ति हो ही नहिं सकती’ भी गाता।
स्याद्वाद भी, अनेकान्त भी, है सम्यक-एकान्त भी…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
कार्य, ‘निमित्तों का’ जो कहते, वे निमित्त के बन्दी हैं,
उपादान-का ‘ही’ जो कहते, वे जानो स्वच्छन्दी हैं।
निश्चय कारण; ‘उपादान की तत्क्षण योग्य अवस्था’ है,
उस क्षण ‘निमित्त अमुक होगा ही’ - ऐसी वस्तु व्यवस्था है।
कारण-कार्य व्यवस्था की, तस्वीर है जिन सिद्धान्त की…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
‘कर्म, जीव को सुख-दुख देते’। यह भी कथन नहीं है ठीक,
सुखी-दुखी जब जीव स्वयं हो, होता उनका उदय समीप,
क्योंकि पड़ा ‘अत्यन्त-अभाव’ इन दोनों ही द्रव्यों के बीच,
है अन्योन्याभाव सदा-से, देह-दशा-कर्मों के बीच।
प्रागभाव, प्रध्वंस अभावों के समझो सिद्धान्त भी…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
जीवों को सुख-दुख देने में, अन्य न कोई सफल होते,
सुख दें, फिर दुख भी दें! ऐसे ईश्वर असल नहीं होते।
स्वयं किये जो भाव शुभाशुभ, निश्चित ही वे फल देते,
करे आप, फल दें अन्य, तो स्वयं किये निष्फल होते।
कैसी अकट दलील, अकर्तावादी जिन-सिद्धान्त की…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
बिगड़ें ये परिणाम स्वयं ही, पर-से नहीं बिगड़ते हैं,
सुधरें भी परिणाम स्वयं ही, पर-से नहीं सुधरते हैं।
होती उनमें षट गुण-भागी वृद्धि-हानि कैवल्य प्रमाण,
क्यों महत्त्व देते उनको, जो क्षण भर नहीं ठहरते हैं?
परिणामी को पहचाने, तब भूल मिटे पथभ्रान्त की…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
समय-समय उत्पन्न हो रहीं, गुण अनंत की पर्यायें,
जबतक उनका लक्ष्य करें हम, वे सारी व्यय हो जायें।
इन उत्पाद-व्ययों के क्रम की, यदि यह वर्तमान पर्याय,
ध्रौव्य वस्तु संग केलि करे, तो ‘जगत पूज्य’ वह हो जाए।
जय बोलो ‘उत्पाद-अरु-व्यय-ध्रुव-युक्तं सत्’ सिद्धान्त की…
सिद्धान्तों पर अमल करो, पाओ पदवी लोकान्त की।।
रचनाकार: सिंघई रवीन्द्र जैन, इटारसी (म.प्र.)