अज्ञान समस्त दुःखोंकी जड़ है। यह एक ऐसी वस्तु है जो आत्म-विवेकको आच्छन्न किये रहती है, ऐसा अन्धकार है जिससे आत्माका ज्ञान-सूर्य भी निष्प्रभ एवं निस्तेज बना रहता है। फलतः अज्ञानावस्थामें यह आत्मा हित और अहितको नहीं पहिचान पाती। जिस प्रकार मदिरा पीकर मनुष्य मदमत्त हो जाता है और उसे अच्छे और बुरेका, कर्त्तव्य एवं अकर्त्तव्यका कुछ भी विवेक नहीं रहता, उसी प्रकार अज्ञानकी अवस्थामें भी मनुष्य इतना आत्म-विस्मृत रहता है कि वह हेय और उपादेयमें तनिक भी विवेक नहीं कर पाता । फल यह होता है कि जो वस्तु उसे हानि पहुँचा सकती है वह उसीको लाभकर मान बैठता है और जब उस वस्तुसे, उसे आनन्द नहीं मिलता, तो वह निराश होकर उद्विग्न हो उठता है वह एक बार नहीं अनन्ते बार इस प्रकार मार्ग-भ्रष्ट होता है और दुख उठाता है। आत्माकी अनादिकालीन संसार-यात्रा अज्ञानमूलक ही है। अज्ञानके कारण उसकी प्रवृत्ति अन्तर्मुखी नहीं हो पाती। वह बहिर्मुखी रहती है और वह वाह्य जगत्के वैभवमें आनन्दकी खोज करता है। आनन्द और शान्ति आत्म-वस्तुएँ है। वे पर-वस्तुमें कैसे मिल सकती हैं। पर आत्मा का अज्ञान पर-वस्तुमें ही आत्म-वस्तुकी खोज करना चाहता है। वह बार-बार पर-वस्तुको पकड़ता है और उसमेंसे आनन्द और शान्ति निकालने का प्रयत्न करता है; पर प्रत्येक बार असफल रहता है और दुखी होता है। पता नहीं, इस आत्माने इस प्रकार कितने अनगिनत क्षण विवेक-विकल होकर निकाल दिये । विवेक-सूर्यके प्रकाशने कविवर भागचन्द्रकी अन्तरात्माके कोने- कोनेकों आलोकित कर दिया है। उन्हें स्व और परका बहुत स्पष्ट बोध हो चुका है। वह आज आत्मालोचन कर रहे हैं और उन्हें इस बातका वड़ा पश्चात्ताप और दुख हो रहा है कि न जाने कितने असंख्य क्षण उन्होंने अपनी अज्ञानावस्थामें व्यतीत कर दिये। कविवर कहते हैं:-
मोह-वारुणी पी अनादि तें पर-पद में चिर सोये ।
हे आत्मन् ! तुमने इतने दिन विवेकके विना ही बिता दिये । तुम अनादिकालसे मोहरूपी मदिराको पीकर चिरकाल तक ‘पर-पद’ में ही सोते रहे-अपनेको भूलकर पर-वस्तुको ही आत्म-वस्तु समझते रहे । तुमने उस आत्म-पदकी ओर ध्यान ही नहीं दिया, जो अनन्तगुणमय एवं चैतन्यपुञ्ज है और अनन्त सुखकी राशि है।
हे आत्मन् ! तुमने इतने दिन विवेकके बिना ही बिता दिये ! कविवरका आत्मालोचन आत्माकी विवेक-विकल-अवस्थाके मूल कारण तक पहुँचता है और देखिए, वह उसका कितना वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं:-