जीवन है पानी की बूंद कब मिट जाए रे
होनी अनहोनी कब क्या घट जाए रे।।
पढ़ा न जरा विचारा है, खुद को नहीं सुधारा है।
खुद को नहीं सुधारा है, इसीलिए अधियारा है।।
इसलिए अँधियारा है, दिल में नहीं उतारा है।
खुद को ही पढ़ ले, सब कुछ पढ़ जाए रे ।।१।।
करना है वो आज करें , कल पर मत विश्वास करें।
कल पर मत विश्वास करो, आज करो वो अभी करो।।
कल को किस ने देखा है, कल का नहीं भरोसा हैं।
कल-कल करके तू, क्यों अकल गॅवाये रे।।२।।
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २१४
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