जीवा ! शूं कहिये तनैं भाई | Jeeva ! shu kahiye tane bhai (Gujarati)

जीवा ! शूं कहिये तनैं भाई |
पोता नूं रूप अनूप तजी नैं, शा माटैं विषयी थाई || टेक ||

इन्द्रीना विषय विषथकी, मोटा ज्ञान नू अमृत गाई |
अमृत छोड़ीनैं विषय विष पीधा, साता तो नथी पाई || १ ||

नरक निगोदना दुःख सह आव्यो, बली तिहनैं मग धाई |
एहवी बात रूड़ी न छै, तमनैं तीन भवन ना राई || २ ||

लाख बातनी बात ए छै, मूकीनै विषय - कषाई |
‘घानत’ ते वारै सुख लाधौ, एम गुरु समझाई || ३ ||

Artist- पं. घानतराय जी

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अर्थ

ओ जीवात्मा, तुझे क्या कहें भाई! अपने पूर्व कर्म के संयोग से सुन्दर रूप प्राप्त करके तूने उसे विषयों से आच्छादित कर दिया है, उनमें उलझा रखा है।

इन्द्रीना विषय विषथकी मौटा, ज्ञाननू अम्रत गाई।

इन्द्रिय-विषयों में उलझकर तू उनको ही अमृत के समान मानता रहा, उनके गीत गाता रहा और इस प्रकार तूने अमृत को छोड़कर विषयों के रस को पीया, तो उससे तुझे साता की प्राप्ति नहीं हुई।

नरक निगोदना दुख सह आव्यो, बळी तिहनैं मग धाई।

तूने नरक-निगोद के दुःखों को सहा। अब मनुष्य जन्म पाकर भी तू पुनः उसी मार्ग पर चल रहा है, भाग रहा है। यह बात तुझे अच्छी न लगी ! तू तीन भुवन का राजा होकर भी एक इतनी सी बात नहीं समझ सका !

लाख बातनी बात एम छै, मूकीनै विषयकषाई।

लाख बात की एक बात यह है कि तू विषय कषायों को छोड़-तज । द्यानतराय कहते हैं कि तभी तुझे सुख की प्राप्ति हो सकेगी, सत्गुरु ने इस प्रकार समझाया है।

शब्दार्थ: इस भजन में गुजराती भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है-शू = क्या; तनै = तुझे; पोतां अपने मूल स्वरूप को, आत्मस्वरूप को; तजीनैं तजकरक; शामाटै किसलिए, थाई हुआ न पाई नहीं प्राप्त हुई; बली पुनः; तिहनै उसी: एहवी ऐसी: रूड़ी अच्छो पोधा पोया; मूकि छोड़-तज ।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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